Women Poem in Hindi: स्त्री जब खुश होती है
बर्तन माजते माजते ,
कपड़े धोते-धोते ,
रोटी बेलते बेलते ,
सब्जी में छोका लगाते लगाते
वो खुशी में गुनगुनाती है ।
प्याज छिलते छिलते
आंखों में आंसू लिए भी
वह गुनगुनाती है
माथे पर ओस की तरह चमकती
पसीने की बूंदे भी
उसको विचलित नहीं कर पाती
वह अपने अंदर खोई हुई ,
होने के बाद भी
काम करते-करते गुनगुनाती है।
कभी अकेले खामोश
चारदीवारी में भी गुनगुनाती है
सुबह से शाम तक
चक्की की तरफ पिसते पिसते
भी खुश होकर गुनगुनाती है
वह बच्चों की भागमभाग
बच्चों की फरमाइश
और रिश्ते नाते निभाते निभाते
भी खुश होकर ,
खुद को खुश रखने के लिए
गुनगुना लेती है ।
वह सांसारिक दुखों से
परेशान होकर बुद्ध की तरह
घर नहीं छोड़ती
वह उर्मिला बन
लक्ष्मण की प्रतीक्षा में
दीपक की तरह
जलते हुए गुनगुना लेती है
वह गंगा की पवित्र
नदी की तरह बहते हुए
अठखेलियां करते हुए
भी गुनगुना लेती है।
अपने लिए वह
कुछ पल निकालती है
सारा काम निपटा कर
अपने अकेलेपन को
दूर करने के लिए भी गुनगुनाती है।
जब स्त्री खुश होती है
वो गुनगुना लेती है।
स्त्री गुनगुनाती है-गृहलक्ष्मी की कविता
