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महानगर | Mahanagar novel S Balwant | best novel in hindi | Grehlakhami
Mahanagar

इस बार मास्को से वापस लौटते वक्त कबीर ज्यादा उदास था। बहुत कुछ बदल गया था। नादिया अभी-अभी उसको एयरपोर्ट तक छोड़ कर गई थी। जाते वक्त उसने कबीर को कसकर बाहों में लिया और उसे चूमा। बिछड़ते समय उसकी आंखों में एक अलग-सी उदासी थी।

कबीर को लगा यह उदासी शायद औरत मर्द की मुहब्बत की नहीं बल्कि दो अच्छे दोस्तों के बिछुड़ने की है।

कबीर के कई दोस्त मास्को में रहते थे। वह उनको अकसर याद करता और कई बार मिलने का मन बनाता। मास्को में चाहे हालात कितने भी बदले हों, पर उसका यह मानना था कि जब किसी दोस्त पर मुश्किल का समय हो तो पता तो करना ही चाहिए?

जब से सोवियत संघ के टुकड़े हुए, दिन-ब-दिन वहां के लोगों की हालत खराब होने की खबरें अक्सर आती रहती थीं। कुछ भारतीय जो वहां व्यवसाय के लिए गए थे माफिया के डर से ही कांपते वापस आ गए। खबरों की इंतहा यह थी कि रूसी संसद पर चलती हुई तोपें भी टीवी पर दिखाई जा चुकी थीं। अधजली संसद कई बार दिखाई गई …… जब वह ऐसी खबरें सुनता तो डर जाता। पता नहीं क्या हो….. अब दोबारा रूस नहीं जाना। माफिए के लोग तो कमरे में घुसकर सामान और पैसे लूट ले जाते हैं। वहां जुर्म बहुत बढ़ गया है। पता नहीं कौन किसमें शामिल हो गया हो?

इस बार लंदन जाते समय उसने मास्को का वीजा लेने की कोशिश भी की पर डर की वजह से अंत में उसने अपना मन बदल लिया। फिर जब उसने लंदन से नादिया को फोन किया तो नादिया के बहुत जिद करने पर वह मास्को में रुकने के लिए तैयार हो गया।

वीजा लेकर उसने नादिया को फोन किया। नादिया ने कहा कि वह उसे एयरपोर्ट लेने तो आएगी पर अब उसके पास कार नहीं है … वह बस में आएगी और वापसी पर टैक्सी करके उसे जहां जाना होगा छोड़ देगी।

नादिया की भी यह इच्छा थी कि वह उसकी मां के फ्लैट में ही ठहरे और जो होटल का खर्च बचे वह मां को तोहफे के तौर पर दे दे।

कबीर ने सोचा कि होटल की बजाय नादिया की मां का घर अच्छा है। उनका साथ भी रहेगा और वहां नादिया से मिलना भी आसान होगा। पिछली बार जब वह एक दिन के लिए मास्को में ठहरा था तब भी नादिया उसे अपनी मां के घर ही ले गई थी।

कबीर पहले अकसर सोवियत यूनियन आया करता था और नादिया भी एक बार भारत आई थी। उसे इस बात पर गर्व था कि वह हिन्दी की विद्यार्थी है। उसकी मां उसे संपूर्ण भारतीय बनाने के सपने देखा करती थी। उसने नादिया को भरत नाट्यम भी सिखलाया। उसे स्वयं भी भारतीय कलाकारों, इतिहासकारों और फिल्मकारों के बारे में अच्छी जानकारी थी।

जब नादिया ने मास्को विश्वविद्यालय से डिग्री कोर्स किया तो उसके मन में एक सपना था। भारतीय संस्कृति से मुहब्बत का सपना। भारतीय सौंदर्य से जुड़ने का सपना और यही सपना लेकर वह एक बार भारत आई भी थी। लेकिन दस दिन के सफर के बाद अधप्यासी ही वापिस चली गई, कि फिर आएगी।

पर देखते ही देखते सोवियत संघ की रूसी फैडरेशन बन गई। सारी अंतराष्ट्रीय नीतियों में तबदीली आ गई।… भारतीय भाषाओं से संबंधित सब संस्थाएं या तो बंद हो गईं या उनमें बदलाव आ गया। रातों-रात सारी उम्र की पढ़ाई बेकार हो गई… लगता था जिंदगी भर के सपने रातों-रात चूर हो गए हों…।

तब वह मां-बेटी अकेली रहती थीं। मर्दों का बोलबाला बढ़ने लगा तो नादिया ने भी शादी कर ली और अब वह अपने पति के साथ रहती थी। नादिया ने अपने पति को अपनी पुरानी जिंदगी के बारे में सब कुछ बताया हुआ था। उसने कबीर के साथ अपने संबंधों के बारे में भी उसे बताया था और कहा था कि कबीर भारत में अपने परिवार के साथ रहता है और खुश है।

उसका पति उसे बेहद प्यार करता था।

लन्दन में जब फोन बंद किया तो वह फिर सोच में पड़ गया।… बहुत कुछ बदल गया है। कहीं नादिया भी न बदल गई हो?…कहीं वह खुद भी माफिया के लोगों से न मिली हुई हो?… और कबीर के आने की खबर माफिया को दे दे।… वहां माफिया के लोग तो घरों में घुसकर लूट कर ले जाते हैं। यह वह सुन चुका था।

ऐसी खबरें उसे लंदन में भी कई लोगों ने दी थीं। लंदन के कई लोगों को मास्को में कैसे लूटा गया था, इसकी भी कई कहानियाँ उसे सुनने को मिलीं। कबीर फिर परेशान हो गया। उसके पास तीन दिन बाकी थे। उसने कोशिश की कि सीधे दिल्ली की फ्लाइट मिल जाए। पर उन तीन दिनों में से दो दिन दिल्ली की उड़ान ही नहीं थी। इसलिए मास्को में ठहरना ही पड़ना था।

उसने दो दिन और दो रातें इसी परेशानी में काटीं। चलने से पहले उसने कुछ कीमती सामान लंदन में ही रख दिया था। बचे हुए पैसों के ट्रेवलर चैक बनवाए और कुछ नगदी ले मास्को पहुंच गया।

नादिया हवाई अड्डे पर उसका इंतजार कर रही थी। दोनों पूरी गरमजोशी से मिले और टैक्सी लेकर शहर की ओर चल पड़े।

कबीर के मन का डर फिर बढ़ने लगा। ज्यों-ज्यों टैक्सी शहर की ओर बढ़ रही थी, वह हर व्यक्ति को शक और भय से देख रहा था।

आखिर वे घर पहुंच गए। थोड़ी देर में नादिया की मां भी आ गई। पर इस बार उसके साथ नादिया का पिता भी था। उसे देखते ही कबीर फिर काँप सा गया। सोचा यह ज़रूर माफिया का आदमी होगा।… पिछली बार तो नादिया का पिता यहां नहीं था।

अंदर से डरते हुए उसने उनकी बातों में साथ दिया। नादिया की मां ने खाने के बारे में पूछा और फिर वह खाना पकाने में लग गई।

नादिया, उसका बाप मि. वलेरा और कबीर एक ही कमरे में बैठे थे। नादिया का पिता लंबा और पक्की हड्डी के शरीर वाला था। थोड़ी देर बाद जब वह उठकर दूसरे कमरे में गया तो कबीर ने नादिया से पूछा, जब पिछली बार मैं यहां आया था, तब तो तुम्हारे पिता यहां नहीं थे?” “मेरी मां ने दूसरी शादी की है!” नादिया ने बताया।

भय में उलझा वह सोच रहा था कि वह उनके दिल की बात बाहर कैसे निकलवाये? उनका क्या प्लान है?… उसे डर था कि कहीं ये लोग रात को सोने के समय ही कुछ गड़बड़ न कर दें?….

कुछ समय बाद मि. वलेरा उस कमरे में वापस आये और कबीर को सिगरेट पेश की। कबीर के इनकार करने पर वह स्वयं घर के छज्जे पर चले गये और सिगरेट पीने लगे। कबीर और नादिया अंदर बैठे रहे। कुछ देर बाद मि. वलेरा ने कबीर को छज्जे पर बुलाया और उसे बाहर का दृश्य दिखाने लगे। बाहर ठंडी हवा चल रही थी। जब नादिया उनके पीछे छज्जे पर आ खड़ी हुई, तो वह पल भर के लिए कांप सा गया। यह फ्लैट काफी ऊपर की मंजिल पर था। जब उसने नीचे चलती गाड़ियों की ओर देखा तो वे खिलौने सी लग रही थीं। वह पूरी तरह सहम-सा गया और डर के मारे अंदर आ गया।

वह कुछ समय इधर-उधर की सोचता रहा। अचानक उसे याद आया कि उसके पास स्कॉच की एक बोतल है, जो उसने ड्यूटी-फ्री शॉप से खरीदी थी। उसने नादिया से पूछा कि क्या वह उसके पिता को ये स्कॉच भेंट कर सकता है?… वह बहुत खुश हुई। स्कॉच की बोतल देखते ही मि. वलेरा की आंखों में चमक आ गई और वह भी खास चमक। वह खुशी में झूमने लगे। थोड़ी देर बाद खाना शुरू हुआ तो स्कॉच भी खोली गई। कबीर के आने की खुशी में नादिया और उसकी मां ने वाइन मंगवाई थी। उन्होंने उसका साथ देने के लिए एक-एक पैग लिया। मि. वलेरा और वह कभी स्कॉच पीते और कभी वोदका के पैग पर टोस्ट पेश करते, बीच-बीच में मि. वलेरा कहते कि कबीर की हंसी असली रूसियों जैसी है। कभी-कभी वह उठकर उसे गले लगा लेते।

वह जो भी बातें करते, नादिया उनका अनुवाद करती जाती। खाने की मेज पर बैठे-बैठे वहां की गरीबी, लूटमार, माफिया, राजनीति तथा और बहुत से विषयों पर बातें होती रहीं। वह खाने की मेज पर बैठे बातें करते रहे और धीरे-धीरे कबीर का डर कम होने लगा।

खाना खत्म हुआ तो आधी रात हो चुकी थी। नादिया को अपने घर जाना था। उसकी मां और बाप जब उसे मेट्रो स्टेशन तक छोड़ने के लिए जाने लगे तो चलते वक्त उन्होंने बताया, आजकल रात को खतरा होता है। अकेली लड़की को इस समय नहीं जाना चाहिए। इसलिए वे उसे छोड़कर जल्द ही वापस आ रहे हैं।

कबीर फिर डर गया कि कहीं यह उनकी कोई चाल तो नहीं। इन लोगों के जाने के बाद ही माफिया के लोग न आ जाएं? पर उनके साथ बिताए समय और बातचीत के खयाल से यह डर जल्दी ही उसके मन से निकल गया और वह दरवाजे के अन्दर की चिटखनी लगाकर लेट गया। – सुबह जब नादिया का फोन आया तब उसकी आंख खुली। वह प्रोग्राम पूछ रही थी। नादिया ने कबीर को यह भी बताया कि उसने उसी दिन शाम को एक बैले देखने के लिए दो टिकटें मंगवाई हुई हैं। थोड़ी देर में वह खुद भी आ गई। इतने समय तक कबीर नादिया की मां से रूसी भाषा सीखता रहा और उसके पिता द्वारा पेश की गई वोदका के साथ टोस्ट का मजा लेता रहा।

घर से बाहर निकलते समय कबीर ने कुछ डालर नादिया की मां को दिए और बाहर आकर नादिया और वह शहर की ओर चल दिए।…यह वही सड़क थी, जिससे वे कल आए थे, जो हवाई अड्डे से शहर की ओर जाती थी।

आज उसे कल की भांति हर व्यक्ति से उतना डर नहीं लग रहा था। उन्होंने मेट्रो स्टेशन से गाड़ी ली और क्रेमलिन देखने चले गए। नादिया ने वहां के सारे चर्च कबीर को दिखाये। वह हर चर्च का इतिहास और उनमें लगे चित्रों के बारे में उसे पूरे विस्तार से बताती रही। उसे वह उस चर्च में भी ले गई जो रूसी इन्कलाब से पहले वहां के बादशाह जार का सरकारी चर्च था और वहां भी ले गई जो अब सरकारी चर्च है।

बाद में वे दोनों लाल चौक पर आ गए और घूमते हुए लेनिन म्यूजियम के आगे से गजरे। नादिया ने बताया कि लेनिन का शरीर अभी भी वहां सुरक्षित रूप से संरक्षित है।… सारे स्टोर. .म्यूजियम…पुस्तकालय सब वैसे ही हैं। कुछ के नाम बदल गए हैं और स्टोरों में कुछ और तरह का सामान बिकने लगा है। होटल रोशिया भी पास ही था, जहाँ कबीर ठहरा करता था। नादिया ने बताया कि वह भी वैसे ही चल रहा है।…गरीबी बहुत बढ़ गई है।…फैक्ट्रियां बंद पड़ी हैं।…उन्हें चलाने के लिए पैसा नहीं है। जिनके पास साधन थे, वे कारोबार में चले गए।… अमीर माफिया के साथ मिलकर और अमीर होते जा रहे हैं। आम व्यक्ति को केवल पेट भरने लायक काम भी मुश्किल से मिल पाता है। रूबल की कीमत बहुत कम हो गई है। एक अमरीकी डालर के 6-7 हजार रूबल सरकारी तौर पर मिलते हैं।…ब्लैक में तो और भी ज्यादा।

नाजायज काम बहुत बढ़ गए हैं। लोग धंधा करने के लिए, माफिया को चढ़ावा चढ़ाते हैं, और धड़ल्ले से कारोबार करते हैं।…लड़कियों का जिस्म फरोशी का धंधा भी खूब जोरों पर है। उसने बताया कि थोड़ा बहुत तो पहले भी चलता था, पर इतने बड़े पैमाने पर नहीं।…अब स्कूलों की लड़कियां पंद्रह-सोलह साल की उम्र में ही इस धंधे में पड़ जाती हैं। पहले वे अय्याशी की वजह से इस धंधे में आती थीं, पर अब सरवाइवल के लिए आती हैं।

क्रैमलिन में ही “मास्कां” स्टेट थिएटर की तरफ से चाइकोवस्की के संगीत पर कंपोज किए गए “स्वैन लेक” बैले का शो था।…सारा हॉल फुल था कोई सीट खाली नहीं थी।… वह इस बात पर भी हैरान हुआ… गरीबी और अमीरी की इंतहा देख कर उसे भारत याद आ गया। नादिया ने पहले ही दो सीटें अच्छी जगह पर ले रखी थीं। उसने कबीर को सारे बैले की तफसील पढ़कर सुनाई। फिर जब बैले शुरू हुआ वह उसकी एक-एक बात साथ-साथ बताती गई। इस बैले में कई मुल्कों के नृत्य भी शामिल किए गए थे। जब किसी और देश का नृत्य आता तो नादिया एकदम से फूलकर बताती कि यह नेपाली नृत्य है…यह फ्रेंच,…यह जार्जियन या कोई और …। बैले की कहानी एक राजकुमार की थी, जिसे समुद्र पर नाचती हुई एक लड़की से इश्क हो जाता है पर वह लड़की किसी जादूगर के शिकंजे में है। जब भी वे दोनों मिलते, जादूगर अपने जादू से उनको एक दूसरे से जुदा कर देता वे दोनों एक दूसरे के बिना तड़पते रहते। …राजकुमार कभी अपनी मां के पास मदद मांगने जाता तो कभी स्वयं ही युद्ध करने के लिए जाता …पर उसे जीत हासिल नहीं होती।…वे एक दूसरे से मिलने के लिए तड़पते और ईश्वर से प्रार्थना करते… अंत में वह राजकुमार उस जादूगर के पर काटने में कामयाब हो जाता है और उसे अपनी महबूबा मिल जाती है।…दोनों खूब खुश होते हैं और देर तक नाचते रहते हैं।

बैले देखते हुए बीच-बीच में नादिया भावुक हो जाती, और कबीर के कंधे पर सिर रख देती। उसके खुले केश और मुस्कराता हुआ चेहरा कबीर को अच्छा लग रहा था। कभी वे एक दूसरे का हाथ पकड़ लेते।…जो लड़के-लड़कियां बैले में नाच रहे थे वे रबड़ के गुड्डे-गुड़िया लग रहे थे।

जब कोई रोमांचक संगीत बजता, तो नादिया अपने दोनों हाथ खोलकर बैठ जाती। बाद में उसने बताया कि इस तरह हाथ करने से परमात्मा के पास दुआ जाती है कि इस संगीत से मेरी आत्मा में रोमांटिक इच्छा और बढ़े यह संगीत मेरी रोमांटिक इच्छा को और प्रबल करे। “परमात्मा से यही दुआ कर रही थी…” कहते हुए उसने कबीर के कंधे पर सिर रख दिया। नादिया के लम्बे बाल कबीर की पीठ से नीचे तक बिखर गए। कबीर के शरीर में एक अजीब एहसास होने लगा और उसने नादिया का मुंह चूम लिया इस पर नादिया ने भी कबीर को चूम लिया। इस बार यह पहला मौका था जब उन्होंने एक दूसरे को चूमा।

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बैले चलता रहा और वे एक दूसरे के साथ जुड़कर बैठ रहे कभी एक दूसरे का हाथ पकड़ लेते और कभी एक दूसरे को चूम लेते।

बैले खत्म होने के बाद वे बाहर घूमने लगे।

दोनों एक दूसरे के गिर्द बांहें डाले, दुनिया से बे-खबर चल रहे थे।… बीच-बीच में कबीर भारत की बातें छेड़ देता। कभी नादिया रूस की बातें करने लगती।… चलते-चलते वे मास्को की मशहूर नदी के पुल पर पहुंच गए। होटल राशिया के पीछे इस पुल पर से अगर आकाश की तरफ देखो तो यूं लगता है मानो आकाश को छुआ जा सकता है।

यह वही पुल था जहां वे बारह-पंद्रह साल पहले आए थे। नादिया तब मास्को विश्वविद्यालय से डिग्री कर रही थी।… खाली वक्त में उसे काम करने का शौक था और जेब खर्च बनाने का लालच भी। तब वह दुभाषिये का काम कर लेती थी। पंद्रह साल पहले जब कबीर सोवियत संघ आया था, तो नादिया उसके साथ इंटरप्रेटर के तौर काम कर रही थी। नादिया इंटरप्रेटर तो बढ़िया थी ही पर उसे भारत के बारे ज्यादा से ज्यादा जानकारी प्राप्त करने की इच्छा भी थी।… इसलिए वह कबीर के साथ काम करके खुश थी।

जब भी फुर्सत मिलती वह भारत के बारे में जानने का प्रयास करती… कैसा देश है?…कैसे लोग हैं? रहन सहन कैसा है?… साहित्य… कला… और पता नहीं क्या कुछ।…जो कुछ भी सूझता, वह जानना चाहती थी।

कबीर ने जब पहले दिन नादिया से मास्को घुमाने के लिए कहा था तो, वह उसे जहां ले गई उस जगह का नाम उन्होंने “लवर स्ट्रीट” रखा, क्योंकि वहां दोनों एक दूसरे के बहुत करीब आ गए थे। एक रात चलते-चलते वे इस नदी के पुल पर एक दूसरे में समाए खड़े थे… और ऊपर से मूसलाधार बारिश हो रही थी।… दोनों ने अपनी पूरी आवाज से कहा था “रब्बा, तेरी मेहर दा अंत नहीं। हमारी जिंदगी का सपना, यह देश! इस देश के इतिहास का यह पन्ना लाल चौक और यह बहता हुआ दरिया।…इस पर खड़े हम तेरी हाजरी भर रहे हैं। और तुम हमारी खुशी को परवान चढ़ाकर बारिश का संदेश दे रहे हो।…सलाम है रब्बा…तुम्हें लाल सलाम! इसके बाद वे कई बार उस पुल पर आए और जब भी इस पुल पर आते बरसात जरूर होती।

आज फिर वे इस पुल पर से जा रहे थे। लेकिन इस बार बरसात न हुई। शायद बहुत कुछ बदल गया था।

अगले दिन वह और दोस्तों से मिला। मास्को विश्वविद्यालय गया। एक प्रोफेसर दोस्त के घर खाने पर गया। वे अक्सर भारत आते रहते थे। उनकी पत्नी के साथ जब उसने बात की, तो वह बहुत उदास थी। उसने तो कबीर को सीधे-सीधे कह दिया, “पहले हमारी बारी थी और वही सौदागर बाद में भारत पहुंचने वाले हैं। हम तो सह ही रहे हैं, आप अपना खयाल करो।”

कबीर ने ऊपर से तो हंस कर टाल दिया पर उसे लगा कि इसको क्या पता हम क्या भोग रहे हैं? पर वह अंदर से डर भी गया कि “क्या इससे भी बदतर वक्त आने वाला है?”

कबीर का प्रोफेसर दोस्त चाहता था कि वह उनके पास ठहरे। पर कबीर नादिया के पास वापिस जाना चाहता था।…प्रोफेसर उसे छोड़ आया।

नादिया और उसकी मां इंतजार कर रही थीं। मि. वलेरा वोदका लेने गये हुए थे।

वह आया तो खाना शुरू हुआ।…खूब सारे टोस्ट पेश किए गए।…बहुत सारे रैजोलूशन भी।…पहले अक्सर ऐसे टोस्ट हुकूमत के नाम पर पेश होते थे, पर इस बार सब ईश्वर के नाम पर पेश हुए।…ईश्वर ही मालिक…वही वारिस…! कबीर को लगा कि नादिया की मां उसके और नादिया के रिश्ते के बारे में जानती है, पर शायद उसने इस बारे में मि. वलेरा को नहीं बताया था। उसके चेहरे पर आते हर भाव से कबीर को लगता कि वह उसके और नादिया के रिश्ते को समझने की कोशिश कर रहा है। पर कबीर और नादिया बहुत कुछ आंखों आंखों में ही कह जाते। नादिया बता रही थी कि राजनीतिक उथल-पुथल तो हमेशा होती रही है। पर पिछले दो तीन लीडरों के समय में सब कुछ ऐसे बदल गया जैसे कि सब कुछ सपना हो। आजादी की बात तो हम लोग पहले भी करते थे, पर ऐसी आजादी किसी ने नहीं सोची थी कि बदले में रोटी भी नसीब न हो। चाहे नादिया यह कह नहीं रही थी, पर जो कुछ भी खाने की मेज पर पड़ा था, वह कबीर के आने की वजह से और उसके पैसे से लाया गया था। नहीं तो यह सब तो उनके लिए सपना हो गया था।

बातें करते-करते नादिया उदास हो जाती। नादिया की मां अपने सपने सुना रही थी।…बता रही थी कि जब नादिया पैदा हुई, तब भारत और सोवियत संघ के संबंध बहुत गहरे थे।…लोगों में बड़ी मोहब्बत थी। तब उसने अपनी बेटी को हिंदुस्तानी तालीम देने का फैसला किया। वह पी.एचडी. कर रही थी कि अचानक एक हवा का झोंका आया और सब कुछ रातों रात बदल गया।

जिंदगी भर का पढ़ा हुआ बेकार हो गया।…तमाम सपने चूर-चूर हो गए।…अब वह चर्च जाने लगी थी।…उसने ईश्वर का नाम लेना शुरू कर दिया था और अब उसका ईश्वर पर विश्वास बढ़ने लगा था।

कबीर सोच रहा था कि यहां और भी बेशुमार लोग होंगे, जिनके सपने इसी तरह टूटे होंगे।

इस वक्त वे सब खामोश थे। कबीर ने नादिया को भारत में आकर बसने की सलाह दी तो उसकी मां ने बताया कि उनके पूर्वजों की कब्रें यहां हैं। वह अक्सर वहां जाकर उनपर दीया जलाकर आती है। भारत या किसी भी और देश से आकर ऐसा करना संभव नहीं है और ऐसा न करना अपने पूर्वजों से मुंह मोड़ना होगा और यह अपनों के साथ गद्दारी होगी। यह कहते हुए नादिया की मां भावुक हो गई…कमरे में कुछ देर के लिए फिर खामोशी छा गई।

मौके की नजाकत को देखते हुए मि. वलेरा ने रूसी भाषा में एक गीत गाना शुरू कर दिया। वह इतना मगन होकर गा रहे थे कि कबीर को वो कल वाले मि. वलेरा से अलग लगे। जैसे कल वह सोच रहा था कि कहीं वलेरा माफिया का आदमी न हो, पर आज उस सख्त हड्डी वाले आदमी के अंदर एक भावुक इंसान उतर आया हो।

बाद में सभी उस गीत में शामिल हो गए और नाचने लगे। शायद ऐसा मौका उन्हें बहुत देर बाद मिला था।…सब भावुक भी थे और खुश भी।…जब सब थक गए, तो नादिया के माता-पिता दूसरे कमरे में सोने चले गए। अब कबीर और नादिया कमरे में अकेले थे।…कबीर ने नादिया से पूछा “आज वे तुम्हें छोड़ने नहीं जाएंगे?”

“नहीं।…आज मुझे यहीं सोना है… तुम्हारे साथ।… नादिया ने बिना किसी भाव के यह बात कह दी। कबीर ने कुछ बोले बिना उसके होंठ चूम लिए। दोनों सोफे पर बैठे एक दूसरे की आंखों में आंखें डाल एक दूसरे को पढ़ने की कोशिश करते रहे।…और बीच-बीच में वे एक दूसरे को चूम लेते।

कबीर ने नादिया के ब्लाउज के बटन खोल दिए…नादिया ने बाकी कपड़े भी उतार दिए।.. और वह कबीर के कपड़े भी उतारने लगी। अब वह दोनों एक दूसरे के आलिंगन में प्यार की दुनिया में लीन थे।

यह सिलसिला काफी देर तक चलता रहा।

अचानक नादिया ने चुप्पी तोड़ी और कहा, “अगर मैं आज यहां न सोऊं तो तुम्हें कैसा लगेगा?”

“शट अप”।… क्या यह समय है ऐसी बात करने का?…हमें तो आज अपनी जुदाई के एक-एक पल का ब्याज तक एक दूसरे से वसूलना है।…कहकर उसने नादिया को अपनी बांहों में कस लिया। पर फिर वह नादिया को छोड़ कर कुछ और सोचने लगा और थोड़ी देर की चुप्पी के बाद बोला, “मैं यह उम्मीद तो जरूर लेकर आया था कि हम इकट्ठे रहेंगे और अगर तुम मेरे साथ यहां न रहीं तो मुझे मायूसी होगी।” कबीर ने अपने दिल की बात कह दी।

“पर मैं अपनी नजरों में खुद ही गिर जाऊंगी।…अपनी इज्जत खुद नहीं कर सकूंगा।…मुझे तुम्हारे प्यार पर नाज है।… मेरा पति भी यह जानता है।…उसे यह भी पता है कि मैं इस वक्त तुम्हारे साथ हूँ।…लेकिन अगर मैं तुम्हारे साथ सोई तो मैं उसके साथ आंख नहीं मिला सकूंगी।…अपनी नजरों में खुद गिर जाऊंगी पर मैं तुम्हें भी मायूस नहीं देख सकती।…शायद तुम्हारे अंदर मैंने वह पाया है जो मेरे अवचेतन में कहीं बैठा था।… इसलिए मैं तुम्हारे साथ रहकर अपने आप को पूरा महसूस करती हूं।…तुम मुझे कभी गैर लगे ही नहीं।” यह कहती-कहती वह कबीर के साथ लग गई और उसका माथा गाल, होंठ चूमती चूमती रो पड़ी।

कबीर ने नादिया को कस कर अपनी बाहों में ले लिया।… कुछ देर वह चुप रहा और फिर बोला, “चलो केश संवार लो, और तैयार हो जाओ।…आज मैट्रो रेल स्टेशन तक मैं खुद छोड़ कर आता हूं।”

शायद नादिया कबीर से यह उम्मीद नहीं करती थी। पर इस बात ने उसे झंझोड़ कर रख दिया। जैसे उसके दिल से एक भारी बोझ उतर गया हो।…दोनों ने एक दूसरे को आलिंगनबद्ध किया चूमा और फिर तैयार हो मैट्रो की तरफ चल पड़े।

नादिया मैट्रो में बैठी आखिर तक हाथ हिलाती रही और कबीर उसे तब तक देखता रहा जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हुई। जब वह दिखनी बन्द हुई तो कबीर पैदल ही वापस चल पड़ा। यह वही सड़क थी जिस पर वह पहले दिन आया था और हर इनसान से डर रहा था, पर आज उसे किसी से डर नहीं लगा था …वह सब की तरफ देख कर मुस्कराता…विश करता हुआ घर की ओर चलता रहा।

घर पहुंच कर उसने अपने कमरे की अन्दर से चिटखनी लगाई और और लेट गया।

सुबह हुई तो नादिया का फोन आया।

उसकी मां हैरान थी कि रात नादिया यहां क्यों नहीं रही? ..अकेली स्टेशन गई थी? शायद ऐसे कई और सवाल वह नादिया से फोन पर पूछ रही थी।…पता नहीं नादिया ने क्या जवाब दिया। पर फोन के बाद नादिया की मां काफी देर कबीर के साथ बोली नहीं।…कुछ सोचती रहीं। जब नादिया आई तो उसकी आँखों में एक चमक थी और चेहरे पर आत्मविश्वास। वे तैयार होकर बाहर के लिए चल पड़े। आज वे धर्म, ज्ञान व आपसी रिश्तों की बुनियाद की बातें करते रहे।

किसी स्टेशन से मैट्रो पकड़ कर वे गोर्की पार्क चले गए और पार्क के किनारे पानी में चलती किश्तियों में सैर करते रहे। फिर गोर्की पार्क के अंदर आकर एक दूसरे का हाथ पकड़ कर बैठ गए।…दोनों के बदन की तपन एक दूसरे को लग रही थी।…कबीर का मन हुआ कि वह नादिया से कहे कि जो फैसला हमने कल रात किया वह गलत था।…हम इनसान हैं।.. इतनी दूर आकर भी एक दूसरे को पूरी तरह मिल नहीं सके तो क्या फायदा? …पर वह हिम्मत न कर सका। बाद में उसे खुद को लगा कि यह कितनी गलत बात है। …नादिया उसे प्यार करती है। वह सब कुछ करने के लिए तैयार थी, पर उसने अपने मन की बात उसके सामने रखी तो उन्होंने हम बिस्तरी का खयाल अपनी मर्जी से छोड़ दिया था।

अब नादिया भारतीय दर्शन की बातें करने लगी। बाद में उठ कर वह उसी नदी के पुल पर गए। आज कबीर नादिया को बहुत ध्यान से देख रहा था। वह उसे बहुत सुंदर लग रही थी। कबीर नादिया की खूबसूरती का जिक्र करने लगा तो वह सुनती रही। आखिर में उसने केवल “धन्यवाद” ही कहा। शायद वह जानती थी कि वह वास्तव में बहुत सुंदर है। इस बात की उसे खुशी तो बहुत थी पर घमंड नहीं। बात करते-करते कब आधी रात हो गई।…समय का पता ही न चला।…नादिया एकदम घबराई और जल्दी से जल्दी घर जाने को कहा। मां को फोन किया वह भी घबराई हुई थी। वह कबीर को स्टेशन पर लेने आ गई थी। नादिया दूसरी गाड़ी पकड़ कर अपने घर चली गई।

कबीर और नादिया की मां घर की ओर चल दिए। रास्ते में नादिया की मां उससे पूछ रही थी कि उन्होंने सारा दिन क्या किया? ..शायद वह नादिया से फोन पर पूछ भी चुकी थी। पर वह जैसे कबीर से केवल बात करने के लिए ही बात कर रही हो। बाद में उसने यह भी पूछा कि “रात को नादिया वापस क्यों चली गई थी?” “यह कुछ निजी मामला है।…विस्तार से बताऊंगा।” कबीर ने कहा। “खाक बताओगे?… मैं अपनी लड़की को शारीरिक धंधे में नहीं डालना चाहती थी।…तुम्हारे साथ उसके रिश्ते के बारे में मुझे पता है।…मैंने सोचा तुम्हारे साथ उसके संबंध बने रहें… तुम इसी तरह हमारे यहां आते जाते रहो, तो हमारा घर भी चलता रहेगा..पर अब खाक चलेगा हमारा घर?… तुम्हें क्या लालच?…अब तुम उससे केवल ख्वाबों में ही मोहब्बत करोगे।…मिलने क्यों आओगे?..मुझे तो अपने चूल्हे की आग भी बुझती नजर आ रही है।” वह यह कहते-कहते रो पड़ी।

कबीर ने उसे चुप कराने की कोशिश की और वह चुप हो गई। घर पहुंच कर कबीर को सारी रात नींद नहीं आई। वह इस देश में बहुत बार आया था।…उसने इस देश को पूरी बुलंदियां छूते हुए देखा था।…दुनिया इस देश का लोहा मानती थी।…संसार के आर्थिक और राजनीतिक फैसले इस देश की मर्जी के बिना कभी नहीं हो सकते थे। ये लोग, जिनकी मोहब्बत और आजादी के अफसाने अब तक सुनते आए थे, आज इतने मोहताज हो गए हैं?..वह समझता था कि सोवियत यूनियन टूटने का सबसे बड़ा नुकसान भारत को हुआ।…पर उसे लगा, वह गलत था। उसे लगा जैसे इतिहास की तमाम पुस्तकें उसके ऊपर आ गिरी हों और उनके पन्ने उसके दिमाग से पीछे निकलते जा रहे हों।

फिर कुछ समय वह चुपचाप बैठा सोचता रहा। पर उसकी तिलमिलाहट बढ़ती गई…उसका मन किया कि वह उड़कर जाए और इन सौदागरों के पंख काट दे।…फिर उसे लगा कि वह राजकुमार थोड़े ही है और यह कोई परी कहानी तो है नहीं यह एक हकीकत है …. इतिहास की हकीकत।…जिसे इतिहास के पन्नों ने तब नहीं पहचाना जब वक्त था।…और गया वक्त कभी हाथ आता नहीं।

कबीर ने फैसला किया कि जितने भी डॉलर, ट्रेवलर चैक व तोहफे उसके पास हैं, चुपचाप वह वहीं उसी कमरे में रख जाएगा, जहां वह रात को सोया करता था। …ट्रेवलर चैक वह नादिया के नाम भर देगा। कुछ डॉलर वह नादिया की मां को देने के लिए ही अपने पास रखेगा, इससे उन्हें कोई शक नहीं होगा।

सुबह नादिया के आने से पहले वह अपना काम कर चुका था। उसने सारा कुछ ऐसे तरीके से किया कि जिसका पता उसके जाने के बाद ही चले।

प्रोफेसर ने कार भेज दी, जो कबीर को हवाई अड्डे तक छोड़ने के लिए काफी थी। वह नादिया की मां बाप से गले मिला। कुछ डॉलर उसने नादिया की मां को दिए।…उसकी आंखें बता रही थीं जैसे वह अंदर से आशीष दे रही हो। जैसे कह रही हो “बेटा, फिर आना।”

नादिया और कबीर हवाई अड्डे पर बैठे एक दूसरे को देखते रहे…आंखों में कुछ कहते और एक दूसरे को चूम लेते। बिछुड़ने का समय नजदीक आ रहा था! नादिया कस्टम के बाद अंदर वाले काउंटर तक जाने में कामयाब हो गई जब उसने कबीर को अपने आलिंगन में ले लिया तो उसका शरीर कांप रहा था।…पता नहीं यह एक दूसरे से बिछुड़ने के कारण था या फिर किसी अधूरी इच्छा का अहसास। रात काफी हो गई थी। उसने नादिया को जाने के लिए कहा।

अंत में नादिया अपनी गीली आंखें लिए दूर तक हाथ हिलाती कबीर की आंखों से ओझल हो गई।

कबीर जहाज में बैठा बहुत उदास था।… बहुत कुछ बदल गया था।… सब कुछ बदल गया। उसे नादिया का सुनाया हुआ एक चुटकुला याद आया, वह कहती थी कि आजकल रूस में यह चुटकुला बहुत मशहूर है कि जब एक परिवार दूसरे परिवार से मिलता है तो हालचाल पूछने के बाद उनका एक दूसरे से पहला सवाल होता है :

“काम धंधा कैसा है …?”

“बस मुश्किल से रोटी पानी ही चलता है!” जवाब होता।

“रोटी पानी का क्या हाल है?” दूसरा सवाल होता।

“बस तीन मरतबा खा लेते हैं…।”

“है…तीन मरतबा..? बड़े अमीर हो सप्ताह में तीन बार रोटी खाते हो?…”

यह चुटकुला याद आते ही हंसने की बजाय कबीर की आंखों से आँसू निकल पड़े।

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