Goddess of Prosperity: दिवाली के अवसर पर लक्ष्मी-गणेश की पूजा का विधान है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इनके स्वरूप में जीवन का रहस्य छिपा हुआ है। आइये, जानते हैं क्या है हिन्दू धर्म में लक्ष्मी-गणेश की पूजा का अर्थ।
भारतीय धर्म की शिक्षा पद्धति ‘प्रतीक पूजा’ के रूप में प्रचलित है। धर्म और अध्यात्म के रहस्यों को भारतीय संस्कृति में प्रतीक प्रतिमाओं के माध्यम से समझाया गया है। देवी देवी-देवताओं की विचित्र कल्पनाएं की गई हैं- यथा उनकी मुखाकृति, रहन-सहन, वाहन तथा विन्यासादि के ऐसे रहस्यमयी कथानक तैयार किए गए हैं कि उन्हें पढ़कर यह अनुमान करना भी दुष्कर जान पड़ता है कि ऐसे भी कोई देवी-देवता हैं भी अथवा नहीं।
Also read : क्या आप जानते हैं दिवाली से जुड़ी इन 3 खास परम्पराओं के बारे में: Diwali Rituals
गंभीरतापूर्वक विचार करने पर यह ज्ञात होता है कि पौराणिक देवों के जो वर्णन मिलते हैं, उन वर्णित विचित्र प्रतीकों के पृष्ठ में बड़ा आध्यात्मिक रहस्य निहित है। ऋषियों ने समष्टिगत चेतना और उसके अनुशासनों का बोध ‘प्रतीक पूजा’ के माध्यम से करवाया है। भगवान की अनेकानेक विशेषताओं को ध्यान में रखकर आदर्शों के प्रतीक देवी-देवताओं को चित्रित किया गया है। सभी देव प्रतिमाओं के पीछे भावपूर्ण संकेत सूत्र निहित हैं। यह संकेत सूत्र एक दृश्यमान पुस्तक है जिसके माध्यम से जीवन दर्शन और आत्म विज्ञान के गूढ़ रहस्यों को बालबोध की भांति समझा और समझाया जा सके।
प्रतिमा प्रतीकों के दृश्य स्वरूप के सहारे सामान्य जन भी काफी कुछ जान और सीख सकते हैं। उनकी आकृतियां, मुद्राएं आदि निर्धारित करने के पीछे यह उद्देश्य रहा है कि देव परम्पराओं के साथ आबद्ध नियमों, तथ्यों व रहस्यों को सर्वसाधारण में समझने का उत्साह व आकर्षण बना रहे। ‘अनेकता में एकता’ के मध्य यह दर्शन मनोरंजक होने के साथ-साथ ज्ञानवर्धक भी है। इस आशय में मानवी मनोविज्ञान का समुचित समावेश निहित किया गया है, जिसका अवगाहन करके मनुष्य बहुत थोड़े से सत्य और जीवन लक्ष्य की उन्मुक्त अवस्थाओं का ज्ञान सहज उपलब्ध कर सकता है।
देवी लक्ष्मी
भगवान की विभिन्न विभूतियों के समुच्चय देव रूपों मेें से एक प्रख्यात हैं देवी लक्ष्मी। उनके स्वरूप में अनेक गुणों का आभास होता है। वे मूलत: धन-धान्य और ऐश्वर्य की महादेवी हैं। उनकी आधार शिला वैज्ञानिक है। मानव स्वर्ण, हीरे-मोती महल आदि को धन मानता है। यही उसका ऐश्वर्य वैभव है। लक्ष्मी का स्वरूप इसी समृद्धि का रहस्य है। यह वैभव कभी स्थाई नहीं रहता, बनता-बिगड़ता रहता है। वस्तुत: यही इसका स्वभाव है। इस चंचल स्वभाव के कारण ही लक्ष्मी को चंचला कहते हैं। कमल पुष्प पर बिराजने के कारण उनका एक नाम कमला है। उनकी कमलासन की एक कमल नाल भूमि की ओर जा रही है, जिसका अर्थ यह है कि संसार का समूचा धन-वैभव भूमि के अंतर्गर्भ में छिपा है। भूमि में अनेक प्रकार के मणि, माणिक्य, खनिज छिपे-दबे हैं, जिन्हें कमलनाल की भांति भूमि से चूसकर (बाहर निकालकर) कमल पुष्प पल्लवित होता है और अपनी आभा, सुगन्ध चहुं ओर बिखेरता है। वह अपने लाल रंग की सुन्दरता से हर किसी को आकर्षित करता है। लक्ष्मी देवी का यही सुन्दर आकर्षण धन-वैभव कमलासन का प्रतीक है।
लक्ष्मी का एक प्रमुख प्रतीकात्मक विन्यास उनका वाहन उलूक (उल्लू) है। वह अमंगलकारी माना जाता है। लक्ष्मीपति भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ है जो मंगलकारी माना जाता है। इस आशय का अर्थ है कि जो लोग केवल लक्ष्मी के उपासक होकर लक्ष्मी की भक्ति करते हैं, उनके यहां लक्ष्मी उल्लू पर सवार होकर आती हैं। इस मुद्रा में वे धन के साथ-साथ कुप्रवृत्तियां भी लाती हैं, जिससे मानव की बुद्धि धन के लालच में लोभी और अहंकारी हो जाती है। परंतु जब लक्ष्मी के साथ विष्णुदेव की भी आराधना की जाती है और उनका भी आवाहन किया जाता है तब लक्ष्मी पतिदेव विष्णु के साथ गरुड़ पर सवार होकर सम्पत्ति और सद्प्रवृत्तियां अपने साथ लाती हैं। अत: लक्ष्मी की आराधना विष्णुदेव के साथ करनी चाहिए।
लक्ष्मी के दोनों ओर सेवा मुद्रा में खड़े दो गज (हाथिओं) का अर्थ यह है कि लक्ष्मी की वैभव समृद्धि होने से व्यापार-व्यवसाय में वृद्धि होती है। इसके संचालन हेतु योग्य और कार्यकुशल व्यक्तियों को नौकरी पर रखा जाता है। उन्हें उचित वेतन दिया जाता है। ऐसी नियुक्तियां अपने घर के दरवाजे पर हाथी बांधने वाली उक्ति को चरितार्थ करती हैं। इन हाथियों की सूंड में जल उड़लते पात्र होते हैं, जिसका अर्थ है कि जो व्यक्ति समृद्धि चाहते हैं, उन्हें अपने अधिकारी, सेठ का विश्वास पात्र होना चाहिए। ये पात्र अपनी सेवा रूपी जल से अधिकारी सेठ का सदैव अभिषेक करते रहें। लक्ष्मी की अभय हस्त मुद्रा का अर्थ यह है कि जो अति सम्पन्न व्यापारी, सेठ-साहूकार हैं और अपना व्यापार व समृद्धि बढ़ाना चाहते हैं, वे अपने सेवकों, कर्मचारियों को सुरक्षा का अभय दान दें। इन्हीं कर्मचारियों के मानसिक और शारीरिक परिश्रम से समृद्धि बढ़ती है। जड़ परिश्रम की ऐसी स्थिति में इन्हें व इन पर आश्रितों के पोषण हेतु सुरक्षा व विविध सुविधा जुटाकर उन्हें अभावों, कष्टों से मुक्त रखने का सदैव प्रयास करते रहना चाहिए, जिससे उनके मन में सेवा कार्य के समय तनाव, असंतोष, प्रतिशोध, विरोध आदि की भावना न रहे और उन्हें सतत् अभय दान मिलता रहे। लक्ष्मी के धन लुटाते मुक्त हस्त का अर्थ है कि जो व्यक्ति समृद्धि चाहता है, उसे अपना धन परोपकार के हेतु खुले हाथों देना चाहिए। उसमें सदैव दान-दया के भाव जाग्रत होने चाहिए। ऐसे मनोभावों से देवी लक्ष्मी सदैव उससे प्रसन्न रहती हैं। वह ऐसे दानवीर पर कृपा करती हैं। ऐसा करने से दाता को सम्मान प्राप्त होता है और अथाह मानसिक संतोष मिलता है। अर्थात् दानवीर के पास जब भी धन आए, उसे दोनों हाथों से सेवाभावी कार्यों के हेतु समर्पित कर देना चाहिए। लक्ष्मी का विष्णु की चरणदासी बन उनके पैर दबाने का अर्थ पति की सेवाभक्ति तथा पतिव्रता होता है। अर्थात् विष्णु के चरणों में वे (लक्ष्मी) रमती हैं, इसीलिए उन्हें ‘रमाÓ कहा जाता है। जिसे देवी लक्ष्मी चाहिए उसे विष्णु की उपासना करनी चाहिए। लक्ष्मी की कृपा उसी पर होती है जो विष्णु भक्त होते हैं और फिर जब लक्ष्मी के साथ विष्णु आते हैं तब भक्त के लिए सोने में सुहागा वाली उक्ति चरितार्थ हो जाती है।
देव गणेश
‘ग’ से ज्ञान और ‘ण’ से निर्वाण। अर्थात् ज्ञान और निर्वाण के ईश गणेश सदैव मंगलकारी हैं। वे ज्ञानानाम अग्रणीय होकर भी शांत, सौम्य तथा आशीषमयी हैं। विघ्न विनाशक गणेश मूलत: मातृशक्ति की अमोघ रचना हैं। मां भवानी पार्वती माया हैं जो महाशिव से निजत्व पाकर ब्रह्मï हो जाती हैं। गणेश रिद्धि-सिद्धि के स्वामी लक्ष्य और लाभ के पिता हैं।
गणेश का विशालकाय गजमस्तक दृढ़ संकल्प तथा मजबूती का प्रतीक है। गज अपनी छोटी आंखों से सब कुछ देखता है। उसकी आंखों में छोटी से छोटी वस्तु को बड़े आकार में देखने की शक्ति प्राप्त होती है। यही कारण है कि गज को अपने विशाल शरीर का अभिमान नहीं होता। वह छोटी-छोटी चींटियों को भी बचाकर चलता है। अर्थात् जो व्यक्ति अपने कार्य में सफलता प्राप्त करना चाहता है वह अपने सहयोगियों को कभी छोटा नहीं देखता और न ही मानता है अपितु समभाव चाहता है। प्रत्येक बात में तीक्ष्ण नजर से परखना हाथी की छोटी आंखों की विशेषता है। गणेश की लंबी नासिका (सूंड) बलिष्ठ होने के साथ-साथ अनेक बातों को सार्थक करती है। वे सबसे ऊंची नाक वाले माने जाते हैं। यह विशिष्टता कार्य सिद्धि हेतु आवश्यक है। ऊंची नाक वाले न तो नाक पर मक्खी बैठने देते हैं और न ही नाक कटने देते हैं। हाथी अपनी नाक को सदैव ऊपर उठाए रखता है। इस प्रकार गणेश की नाक प्रतिष्ठा की प्रतीक है।
गणेश के कान विशाल हैं। विशाल कानों वाला कान का कच्चा नहीं होता। वह सदैव दोनों कानों का उपयोग करता है। अच्छी बातों पर वह ध्यान देता है और बेकार की बातों को एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल बाहर कर देता है। वे एक दंती भी हैं। एक दन्त का होना द्वंद्व व द्वेष से मुक्त होना है। यह दांत निर्विघ्न कार्य सिद्धि का कारक है। गणेश की जिह्वïा अन्दर की ओर लपलपाती है, बाहर की ओर नहीं। उनकी जीभ इस तथ्य की परिचायक है कि जीभ सदैव अन्दर रखो और दूसरों की नहीं स्वयं की आलोचना करना व स्वयं के गुण-दोष देखना सीखो। ऐसा करने वाला मनुष्य सदाचार से सदैव दूर रहता है। गणेश लम्बोदर हैं। वे उदर पाचन शक्ति और विशालता के लिए प्रसिद्ध हैं। उसमें सूर्य-चन्द्र, पृथ्वी, बुध, शुक्र, मंगल आदि सभी तारागण परिक्रमामय हैं। लम्बोदर का अर्थ यह भी है कि अन्य की बातें पेट में रखकर उन्हें पहचानने की क्षमता स्वयं में पैदा करनी चाहिए। ऐसे करने वाला व्यक्ति अनेक प्रकार के झंझटों से मुक्त रहता है।
गणेश का शरीर पौरुष का प्रतीक है। अर्थात् सद्पुरुष सदैव मानवोचित सदाचार में सलंग्न रहता है। हमें ऐसे सत्पुरुष के गुण ग्रहण कर स्वयं को सच्चा पुरुष बनाना चाहिए। उनकी चारों भुजाएं चारों दिशाओं में कार्यशील रहने की सूचक है। उनके एक हाथ में माला एकता और साधना का प्रतीक है। दूसरे हाथ में कमल धन-समृद्धि का प्रतीक है। यह प्रतीक यह संदेश देता है कि धन के प्रति लोभ नहीं होना चाहिए। उनके तीसरे हाथ में पशु है जो जीवन में आने वाले विघ्नों को काटने का संदेश देता है। उनके चौथे हाथ की मुी है जो यह दर्शाती है कि हमें अपने रहस्य गुप्त रखने चाहिए। बन्द मुी जीवन रहस्य की सफलता का प्रतीक है।
गणेश मोदक प्रिय हैं। ब्रह्मïाण्ड, ज्ञान, निर्वाण में लीन गणेश जैसे देव को मोदक इसलिए प्रिय है क्योंकि अनन्त ब्रह्मïाण्ड का स्वरूप ही मोदक समान है। उनका वाहन मूषक ऐसा जीव है जो अत्यन्त निरीह, शूद्र और सामान्य होकर भी बुद्धि, ज्ञान और कर्म में असाधारण है। वह अपने गुणों में विवेचक, विशेषक, विच्छेदक और विस्तारक है जिसका ज्ञान निश्चयात्मक होता है। विशाल पर्वतों की जड़ों में अपने लिए मार्ग और स्थान बना लेने की क्षमता मूषक में होती है। विरोधियों के क्षेत्र को खोखला कर देना और उनके अभेध दुर्ग में बिल बनाकर प्रवेश कर सारे रहस्य बाहर ले आना एक असाधारण बात है। इस प्रकार भारी-भरकम गणेश के वाहन मूषक का अर्थ है कि छोटे व्यक्तियों के सहयोग को भी बड़े व योग्य व्यक्तियों के सहयोग की भांति मानना चाहिए। इसके अभाव में कोई कार्य संपूर्णता को प्राप्त नहीं होता।
गणेश द्वारा अपना मस्तक कटा देने का अर्थ स्वयं को आहूत कर देना है। सिर कटना अहंकार का नाश है। गणेश अहम्ï से परे होकर मंगलमय हो जाते हैं। वे अहम् का शमन व दमन इस सीमा तक कर देते हैं कि नर शरीर पर अन्य सिर धारण कर लेते हैं और उनका भार लेकर कृतार्थ हो जाते हैं। ब्रह्मïवैवर्त पुराण के गणेश खंड में इस स्वरूप को वन्दनीय माना गया है। हाथी के सिर का नर देह से जुड़ना संयोजक, समाहाकारक, समन्वयकारक और संश्लेषक बुद्धि है। गणेश का कद बौना है। इससे यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए कि समाजसेवी पुरुष सरलता, नम्रता आदि सद्गुणों के साथ अपने आपको छोटा मानता हुआ चले, जिससे उसके अंदर अभिमान के अंकुर उत्पन्न न हों। ऐसा व्यक्ति अपने उद्देश्य में निर्विघन्नतापूर्वक सफलता प्राप्त कर सकता है। गणेश को सिन्दूर लगाने का अभिप्राय यह है कि यह सौभाग्य सूचक और मंगल द्रव्य है। उन्हें दूर्वा चढ़ाने का तात्पर्य यह है कि गज को दूर्वा प्रिय है। दूर्वा में नमता, सरलता है। इस प्रकार गणेश की आराधना करने वाले व्यक्ति का वंश दूर्वा की भांति अभिवृद्धि को प्राप्त होकर स्थायी सौभाग्य व मंगल को प्राप्त होता है।
अन्तत: कहा जा सकता है कि लक्ष्मी-गणेश मानवीय जीवन की उन सभी आध्यात्मिक विशेषताओं के प्रतीक हैं, जिनके बिना मनुष्य जीवन पाने का अर्थ ही हल नहीं होता। मानव का धर्म उसकी विवेक और बुद्धि पर आधारित है, जिसके सहारे वह ज्ञान और विज्ञान की ओर अग्रसर होता है और मनुष्य से देव, नर से नारायण स्वरूप बनने में समर्थ होता है। यही संदेश हमें प्राचीन काल से देवी लक्ष्मी और देव गणेश प्रदान करते चले आ रहे हैं। इन आध्यात्मिक रहस्यों को हृदयगंम करना तद्नुरूप जीवन की रीति-नीति बनाना सच्चे लक्ष्मी-गणेश के भक्तों का परम लक्ष्य है। उत्तम होगा शुभ दीपावली के पावन अवसर पर हम लक्ष्मी-गणेश जैसी दिव्य विभूतियों का चिन्तन करें तथा उनके अनुपमेय गुणों को स्वयं के जीवन में उतारने का प्रयास करें तभी श्री, समृद्धि और मंगलमय शांति हमें प्राप्त होगी।
