Mother Poem: वो जो कहती थी “जाओ माँ…..
जब मैं हॉस्टल जाऊंगी
तुम्हें बिलकुल याद नहीं करूंगी”
वो अब मुझे दिन – रात याद करती हैं
तुम्हारें बगैर कितनी अधूरी हूँ माँ
ये शिकायत हर रात मुझसे करती हैं!
सिर्फ तुम्हारें इर्द -गिर्द हीं होने से
मेरी हर परेशानी दूर हो जाती थी
मैं खामोश रहती थी और
तुम सबकुछ समझ जाती थी!
वो प्यार भरा हाथ माँ…..
जब मेरे सिर पर फेर जाती थी तुम
ऐसा लगता था सारी बलाएं
तुम उनमें समेटकर ले जाती थी!
माँ वो स्पर्श याद आता हैं जो
सिर्फ तुम्हारें कंधे पर हाथ रखने से हीं
हौसला बन जाता था मेरा……
जो तसल्ली मुझे तुम्हारें होने से मिलती थी
वो अब ढूंढ़ने से भी नहीं मिलती हैं
वो लम्हा याद आता हैं माँ……
माँ मुझे घर बहुत याद आता हैं……..
खाना हर दिन बदल -बदलके मिलता हैं
पर वो स्वाद कहीं नहीं मिलता हैं
माँ तुम्हारें हाथ का जायका कहीं नहीं मिलता हैं….
जैसे – तैसे निवाला खा तो लेती हूँ
कैसे खाती हूँ ये देखने वाला नहीं मिलता हैं!.
मेरी पसंद , मेरी तमन्ना, मेरी चाहत
सब मुझसे ज्यादा तुम जानती हो माँ
शायद इसलिए तसल्ली वाली थपकी
अपने बातों में समेटकर वहीं से मुझे सुलाती हो
सच माँ……. तुम बहुत याद आती हो…….
ये कहती हो तुम,”मैंने तुम्हें जन्म दिया
इसलिए सबकुछ समझती हूँ बेटी ” पर माँ
मैंने भी तो जन्म लेकर
तुममें “माँ”को जन्मा हैं……….
हाँ माँ…….. सच में अपनी हर साँसों में
मैंने माँ को जीया हैं……………
माँ तुम बहुत याद आती हो-गृहलक्ष्मी की कविता
