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मेरा घर-21 श्रेष्ठ युवामन की कहानियां पंजाब: Hindi Kahaniya
Mera Ghar Hindi Kahaniya

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Hindi Kahaniya: यह हिन्दुस्तान है जनाब! इसकी सबसे बड़ी कमी है…अकेली लड़की को दबाना। मजाल है…एक अकेली लड़की रात-बिरात सफर करे या किसी पब्लिक प्लेस पर घूम-फिर सके, तब उसे एक सहारे की आवश्यकता होती है। दिन के समय वह बहादुर हो सकती है परन्तु रात को नहीं…। जब अंकल के घर से वह अपना सामान उठा कर अपने ऑफिस आ गई तो सारा दिन इसी चिन्ता में घुलती रही कि रात को वह कहां जाएगी? अंकल के घर से बहुत गुस्से के कारण और सम्मान के खातिर वह चल दी थी, सोचा था, अंकल बांह पकड़ कर बिठा लेंगे। अंकल तो फिर भी कहते रहे परन्तु आंटी से झिझकते हुए जबरदस्ती पकड़ कर बिठा न सके और वह तेज बारिश में ही तीन-चार बैगों में अपना छोटा-मोटा सामान और कपड़े भर कर निकल आई थी। आंखें बार-बार भर आतीं। उसने रोते हुए ही वहां से बस ली और ऑफिस पहुंच गई। बार-बार उसे यही ख्याल आता रहा कि उसके मां-बाप का घर होता तो क्या कोई उसकी चिन्ता न करता। उसे वापस लेने के लिए न आता। काश! उसका भी कोई घर होता। …’घर’ इस शब्द पर तो वह सदा ही भावुक होती रही थी।

‘घर’ दो ही अक्षरों का शब्द….परन्तु कितना अर्थपूर्ण है। सच में घर तो घर ही होता है, गर अपना हो। अपना छोटा-सा घर भले एक ही कमरे का हो, मगर उसमें अपनेपन का एहसास हो।

सारा दिन वह कितनी उदास रही। नई-नयी नौकरी थी। वह किसी को जानती-पहचानती नहीं थी। ना ही वह किसी कुलीग को अभी अच्छी तरह से जानती थी। अपनी इस स्थिति के बारे में वह किसी और को बता भी नहीं सकती थी। अंकल के घर से निकलते हए तो उसने यह सब सोचा ही नहीं था। तब तो बस एक ईगो थी, एक गैरत थी….परन्तु अब..? अब कहां जाऊं? लड़का होता तो यहां ऑफिस के लॉन में ही पड़ी रहती…। प्लेटफार्म पर ही जा कर लेट जाऊं…परन्तु लडकी…बेचारी कहां जाए? शाम जब गहरी हो गई तो बेगैरत हो, ढीठ बन, वही बहुत ही स्वाभिमानी लड़की बस से वापस अपने उसी अंकल के घर ही जा रही थी, जहां से सुबह तेज बारिश में बहती आंखों से निकली थी।

वहीं घर जहां उसके पापा उसे छोड़ गए थे, जहां रह कर वह आसानी से अपने ऑफिस जा सकती थी। डिग्री लेने के बाद अच्छी नौकरी करने पर, वह केवल अपने अंकल के घर पर ही महफूज रह सकती थी। रात की आहट के साथ ही वह उस घर में वापस आ गई थी, जहां उसे वापस देख कर सभी अचंभित रह गए। आंटी और उसकी बेटियां हैरान-सी खड़ी उसे देखती रह गईं। वह कांपती टांगों से ड्राईंगरूम में जा बैठी और रोने लगी। उसने सोचा था, शायद आंटी आ कर उसकी पीठ सहलाते हुए कहेगी, “अच्छा हुआ, तुम वापस आ गई। मुझे बहुत फिक्र हो रही थी…।” लेकिन उसके पास कोई न आया।

वह खुद ही कुछ देर बाद बोली, उसे अपनी सुबह वाली हरकत पर शर्म आ रही है….। वह उन सब से माफी मांगती है। …वह फिर से रो दी। जिन्दगी में पहली बार बिना किसी कसूर के उसे झुकना पड़ा था। ….सिर्फ इसलिए कि एक अजनबी शहर में वह कहां जाएगी? कम से कम वहां एक छत तो है, एक छत जिसकी छाया तले वह निश्चित हो सो सकती। भले उस छत की दीवारों में बेगानेपन की बदबू ही हो।

उस दिन के बाद से वह और भी दबी-दबी रहने लगी। शायद कहीं उससे कोई गलती न हो जाए। क्या मालूम अंकल की गुस्ताख लड़की किस समय उसे यह ताना मार दे कि वह तो बेशर्म है, तभी वापस आ गई थी। एक अंकल ही थे जो पापा की दोस्ती निभा रहे थे। वह कभी परायों के समान पेश नहीं आए। जब वह डाईनिंग टेबल पर बैठे होते तो वह भरपेट खाना खाती। तब डोंगे से सब्जी लेते हुए उसके हाथ नहीं कांपते थे, वरना तो प्लेट में और रोटी रखते हुए उसके हाथ कांपने लगते। रोटी खाने के बाद भी उसे हमेशा लगता, वह बहुत भूखी है।

कई बार तो ऑफिस से आते ही उसका जी चाहता कि पर्स एक ओर पटक कर, वह फ्रिज खोल कर, जो जी चाहे, खाए और लंबी तान कर सो जाए। जब तक जी चाहे टेप रिकॉर्ड पर मन्नी बाई की गजलें सने देर तक टेबल लैंप जगा कर पढ़े-लिखे…कॉफी बना कर पिए और खीं-खीं कर हंसे। परन्त यह सब तो अपने घर में ही संभव होता है जहां कोई झिझक नहीं होती, कोई एहसानमंद नजर नहीं होती। अपने घर की छत से तो आसमान भी अपना लगता है और चांद-सितारे भी अपने।

परन्तु बेगानी छत पर सब कछ बेगाना….बेगाना शहर, बेगाने लोग, बेगाना बिस्तर…वहां अपना क्या था? सिर्फ एक नौकरी अपनी थी, जिस कारण वह भटक रही थी। एक दिन एक कुलीग लड़की ने उससे अपना कमरा शेयर करने के लिए कहा था तो वह चौंक उठी थी…”नहीं-नहीं, घर कभी शेयर नहीं किए जाते?” यहां इतना दब कर, झुक कर, डर-डर कर रहते हुए उसे लग रहा था, जैसे धीरे-धीरे उससे कुछ रिसता जा रहा है, कुछ मिटता जा रहा है। उसका अपना अस्तित्व ….अपना आप….उसकी खुली हंसी…। आखिर यह भटकाव क्यों? इसलिए कि वह एक लड़की है, वह अकेली नहीं रह सकती। उसे सहारे की आवश्यकता है, सिक्योरिटी की आवश्यकता है?

बहुत प्रयास करने के बाद उसे अचानक उस अजनबी शहर में वर्किंग होस्टल में एक कमरा मिल गया, तब उसे लगा, उसके भीतर की ईगो अभी मरी नहीं थी क्योंकि कमरे में अपना सामान सजाते हुए वह खुल कर हंसी थी। इस कमरे के एक कोने में उसके मैले कपड़े हजार दिन भी पड़े रहे तो उसे गिला नहीं होगा, मगर आंटी जब सारे परिवार के कपड़े धो देती और उसके कुछ कपड़े स्टोर के एक कोने में पड़े रह जाते तब उसके भीतर कितना कुछ टूट जाता था।

होस्टल के डाईनिंग टेबल से वह भले भूखी उठ जाए, उसे कोई शिकवा नहीं होगा मगर आंटी और उसके बच्चे जब उसके आने से पहले ही सारा फ्रूट खत्म कर देते तो वह शर्मिन्दा महसूस करती। यह होस्टल किसी का घर नहीं, इसके बावजूद सभी को अपने घर जैसा एहसास देता था। जहां सिक्योरिटी भी थी और अंह भाव भी था। जिसकी इतनी बड़ी बिल्डिंग का कम से कम एक कमरा तो उसका अपना था। जिसका बिस्तर बेगाना नहीं, जिसकी दीवारों पर कोई एहसान नहीं। जहां आंटी की लड़की की तीर समान कोई बात सुन कर भी चुप रह जाने का दर्द नहीं था। नहीं…यह कमरा तो उसका था सिर्फ उसका…। जिससे उसे कभी कोई शिकायत नहीं होगी। जिसका दरवाजा केवल वही खोलेगी, कम से कम शर्मिन्दा हो कर कितनी-कितनी देर तक दरवाजा खलने की प्रतीक्षा नहीं करनी होगी। यह दरवाजा जब जी चाहे वह स्वयं ही खोलेगी। जिस पर खूबसूरत कैप्शन पर उसने लिख दिया था, “मेरा घर”। उस तख्ती को अपने कमरे के दरवाजे पर लटकाते हुए उसका जी चाहा वह अपने इस घर को बांहों में भर ले…।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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