Piya Basanti Re
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Hindi Social Story: ठक …!ठक… !!ठक…!!! आतंकवादियों ने उस आर्मी बेस पर अटैक किया था जिसमें शशांक अपने साथियों के साथ एक मिशन के तहत रुका हुआ था।
पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर में भारतीय सैनिकों का एक दल अपने मिशन पर था। जहां अचानक ही आतंकवादी आ धमके। उनलोगों ने अचानक ही अंधाधुंध फायरिंग करनी शुरू कर दिया।
उनके हमलों से कई सैनिकों की जान चली गई जिसमें एक शशांक था जिसकी उम्र मुश्किल से 30-32 साल की थी ।
इस हादसे में वह शहीद हो गया था।
दुश्मन मुल्क से ऐसी घटनाएं रोज ही खबरों की सुर्खियां बनती रहीं हैं लेकिन जिसका सुहाग उजड़ गया, जिंदगी श्मशान बना गई वह उजाला थी। मुश्किल से 24 – 25 साल की नवयुवती। उसकी शादी को दो ढाई साल मुश्किल से हुए थे और गोद में दो जुड़वा बच्चियां।
जब उसके कानों में यह खबर पड़ी उसके तो होश ही उड़ गए ।वह अपने बच्चों का चेहरा देखते हुए धडाम से नीचे गिर गई। उसे कुछ भी होश नहीं था।कब शशांक की डेड बॉडी आई और कब उसका अंतिम संस्कार हुआ। उसे कुछ भी याद नहीं रहा।वह बेहोशी में पड़ी हुई थी ।दोनों बच्चे “मां…! पापा…!! मां, पापा!!” का रट लगाए रो रहे थे मगर वह थी कि इस घटना को सत्य मानने को तैयार ही नहीं थी।जब शशांक की तेरहवीं हो गई और उसके मांग से सिंदूर हमेशा के लिए पुंछ गया तब उसके पिता और ससुर दोनों ही उसके पास आकर उसके कंधे थपथपाते हुए बोले “बिटिया जो होना था वह तो हो गया ।अपने भाग्य को कोसने से कोई फायदा नहीं। तुम शशांक की मौत का शोक मत मनाओ। तुम्हारा पति देश का हीरो था ,देश की सेवा में शहीद हुआ है। ऐसे अपने आप को दुखियारी मत बनाओ। अपने आप को संभालो। अपने दोनों बच्चों को संभालो।”
अपने दोनों परिवारों का स्नेह स्पर्श पाकर उजाला पड़ी फूट-फूट कर रो पड़ी ।अपने मां पापा और सास ससुर सभी के गले लगकर वह यही कहती “आखिर मैंने क्या गलती की ! मेरा जीने का कोई हक नहीं है क्या? मेरे सिर से सिंदूर क्यों पुंछ गया’

“बेटी होनी को कोई कुछ नहीं कर सकता !ऊपर वाले के आगे हम सब लाचार हैं। कितनी खुशहाल जोड़ी थी तुम दोनों की। न जाने उसमें ग्रहण क्यों लग गया? अब इन दोनों बच्चों का चेहरा देखो और जीने की कोशिश करो।”
उजाला के पिता रमाकांत जी उसे अपने साथ ले जाना चाहते थे मगर उजाला के सास ससुर दोनों में जाने से मना कर दिया और कहा “अभी साल भर तक जब तक शशांक की बरसी नहीं हो जाएगी तब तक उजाला घर से नहीं जा सकती है।”
उजाला का मन भी नहीं था वहां से जाने का। आखिर वह शशांक के साथ ब्याह कर इस घर में आई थी। भले ही उसे छोड़कर हमेशा हमेशा के लिए शशांक घर से चला गया था लेकिन उसका अधिकार तो है इस घर पर।वह अकेला लड़का था। दो बहनें थीं।दोनों की शादी हो चुकी थी। शशांक के माता-पिता भी उम्रदार थे और बेटे की मौत ने भी उन्हें तोड़ दिया था।
उजाला और दोनों बच्चों को देखकर वे दोनों अपने ग़म भूलने की कोशिश कर रहे थे।

समय हर ज़ख्म का इलाज है।धीरे-धीरे सब कुछ नॉर्मल होता गया ।आईने में उजाला अपने आप को देखती‌उसकी सूनी मांग और सूना माथा बार-बार शशांक की याद दिलाया करता लेकिन शशांक की बोलती और हंसती तस्वीर उसके अंदर हिम्मत भर देती थी।

शशांक ने पहली रात में ही उससे कहा था “उजाला हम सैनिकों की जिंदगी तलवार की धार पर होती है ,कब पलट जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। तुम्हें अपने आप को मजबूत बनाना होगा।
तुम एक सैनिक की पत्नी हो ‌रोने वाली गुड़िया मुझे पसंद नहीं। अपने संघर्षों का मुकाबला डटकर करना सीखो। जिंदगी का क्या भरोसा?”
“आप बिल्कुल सही कहते हैं!” उजाला शशांक की तस्वीर देखकर अपने आप बुदबुदाती फिर अपने दोनों बच्चों का चेहरा देखती ।उसके अंदर हिम्मत आ जाती थी।

सरकार के अनुदान पर उसे एक अच्छे सरकारी स्कूल में टीचर की नौकरी मिल गई थी ।अब उसे कोई कमी नहीं थी। शशांक का पेंशन आ ही रहा था । ससुर अच्छी नौकरी पर से रिटायर किए थे। खेत खलियान सब कुछ था। बस अकेलापन था और सारी जिम्मेदारी।
उसके सास ससुर बूढ़े होते जा रहे थे तो नहीं चाहते थे कि उजाला उन्हें छोड़कर जाए मगर इतनी लंबी जिंदगी सिर्फ यादों के भरोसे तो नहीं काटी जा सकती! यह भी वह समझते थे फिर शशांक के दोनों निशानियां देखते तो उनकी आंखों में कुछ खटक सा जाता। अगर उजाला ने दूसरी शादी कर ली इन बच्चों का क्या होगा? साल डेढ़ साल बीत गया, उजाला के पिता उजाला की दूसरी शादी करवाना चाहते थे। वह उजाला के ससुर से बात करने के लिए आए।
रंजन जी की आंखों में आंसू आ गए मगर दुनियादारी तो वह भी जानते थे। उन दोनों की आंखें कब बंद हो जाए और फिर उजाला का क्या होगा उससे अच्छा है उजाला किसी और घर में चली जाए।

उजाला के पिता रमाकांत जी ने एक लड़का देख रखा था। वह भी उजाला की तरह ही विधुर था । उसके भी दो बच्चे थे।
वह उनलोगों के जान-पहचान का था।

रंजन जी बिलख उठे “उजाला के जाने के बाद हमारा क्या होगा? मैं तो भूल गया था कि वह हमारी बहू है। मुझे तो लग रहा था कि वह हमारी बेटी है।
आप शादी की तैयारी कीजिए । मैं और मेरी पत्नी दोनों उसकी खुशी में ही खुश हैं।”

उस समय उजाला स्कूल में पढ़ा रही थी। जब वह घर आई तो घर का माहौल थोड़ा बदला हुआ सा लग रहा था।
उसने अपनी सासू मां से पूछा “क्या हुआ मां?”
कुछ नहीं बेटा आज शशांक की बहुत याद आ रही थी।”
“ क्या हो गया ऐसा! अचानक क्यों याद आने लगी?”वह आश्चर्य चकित हो गई।
उसकी सास फूट फूटकर रो पड़ी “बेटा को तो हमने खो दिया, बहू को भी खोने जा रहे हैं।
पर …बेटा शादी भी बहुत जरूरी है हमारे समाज के लिए।बस एक चुटकी सिंदूर, यही हमारे समाज के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है। तुम्हारे पिता तुम्हारी शादी ठीक कर दिए हैं।
अब कुछ दिन में आकर तुम्हें ले जाएंगे।”

“यह क्या कह रही है मां आप और आप लोग तैयार हो गए मेरी शादी के लिए?”
उसकी सास चुप ही रहीं।
“नहीं मैं शशांक की जगह किसी को नहीं दे सकती।उन्होंने मेरा पाणिग्रहण कर मेरे मांग में सिंदूर लगाकर मुझे अपनाया था‌। इसी भरोसे से मैं इस घर को अपना कहती हूं। अब इस घर को छोड़कर मैं कहीं नहीं जाने वाली। आप दोनों है ना मेरे साथ।”
“अरे बेटा हम दोनों की जिंदगी का क्या भरोसा?”ससुर जी समझाने लगे।

“पापा जिंदगी क्या भरोसा? भरोसा तो किसी का भी नहीं! शशांक की जिंदगी का क्या भरोसा था कि एक दिन आतंकवादियों की गोलियों से इस तरह चुपचाप चल देंगे !मगर जिंदगी तो चल रही है ना। मेरे पास है शशांक की हिम्मत है ।उस सिंदूर की कीमत है और उनकी दो प्यारी-प्यारी निशानियां हैं। मैं आप इनको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी और अपने बच्चों का सौदा कभी नहीं कर सकती। मुझे यही रहने दीजिए।
मैं खुश हूं। शशांक की यादों के सहारे मैं सारी जिंदगी काट लूंगी और उन्होंने कहा था तुम बहादुर हो। एक सैनिक की पत्नी हो।तुम्हें इस तरह से डरना नहीं चाहिए ।मैं बहुत बहादुर हूं पापा ।मुझे किसी की जरूरत नहीं है और प्यार से सम्मान से सारी दुनिया को अपना बनाया जा सकता है ।कहानी को बदला जा सकता है ।दुनिया की परिभाषा को भी बदला जा सकता है। मैं वह बदल कर दिखाऊंगी ‌कल मैं आपकी बहू थी। आज बेटी बनकर अपने ही घर में रहने दीजिए।मैं कहीं नहीं जाऊंगी पापा …मुझे कहीं मत भेजिए!”
उजाला की सासु मां ने उसे अपने कलेजे से लगा लिया
“ एक ही तो बेटा था मेरा। बड़े शौक से तुम्हें बहू बनकर लाए थे बेटा। सोचे थे जिंदगी भर हंसती खेलती रहोगी फूल की तरह मगर तुमसे यूं ही मुरझा गई हो।”

“मां मैं यही खिली हुई हूं। कहीं और नहीं खिल पाऊंगी ।किसी बगिया से उखाड़ कर किसी पौधे को किसी दूसरी जगह लगा दीजिए तो जरूरी नहीं कि वह वहां हरा भरा ही रहेगा।वह सूख भी सकता है। इसलिए प्लीज अभी तो मुझे शशांक की यादों के सहारे जीने दीजिए। कल को जब उनकी यादें धूमिल पड़ जाएगी तो मैं जरूर शादी कर लूंगी। पूरे हक से कहूंगी “मां पापा अब मेरी शादी करवा दीजिए। इतना तो अधिकार आपने मुझे दिया है ना। पापा मैं कहीं नहीं जाऊंगी।*

रमाकांत जी जब उसे लेने आए तो उजाला ने उन्हें भी मना कर दिया *पापा आपने बहुत शौक से अपने हाथों से मुझे शशांक के साथ विदा किया था। आप हैं ना मेरे साथ और मेरा पूरा मायका मेरे साथ है। मैं अकेली कहां हूं ?मैं किसी और कि नहीं हो सकती। पापा प्लीज मेरा सौदा मत कीजिए।एक बार शादी होती है, एक बार सिंदूर लगता है और फिर पूरी जिंदगी तो उसकी कीमत ही अदा करनी पड़ती है। भले ही शशांक यहां नहीं है लेकिन यह घर तो मेरा अपना है ना ! मुझसे यह हक मत छीनिए।”
रमाकांत जी भावुक हो उठे। उन्होंने भरे हुए गले से कहा”हां बेटा, यह घर तुम्हारा है। तुमसे यह हक कोई नहीं छीनेगा। हम सब तुम्हारे साथ खड़े हैं।”
उजाला फूट फूटकर रो पड़ी। लेकिन उसकी आंखों में नई रोशनी की चमक आ गई थी।