बंटवारा-गृहलक्ष्मी की कविता
Batwara

Hindi Poem: घर बंट रहा नहीं है ये किसी का,
किसी का संसार बंट रहा।
होता देख बंटवारा घर का आज
एक मां का कलेजा फट रहा।

बचपन में चूरन टाफी मीठी गोलियां बांटने वाले भाई
आज जायदाद बांट रहे,
पहनते थे जो कपड़े एक दूजे के प्रेम से,
आज जायदाद की खातिर
भरे बाजार आज एक दूसरे की इज्जत उतार रहे।

लड़ते थे जो बचपन में मां के साथ सोने के लिए,
आज उस मां को ही एक दूजे की और धकेल रहे,
करके मां-बाप के ही हिस्से,
उन्हें किस्तों में पाल रहे।

पाल लिया जिस मां-बाप ने
चार-चार औलादे को एक साथ,
उन मां-बाप को ही अब चार-चार औलादे
अब  दो हिस्से कर रहे।
बचपन में चूरन चटनी बांटने वाले भाई आज,
जायदाद के लिए लड़ रहे।

भूल गये खून का रिश्ता,
एक दूजे के खून के प्यासे हो रहे।
भूल गए वो बचपन की याद सुहानी,
अब कुटिल पर कुटिल चालें चल रहे।
बचपन में एक थाली में खाने वाले ही एक मां के बच्चे आज,
जायदाद के लिए लड़ रहे।

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