papi devta by Ranu shran Hindi Novel | Grehlakshmi

अदालत ने न्याय की एक प्रतिलिपि सुधा को भी भेजी थी इसलिए भगतराम जानते थे इंस्पेक्टर जोशी को सजा हो चुकी है। उसे उसके अनजाने अपराध का फल मिल चुका है। अब इस समय की परिस्थिति देखते हुए वह निर्णय नहीं कर सके कि उन्हें उनसे घृणा करनी चाहिए या नहीं। उन्होंने सुधा को देखा, उसका राजा बेटा गुम हो जाता तो वह निश्चय ही अपनी जान दे देती। अपने पति की एकमात्र जीती-जागती निशानी को छाती से लगाने के बाद ही तो उसे जीने का सहारा मिलता है।

पापी देवता नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1

उनके सामने घृणा तथा श्रद्धा की ऐसी गुत्थी थी जिसे वह सुलझा नहीं सके। सुधा जिसे पहचानकर घृणा करती है उसे बिना देखे देवता भी मान रही है। क्या वह अपनी बेटी को उसकी वास्तविकता बता दे ? नहीं। इस समय और वह भी ऐसे स्थान पर कुछ कहना उचित नहीं था। उनकी बेटी क्या, यहां तो सभी की दृष्टि में वह एक देवता है। और क्या अपनी जान को खतरे में डालकर उसने एक देवतुल्य काम नहीं किया है ? क्या उसने राजा बेटा को बचाकर सुधा को जीने का एक नया सहारा नहीं दिया है ? उन्होंने खामोश रहने में ही भलाई समझी।

‘‘चलिए गाड़ी में बैठिए।’’ पुलिस इंस्पेक्टर ने आनन्द जोशी तथा बाबा को खामोश देखा तो कहा।

और उसके साथ आनन्द जोशी, बाबा तथा अपनी गोद में बच्चे को लिए हुए सुधा पुलिस की गाड़ी की ओर चल पड़ी। तब भी जनता आनन्द जोशी की प्रशंसा किए नहीं थकती थी।

‘‘वाह ! खूब पहचाना कि किसने बच्चा अपहृत किया था।’’ एक व्यक्ति उसकी प्रशंसा में कह रहा था।

‘‘क्या आंखें हैं। कोई सी.आई.डी. भी ऐसे सूट-बूट वालों पर संदेह नहीं कर सकता था।’’ दूसरा कह रहा था।

‘‘जैसी आंखें, वैसी ही चुस्ती! क्या कमाल दिखाया है !’’ वह तीसरे व्यक्ति की जुबान पर था।

ऐसे वाक्य सुनकर पुलिस इंस्पेक्टर ही नहीं, बाबा भगतराम भी आनन्द जोशी को देखे बिना नहीं रह सके। आनन्द जोशी की श्रद्धा उनके मन में बढ़ती ही जा रही थी। सुधा भी अपने मन में देवता की एक सुन्दर तस्वीर बनाती हुई उसके अहसान से दबती चली गई।

थाने के अन्दर पुलिस इंस्पेक्टर ने अपनी मेज के समीप एक ओर आनन्द जोशी को तथा दूसरी ओर सुधा और उसके बाबा को कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। अपराधी को उसने कुछ दूर पर दीवार से सटी एक बेंच पर बैठने का आदेश दिया। फिर एक मुंशी कांस्टेबिल को बयान लिखने का आदेश देकर वह अपना छोटे डंडे का हंटर लिए अपराधी के समीप पहुंचा। एक कुर्सी उसके समीप खींची और फिर हण्टर का एक कोना उसकी आंखों के समीप करते हुए उसने पूछा, ‘‘क्या नाम है तुम्हारा ?’’

‘‘बदरी प्रसाद।’’ अपराधी ने कनखियों से आनन्द जोशी को देखते हुए दांस पीसे जिसके कारण आज वह इस मुसीबत में फंसा था।

‘‘क्या काम करते हो ?’’

‘‘कुछ नहीं।’’

‘‘ओह !’’ इंस्पेक्टर गुर्राया, ‘‘तो बच्चे उठाना पेशा बना रखा है।’’ वह अपनी कुर्सी से उठा और अपराधी के ऊपर छः सात हण्टर बरसाए। अपराधी चोट सहन नहीं कर सका तो दर्द से तड़पकर चीखने लगा, परन्तु उसने दया की भीख नहीं मांगी। इंस्पेक्टर ने अच्छी तरह हण्टर मारने के बाद पूछा, ‘‘बताओ किसलिए तुम और तुम्हारे साथी बच्चा उठाते हैं ? बताओ ?’’ इंस्पेक्टर ने डांटकर एक जोरदार हण्टर उसे और मारा।

‘‘मैं नहीं बताऊंगा। मैं नहीं बता सकता।’’ अपराधी ने गिड़गिड़ाकर कहा।

‘‘तुम क्या तुम्हारे बाप भी बतायेंगे।’’ इंस्पेक्टर अचानक खिसिया गया तो उस पर अंधाधुंध हण्टर बरसाने लगा-सिर पर, गर्दन पर, कन्धे तथा बांहों पर भी।

‘‘आप मुझे मार डालिए परन्तु मैं कुछ भी नहीं बताऊंगा। अपराधी ने अपने हाथों से खुद को बचाने का असफल प्रयत्न करते हुए कहा, ‘‘यदि मेरे मुंह से कुछ निकल गया तो वह मेरे बीवी-बच्चे को जान से मार देगा।’’

‘‘कौन तुम्हारे बीवी-बच्चों को जान से मार देेगा ?’’ इंस्पेक्टर ने गरजकर एक पल अपना हाथ रोकते हुए पूछा।

‘‘मैं नहीं बताऊंगा-मैं कुछ भी नहीं बताऊंगा।’’ अपराधी ने दर्द से कराह लेकर अपनी गर्दन सहलाते हुए कहा।

‘‘देखो बदरी प्रसाद।’’ इंस्पेक्टर ने इस बार नम्रता से काम लिया। बोला, ‘‘यदि तुम अपराधियों को पकड़वाने में हमारी सहायता करोगे तो हम भी तुम्हारे बीवी-बच्चों की पूरी रक्षा करेंगे।’’

‘आप उनकी रक्षा नहीं कर सकते क्योंकि अब तक बॉस के आदमियों ने उन्हें उस तक पहुंचा भी दिया होगा। यह ‘बॉस’ की एक अचूक चाल है। मेरे बीवी-बच्चों के मरने से अच्छा है कि मैं ही अपनी जुबान बंद रखकर जान दे दूं।’’

पुलिस इंस्पेक्टर चक्कर में पड़ गया। वास्तविकता उगलवाने का कोई रास्ता समझ में नहीं आया तो खिसियाकर वह बेतहाशा अपराधी को हण्टर मारने लगा। शायद इस प्रकार वह अपराधियों का पता बता दे। अपराधी तड़पकर चीखने लगा-चिल्लाने लगा। परन्तु अपने दिल का भेद उसने जरा भी प्रकट नहीं किया। यहां तक कि इंस्पेक्टर उसे मारते-मारते थक गया।

‘‘ठहरिए इंस्पेक्टर साहब।’’ सहसा आनन्द जोशी ने अपनी कुर्सी पर से उठते हुए कहा और फिर अपराधी की ओर बढ़ गया।

पुलिस इंस्पेक्टर ने फूलती सांसों के साथ आनन्द जोशी को देखा। अपने मामले में उसका हस्तक्षेप करना उसे अच्छा नहीं लगा फिर भी आनन्द जोशी के व्यक्तित्व में कोई ऐसा प्रभाव अवश्य था कि वह उसे मना नहीं कर सका।

आनन्द जोशी अपराधी के समीप पहुंचा। फिर बहुत इत्मीनान के साथ अपना एक पैर उठाकर बेंच पर रख दिया-अपराधी के बिल्कुल समीप ही। उसके इस साहस पर वहां खड़े सभी पुलिस कर्मचारियों ने उसे बहुत आश्चर्य के साथ देखा फिर पलटकर आपस में एक-दूसरे का मुखड़ा ताकने लगे, इस प्रकार मानो नजरों ही नजरों में उसका परिचय पूछ रहे हों। कौन है यह व्यक्ति ? कौन है ? किसी दूसरे हलके या शहर का एक पुलिस अधिकारी ? सी.आई.डी. या सरकार का कोई आदरणीय कर्मचारी ? परन्तु ठीक-ठीक अनुमान नहीं लगा सके। फिर भी किसी ने उससे कुछ पूछा नहीं और न ही उसे रोकने का साहस किया। आनन्द जोशी अब पुलिस इंस्पेक्टर नहीं था, परन्तु उसका स्वभाव वही पुराना था। उसके अन्दर की आत्मा नहीं बदली थी। उसके रक्त की बूंद-बूंद में वही जोश था जो उसे खानदान से मिला था। वह अपराधी की ओर झुका।

‘‘देखो बदरी।’’ उसने बहुत नम्रता से कहा, ‘‘यदि तुम अपराधियों का पता नहीं बताओगे तब भी हम तुम्हें मरने नहीं देंगे। और यदि तुमने चालाकी से काम लेकर अपनी जान दे भी दी, तब भी यह सूचना जेल के बाहर नहीं जा सकेगी क्योंकि हमें कल के अखबारों में निकालना पड़ेगा कि अपराधी बदरी प्रसाद, जो एक बच्चा अपहृत करते समय रंग हाथों पकड़ा गया है, उसने अपना पूरा बयान दे दिया है और जिसे अब भेद में रखकर आवश्यक कार्यवाही की जा रही है।’’

‘‘नहीं–नहीं।’’ अपराधी गिड़गिड़ाकर विनती करने लगा, ‘‘ऐसा मत कीजिए-ऐसा हर्गिज मत कीजिए वरना वह मेरी बीवी-बच्चों को मार डालेगा।’’

‘‘फिर तुम हमें अपना पूरा-पूरा बयान क्यों नहीं देते ?’’ आनन्द जोशी अपनी चतुरता पर मन ही मन मुस्करा उठा। बोला, ‘‘तुम हमारी सहायता करोगे तो हम भी…’’ अचानक आनन्द जोशी चौंक गया। वह बहुत देर से ‘हम’ और ‘हमें’ कहकर अपने आपको पुलिस कर्मचारी प्रकट कर रहा था। उसने झट बात सुधार दी। बोला, ‘‘मेरा मतलब पुलिस भी तुम्हारी पूरी सहायता करेगी और चाहेगी कि तुम्हारे बीवी-बच्चों को कोई हानि नहीं पहुंचे।’’

हम ! हमें ! सभी पुलिस कर्मचारी उसे बहुत आश्चर्य से देख रहे थे और उसके बात सुधारने पर तो अब सभी को विश्वास हो गया कि निश्चय ही वह गुप्तचर विभाग का ही कोई अधिकारी है। अपनी बात का उसने ऐसा पासा फेंका था कि अपराधी का इससे बच निकलना जरा भी संभव नहीं था। सब फटी-फटी आंखों से उसे देखने लगे। कुछेक कर्मचारी तो उससे प्रभावित होकर सावधान की स्थिति में भी खड़े हो गए।

अपराधी बदरी प्रसाद आनन्द जोशी की बात सुनकर चुप हो गया। दोनों स्थिति में उसके बीवी-बच्चे जाल में फंसते हैं। यदि वह अपना बयान नहीं देता है तब भी उसका ‘बॉस’ अखबार की बातों में आकर उसके बीवी-बच्चों को अवश्य जान से मार देगा। यही एक भय था जिसके कारण उसके आदमियों ने अनेकों अपराध में पकड़ने के बाद भी अब तक उसका भेद सुरक्षित रखा था। परन्तु अब क्या हो सकता है ? अब, उसने पुलिस को सब कुछ बता देने में ही अपनी तथा बीवी-बच्चों की भलाई समझी। उसने अपना सिर झुका लिया। उसकी आंखों से आंसू निकले और टप-टप करके नीचे गिरने लगे।

‘‘आप मेरा बयान ले सकते हैं इंस्पेक्टर साहब।’’ आनन्द जोशी ने सीधे खड़े होकर पैरों को नीचे करते हुए कहा।

सारे के सारे उपस्थित पुलिस कर्मचारी आनन्द जोशी को अब तक बहुत आश्चर्य से देख रहे थे। यदि कोई चकित नहीं था तो वह थे बाबा भगतराम जी। वह जानते थे कि जोशी पहले एक गुणी पुलिस इंस्पेक्टर रह चुका है। उसके लिए दांव-पेंच वाली बातें करके अपराधी के मुंह से सत्य निकलवाना एक साधारण-सी बात थी। इस घटना से सम्बन्धित इंस्पेक्टर अपनी मूर्खता पर दिल ही दिल में लज्जित हुआ और फिर आनन्द जोशी से हाथ मिलाते हुए बोला, ‘‘थैंक्यू मिस्टर…’’ वह रुक गया।

‘‘आनन्द…’’ आनन्द जोशी के होंठों से पूरा नाम निकलते-निकलते रह गया, पूरा नाम निकल जाता तो वह सुधा के दिल में समाई अपनी सारी श्रद्धा तुरन्त खो देता। अदालत ने उसे सजा देते समय एक प्रतिलिपि सुधा को भेजी थी। उसमें उसका पूरा नाम होना आवश्यक था। उसने चिन्तित होकर सुधा को देखा।

सुधा ने उसका नाम सुना परन्तु उसके चेहरे पर किसी प्रकार का ऐसा चिन्ह नहीं उत्पन्न हुआ जो उसे चिन्तित करता। वह यह भी नहीं जान सकी कि उसका सहायक कुछ कहते-कहते रह गया है। आनन्द नाम उसके लिए अपरिचित था। आनन्द जोशी के साथ बाबा भगतराम भी सुधा को देख रहे थे-कुछ चिन्तित से। परन्तु फिर उन्हें तुरन्त याद आ गया कि जब अदालत से सुधा के नाम निर्णय की एक प्रतिलिपि आई थी तब उसकी आंखें बिल्कुल ही खराब हो चुकी थीं। इसीलिए उन्होंने स्वयं निर्णय पढ़ने के बाद सुधा को केवल इतना बताया था कि इंस्पेक्टर जोशी को उसकी भूल पर तीन वर्ष की सजा हो गई है और तब सुधा दिल की गहराई से कोसते हुए रो पड़ी थी कि उस हत्यारे को मृत्यु-दण्ड क्यों नहीं मिला ? उन्होंने मन ही मन उस घड़ी को धन्य कहा जब बात वहीं समाप्त हो गई थी। उन्होंने आनन्द जोशी को देखा तो उसने एक अपराधी के समान फिर अपना मुखड़ा झुका लिया।

Leave a comment