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मूछों वाली देवरानी – गृहलक्ष्मी कहानियां

अरे! कविता बेटा, जरा मेहमानों के लिए चाय नाश्ता तो ला। जी अम्मा, अभी लाई। मैं मेहमानों के सामने चाय और पकौड़े रख कर आ गई। वैसे तो अम्मा कभी मुझसे बहुत खास खुश नहीं रहती पर आज बहुत खुश है। देवरजी का रिश्ता जो आया है। मेरी परिवार में मैं हूं, मेरे पति जो कि एक अध्यापक हैं, मेरी प्यारी सासू मां जिन्हें मैं प्यार से अम्मा कहती हूं और मेरे देवर जी। देवरजी पढ़ने में बहुत अच्छे थे। थोड़े ही प्रयास में उन्हें अमेरिका में नौकरी मिल गई। जब से वह बाहर गए हैं मां के तो पैर ही जमीन पर नहीं रहते।

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उम्मीद – गृहलक्ष्मी कहानियां

मेरे विचारों में पहले से अधिक लचीलापन आ गया है। क्योंकि जिन्दगी सब चीजों से अधिक कीमती है। ये बात सही है क्वारटांइन का एंकात पीड़ा देता है पर यह खुद को करीब से महसूस भी करवाता है।

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फोन की घंटी लगातार बज रही थी – गृहलक्ष्मी कहानियां

फोन की घंटी लगातार बज रही थी। आज एकता ने सोच लिया था कि फोन नहीं उठाना है। सारा दिन फोन के ताने सुन-सुनकर उसके कान पक गए। जब मैं काम करती हूं तो कोई नहीं देखता मुझे।

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उधार वाले खिस्को – गृहलक्ष्मी कहानियां

आज भोगीलाल जी मिले तो उनके रंग-ढंग निराले थे। हाथ में गोल्डन घड़ी। गले में गोल्डन चेन। आंखों पर गोल्डन चश्मा। गोल्डन मोबाइल। गोल्डन चेन से बंधा गोल्डन पट्टे वाला गोल्डन रिट्रीवर। छोटे-मोटे बप्पी लाहड़ी नज़र आ रहे थे अपने भोगी भाई। मैं चौंक गया। सामान्य सी नौकरी करने वाला व्यक्ति अचानक इस भेष में? और आज वो मुझसे मिले बिना ही निकले जा रहे थे। मुझे आवाज़ देकर बुलाना पड़ा।

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सर दर्द है मिस्टर पॉजिटिव – गृहलक्ष्मी कहानियां

भाई साहब मैं तो अपने पड़ोस में रहने वाले मिस्टर पॉजिटिव से बड़ा परेशान हूं। पता नहीं वह अभी तक आप से मिले हैं या नहीं, अगर नहीं मिले हैं, तो मैं दुआ करता हूं कि आपकी उनसे मुलाकात न ही हो तो अच्छा है।

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प्रारंभ का अंत – गृहलक्ष्मी कहानियां

वीरेंद्र शान्त खड़ा था, अचला कह रही थी – – मैंने तुम्हे कभी प्यार नहीं किया था, तुम्हारी तरफ देख क्या लिया ,तुम-से बात क्या कर ली- – तुमने उसे प्यार समझ लिया? और मुझे बदनाम कर बैठे।

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जानिए हिंदी भाषा पर महान व्यक्तियों के विचार – गृहलक्ष्मी कहानियां

हिंदी ना सिर्फ एक भाषा है बल्कि ये हमारी राष्ट्रीयता की पहचान भी है, ऐसे में हिंदी की महत्ता को लेकर देश के महान शख्सियतों ने काफी कुछ कहा है, जिसे जानना हम सबके लिए काफी उपयोगी है।

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दीप -पर्व मनाएँ पारम्परिक अंदाज में

आज की भागदौड़ और रफ्तार से भागती जिंदगी में हमारी खुशियां और रिश्ते सब पीछे छूटते जा रहे हैं। व्यस्त दिनचर्या के चलते चाहते हुए भी हम अपने और अपनों के लिए वक्त नहीं निकाल पाते। ऐसे में त्योहारों का आना एक बहाना बन जाता है। खुशियों के पल जीने का।

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