googlenews
भाई दूज—गृहलक्ष्मी की कहानियां: Bhai Dooj Story
Bhai Dooj

Bhai Dooj Story: कमरे की खिड़की खोलते ही हवा की मद्धिम मीठी सी लहर तन को छूकर मौसम के करवट बदलने का किस्सा कानों में हौले से कहकर निकल गई ।आसमान धुंध की चादर ओढ़े सो रहा था,ओस की मखमली बूंदे खिड़की के बाहर लगे गुड़हल के फूलों पर बरस रही थी,मानो नींद में सोते फूलों को छींटे मारकर जगाने का प्रयास कर रही हो। यादों में बहुत ताकत होती है, वो कल को आज में जिंदा रखती है। शुचि यादों के गलियारे में विचरण कर रही थी।गुड़हल का पेड़ उसे बहुत प्रिय था,माँ ने कितने प्यार से इसे आँगन में लगाया था। उसके सुर्ख चटख फूल उसे हमेशा आकर्षित करते थे।

“माँ!मैं इसकी कटिंग ले कर जाऊँगी?”

“क्यो री,तेरे शहर में भी तो मिलता होगा।क्या कहेंगे दामाद जी…दहेज में मायके से कूड़ा-करकट बटोरकर लेकर आई है।”

मिलने को तो सब कुछ मिलता था उसके शहर में पर माँ के हाथों का स्पर्श उसकी ममता,उसके आस-पास होने का अहसास उन बाजारू पौधों में कहाँ से लाती। माँ हमेशा कहती थी कि मायके की मिट्टी भी सोना होती है, सोना ही तो लाई थी वो… उस डंठल के माध्यम से वो अपनी खुशियाँ, माँ का आशीर्वाद, उनके साथ होने का अहसास लेकर आई थी। मायके से जब भी ससुराल के लिए निकलती तो न जाने क्यों मन में एक ही खयाल आता, खोयचें के साथ मायके की यादें, अपना बचपन, इस शहर को भी थोड़ा-थोड़ा अपने आंचल में बांध कर ले चले तो शायद उस से बिछड़ने का दर्द कुछ कम हो जाए।

आजकल जिंदगी न जाने क्यों ठहरी सी महसूस हो रही थी, इन दिनों मन के भीतर और बाहर बिखरा-बिखरा सा महसूस होता था। शाम को ही तो लौट कर आई थी वो मायके से…”अस्सी किलोमीटर की यात्रा भी कोई यात्रा है, जब चाहेगी तब गाड़ी उठाई चली आएगी।” यही तो कहा था माँ ने पर क्या पता था ये अस्सी किलोमीटर भी आठ सौ किलोमीटर की तरह भारी लगने लगेंगे। त्योहार के दिन, शरीर थक कर चूर हो गया था। तन से ज्यादा वो मन से थक गई थी।कभी-कभी बाहर को समेटते-समेटते इंसान खुद को समेटना भूल जाता है। वो दुनिया के सामने खुद को कितना शांत दिखाती थी पर जानती थी कि बाहर से शांत दिखने के लिए अंदर खुद से कितना लड़ना पड़ता है। माँ हमेशा कहती थी “कि बस अपने आप से मत हारना फिर आपको कोई नहीं हरा सकता।” आज तक लड़ती ही तो आ रही थी खुद से…कभी हारने नहीं दिया था उसने खुद को। वो खुद भी तो गुड़हल के फूल की तरह थी,दुनिया के लिए वो दिन भर खिलखिलाती और खुश दिखती पर रात के गहन अंधकार में सिमट जाती उनींदी हो जाती,डूब जाती अपने आप में… रेडियो पर गाना बज रहा था,”चंदा रे मेरे भैया से कहना बहना याद करें।”

शुचि की आँखों के सामने श्रवण का मासूम चेहरा और मुट्ठी में बंधा वो बटुवा याद आ गया, दिल की सियन एक-एक कर खुलती जा रही थी, शादी के बाद पहली बार भाई दूज पर गई थी वो कितना उत्साह था मन में पर…

“मेरी मम्मी कहती हैं कि शादी के बाद पहले भाई दूज में बेटियाँ मायके खाली हाथ नहीं आती। भाई-भाभी के लिए कपड़े, मिठाई और उपहार लेकर आती हैं। दीदी आप से बड़ी हैं, हमसे ज्यादा दुनिया देखी है उन्होंने.. इतनी भी अक्ल नहीं इनके ससुराल वालों को…भरा पूरा परिवार है किसी ने उन्हें समझाया भी नहीं।”

मुदिता की आवाज दूसरे कमरे तक आ रही थी।शुचि कट कर रह गई,अपने मायके आने के लिए अब इन सब बातों को भी सोचना पड़ेगा।श्रवण की पत्नी मुदिता उम्र में उससे कितनी छोटी थी पर उसने शुचि को कहने से पहले एक बार भी नहीं सोचा,हर घर का चलन, रीति-रिवाज,परम्परायें अलग-अलग होती है। उसे भी तो ये बात कहा पता थी..श्रवण शुचि से उम्र में छोटा था,पापा पहले ही गुजर गए थे। माँ यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाई और जल्दी ही वो भी इस दुनिया से कूच कर गई। माँ के मरने से पहले शुचि की शादी तय हो चुकी थी,गोद भराई भी हो चुकी थी पर माँ के न रहने से स्थितियाँ बदल गई थी ।शुचि के जाने के बाद श्रवण का क्या होगा यह सोचकर ताऊ जी ने श्रवण का आनन-फानन में विवाह करवा दिया। हालांकि ताऊजी पीछे वाली गली में ही रहते थे पर शुचि की शादी हो जाने के बाद श्रवण की जिम्मेदारी उनके ऊपर आ जाती,इसलिए इससे बेहतर उपाय उन्हें और कोई नहीं सूझा।

मुदिता का मायका उसी शहर में था, मायके वालों का आना-जाना हमेशा लगा ही रहता था। शनिवार और रविवार की रात मायके में ही बीतती थी। श्रवण के मुँह से अक्सर सुना था कि वह अपने ससुराल वालों के साथ घूमने गया था। कहीं ना कहीं शुचि अब बेफिक्र थी कि श्रवण अपनी जिंदगी में खुश है उसकी जिम्मेदारियाँ कम हो रही है पर कहना जितना आसान था होता नहीं है। अपने मन को समझाती पर बड़ी बहन होने का फर्ज उसे बार-बार याद आ जाता। अभी उसकी उम्र ही कितनी है, अभी कुछ ही सालों पहले की तो बात है निक्कर पहने उसके सामने दौड़ता रहता था। पापा एक छोटी सी नौकरी करते थे घर में पैसा तो नहीं था पर प्यार बहुत था। महीने के अंत तक आते-आते घर की जमा पूंजी खत्म होने लगती थी पर माँ ने उन्हें पालने-पोसने में कोई कमी नहीं छोड़ी थी। माँ के पास जो कुछ भी होता दोनों भाई-बहनों में बराबर से बांटा जाता। याद है उसे कभी-कभी पैसे की कमी के कारण दूध नहीं हो पाता था, कितने लोगों के मुँह से सुना था कि माएँ बेटों की खातिर बेटियों से बेईमानी कर जाती हैं पर माँ ऐसी नहीं थी। श्रवण दूध पीने का बहुत शौकीन था, शुचि हमेशा अपने मन को समझा देती कि वह अभी छोटा है उसे दूध की जरूरत है पर माँ उस दूध में पानी मिलाकर दोनों को बराबर-बराबर बांट देती।शुचि आज सोचती है कि माँ दूध में तो मिलावट कर देती थी पर उसकी ममता में मिलावट कहीं नहीं थी।

शिवरात्रि के मेले से ख़रीदी गई श्रवण की गुल्लक में उसकी सारी दुनिया सिमट सी जाती थी। माँ दोनों को दो-दो रुपये देती,शुचि हर साल मेले से चूल्हे का सेट ख़रीदती और श्रवण मुँह से फूंकने वाला बाजा… माँ हमेशा कहती, “बड़ा कंजूस है पैसा बचाकर अपने गुल्लक में डाल देता है।”

याद है उसे आज भी वो दिन, घर मे सोंधी-सोंधी खुशबू फैली हुई थी,माँ रसोईघर में हलवा बना रही थी। माँ जानती थी बाजार की मिठाई से ज्यादा माँ के हाथों का हलवा दोनों भाई-बहन को पसन्द है। उस दिन श्रवण बिना टोके नहा-धोकर आँगन में पटरे पर बैठ गया था।

“माँ! देख रही हो आज बिना कहे नहा-धोकर बैठ गया है, वरना रोज नहाने के लिए पीछे-पीछे दौड़ते रहो। अपनी पूजा करवाने का कितना शौक है, ऐसे बैठा है जैसे कहीं का महाराजा हो।अभी तो आपने आँगन में चौक भी नहीं पूरी है।”

माँ मुस्कुरा दी थी,जानती थी श्रवण पूजा के लिए नहीं उस हलवे के लिए नहा-धोकर बैठ गया था,वो ये बात जानता था माँ पूजा के बिना हलवा नहीं देगी।शुचि न जाने क्यों थोड़ा चिढ़ सी गई थी उसके भी तो अरमान थे कि श्रवण उसके हाथ में कोई अच्छा सा उपहार रखे पर वह कंजूस हमेशा यही कहता “मैं कोई कमाता थोड़ी हूँ।” आज सोचती हूँ तो हँसी आती है, था ही कितना बड़ा… बित्ते भर का छोकरा पैसे लाता भी तो कहाँ से… माँ अपने आंचल की गांठ को खोल कर अपनी जमा पूंजी श्रवण के हाथ पर रख देती।

“ले अपनी दीदी को दे दे…पटरे से ऐसे सूने हाथ नहीं उठते..बहनों को देने से घर में समृद्धि आती है अच्छी तरह से ये बात गाँठ में बांध लो।”

पर उस दिन नन्हे श्रवण ने माँ से पैसे नहीं लिए,उसने गुल्लक तोड़ दी थी,साल भर से गुल्लक में जमा कर रहे सिक्कों को उसने शुचि के हाथों में रख दिया।
“दीदी!अब मैं बड़ा हो गया हूँ, ये लो तुम्हारा नेग…इससे कोई अच्छी सी चीज खरीद लेना।”

श्रवण के मुँह से इतनी बड़ी-बड़ी बातें सुन माँ की आँखें सजल हो गई।उनका छोटा सा शरारती श्रवण कब इतना बड़ा हो गया, उन्हें पता भी न चला। याद है उसे आज भी वो दिन जब माँ मामा को टीका करने के लिए उनके घर जाती थी। मामा एक रुपए का सिक्का उनके हाथों पर रख देते और माँ उस सिक्के को माथे से लगाकर अपनी अलमारी के अंदर वाली तिजोरी में एक डिब्बे के अंदर रख देती। हर दूसरे-तीसरे दिन जाने क्यों वो उस डिब्बे को खोलकर सिक्के को देखती ,शायद उस सिक्के के रूप में बचपन की यादें, रिश्तों की गर्माहट और मामा के प्यार को वो महसूस करना चाहती थी पर माँ ये कहाँ जानती थी कि उनकी बेटी के भाग्य में ये प्यार कब तक बदा है। वक्त के साथ भाई दूज पर एक साड़ी और एक किलो मिठाई देना भी इस घर को भारी पड़ने लगा था। शुचि ने एक बार मुदिता को अपने मायके वालों से फोन पर बात करते सुन लिया था,

” मम्मी!कहने को तो अस्सी किलोमीटर पर रहती है पर साल में तीन-चार बार चक्कर मार लेती है।इस महंगाई के जमाने में हर बार साड़ी-मिठाई देना कहाँ तक सम्भव है। पिछली बार तो श्रवण से मेरी इस बात पर लड़ाई भी हो गई थी। अपने लिए दिलाने को कहो तो इनके पास पैसे नहीं होते पर बहन के लिए खजाना खुल जाता है।”

कितना मन दुखा था उस दिन…हर बार सोचती की अब वो भाई दूज पर नहीं आयेगी।नहीं चाहिए ऐसी विदाई जिसमें प्यार कम बोझ ज्यादा हो पर ज्यों-ज्यों त्योहार पास आने लगता मन बेचैन हो जाता और वो सारा मान-अपमान भूल कर भाई को टीका लगाने पहुँच जाती।मुदिता का मायका भी तो उसी शहर में था, श्रवण के टीका लग जाने के बाद वो भी अपने बड़े भाइयों का टीका काढ़ने मायके चली जाती और उधर से उपहारों से लदी-फदी आती। कितने चाव से दिखाती थी वो एक-एक उपहार..

“दीदी!पिछली बार बड़े भैया से वायदा लिया था,अबकी बार कान के झुमके लूंगी।ये देखिये बड़े भैया ने कितने सुंदर झुमके दिए है।बड़ी भाभी ने अपनी तरफ से ये साड़ी भी दी है।”

उसके चेहरे की चमक देखकर शुचि ने हुलस कर पूछा था,

“और छोटे वाले भाई ने?”

मुदिता का चेहरा उतर गया,

“शादी के पहले सबसे ज्यादा उसी से मेरी पटरी खाती थी,मेरी शादी के वक्त कितना रोया था वो…पर अब देखो बहन के लिए सारा प्यार कपूर की तरह उड़ गया। बहुत तेज़ है उसकी बीवी,एक रुपये खर्च नहीं करना चाहती। ये देखिये सस्ता सा सलवार सूट पकड़ा दिया,निशातगंज में सात-सात सौ का मिलता है।”

उसके उतरे हुए चेहरे को देखकर शुचि ने बड़ी बहन होने का फर्ज निभाते हुए उसे समझाने का प्रयत्न किया।

“हर आदमी अपनी हैसियत और इच्छाशक्ति से देने की कोशिश करता ही है।वैसे भी किसी के एक साड़ी या सूट देने से तुम्हारी जिन्दगी नहीं गुजर जाएगी।”

“दीदी!बड़े भैया हमेशा अच्छे और महंगे उपहार देते हैं पर छोटा… मैंने दोनों में कभी कोई भेदभाव नहीं किया।एक जैसी मिठाई लेकर जाती हूँ,कम से कम इतना तो सोचना ही चाहिए।जितना बहन ने दिया है उतना तो वापस कर दूँ।”

शुचि सोच रही थी कि ये कैसा रिश्ता है जहाँ एक हाथ ले एक हाथ दे की बात की जाती है। क्या हम बच्चे हैं जहाँ जन्मदिन पर उपहार के बदले उपहार मिलता है। अगर हाँ तो हम प्यार और विश्वास का आदान-प्रदान क्यों नहीं करते। क्यों नहीं एक-दूसरे को यकीन दिलाते हैं कि कैसी भी परिस्थितियाँ हो हम एक-दूसरे के लिए खड़े हैं पर उस घटना से शुचि ने एक सबक जरूर सीख लिया था।वो खाली हाथ तो पहले भी नहीं आती थी पर अब वो श्रवण के साथ-साथ मुदिता के लिए भी साड़ी… महँगी ब्रांडेड साड़ी लेकर जाने लगी थी। मुदिता कितना खुश हुई थी उस साड़ी को देखकर… मुदिता को खुश देखकर शुचि भी खुश होने का प्रयास कर रही थी पर मन में एक कसक सी थी। चेहरे पर इस खुशी को देखने के लिए उसे कीमत चुकानी पड़ रही थी। हमेशा की तरह शुचि ससुराल वापस जाने के लिए सामान गाड़ी में रखवा रही थी।मुदिता और श्रवण उसे बाहर तक छोड़ने आये थे। तभी श्रवण ने कहा,
“मुदिता! कमरे से मेरा मोबाइल ले आओ,एक जरूरी फोन आने वाला है।कहीं ऐसा न हो बजता ही रह जाये।”
मुदिता श्रवण और शुचि को छोड़कर घर के अंदर चली गई। मुदिता के जाते ही श्रवण ने अपनी पैंट की जेब से एक छोटा सा बटुवा निकाला और शुचि के हाथों में रखकर बड़े प्यार से बोला,
“दीदी! अपनी पसंद की साड़ी खरीद लेना। माँ हमेशा कहती थी न बहनों को देने से घर में समृद्धि आती है।”

शुचि आश्चर्य से श्रवण को देख रही थी न जाने क्यों उसे श्रवण में आज वही निक्कर वाला छोटा सा प्यारा सा श्रवण नजर आ रहा था। उसकी छोटी-छोटी हथेलियों में रखे गुल्लक के सिक्के अब नोटों में बदल चुके थे पर प्यार आज भी वैसा ही निश्छल था,न जाने क्यों शुचि की आँखें भर आई थी।

Leave a comment