रात के दूसरे पहर जब गांव अंधेरे में डूबने लगा, तब देवू चुपके से खिड़की फांद कर कमरे में प्रविष्ट हुआ और गहरी नींद सो रहे बीरू को झकझोरते हुए उठाने की कोशिश की।
‘सोने दे अम्मां! उस पर नींद का खुमार था।
‘मैं अम्मा नहीं, देवू हूं। ‘देवू तुम! बीरू आंखें मलता बोला। अनायास उसे याद आया, उसने आज देवू के साथ चौधरी के खेतों से भुट्टे चुराने जाना है। वह बिस्तर छोड़ उठ गया। थोड़ा पानी पीकर उसने खूंटी पर लटके बोरे को कंधे पर डाला और देवू के साथ घर से निकल गया।
अनपढ़ देवू और बीरू गांव के मवेशी चराते थे, लेकिन दोनों इससे छुटकारा पाना चाहते थे।
पिछले रोज वे बैजनाथ शहर गए थे। बस अड्डे पर कई बसें खड़ी थी। अड्डे के अंतिम छोर पर एक छोटी उम्र का लड़का अंगीठी पर भुट्टे भून रहा था। कुछ लोग भुट्टे खरीदने खड़े थे। देवू ने उससे पूछा, ‘एक भुट्टा कितने का?
‘पांच रुपये लड़के ने कहा।
‘पांच रुपये का भुट्टा! देवू स्तब्ध रह गया।
‘भुट्टा गरम करूं क्या?
‘नहीं देवू अचकचाते हुए बोला।
उस लड़के ने कुछ ही देर में बीस भुट्टे बेच कर सौ रुपया जेब में डाला और वहां से चला गया। देवू और बीरू अवाक उसेजाता देखते रहे।
‘सौ रुपये! जिसे पाने के लिए हमें पूरे महीने गांव के मवेशी चराने पड़ते हैं। भूल से कोई मवेशी किसी के खेत में मुंह मार ले तो गाली-गलौच के साथ पिटाई की नौबत आ जाती है। इस काम से मेरा मन भर गया है। बीरू ने कातर स्वर में कहा। ‘तुम ठीक कहते हो। देवू बोला।
‘क्यों न हम गांव से भुट्टे चुराकरबसअड्डे पर भुट्टे बेचने का धंधा करें? एक दिन में पांच सौ रुपया कमाना मामूली बात होगी। बीरू ने कहा। देवू ने हां में सिर हिलाया। दोनों दोस्त अपनी इस कल्पना कर फूले न समा रहे थे। अमीर बनने का शार्टकट सोच उनके पांव धरती पर न पड़ रहे थे।
अगले रोज मवेशी चराते समय दोनों भुट्टे किस खेत से चुराएं, इस बारे में बात कर रहे थे। बहुत माथा-पच्ची के बाद उनकी आंखें चौधरी के खेतों पर अटक गई, जो, गांव से अलग श्मशान घाट के आगे थे। बीच में नहर बहती थी। पानी से उठता शोर भुट्टे तोडऩे की आवाज को दबाने और श्मशान में भूत-प्रेतों का डर उन्हें गांव वालों की नजरों से बचाने में सहायक होगा।
दोनों श्मशान से गुजरे। वहां झाडिय़ों से झींगुर, कीट पतंगों की आवाजों से वातावरण में भय था। पर दो होने से वे निडर थे, उस पर हरे-नीले नोटो का लालच। वे खेतों में घुस गए।
चौधरी के खेतों में भुट्टों की फसल सामान्य से अधिक हुई थी। भुट्टी के डंठलों से भूमि जंगल की तरह दिख रही थी। भुट्टे तोडऩे से पहले देवू ने बीरू के कान में कहा, ‘बीरू, सौ भुट्टे तोडऩा अधिक नहीं। ‘अच्छा बीरू ने कहा।
थोड़ी देर में दोनों अपने-अपने बोरे उठाए खेतों से बाहर निकले। श्मशान के पास एक चट्टान की ओट में बैठ वे बीड़ी पीने लगे। कुछ देर इधर-उधर की बातें कर सुबह होने से पूर्व दोनों अपने कमरे में पहुंच गए। भुट्टों के बोरों को छिपा वे बिस्तर में दुबक गए। एक ही बात उनके जहन में थी, कब भुट्टों को बाजार ले जाकर बेचें और कब उनकी जेब भरे।
अगली सुबह पौ फटने से पूर्व दोनों कंधों पर बोरे उठाए बैजनाथ जा रहे थे। उस रोज उन्होंने काम का बहाना बना कर मवेशी चराने से छुट्टी ले ली थी। बस अड्डे के भुट्टे भूनने के लिए स्थान चुनकर देवू कोयला खरीदने और बीरू आग जलाने के लिए सूखी-लकडिय़ां इकट्ठी करने लगा। थोड़ी देर बाद वही लड़का जिसे देवू और बीरू ने भुट्टे बेचते देखा था भुट्टों भरा टोकरा सिर पर उठाए बीरू की बगल में बैठ गया। बीरू को आग जलाते देख उसने बुरा सा मुंह बनाया और भुट्टे भूनने में व्यस्त हो गया। देखते ही देखते उसने चार भुट्टे गर्म किए और नींबू-नमक लगाकर जोर-जोर से आवाजें लगाने लगा, ‘ताजा मसालेदार भुट्टा ले लो…! उसके चार भुट्टे बीस रुपये में बिकते देर न लगी। वह चार और भुट्टे अंगीठी में डालकर पंखा फेरने लगा। बीरू टुकर-टुकर उसे देखता रहा।
देवू कोयला लिए आया। बीरू ने छोटी-छोटी सूखी लकडिय़ां तैयार रखी थीं। दो-तीन रद्दी कागज लकडिय़ों के बीच रखकर उसने आग जला दी। कोयला गर्म होते ही देवू भुट्टे गर्म करने लगा। बीरू ने अचानक देवू की उंगली में चमचमाती अंगूठी देखी तो पूछा, ‘नई ली क्या?
‘हां, कोयले की दुकान के बाहर बैठा बाबा कह रहा था, ‘अंगूठी तांत्रिक हैं। जो काम शुरू करोगे खूब चमकेगा… ‘कितने की? ‘दो रुपये की।
‘एक अंगूठी मैं भी ले लूं। बीरू ने खिसियाते हुए कहा। ‘पगले, हमारा काम अलग थोड़े है। मैंने डाली या तूने, बात तो एक ही है। कुछ दिन मैं डाल लेता हूं, जब काम अच्छा चल पड़ेगा तब इसे तू डाल लेना।
‘ठीक है कह कर बीरू ने देवू के हाथ से पंखा लिया और कोयलों को तेज हवा देने लगा। दो भुट्टे गर्म हो गए थे।
‘भुट्टे ले लो। बीरू ने आवाज लगाई।
‘कैसा मरियल सा बोल रहा है, जैसे दो दिनों से भूखा हो। जोर से हांक लगा। देवू ने उकसाया।
‘तू आवाज लगा, मुझे शर्म आ रही है।
‘नरम मीठे भुट्टे लो। देवू गला फाड़ चिल्लाया।
‘भुट्टे कैसे दिया? एक मुसाफिर ने पूछा।
‘पांच रुपये देवू ने कहा।
‘भुट्टा चार रुपये। बगल में बैठा लड़का भुट्टे पर नमक-नींबू लगाते बोला। मुसाफिर दूसरी ओर मुड़ गया। देवू-बीरू बगले झांकते रहे।
‘अभी पांच रुपये में बेच रहा था… बीरू ने आश्चर्य से कहा। ‘हूं देवू सिर खुजलाते बोला।
दोपहर तक उनका एक भी भुट्टा न बिका। दो सेर कोयला जल कर राख हो गया।
‘बीरू, कच्चे भुट्टों का ही सौदा कर लेते हैं। देवू ने कहा। ‘हां, यही ठीक रहेगा। बीरू ने कहा। दोनों बाजार आ गए। एक सब्जी की दुकान में एक टोकरे में कच्चे भुट्टे पड़े थे। देवू ने बीरू को इशारा किया।
‘भुट्टे खरीदोगे? बीरू ने दुकानदार से पूछा।
‘हां। ‘क्या भाव?
‘साठ रुपये क्विंटल।
‘यह तो बहुत कम है। भूना भुट्टा पांच रुपये में बिकता है। देवू ने कहा।
‘कच्चे भुट्टे में पत्तों का भार अधिक होता है। दुकानदार ने तर्क दिया। ‘फिर भी इस भाव हम भुट्टा नहीं बेचेंगे देवू ने कहा।
‘किस भाव दोगे? दुकानदार हाथ में आया माल गंवाना नहीं चाहता था।
‘सौ रुपये क्विंटल बीरू बोला।
‘अस्सी रुपये मंजूर है, तो दे दो।
‘ठीक है वजन करो। देवू दोनों बोरे दुकानदार के आगे रखते हुए बोला।
‘नब्बे किलोग्राम। दुकानदार ने भुट्टों का वजन कर पचहत्तर रुपये देवू के हाथ थमाते हुए कहा, ‘जब भी भुट्टे बेचने हों, यहां चले आना। मैं तुम्हें अधिक पैसे दे रहा हूं।
दोनों ने ‘हां में सिर हिलाया और गांव चल पड़े।
‘बीरू, अगली बार हम दो क्विंटल भुट्टे बेचेंगे। इससे हमें अच्छे पैसे मिलेंगे। देवू ने कहा। ‘यह ठीक रहेगा। बीरू ने उत्साह भरे स्वर में कहा।
एक सप्ताह बाद आधी रात दोनों फिर चौधरी के खेतों में थे। वे अलग-अलग खेतों से भुट्टे तोड़ रहे थे। बीरू का भुट्टों से आधा बोरा भर गया था। वह आज बोरे के वजन का अनुमान लगा रहा था।
अनायास निस्तब्ध रात्रि में उसे देवू के चिल्लाने का स्वर सुनाई दिया। बीरू का हाथ भुट्टे तोड़ते रुक गया। वह भागता हुआ देवू के पास पहुंचा। देवू पांव पकड़े चीख रहा था।
‘क्या हुआ देवू?
‘बीरू, मुझे सांप ने काट खाया… मैं नहीं बचूंगा। वह रोता हुआ बोला।
बीरू को जैसे काठ मार गया। उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। थोड़ी देर वह देवू को तड़पते देखता रहा। उसकी सिसकियां धीरे-धीरे शिथिल पडऩे लगी और उसने दम तोड़ दिया।
देवू को मरा देख बीरू बदहवास सा गांव की ओर भागा। श्मशान उससे पीछे छूटते जा रहे थे। उसे सिर पर देवू की मौत का भूत सवार था। घर पहुंचा तो उसका शरीर पसीने से तर था। सुबह होने में अभी समय था। वह चुपचाप बिस्तर में पसर गया। सुबह वह जल्दी ही मवेशी लिए चारागाह चला गया।
दोपहर गांव की ओर से शंख और रोने की आवाजें सुनाई देने लगी। बीरू मन ही मन कांप उठा। ‘बीरू, देवू मर गया। गांव का एक आदमी खबर लाया।
‘देवू मर गया, कैसे? बीरू अनजान बनते बोला। ‘वह चौधरी के खेत से भुट्टे चुरा रहा था… उसे सांप ने काट लिया।
बीरू बेमन सा मवेशी लिए गांव लौटा। वह देवू के घर गया। वहां आंगन में देवू की लाश सफेद चद्दर से ढकी थी। शवयात्रा में बीरू देवू की अर्थी को कंधा दिये सबसे आगे चल पड़ा। शवयात्रा में शामिल लोग कानाफूसी कर रहे थे।
‘देवू को अपने कर्मो का फल मिल गया…।
‘कैसे? एक व्यक्ति ने पूछा।
‘चौधरी कह रहा था देवू अकेला न था… बीरू के पांव लडख़ड़ाने लगे।
‘वहां दो बोरे पड़े थे। ‘उसे भी अपने कर्मो का फल मिलेगा। एक बुजुर्ग ने कहा।
बीरू को लगा अचानक अर्थी भारी हो गई है।
श्मशान आ चुका था। देवू का पार्थिव शरीर चिता पर लिटा दिया गया।
‘चिता को अग्नि कौन देगा? मरघट का बाबा लोगों से पूछ रहा था। ‘मैं अग्नि दूंगा… वह मेरा दोस्त था। बीरू ने कहा।
बाबा ने जलती लकड़ी बीरू के हाथ में थमा दी। बीरू ने बिना समय गंवाए जलती लकड़ी चिता में रखी सूखी घास में डाल दी। चिता धधक उठी। बीरू देवू की लाश को निहारता रहा जब तक कि पूरी लाश स्वाहा न हो गई। उसने संतोष की सांस ली। देवू के साथ गहरा राज भी जलकर राख हो गया था।
शाम ढल चुकी थी। मातम में आए लोग वापस जा चुके थे। बीरू अकेला रह गया था। बीरू ने श्मशान से पूर्व विश्वास पाने के लिए कहीं देवू के शरीर का कोई भाग जलने से तो नहीं रह गया, बांस की खपची को लाश के बीच घुमाया। जैसे ही उसने बांस की खपची वापस खैंची उसकी आंखों से आंसू टपक पड़े। खपची के सिरे वाली कील में देवू की तांत्रिक अंगूठी फंसी थी।
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