मंसाराम दो दिन गहरी चिन्ता में डूबा रहा बार-बार अपनी माता की याद आती, न खाना अच्छा लगता, न पढ़ने ही में जी लगता। उसकी कायापलट-सी हो गई। दिन गुजर गए और छात्रालय में रहते हुए भी उसने वह काम न किया, जो स्कूल के मास्टरों ने घर से कर लाने को कह दिया। परिणामस्वरूप उसे बेंच पर खड़ा रहना पड़ा। जो बात कभी न हुई थी, वह आज हो गई। यह असह्य अपमान भी उसे सहना पड़ा।
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तीसरे दिन वह इन्हीं चिन्ताओं से मग्न हुआ अपने मन को समझा रहा था – क्या संसार में अकेली मेरी ही माता मरी है? विमाताएँ तो सभी इसी प्रकार की होती है! मेरे साथ कोई नई बात नहीं हो रही है। अब मुझे पुरुषों की भांति द्विगुण परिश्रम से अपना काम करना चाहिए; माता-पिता जैसे राजी रहें; उन्हें राजी रखना चाहिए। इस साल अगर छात्रवृत्ति मिल गई, तो मुझे घर से कुछ लेने की जरूरत ही न रहेगी। कितने ही लड़के अपने बल पर बड़ी-बड़ी उपाधियाँ प्राप्त कर लेते हैं। बाधाओं पर विजय पाना और अवसर देखकर काम करना ही मनुष्य का कर्तव्य है। भाग्य के नाम को रोने-कोसने से क्या होगा?
इतने में जियाराम आकर खड़ा हो गया।
मंसाराम ने पूछा – घर का क्या हाल है जिया? नई अम्माजी तो प्रसन्न होगी?
जिया – उनके मन का हाल तो मैं नहीं जानता; लेकिन जब से तुम आए हो, उन्होंने एक जून भी खाना नहीं खाया। जब देखो, तब रोया ही करती हैं। जब बाबूजी आते है, तब अलबत्ता हँसने लगती हैं। तुम चले आये, तो मैंने भी शाम को अपनी किताबें संभाली। यही तुम्हारे साथ रहना चाहता था। भूंगी चुड़ैल ने जाकर अम्माजी से कह दिया। बाबूजी बैठे थे, उसके सामने ही अम्माजी ने आकर मेरी किताबें छीन ली और रोकर बोली – तुम चले जाओगे, तो इस घर में कौन रहेगा? अगर मेरे कारण तुम लोग घर छोड़-छोड़कर भागे जा रहे हो, तो लो मैं कहीं चली जाती हूं। मैं तो झल्लाया हुआ था ही, बही अब बाबूजी भी न थे, बिगड़कर बोला – आप क्यों कहीं चली जायेगी? आपका तो घर है, आप आराम से रहिए। गैर तो हमीं लोग हैं; हम न रहेंगे तब तो आपको आराम ही आराम होगा।
मंसाराम – तुमने खूब कहा, बहुत ही अच्छा कहा! इस पर और भी झल्लायी होगी और जाकर बाबूजी से शिकायत की होगी।
जियाराम – नहीं, यह कुछ नहीं हुआ। बेचारी जमीन पर बैठकर रोने लगी। मुझे भी करुणा आ गई। मैं भी रो पड़ा। उन्होंने आंचल से मेरे आँसू पोंछे और बोलीं – जिया! मैं ईश्वर को साक्षी देकर कहती हूं कि मैंने तुम्हारे भैया के विषय में तुम्हारे बाबूजी से एक शब्द नहीं कहा। मेरे भाग्य में कलंक लिखा हुआ है, वही भोग रही हूं। फिर और न जाने क्या-क्या कहा, जो मेरी समझ में नहीं आया। कुछ बाबूजी की बात की।
मंसाराम ने उद्विग्नता से पूछा – बाबूजी के विषय में क्या कहा, कुछ याद है?
जियाराम – बातें तो भई, मुझे याद नहीं आती। मेरी मेमोरी कौन बड़ी तेज है; लेकिन उनकी बातों का मतलब कुछ ऐसा मालूम होता था कि उन्हें बाबूजी को प्रसन्न रखने के लिए यहाँ स्वांग भरना पड़ रहा है। न जाने धर्म-अधर्म की कैसी बातें करती थीं जो मैं बिल्कुल न समझ सका। मुझे तो अब इसका विश्वास आ गया है कि उनकी इच्छा तुम्हें यहाँ भेजने की न थी।
मंसाराम – तुम इन बातों का मतलब नहीं समझ सकते। ये बड़ी गहरी चालें हैं।
जियाराम – तुम्हारी समझ में होंगी, मेरी समझ में नहीं है।
मंसाराम – जब तुम ज्योमेट्री नहीं समझ सकते, तो इन बातों को क्या समझ सकोगे। उस रात को जब मुझे खाना खाने के लिए बुलाने आयी थी और उनके आग्रह पर मैं आने को तैयार हो गया था उस वक्त बाबूजी को देखते ही उन्होंने जो कैंड़ा बदला, वह क्या मैं कभी भी भूल सकता हूं?
जियाराम – यही बात मेरी समझ में नहीं आती। अभी कल ही मैं यहाँ से गया तो लगीं तुम्हारा हाल पूछने। मैंने कहा – वह तो कहते थे कि अब कभी इस घर में कदम न रखूंगा। मैंने कुछ झूठे तो कहा नहीं तुमने मुझसे कहा ही था। इतना सुनना था कि फूट-फूटकर रोने लगीं। मैं दिल में बहुत पछताया कि कहां-से-कहां मैंने यह बातें कह दी। बार-बार यही कहती थी, क्या मेरे कारण घर छोड़ देंगे? मुझसे इतने नाराज है! चले गए और मुझसे मिले तक नहीं! खाना तैयार था, खाने तक नहीं आये। हाय! मैं क्या बताऊँ, किस विपत्ति में हूं। इतने में बाबूजी आ गए। बस, तुरंत आंखें पोंछकर मुस्कराती उनके पास चली गई। यह बात मेरी समझ में नहीं आती। आज मुझसे बड़ी मिन्नत की कि इनको साथ लेते आना। आज मैं तुम्हें खींच ले चलूंगा। दो दिन में वह कितनी दुबली हो गई हैं, तुम्हें यह देखकर उन पर दया आयेगी। चलोगे न?
मंसाराम ने कुछ जवाब न दिया। उसके पैर कांप रहे थे। जियाराम तो हाजिरी की घंटी सुनकर भागा, पर वह बेंच पर लेट गया और इतनी लंबी सांस ली, मानो बहुत देर से उसने सांस नहीं ली है। उसके मुख से दुस्सह वेदना में डूबे हुए शब्द निकले – हाय ईश्वर! इस नाम के सिवा उसे अपना जीवन निराधार मालूम होता था। इस एक उच्छ्वास में कितना नैराश्य, कितनी संवेदना, कितनी करुणा, उसकी दीनता-प्रार्थना भरी हुई थी, इसका कौन अनुमान कर सकता है! अब सारा रहस्य उसकी समझ में आ रहा था और बराबर उसका पीड़ित हृदय आर्तनाद कर रहा था – हाय ईश्वर! इतना घोर कलंक।
क्या जीवन में इससे बड़ी विपत्ति की कल्पना की जा सकती है? क्या संसार में इससे घोरतर नीचता की कल्पना की जा सकती है? आज तक किसी पिता ने अपने पुत्र पर इतना निर्दय कलंक न लगाया होगा। जिसके चरित्र की सभी प्रशंसा करते थे, जो अन्य युवकों के लिए आदर्श समझा जाता था, जिसने कभी अपवित्र विचारों को अपने पास नहीं फटकने दिया, उसी पर यह घोर कलंक! मंसाराम को ऐसा मालूम हुआ, मानो उसका दिल फटा जा रहा है।
दूसरी घंटी भी बज गई। लड़के अपने अपने कमरे में गये; पर मंसाराम हथेली पर गाल रखे अनिमेष नेत्रों से भूमि की ओर देख रहा था, मानो उसका सर्वस्व जलमग्न हो गया हो, मानो वह किसी को मुंह न दिखा सकता हो। क्लास में गैरहाजिरी हो जायेगी, जुर्माना हो जायेगा, इसकी उसे चिन्ता नहीं। जब उसका सर्वस्व लुट गया, तो अब इन छोटी-छोटी बातों का क्या भय? इतना बड़ा कलंक लगने पर भी अगर जीता रहूं तो मेरे जीवन को धिक्कार है।
उसी शोकातिरेक की दशा में वह चिल्ला पड़ा – माताजी! तुम कहां हो? तुम्हारा बेटा, जिस पर तुम प्राण देती थी जिसे तुम अपने जीवन का आधार समझती थी, आज घोर संकट में है। उसी का पिता उसके गर्दन पर छुरी फेर रहा है, हाय तुम कहां हो?
मंसाराम फिर शांत चित्त से सोचने लगा – मुझ पर यह संदेह क्यों हो रहा है? इसका क्या कारण है? मुझसे ऐसी कौन-सी बात उन्होंने देखी, जिससे उन्हें यह संदेह हुआ? वह हमारे पिता है, मेरे शत्रु हो जाये यह इस बात अकारण नहीं हो सकती।
अच्छा, इस संदेह का बीजारोपण किस दिन हुआ? मुझे बोर्डिंग हाऊस में ठहराने की बात तो पीछे की है। उस दिन, रात को वह मेरे कमरे में आकर मेरी परीक्षा लेने लगे थे, उसी दिन उनकी त्यौरियां बदली हुई थीं। उस दिन ऐसी कौन-सी बात हुई, जो अप्रिय लगी हो? मैं नई अम्मा से कुछ खाने को मांगने गया था। बाबूजी उस समय वहाँ बैठे थे। हां, अब याद आती है, उसी वक्त उनका चेहरा तमतमा गया था। उसी दिन से नई अम्मा ने मुझसे पढ़ना छोड़ दिया। अगर मैं जानता कि मेरा घर में आना जाना, अम्मा जी से कुछ कहना-सुनना और उन्हें पढ़ाना-लिखाना पिताजी को बुरा लगता है, तो आज क्यों यह नौबत आती? और नई अम्मा! उन पर क्या बीत रही होगी।
मंसाराम ने अब तक निर्मला की ओर ध्यान नहीं दिया था। निर्मला का ध्यान आते ही उसके रोएँ खड़े हो गए! उनका सरल लेहशील हृदय यह आघात कैसे सह सकेगा? आह! मैं कितने भ्रम में था! मैं उनके स्नेह को कौशल समझता था। मुझे क्या मालूम था कि उन्हें पिताजी का भ्रम शांत करने के लिए मेरे प्रति कितना कटु व्यवहार करना पड़ता है। आह! मैंने उन पर कितना अन्याय किया है। उनकी दशा तो मुझसे भी खराब हो रही होगी। मैं तो यहाँ चला आया, मगर वह कहां जायेगी? जिया कहता था, उन्होंने दो दिन से भोजन नहीं किया। हरदम रोया करती हैं। कैसे जाकर समझाऊं? वह इस अभागे के पीछे क्यों अपने सिर पर यह विपत्ति ले रही हैं? वह क्यों बार-बार मेरा हाल पूछती हैं? क्यों बार-बार मुझे रुलाती हैं? कैसे कह दूँ कि माता, मुझे तुमसे जरा भी शिकायत नहीं, मेरा दिल तुम्हारी तरफ से साफ है।
वह अब भी बैठी रो रही होगी। कितना बड़ा अनर्थ है? बाबूजी को यह क्या हो गया? क्या इसीलिए विवाह किया था? एक बालिका की हत्या करने के लिए ही उसे लाये थे? इस कोमल पुष्प को मसल डालने ही के लिए तोड़ा था?
उनका कैसे उद्धार होगा? उस निरपराधी का मुख कैसे उज्ज्वल होगा? उन्हें केवल मेरे साथ स्नेह का व्यवहार करने के लिए यह दंड दिया जा रहा है। उनकी सज्जनता का यह उपहार मिल रहा है। मैं उन्हें इस प्रकार निर्दय आघात सहते देखकर बैठा रहूंगा? अपनी मानरक्षा न सही, उनकी आत्मरक्षा के लिए इन प्राणों का बलिदान करना पड़ेगा। इसके सिवाय उद्धार का कोई उपाय नहीं। आह! दिल में कैसे-कैसे अरमान थे। वे सब खाक में मिला देने होंगे। एक सती पर संदेह किया जा रहा है; और मेरे कारण! मुझे अपने से उनकी रक्षा करनी होगी, यही मेरा कर्तव्य है। इसी में सच्ची वीरता है। माता, मैं अपने रक्त से इस कालिमा को धो दूंगा। इसमें मेरा और तुम्हारा दोनों का कल्याण है।
वह दिन भर इन्हीं विचारों में डूबा रहा। शाम को उसके दोनों भाई आकर घर चलने के लिए आग्रह करने लगे।
सियाराम – चलते क्यों नहीं? मेरे भैयाजी चले चलो न!
मंसाराम – मुझे फुरसत नहीं है कि तुम्हारे कहने से चला चलूं!
जिया – आखिर कल तो इतवार है ही।
मंसाराम – इतवार को भी काम है।
जियाराम – अच्छा, कल आओगे न?
मंसाराम – नहीं, मुझे कल एक मैच में जाना है।
जियाराम – अम्मा जी मूंग के लड्डू बना रही हैं। न चलोगे तो एक भी न पाओगे। हम तुम मिल के खा जाएंगे सिया, इन्हें न देंगे!
जियाराम – भैया, अगर तुम कल न गये, तो शायद अम्माजी यहीं चली आए।
मंसाराम – सच! नहीं, ऐसा क्यों करेंगी। यहाँ आयी तो बड़ी परेशानी होगी। तुम कह देना, वह कहीं मैच देखने गये है।
जियाराम – मैं झूठ क्यों बोलने लगा। मैं कह दूंगा, वह मुँह फुलाये बैठे थे। देख लेना, उन्हें साथ लाता हूँ कि नहीं।
सियाराम – हम कह देंगे कि आज पढ़ने नहीं गये। पड़े-पड़े सोते रहे।
मंसाराम ने इन दूतों से कल आने का वादा करके गला छुड़ाया। दोनों चले गए, तो फिर चिंता में डूब गया। रात-भर उसे करवट बदलते गुजरी। छुट्टी का दिन भी बैठा-बैठा कट गया। उसे दिन भर शंका होती रही कि कहीं अम्माजी सच न चली आएं। किसी गाड़ी की खड़खड़ाहट सुनता, तो उसका कलेजा धक-धक करने लगता। कहीं आ तो नहीं गई।
छात्रालय में एक छोटा-सा औषधालय था। एक डॉक्टर साहब संध्या समय एक घंटे के लिए आ जाया करते थे। अगर कोई लड़का बीमार होता, तो उसे दवा देते। आज वह आये तो मंसा कुछ सोचता हुआ उनके पास जाकर खड़ा हो गया। वह मंसाराम को अच्छी तरह जानते थे। उसे देखकर आश्चर्य से बोले – यह तुम्हारी क्या हालत है जी? तुम तो मानो गले जा रहे हो! बाजार का चस्का तो नहीं पड़ गया? आखिर तुम्हें क्या हुआ? जरा यहाँ तो आओ!
मंसाराम ने मुस्कराकर कहा – मुझे जिन्दगी का रोग है। आपके पास इसकी भी कोई दवा है।
डॉक्टर – मैं तुम्हारी परीक्षा करना चाहता हूं। तुम्हारी सूरत ही बदल गई जी पहचाने भी नहीं जाते।
यह कहकर उन्होंने मंसाराम का हाथ पकड़ लिया, और छाती, पीठ, आँखें, जीभ सब बारी-बारी से देखी। तब चिन्तित होकर बोले – वकील साहब से मैं आज ही मिलूंगा। तुम्हें थाइसिस हो रहा है। सारे लक्षण उसी के हैं।
मंसाराम ने बड़ी उत्सुकता से पूछा – भला, कितने दिनों में काम तमाम हो जायेगा डॉक्टर साहब?
डॉक्टर – कैसी बात करते हो जी? मैं वकील साहब से मिलकर तुम्हें किसी पहाड़ी जगह भेजने की सलाह दूंगा। ईश्वर ने चाहा तो तुम अच्छे हो जाओगे। बीमारी अभी पहली स्टेज में है।
मंसाराम – तब तो अभी साल-दो साल की देर मालूम होती है। मैं तो इतना इन्तजार नहीं कर सकता। सुनिए, मुझे थाइसिस-बायसिस कुछ नहीं है, न कोई दूसरी शिकायत ही है, आप बाबूजी को नाहक तरद्दुद में न डालिएगा। इस वक्त मेरे सिर में दर्द है; कोई दवा दीजिए। कोई ऐसी दवा हो, जिसमें नींद भी आ जाये। मुझे दो रात से नींद नहीं आती।
डॉक्टर ने जहरीली दवाइयों की आलमारी खोली और एक शीशी से थोड़ी-सी दवा निकालकर मंसाराम को दे दी; मंसाराम ने पूछा – यह तो कोई जहर है। भला, इसे कोई पी ले तो मर जाये?
डॉक्टर – नहीं मर तो नहीं जाये; पर सिर में चक्कर जरूर आ जाये।
मंसाराम – कोई ऐसी भी दवा इसमें है, जिसे पीते की प्राण निकल जाये?
डॉक्टर – ऐसी एक-दो नहीं, कितनी दवाएं हैं! यह जो शीशे देख रहे हो, इसकी एक बूंद भी अगर पेट में चली जाये, तो जान न बचे। आनन-फानन में मौत हो जाये।
मंसाराम – क्यों डॉक्टर साहब, जो लोग जहर खा लेते हैं, उन्हें बड़ी तकलीफ होती होगी?
डॉक्टर – सभी जहरों से तकलीफ नहीं होती। बहुत तो ऐसे हैं पीते ही आदमी ठण्डा हो जाता है, फिर उसे होश नहीं आता।
