Mother Poem: सोचती हूं कभी की, क्या कभी मां भी कमसिन रही होगी?
क्योंकि हमने तो बस हमेशा मां को सिर्फ मां ही होते देखा
ना देखा उनका बचपन,
ना उन्हें जवां होते देखा,
मां को बस हमने मां होते देखा…
कितनी खूबसूरत लगी होगी मां मेरी,
जब उनके द्वारे पर शहनाई बजी होगी।
हर कली मुस्कुराई होगी,
जब मेरी मां दुल्हन सी सजी होगी।
मां को बस हमने मां होते देखा…
मां को भी कभी ना हमने,
बहारों की तरह गुनगुनाते देखा
लाड़ लड़ाते हुए बच्चों को अपने बस,
मीठी सी लोरी सुनाते हुए देखा।
मां को बस हमने मां होते देखा…
मां को बस हमने चूल्हे के संग देखा,
देखा मां को गृहस्थी में ही
जवानी से
बूढ़े होते हुए देखा।
मां को बस हमने मां होते हुए देखा…
सिमट गई सारी दुनिया मां की
उस मकान को घर बनाने में,
जिस घर के दरवाजे की नेमप्लेट पर
कभी किसी ने मां का नाम ना देखा।
मां को बस हमने मां होते हुए देखा…
मां के माथे पर हमने हमेशा
बाबूजी का श्रंगार देखा,
थकी हारी चाहें जितनी हो मां,
पर बाबूजी की खुशियों में उनके संग नाचते देखा।
मां को बस हमने मां होते हुए देखा…
आज मेरे सारे तीर्थ,
मेरी मां के नाम हो गए,
हो गए चारों धाम मेरे, जब कलम से मेरी,
मेरी मां का नाम लिखते देखा।
मां को हमने बस मां होते हुए देखा…
