papi devta by Ranu shran Hindi Novel | Grehlakshmi

‘‘मेरा पति निर्दोष है…मेरा पति निर्दोष है साहब, उसे छोड़ दीजिए। उसने हत्या नहीं की।’’ अदालत में मजिस्ट्रेट के सामने अपने पति को दो सिपाहियों के मध्य हथकड़ी पहने खड़ा देखकर सुधा हाथ जोड़ते हुए रो-रोकर विनती कर रही थी क्योंकि मजिस्ट्रेट उसके पति की जमानत रद्द कर चुका था।

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रद्द करने के कई कारण थे। सेठ गोविन्द प्रसाद के हत्यारे को सख्त से सख्त सजा दिलाने के लिए सरकारी वकील तो लड़ता ही परन्तु सेठजी के नातेदारों ने शहर के सबसे बड़े एडवोकेट को भी रखकर यह भय प्रकट किया कि यदि हत्यारा जमानत पर छूट गया तो उनकी जान भी खतरे में पड़ जायेगी। साथ ही उन्होंने कहा कि फर्म गोविन्द प्रसाद एण्ड कम्पनी के हिसाब में तीस हजार रुपये कम हैं। यदि हत्यारे को रिहा किया गया तो वह निश्चय ही इन रुपयों का सहारा लेकर अपने सारे नातेदारों समेत कहीं दूर भाग जायेगा। जब जमानत न होने का कारण सुधा को अपने वकील द्वारा ज्ञात हुआ तो वह स्तब्ध रह गई। सभी को आश्चर्य हुआ क्योंकि यह दोष सरासर बेबुनियाद और गलत था। सुधा अपने पति की बेबसी देखकर तड़प उठी थी और रो-रोकर विनती कर रही थी, ‘‘उसे छोड़ दीजिए। उसने किसी की हत्या नहीं की है-वह निर्दोष है।’’

परन्तु मजिस्ट्रेट का आदेश अन्तिम तथा अटल था। ऐसी घटनाएं उसे रोज ही देखने को मिलती थीं। उसके दिल पर सुधा के आंसुओं ने कोई प्रभाव नहीं डाला। न्याय का तराजू आंसुओं के बाट से नहीं गवाहों के ठोस बयानों से तोला जाता है।

मजिस्ट्रेट की ओर से निराश होकर सुधा ने अपने पति की ओर देखा। सिपाही उसे ले जा रहे थे। लपककर वह सबके सामने ही अपने पति की छाती से लिपट गई। फूट-फूटकर वह इस प्रकार रो पड़ी मानो सिपाही उसे हवालात में नहीं फांसी के तख्ते पर ले जा रहे हैं। उसके आंसुओं को देखकर उसके पति का कलेजा फट गया। परन्तु वह विवश था। एक बंधे पशु के समान उसे जाना था और वह चला गया। अपनी पत्नी को रोता-बिलखता छोड़कर, अपने माता-पिता के सहारे। उसकी माता ने पत्नी को अपनी छाती से लगा लिया और स्वयं रो पड़ी।

फिर मुकद्दमा चला। मुकद्दमे के मध्य सुधा की मां तथा बाबा भी आ गये। सारी बातें पत्रा द्वारा सुधा उन्हें लिख चुकी थी इसलिए आते समय अपने किरायेदारों से कुछ कर्ज भी लेते आयें ताकि अपनी ओर से सहायता पहुंचाकर बेटी का सुहाग सुरक्षित कर सकें। छुट्टियों के अतिरिक्त मुकद्दमे के मध्य भी सुधा को कुछ पल के लिये अपने पति से मिलने का अवसर मिल जाता था। हर पेशी पर वह अपने ससुर जी के साथ वकील को लिए अवश्य अदालत में आ खड़ी होती। अपने पति को कटघरे में हथकड़ियां पहने खड़ा देखकर उसका दिल छलनी हो जाता, उसका पति कितना असहाय था-बेबस। जाते समय उससे मिलती तो फिर वही आंसू होते-वही आहें और वही सिसकियां। सुधा को अपने पति की बात का विश्वास था। वह कभी किसी की हत्या नहीं कर सकता। उसने कोई चोरी नहीं की थी। उसने अपने बयान में कहा था कि जब वह एक फाइल लेकर सेठ गोविन्द प्रसाद के कमरे में पहुंचा तो वह मेज पर लुढ़के हुए थे। उनकी पीठ में छुरी धंसी हुई देखकर वह घबरा गया। सेठजी की सांस चल रही थी। उनकी तकलीफ कम करने तथा उन्हें बचाने के विचार से उसने वह छुरी उनकी पीठ से निकाली ही थी कि तभी इंस्पेक्टर आ गया था।

परन्तु सरकारी वकील की दृष्टि में यह सारी बातें गलत, मनघड़न्त तथा अट्टहासपूर्ण थीं। ऐसी बातें सभी हत्यारे रंगे हाथों पकड़े जाने के बाद अपने बचाव में कहते हैं। सरकारी वकील ने कहा कि हत्यारा जगदीश फर्म का खजान्ची था। उसके हाथ में पैसों का हिसाब-किताब था। उसने रुपये चुराये हैं और अवश्य चुराये हैं। और जब सेठजी को रुपयों का हिसाब नहीं दे सका तो बात दबाने के लिए उसने बहुत बेदर्दी के साथ उनकी हत्या कर दी। सेठजी को निश्चय ही अपने खजान्ची से कोई भय उत्पन्न हो चुका था और इसीलिए वह इंस्पेक्टर जोशी को बुलाकर अपने दिल का भय प्रकट कर देना चाहते थे। परन्तु यह बात अपराधी को नहीं मालूम थी और इसीलिये जब वह सेठजी की हत्या कर रहा था तो अचानक वहां आशा के विपरीत इंस्पेक्टर जोशी पहुंच गया। यदि इंस्पेक्टर जोशी वहां नहीं पहुंचता तो हत्यारा निश्चय ही अपना काम समाप्त करने के बाद वहां से भाग निकलता।

विटनेस बाॅक्स में आकर इंस्पेक्टर जोशी ने वकीले- सफाई के प्रश्नों का वही उत्तर दिया जो उसने अपनी आंखों द्वारा देखा था। यह सारी ही बातें वह अपनी रिपोर्ट में पहले भी लिख चुका था।

सरकारी वकील ने अपनी बातों में वजन लाने के लिए सुधा को भी अदालत में ला खड़ा किया। उसे विश्वास था कि चोरी के बाद रुपये छिपाने में अपराधी की पत्नी का भी हाथ है। सुधा को विटनेस बाॅक्स में खड़ा करके उसने उसका हाथ गीता पर रखवाया और फिर सच के अतिरिक्त कुछ भी न कहने की शपथ ली। फिर उसका नाम पूछा। विवाह से पहले तथा विवाह के बाद अपने पति के साथ उसके व्यवहारिक संबंध के बारे में कुछ अनावश्यक प्रश्न पूछते हुए उसने उसे अपनी बातों के जाल में लपेटा। इसके बाद पूछा, ‘‘सुधा देवी, क्या आपको वास्तव में ज्ञात नहीं कि आपके पति ने सारा रुपया कहां छिपाया है ?’’

‘‘मेरे पति ने कोई चोरी नहीं की। वह कभी ऐसा नहीं कर सकते।’’ सुधा ने अपने आंसू पोंछते हुए कटघरे में बंद अपने पति को देखा।

‘‘देखिये सुधा देवी, आपने अभी-अभी गीता पर हाथ रखकर केवल सच बोलने की सौगन्ध खाई है। यदि आप झूठ बोलेंगी तो आपके पति को निश्चय ही पाप लग जायेगा। आप केवल उन्हीं बातों का उत्तर दें जो मैं पूछ रहा हूं।’’ सरकारी वकील ने नम्रता से कहा, ‘‘मैं अपना प्रश्न फिर दोहराता हूं। बताइए, क्या आपको वास्तव में ज्ञात नहीं कि आपके पति ने सारा रुपया कहां छिपाया है ?’’

सुधा ने अपनी भीगी आंखों द्वारा सरकारी वकील को घूरकर देखा। फिर नफरत से मुंह फेेरकर कुछ खिसियाई-सी बोली, ‘‘मुझे कुछ भी नहीं मालूम।’’

सरकारी वकील को मुकद्दमा लड़ने का वर्षों का अनुभव था और शायद उसे सुधा को क्रोध में उत्तेजित देखने की ही प्रतीक्षा थी। अपनी जीत की आशा लिए वह बहुत हल्के से मुस्कराया। फिर मस्तक पर बल डालकर बोला, ‘‘याद कीजिए…कभी जागते में, या सोते में, प्यार और मुहब्बत करते समय, क्या कभी भी आपके पति ने ऐसी चोरी का वर्णन नहीं किया ?’’ अनुभवी सरकारी वकील मानो सुधा के दिल की गहराई से सारी वास्तविकता खींच लेना चाहता था।

‘‘वह केवल मजाक किया करते थे।’’ सुधा खीझ उठी तो सत्य तुरन्त ही उसके होंठों पर आ गया। यूं भी वह गम तथा परेशानी की अधिकता के कारण अपना आधे से अधिक होश पहले ही गंवाए बैठी थी इसलिए यह नहीं जान सकी कि उसके होंठों से निकला सत्य सरकारी वकील के लिए सोने पर सुहागा सिद्ध होगा।

‘‘योर आंनर।’’ अचानक सरकारी वकील के मुखड़े पर रौनक आ गई। वह तुरन्त न्यायाधीश की ओर पलटा। उसे सबूत का बहुत बड़ा खजाना मिल गया था। उसने सुधा की बात पर ध्यान दिलाकर कहा, ‘‘अपराधी की पत्नी के बात से साफ प्रकट है कि अपराधी का चोरी करने का इरादा पहले से ही था। उसने चोरी की है-अवश्य चोरी की है परन्तु उसे अपनी भोली-भाली पत्नी पर विश्वास नहीं था इसलिए चोरी का यह भेद उसने अपने तक ही सीमित रखा और जब सेठ गोविन्द प्रसाद को अपराधी द्वारा अपने हिसाब में कुछ गड़बड़ी दिखाई पड़ी तो उन्होंने यह बात पुलिस को सुपुर्द कर देनी चाही। परन्तु इसी बीच अपराधी ने उनकी हत्या कर दी क्योंकि अपने आपको छुपाने के लिए उसके पास कोई भी दूसरा रास्ता नहीं था।’’

सरकारी वकील की दलील में वजन था इसलिए अपराधी के पिता ने सुधा को बहुत गौर तथा सन्देहपूर्ण दृष्टि से देखा। उन्हें मानो विश्वास हो चला था कि सुधा की सुन्दरता के पीछे पागल होकर उनके बेटे ने अवश्य यह चोरी की होगी ताकि अपनी पत्नी को बहुमूल्य आभूषणों से संवार सके। आजकल के नवयुवक तो सुन्दरता को देखते ही अपनी सूझ-बूझ गंवा बैठते हैं। अपने बेटे की बरबादी का दोषी उन्होंने सुधा को बनाया। उसकी सुन्दरता को मन ही मन कोसा-सुधा ने उनकी घूरती दृष्टि का अहसास किया तो ऊपर से नीचे तक कांप गई।

उस दिन सुधा ने पहली बार महसूस किया कि उसके पति के घर में उसका कोई स्थान नहीं है। किसी ने उससे कुछ कहा नहीं, सबके खामोश या रूखे व्यवहार से यही प्रकट था कि इस घर की बरबादी का एकमात्र कारण वही है-केवल वही। उन्हें अब केवल अदालत के निर्णय की ही प्रतीक्षा थी। यदि निर्णय उनके पक्ष में नहीं हुआ तो यह लोग उनका जीना कठिन कर देंगे।

लगभग नौ मास बीतने को आए तब जाकर मुकद्दमे की सारी कड़ियां सुलझीं। और फिर निर्णय का भी दिन आ गया। निर्णय के समय अदालत में इंस्पेक्टर जोशी भी उपस्थित था। आज एक दूसरे मुकद्दमे के संबंध में उसकी पेशी थी-वहीं बगल के कमरे में। बरामदे में जाते समय जब अचानक ही उसकी दृष्टि सुधा पर पड़ गई थी तो मानो उसके पग अपने आप ही उसे वहां तक खींच लाए थे। दरवाजे के समीप खड़े होकर वह भी इस मुकद्दमे का निर्णय सुन लेना चाहता था क्योंकि यह ‘केस’ उसी का था और इस ‘केस’ में अपराधी पर अपराध का सिद्ध होना ही उसकी सफलता थी। उस दिन अपराधी के सभी नातेदार वहां उपस्थित थे। उसके माता-पिता, भाई-बहन। सुधा की मां तथा बाबा भी आ गये थे। मुकद्दमे के मध्य कई बार लखनऊ आकर, वह मेरठ वापस चले जाते थे।

सुधा उनके बीच खड़ी निर्णय की प्रतीक्षा कर रही थी। उसके मुखड़े पर हवाइयां उड़ रही थीं। दिल बेचैन धड़कनें लिए कांप रहा था। पिछली रात उसे एक पल भी नींद नहीं आई थी। यदि इस समय उसकी मां तथा बाबा साथ नहीं होते तो उसके लिए अदालत में खड़ा होना भी कठिन हो जाता। इंस्पेक्टर जोशी ने सुधा की अवस्था देखी तो उसे उस पर दया आई। सुधा मां बनने वाली थी-शायद कुछेक दिनों के अन्दर ही। सुधा ने अपने ऊपर चुभती हुई दृष्टि महसूस की तो उसकी पलकें भी इंस्पेक्टर जोशी पर उठ गईं। परन्तु उसे देखते ही उसके मस्तक पर नफरत के बल पड़ गये। इंस्पेक्टर जोशी को उसने इस प्रकार घूरा मानो वहीं खड़े-खड़े ही उसे दृष्टि द्वारा जलाकर राख कर देना चाहती हो। आज जो कुछ भी उसकी स्थिति है, वह इस चण्डाल के कारण ही है। इस चण्डाल के कारण ही उसके सुहाग की सलामती दुविधा में पड़ गई है। इसी चण्डाल के बयान पर निर्भर करके आज न्यायाधीश को अपना न्याय देना है क्योंकि इस मुकद्दमे में खुद को चश्मदीद गवाह बनाने वाला यही एकमात्र व्यक्ति है।

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