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महानगर | Mahanagar novel S Balwant | best novel in hindi | Grehlakhami
Mahanagar

उसका नाम तो मि० बसरा था, लेकिन सब उसे बसु कहकर पुकारते थे। कई दिन हो गए थे, बसु दफ्तर नहीं आ रहा था। रमाकांत हर रोज उसका इंतजार करता। पता नहीं क्या हो गया? वह तो कभी दफ्तर से छुट्टी भी नहीं करता? कोई खबर भी नहीं दी उसने! रमाकांत ने सोचा, आज वह बसु के घर जाएगा।

बसु जब से इस दफ्तर में आया था, उसकी दोस्ती रमाकांत से हो गई थी। वे दोनों साथ खाना खाते।…शाम को घर की ओर एक साथ लौटते।… दिन भर की बातें सांझी करते। घर जाते हुए राह पर एक मोड़ तक साथ-साथ रहते, फिर अपनी-अपनी राह पकड़ अलग हो जाते।

बसु रमाकांत के घर भी आया करता था, पर रमाकांत को वह अपने घर कभी नहीं ले गया था। कहता कि वह घर में अकेला रहता है, इसलिए उसकी क्या सेवा कर पाएगा? पिछले सप्ताह वह रमाकांत की बेटी के जन्म दिन पर उसके लिए फूल लाया था। जब रमाकांत ने वह फूल अपनी बेटी को दिए तो वह बहुत खुश हुई। कहने लगी, “अंकल को मेरा थैंक्स कहना। अंकल बहुत अच्छे हैं। आप तो कभी भी फूल नहीं लाते।” रमाकांत को यह बात बहुत चुभी थी। यह नहीं था कि वह फूलों के खर्चे से डरता था। पर उसे ऐसा कभी सूझा ही नहीं था।… यह बात उसने उसी दिन जानी कि किसी के जन्म दिन पर फूल देने से व्यक्ति की खुशी में कितना इजाफा होता है। रमाकांत को बड़ा अफसोस हुआ कि वह ऐसा क्यूं नहीं कर सका था? वैसे बसु और बातों में भी बहुत कमाल का आदमी था। वह मौका भांप लेता था और आगे बढ़कर उसकी ढाल बन जाता था।

वह बसु को बड़े ध्यान से देखता। लंबा-पतला शरीर। सलीके से पहने हुए कपड़े। दफ्तर के लोगों से उसने बहुत जल्दी मेल-मिलाप बढ़ा लिया था।

दफ्तर में कई ऐसी मुसीबतें आईं जिन्हें वह अपने सिर ले लेता। चाहे फालतू के काम की बात हो या किसी जिम्मेदारी की। रमाकांत हमेशा उससे पीछे रह जाता। रमाकांत आज इन्हीं विचारों में डूबा हुआ पता नहीं दफ्तर का कौन सा काम कर गया और कौन सा छोड़ गया। शाम हुई तो वह बसु की खबर लेने उसके घर की ओर चल पड़ा।

आखिर ऐसी कौन सी बात है कि वह कई दिनों से दफ्तर नहीं आया? कहीं वह बीमार न हो।… पर अगर बीमार होता तो फोन तो कर ही सकता था?… खैर! आज पता चल जाएगा। बस के घर की ओर जाने वाली बस आई तो वह उसमें चढ़ गया।

सारे रास्ते वह बसु के साथ गुजारे दिन याद करता रहा। उसे वह मौका याद आया जब बसु ने उसकी पत्नी को चूम लिया था, तो वह कांप गया था। कितना गुस्सा आया था उस दिन रमाकांत को?… साथ ही वह बहुत दुःखी भी हुआ था।

उस दिन रमाकांत की शादी की सालगिरह थी। बसु ने उन दोनों को खाने पर बुलाया था। कनॉट प्लेस के किसी ठीक से ढाबे पर खाना खाने का फैसला हुआ। निमंत्रण बसु की ओर से था। इसलिए उसकी बताई जगह पर वे दोनों ठीक वक्त पर पहुंच गए। खाने का आर्डर दिया गया और वेटर खाना ले आया। खाना बहुत स्वादिष्ट था। असल में उनकी इतनी आमदनी ही नहीं थी कि रोज होटलों में खाना खा सकते। कभी कभार ऐसी दावत मिलती तो वे जरूर जाते और पेट भर कर कसर निकालते।

आज भी वह ऐसा ही कर रहे थे। बसु उनकी तरफ बड़े प्यार से देखता रहा।…उनकी बातें सुनता रहा। मिसिज रमाकांत भरे शरीर की औरत थीं।

बसु एक टक आंखें गाड़े उसके शरीर की तरफ देखता रहा। उसकी निगाह उसके घने बालों और उनके बीच चमकते सिंदूर पर गई। माथे की बिंदी, आंख, नाक, गाल और होठों की तरफ देखता रहा। होंठों पर लगी लिपस्टिक खाना खाने से उतरनी शुरू हो गई थी। होठों की असली लाली दिखनी शुरू हो गई थी। फिर वह मिसिज रमाकांत के बाकी अंगों को निहारता रहा।

रमाकांत को पहले तो बुरा लगा। पर बाद में उसने सोचा कि उसकी पत्नी अगर सुंदर है, तो देखने वाले तो देखेंगे ही। …यह भी देखता रहे। …क्या घिस जाएगा।

पर जब बसु की निगाह रमाकांत की छातियों पर टिक गई, तो मिसिज़ रमाकांत से रहा न गया। उसने कह ही दिया, “बसु, आप शादी क्यों नहीं कर लेते?”

“शादी?” वह हंसा “आप जैसी खूबसूरत औरत तो यह रमाकांत ले उड़ा अब मैं शादी किससे करूंगा?” बसु के इतना कहने पर वह शरमा गई। आंखें नीचे करके उसने चोर नजर से रमाकांत की ओर देखा। शायद वह सोच रही थी कि यह बात रमाकांत ने तो कभी नहीं कही। उसे लगा शायद वह सचमुच ही खूबसूरत है!

रमाकांत चुप बैठा यह सब देख सुन रहा था। उसे कुछ नहीं सूझ रहा था कि अपनी पत्नी की तारीफ करे या बसु को ऐसा करने से टोके।

“पर इसमें बुरा भी क्या था? अगर मेरी पत्नी खूबसूरत है तो इसमें हर्ज भी क्या है? और आज हम उसके मेहमान भी तो हैं।… छोटा-मोटा मजाक तो चलता ही है!” उसने मन में सोचा।

बसु को खुद भी लगा कि अनजाने में उसने शायद कुछ ऐसा कह डाला है, जो उसे कहना नहीं चाहिए था। दुनिया भर की भटकनों के बाद मुश्किल से तो एक अच्छा दोस्त मिला है। यह भी नाराज न हो जाये। अच्छे दोस्त मिलते भी कहां हैं?…बसु सोच कर अपनी कही बात पर पछता रहा था।

खाना खाकर वे घूमने के खयाल से इंडिया गेट की तरफ निकल गए थे।

हल्की-हल्की ठंड उतर आई थी। वे वहीं पार्क में बैठ गए। थोड़ी देर बाद उन्होंने फैसला किया कि आइसक्रीम खाई जाए!…

रमाकांत ने जिद की कि आज उनकी सालगिरह है और इसलिए अब आइसक्रीम वह लाएगा। रमाकांत उठकर सड़क पर खड़ी रेहड़ी की तरफ आइसक्रीम लेने को बढ़ा था।

मिसिज रमाकांत का दिल धड़कने लगा था। अब बसु और मिसिज रमाकांत दोनों अकेले थे।

शायद वह बसु से कुछ कहना चाहती थी। उसने एक बार कोशिश तो की, पर हिम्मत नहीं हुई। पर फिर वह अपने आप को रोक नहीं पाई और बोल उठी “आखिर क्या मैं सचमुच खूबसूरत हूं।”

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“बेशक। तुम बहुत खूबसूरत हो।”

सुनते ही मिसिज रमाकांत का चेहरा लाल हो गया और बसु ने आगे बढ़कर उसे चूम लिया था।

मिसिज रमाकांत कांप गई थीं। उसे यह पाप तो लगा, पर अच्छा भी। रमाकांत आइसक्रीम लेते हुए यह सब देख रहा था। उसका दिल किया कि जाकर आईसक्रीम बसु के मुंह पर दे मारे।

पर उसने सोचा इसमें अकेले बसु की गलती थोड़े ही है। उसकी पत्नी भी तो आपत्ति कर सकती थी?… वही साली हरामजादी है…। हर औरत ही ऐसी होती होगी।

फिर उसे ख्याल आया कि खुद उसने अपनी पत्नी को कभी इतने प्यार से नहीं निहारा।… उसकी खूबसूरती की तारीफ नहीं की तो फिर दोषी वह खुद भी तो है इस विचार ने उसे उसकी खुद की नजरों में घटिया बना दिया था।

वह आइसक्रीम ले आया। तीनों ने एक-एक पकड़ी और एक दूसरे से आंख चुराते हुए घरों की तरफ चल पड़े थे।

घर पहुंचकर भी रमाकांत का मन नहीं लगा … वह ऊहापोह में फंसा रहा।

उसने सोचा था, आगे से वह कभी बसु के साथ बात नहीं करेगा। बहुत घटिया आदमी है…। तभी शादी नहीं करता साला….। दूसरों की पत्नियों पर नजर रखता है…। अकेले रहने की वजह से पैसे बच जाते होंगे… दूसरों की पत्नियों पर खर्च करने के लिए…। मिसिज रमाकांत बहुत डरी हुई थीं। पर सोच रही थी की यह सब उसने जान बूझकर तो नहीं किया था…। बस हो गया था…। वह एक वफादार औरत की तरह रह रही थी…। अचानक उसके अन्दर से यह क्या उमड़ा था कि ऐसा कर गई। पर फिर सोचने लगी उसने खुद थोड़े ही कुछ किया था? उसके दोस्त की ही ज्यादती थी…। वह ऐसे लोगों से दोस्ती ही क्यों रखता है?… अपने-अपने विचारों में खोए हुए दोनों ही न जाने कब सो गए थे। सुबह उठकर मिसिज रमाकांत ने क्षमा मांगी…। रमाकांत चुप रहा…। उसकी खामोशी ने मिसिज रमाकांत को ओर परेशान कर दिया…। वह डर रही थी…। पता नहीं उसे क्या हो गया था।

रमाकांत तैयार होकर दफ्तर चला गया पर वह अपनी पत्नी से कुछ बोला नहीं। मिसिज रमाकांत और परेशान हो गईं।

जब रमाकांत दफ्तर पहुंचा तो बसु पहले से ही आया हुआ था। उसने रोज की भांति रमाकांत को बुलाया पर रमाकांत ठीक से नहीं बोला।

उसने सोचा ऐसा व्यवहार कर बसु ऐसे दिखावा कर रहा है जैसे कल कुछ हुआ ही नहीं। इतनी देर में स्टाफ के बाकी लोग भी आ गए। उनमें से तानिया और उषा के साथ भी उसकी काफी अच्छी बनती थी। उन्होंने आपस में विश किया और अपने-अपने काम में लग गए। लंच का समय हो रहा था। रमाकांत और बसु इकट्ठे लंच करते थे, पर रमाकांत आज समय से पहले ही उठकर बाहर लंच करने चला गया। बसु ने तानिया और उषा के साथ लंच किया। उषा ने व्यंग कसा, “आज अपने दोस्त के साथ लंच नहीं किया, क्या झगड़ा हो गया है” वह मजे ले रही थी। बसु चुप रहा। कुछ देर दफ्तर की बातें होती रहीं। बाद में तानिया की शादी की बातें चल पड़ी। तानिया ने बताया कि उसने सारे स्टाफ को बुलाया है। इतनी देर में रमाकात लंच कर वापस आ गया। जब वह आया तो वे तीनों जुड़कर बैठे हुए थे। उसे लगा कि यह साला आज तानिया के साथ भी वही सब कुछ करेगा जो कल उसकी पत्नी के साथ किया था। वह क्रोध से भरा अपनी सीट पर चला गया और अपने काम में व्यस्त होने की कोशिश करता रहा।

यह सिलसिला कई दिन तक इसी तरह चलता रहा। रमाकांत घर जाता तो पत्नी के ऊपर खीझता। पर कहता कुछ नहीं। दफ्तर आता तो बसु से दूर-दूर रहता। उसे बसु से नफरत सी होने लगी थी। बसु जब तानिया या उषा से हंस-हंस कर बात करता होता तो रमाकांत बेकाबू हो जाता। पर उसे कहता कुछ न!

एक दिन जब रमाकांत और उसकी पत्नी रात को सोने लगे तो मिसिज रमाकांत ने बताया कि वह उसके अगले बच्चे की मां बनने वाली है। यह सुनकर पहले तो रमाकांत खुश हुआ पर फिर वह उदास होकर उसे ताकता रहा वह शायद यह ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा था कि उस बच्चे का बाप कौन है? उसके मन में बराबर यह शक बना हुआ था कि उसकी पत्नी चोरी छिपे जरूर बसु मिलती है। और अब यह बच्चा भी उसी का होगा। अचानक बिस्तर में लेटे रमाकांत को अपने आप से घृणा होने लगी। उस रात वह ठीक से नहीं सो पाया।

पर समय बीतता गया धीरे-धीरे उसका गुस्सा ठंडा होता गया। एक दिन उसने बीती बातों पर मिट्टी डालने का फैसला कर लिया और समझौता कर जिंदगी फिर उसी रफ्तार से चलाने का फैसला किया। जिन्दगी चल रही थी कि अचानक बसु गायब हो गया और दफ्तर आना बन्द कर दिया।

बस अपनी पूरी स्पीड से भाग रही थी। रमाकांत बसु के साथ गुजारे समय में खो गया। इस तरह यादों का सिलसिला भी चलता रहा और बस भी।

बसु के घर के नजदीक का स्टाप आ गया और वह उतर कर उसके घर की तरफ हो लिया। जैसे-जैसे उसका घर नजदीक आ रहा था उसकी घबराहट और बढ़ती जा रही थी। कहीं बसु बीमार न हो?… वह तो रहता भी अकेला ही है। मां, बाप, बहन-भाई या और किसी रिश्तेदार के बारे में उसने कभी कुछ नहीं बताया। भगवान करे सब ठीक हो।

आखिर वह बसु के घर पहुंच गया। दरवाजा खटखटाया तो एक मर्दनुमा औरत ने दरवाजा खोला। रमाकांत ने अपना परिचय दिया तो वह उसे अंदर ले गई।… आदर से बिठाया और बोली कि बसु हमेशा आपका जिक्र किया करता था।… इतना कहकर वह चुप हो गई।… फिर अचानक उस चुप्पी को तोड़ते हुए कहा “बसु परसों ही यह जून छोड़ गया।”

रमाकांत पर जैसे वज्रपात हुआ हो वह अव्यवस्थित हो उठा।… फिर किसी तरह अपने ऊपर काबू पाकर उसने कहा “दफ्तर में किसी को खबर तक नहीं मिली। हम लोग चिंतित थे।”

“हमारे समाज में जब कोई यह जून छोड़ता है, तो हम किसी को नहीं बताते, बल्कि आधी रात में लाश को छुपा कर ले जाते हैं, ताकि कहीं कोई गर्भवती औरत न देख ले और हमारे जैसी औलाद पैदा कर दे – न मर्द और न औरत।”

रमाकांत को लगा जैसे वह जमीन की तहों में धंस गया हो और कुदरत के करिश्मे उसे थपेड़े मार रहे हों।

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