Summary : इन किलों कि सबसे ख़ास बात
ये किले केवल पत्थरों की संरचना नहीं थे बल्कि स्वाभिमान, रणनीति और आत्मसम्मान के जीवित प्रतीक थे। जिसकी वजह से इन किलों का आज भी बहुत ही ज़्यादा महत्व है।
Unconquered Forts of India: भारत का इतिहास केवल पराजयों की कथा नहीं है। यह उन अडिग किलों की भी कहानी है जिनकी दीवारों से टकराकर साम्राज्यवादी ताक़तों का घमंड टूट गया। अंग्रेज़ों ने युद्ध, कूटनीति और छल यानी कि हर तरीका अपनाया, पर कुछ किले ऐसे रहे जिन पर उनका झंडा कभी नहीं फहराया जा सका। ये किले केवल पत्थरों की संरचना नहीं थे बल्कि स्वाभिमान, रणनीति और आत्मसम्मान के जीवित प्रतीक थे। जिसकी वजह से इन किलों का आज भी बहुत ही ज़्यादा महत्व है। लोग दुनिया के कोने-कोने से इन्हें देखने के लिए आते हैं।
मेहरानगढ़ किला

जोधपुर का मेहरानगढ़ किला अरावली की चट्टानों पर नहीं बल्कि इतिहास की रीढ़ पर खड़ा प्रतीत होता है। कुछ लोग तो इसे मरुस्थल की अजेय दीवार कहते हैं। इसकी ऊँचाई, संकरे प्रवेश द्वार और अंदरूनी सुरक्षा व्यवस्था इतनी सुदृढ़ थी कि अंग्रेज़ कभी प्रत्यक्ष युद्ध का साहस नहीं कर पाए। राजनीतिक समझौतों के दौर में भी यह किला राजपूत स्वाभिमान का केंद्र बना रहा और अंग्रेज़ी सत्ता इसकी दीवारों के बाहर ही सीमित रही।
कुम्भलगढ़ किला
कुम्भलगढ़ की दीवारें केवल लंबाई में नहीं बल्कि आत्मबल में भी महान थीं। अरावली की दुर्गम पहाड़ियों के बीच बसे इस किले तक पहुँचना ही किसी चुनौती से कम नहीं था। अंग्रेज़ों ने इसे सैन्य दृष्टि से व्यावहारिक लक्ष्य नहीं माना। यह किला इस बात का प्रमाण है कि भौगोलिक समझ और प्राकृतिक सुरक्षा कैसे किसी साम्राज्य को रोक सकती है।
जैसलमेर किला

थार के बीच खड़ा जैसलमेर किला केवल एक किला नहीं बल्कि एक चलता-फिरता शहर है। इसकी स्थिति और आसपास का कठोर रेगिस्तानी वातावरण अंग्रेज़ों के लिए बड़ी बाधा रहा। यहाँ युद्ध से ज़्यादा समझदारी और स्थानीय सत्ता का सम्मान काम आया। अंग्रेज़ों ने इसे जीतने के बजाय इसके साथ सह-अस्तित्व को चुना।
लोहागढ़ किला
लोहागढ़ किला इस मायने में अनोखा है कि यह पत्थर नहीं बल्कि मिट्टी से बना है। बावजूद इसके, अंग्रेज़ों की आधुनिक तोपें भी इसकी दीवारें नहीं तोड़ सकीं। भरतपुर के जाट शासकों ने इस किले को अंग्रेज़ी सेना के लिए एक पहेली बना दिया। बार-बार के आक्रमणों के बावजूद लोहागढ़ अडिग रहा और अपनी कारीगरी के बदौलत अपना इतिहास रच दिया।
जिंजी किला

तमिलनाडु का जिंजी किला जिसे ‘पूर्व का ट्रॉय’ कहा जाता है अपनी बहुस्तरीय रक्षा प्रणाली के लिए प्रसिद्ध है। पहाड़ियों पर फैला यह किला इतना जटिल था कि अंग्रेज़ों ने इसे सीधे जीतने का प्रयास नहीं किया। इसकी संरचना और स्थानीय प्रतिरोध ने इसे लगभग अभेद्य बना दिया। जिसकी वजह से उन्हें वापस लौटना पड़ा और जिंजी का किला एक प्रतीक बन गया।
इन किलों की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि भारत की आज़ादी केवल 1947 की घटना नहीं बल्कि सदियों से चले आ रहे प्रतिरोध की परिणति है। जब हम इन अजेय किलों को देखते हैं तो गर्व होता है कि हमारी धरती पर ऐसे दुर्ग रहे हैं जिन्होंने केवल युद्ध नहीं लड़े बल्कि आत्मसम्मान की रक्षा की। ये किले आज भी खड़े होकर कहते हैं कि हर साम्राज्य अजेय नहीं होता।
