सुबह के लगभग साढ़े आठ बजे थे। थाने का वातावरण पुलिस वालों के लिए खुला-खुला तथा अपराधियों के लिए घुटा-घुटा था। इंस्पेक्टर जोशी के पास काम अधिक था इसलिए उसने अभी से ही थाने पहुंचकर अपनी ‘फाइल’ संभाल ली थी। उसका पूरा नाम आनन्द जोशी था परन्तु इंस्पेक्टर जोशी के नाम से वह अधिक प्रसिद्ध था। वैसे उसके निकटतम मित्र उसे आनन्द के नाम से भी पुकार लेते थे। इंस्पेक्टर जोशी को अपना कर्तव्य बहुत मेहनत तथा लगन के साथ जल्द से जल्द निभाने की आदत थी।
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जो काम देर से होता है उसका ‘रिटर्न’ भी देर से मिलता है और यह ‘रिटर्न’ उसे अपनी उन्नति के रूप में देर से मिल सकता था। जिस अपराधी को उसने पिछले दिन पकड़कर हवालात में बंद किया था उस पर कार्यवाही भी उसने आरंभ कर दी थी। अपराधी ने सेठ गोविंद प्रसाद की हत्या की थी। कार्यवाही गम्भीर थी। सेठ गोविन्द प्रसाद कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे। एक बड़ी फर्म के मालिक थे।
पिछले दिन थाने में उसे सेठ गोविन्द प्रसाद का टेलीफोन मिला था। वह उससे कुछ आवश्यक बातें करना चाहते थे और वह पहली ही फुर्सत में उनके दफ्तर जा पहुंचा था परन्तु जब वह वहां पहुंचा तो एक अपरिचित व्यक्ति सेठ गोविन्द प्रसाद पर झुका हुआ था। सेठजी कुर्सी पर बैठे हुए थे परन्तु उनका शरीर सामने की मेज पर गिरा हुआ था।
हत्यारा अपना काम कर चुकने के बाद उनकी पीठ से छुरा निकालकर भागने ही वाला था ताकि सबूत का कोई भी चिन्ह वहां न छोड़े। परन्तु तभी अपने सामने अचानक एक पुलिस इंस्पेक्टर को देखकर वह बौखला गया था। इंस्पेक्टर ने अपनी रिवाल्वर निकालकर उसे सचेत कर दिया था कि यदि वह भागेगा तो उस पर गोली चला देगा। हत्यारे ने डरकर छुरा फेंक दिया था और चीख पड़ा था, ‘‘मैंने हत्या नहीं की…मैंने हत्या नहीं की।’’
हर हत्यारा यही कहता है-अपने अपराध से स्पष्ट इंकार करता है। हत्यारे की चीख सुनकर दफ्तर के सभी लोग वहां एकत्र हो गए थे, इंस्पेक्टर ने हत्यारे को अपनी सुरक्षा में लेकर फोन करते हुए थाने के दो सिपाही बुला लिए थे। फिर रक्त भरे छुरे पर कपड़ा डालकर बहुत सावधानी से उठा लिया था। ताकि प्रमाण के लिए हत्यारे की अंगुलियों के निशान इस पर से मिट न जाएं।
इंस्पेक्टर जोशी के पिता खुद भी अपने जीवन काल में लखनऊ शहर के डी. आई. जी थे। उनकी ईमानदारी तथा देश सेवा की लगन पुलिस विभाग के सभी छोटे-बड़े लोगों में प्रसिद्ध थी। भयानक कामों में भाग लेना उनका शौक था और इसीलिए लगभग दो वर्ष पहले डाकुओं के एक गिरोह का मुकाबला करते हुए वह देश के नाम पर शहीद हो गए थे। मां का देहांत बहुत पहले हो चुका था इसलिए इंस्पेक्टर जोशी संसार में बिल्कुल अकेला रह गया परन्तु तब तक अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वह एक दूसरे शहर में इंस्पेक्टर का पद प्राप्त कर चुका था। इसीलिए उसे अपने जीवन का मुकाबला करने के लिए किसी परेशानी का सामना भी नहीं करना पड़ा। अपना तबादला लेकर वह लखनऊ चला आया जहां उसके पिता ने अपने जीवन के अंतिम दिन काटे थे। एक छोटा और सुन्दर बंगला-अलाटमेंट के कारण किराया कम था, इसलिए उसे ‘मेंटेन’ करने में कोई कठिनाई नहीं हुई।
उसके पिता उसके नाम पर ‘प्राविडेंट फण्ड’ की एक अच्छी भली राशि छोड़ गए थे। इसके अतिरिक्त अपने पेशे में जौहर दिखाकर जीते हुए अनेकों उपहार इस बंगले की शान थे। धीरे-धीरे उसने सभी नौकरों को हटा दिया। केवल हरिया रह गया जिसने आरम्भ से ही उसके पिता की सेवा की थी। हरिया का पिता उसके दादा का नौकर था। उसके दादा अब तक जीवित हैं। दिल्ली में रहते हैं जहां उनका बंगला है। अपने बेटे की आकस्मिक मृत्यु का धक्का उन्हें इस प्रकार लगा कि अब वह बीमार से रहने लगे हैं। नौकर-चाकर उनकी देखभाल करते हैं फिर भी उस बंगले को छोड़कर अपने पोते के साथ नहीं रहना चाहते। उस बंगले से उनका दिली-लगाव है क्योंकि वहां उनकी पत्नी का स्वर्गवास हुआ था। उस बंगले में उन्हें हर समय अपनी धर्मपत्नी की आत्मा की उपस्थिति का आभास होता रहता है। यही कारण है इंस्पेक्टर जोशी को खुद समय निकालकर उनके पास कभी-कभी अवश्य जाना पड़ता है। वह जब भी अपने दादा से भेंट करता है, वह सदा उससे अब विवाह कर लेने का अनुग्रह करने लगते हैं। अपने दादा को उसने वचन दिया कि विभागीय परीक्षा में बैठने के बाद पहला ‘प्रमोशन’ प्राप्त करते ही वह विवाह कर लेगा।
सहसा इंस्पेक्टर जोशी के दफ्तर में दबी-दबी सिसकियों ने पग रखा। उसकी दृष्टि अपने आप ही ऊपर उठ गई। उसके पिछले बन्दी जगदीश के नातेदार आ गए थे। सभी के मुखड़ों पर गम और चिन्ता की कहानी थी। परन्तु बन्दी की पत्नी को देखकर उसे दया आई-केवल दया, जो इंसानियत का एक जज़्बा है। कल की नई नवेली दुल्हन अपने पति के जीते जी विधवा दिखाई पड़ रही थी, आंखें सूजी हुईं-पलकें भीगीं । लटें भी नहीं संवरी थीं। उसका चेहरा उसके दिल के दर्द का दर्पण था। एक व्यक्ति की गलती के कारण कितने सारे लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।
उसने एक सिपाही को बुलाकर अपने बन्दी से उसके घर वालों को मिलने की आज्ञा दे दी और दोबारा अपनी फाइल में खो गया। बन्दी के नातेदार सिपाही के पीछे-पीछे चले गये।
सहसा उसके कानों में सिसकियों तथा आहों का स्वर सुनाई पड़ने लगा। बन्दी के शायद सभी नातेदार रो रहे थे, परन्तु एक हिचकी-एक सिसकी में इतनी अधिक तड़प थी कि उसके दिल की गहराइयों को छू गई। शायद यह बन्दी की पत्नी का स्वर था। उसका मन काम से उचट गया तो कुर्सी पर सीधे होकर उसने पीठ पीछे टेक ली। फिर थोड़ी देर बाद उठकर वह हवालात की ओर बढ़ गया। कुछ दूरी पर खड़े होकर उसने देखा। बन्दी की पत्नी ने अपने पति का हाथ लोहे की सलाख से बाहर निकालकर अपने गाल पर रख लिया था।
वह फूट-फूटकर रो रही थी। अपने पति की बेबसी उससे देखी नहीं जा रही थी। हवालात की एक ही रात ने उसका रूप-रंग बदल दिया था। उसकी आंखों में भी आंसू थे। बन्दी के माता-पिता अपने बच्चे तथा बहू को तसल्ली दे रहे थे कि घबराने की कोई बात नहीं, सब ठीक हो जायेगा। परन्तु कुछ दूरी पर खड़ा इंस्पेक्टर जोशी जानता था कि उस अभागिन नारी के पति को अवश्य सजा होगी और सजा मृत्यु की भी हो सकती है। उनकी बातों के मध्य ही उसे मालूम हुआ कि उस अभागिन नारी का नाम सुधा है। पल भर खड़ा रहने के बाद वह वापस जाने लगा कि तभी सुधा को उसकी उपस्थिति की आहट मिल गई।

‘‘इंस्पेक्टर साहब।’’ वह तड़पकर चीखती हुई उसकी ओर दौड़ी और झट उसके पगों पर गिर गई।
इंस्पेक्टर जोशी बौखलाकर दो पग पीछे हट गया। सुधा रो-रोकर हाथ जोड़ते हुए उससे विनती करने लगी, ‘‘इंस्पेक्टर साहब, मेरे पति को छोड़ दीजिए। उन्होंने कोई हत्या नहीं की है। वह निर्दोष हैं। उनकी जगह आप मुझे गिरफ्तार कर लीजिये।’’
तभी सुधा के ससुर जी वहां आ गये। उन्होंने बहू को सहारा देकर खड़ा किया और फिर इंस्पेक्टर की ओर देखा-आंखों में आशा की झोली फैलाये।
इंस्पेक्टर जोशी का दिल पत्थर का नहीं था परन्तु उसके अपने कुछ उसूल थे। उसके विचार के अनुसार कानून में ढील देना कानून को धोखा देना था। उसने कहा, ‘‘मुझे अफसोस है कि मैं आपकी कोई सहायता नहीं कर सकता। अपनी रिपोर्ट मैं ‘रेकार्ड’ पर चढ़ा चुका हूं। जो जांच अधूरी रह गई है, उसे पूरी करके अदालत के हवाले करना मेरा कर्तव्य है।’’ उसने अपना वाक्य पूरा किया और तेजी के साथ थाने के बाहर निकल गया परन्तु सड़क पर आने के बाद भी सुधा की चीख सुनाई पड़ रही थी। ‘‘इंस्पेक्टर साहब, मेरा पति निर्दोष है-मेरा पति निर्दोष है।’’

