gunahon ka Saudagar by rahul | Hindi Novel | Grehlakshmi
gunahon ka Saudagar by rahul

चौहान ने टेलीफोन की आवाज सुनी तो रिसीवर उठाकर कहा‒“हैलो…!”

दूसरी तरफ से आवाज आई‒“कौन…नेताजी…?”

“मैं ही हूं।”

“मैं…दीवान मुरारीलाल बोल रहा हूं।”

गुनाहों का सौदागर नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1

“ओहो…कहो दीवानजी ?”

“बड़ा महत्वपूर्ण समाचार दे रहा हूं‒इनाम के योग्य।”

“घबराओ मत। इनाम भी मिलेगा।”

“नासिर दल के जितने गुण्डे पकड़े गये हैं, उन सबको पकड़वाने वाला एक काला नकाबपोश है, जो खुद को ब्लैक टाइगर कहता है।”

“यह कोई नया समाचार नहीं है।”

“नया समाचार जो अब सुनाऊंगा।”

“तो सुनाओ न जल्दी से।”

“उन गुण्डों ने बयान दिए हैं कि शहर के दोनों भागों में अराजकता फैलाने के लिए गोगा को आपने अस्सी हजार रुपए दिए थे।”

“ओहो…”

“और आपने गोगा को गोली मारी है न ?”

“हां, मैं कोतवाली फोन कर चुका हूं।”

“एस॰ पी॰ साहब ने एस॰ एस॰ पी॰ साहब को फोन किया था। एस॰ एस॰ पी॰ साहब डी॰ एम॰ साहब से मिलने गये हैं और वे लोग डी॰ जी॰ से सम्पर्क बनाएंगे।”

“क्यों…?”

“आपकी गिरफ्तारी के सिलसिले में ऊपर से ऑर्डर लेने के लिए !”

चौहान सन्नाटे में रह गया।

दूसरी तरफ से अवाज आई‒“हैलो…।”

चौहान ने जवाब दिया‒“मैं सुन रहा हूं।”

“अकरोली के ताजा दंगों की जिम्मेदारी भी आप पर ही डाली जा रही है, क्योंकि अकरोली के एम॰ एल॰ ए॰ दूसरे सम्प्रदाय के मौलाना टाइप हैं और दोनों सम्प्रदायों के लोग उनका सम्मान करते हैं। उनके ऊपर कोई सन्देह नहीं कर सकता।”

“अच्छा मुरारीलाल, शुक्रिया। तुम्हें इनाम जरूर मिलेगा।”

फिर उसने सम्पर्क काट लिया और डायल घुमाकर रिसीवर कान से लगा लिया।

कुछ देर बाद दूसरी तरफ से आवाज आई‒“हैलो…!”

चौहान ने कहा‒“कौन…शेरवानी साहब ?”

“मैं ही हूं।”

“मैं चौहान हूं।”

“ओहो नेताजी, कहिए…?”

“आपको मालूम है। मैं इस समय एक बड़े क्राइसिस में फंस गया हूं।”

“मालूम है…!”

“लेकिन मेरी सीट छीन गई और मैं अदालत के कटघरे में खड़ा हुआ तो लपेट में आप और जगताप भी आएंगे।”

“फिर…?”

“अगर हम लोगों के बीच कुछ मतभेद हैं भी तो क्यों न उन्हें भुलाकर इस समय हम तीनों मिलकर वर्तमान संकट का मुकाबला करें ? सम्भव है, हमारे मतभेदों की बुनियादें गलत-फहमियों पर ही आधारित हों।”

“शायद आप ठीक कह रहे हैं।”

“तो मैं आपके पास आ रहा हूं। आप और मैं जगताप के पास चलेंगे।”

“ठीक है।”

“और आप अपने किसी ऐसे खास आदमी को अपने सम्प्रदाय के लोगों में कन्वेसिंग के लिए भेज दीजिए, जो उन लोगों को समझा सके कि मेरी गिरफ्तारी और नगर की अराजकता किसी अपोजीशन लीडर की चाल है, जो अपने अपराध को मेरे सिर थोपे दे रहा है।”

“फिर…?”

“सम्भव है, मेरी गिरफ्तारी की नौबत आ जाए। ऐसे में अगर आप एक आवाज निकाल देंगे तो आपका सारा सम्प्रदाय मेरे समर्थन में सड़कों पर आ जाएगा और जगताप और जगताप साहब की आवाज पर हमारा सम्प्रदाय, इस तरह पार्टी हाईकमान के दिल में अगर गलतफहमी भी पैदा हो गई होगी तो जनता में मेरी लोकप्रियता देखकर या तो गलतफहमी समाप्त हो जाएगी या फिर वे लोग नीतिवश मेरे विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं करेंगे।”

“ठीक है, आप आ जाइए।”

“तब तक आप जगताप साहब को फोन कर दीजिए।”

“अभी नहीं…”

“क्यों…?”

“पहले हम दोनों कुछ तय कर लें। फिर जगताप साहब के पास चलेंगे।”

“ठीक मैं आ रहा हूं।”

चौहान ने रिसीवर रख दिया।

चौहान उस समय अपनी विख्यात कार में जाने की जगह एक काली-पुरानी मौरिस माइंस में कोठी से निकला, ताकि कोई उसे पहचान न सके। शीशे चढ़ा रखे थे।

कुछ देर बाद ही गाड़ी शेरवानी की कोठी के फाटक पर पहुंची। चौकीदार ने चौहान की एक झलक देखी और फाटक खोल दिया।

गाड़ी अन्दर जाने पर फाटक बन्द हो गया और गाड़ी बरामदे में रुक गई, जिसे खुद चौहान चलाकर लाया था।

उसने घंटी बजाई। दरवाजा भी खुद शेरवानी ने खोला और मुस्कराकर बोला‒“खुश आमदीद…तशरीफ लाइये !”

चौहान अन्दर घुसा और शेरवानी ने दरवाजा बन्द कर लिया। चौहान ने कहा‒“मैं अपने यहां किसी को खबर करके नहीं आया कि मैं कहां जा रहा हूं और न ही अपनी किसी ऐसी गाड़ी में आया हूं, जिसे लोग पहचान लेते।”

“वैरी गुड !”

“अब बताइये, क्या करना है ?”

“वही, जो इस मौके पर करना चाहिये और इस मौके का मुझे काफी दिनों से इन्तजार था।”

चौहान ने शेरवानी के वाक्य में व्यंग्य को महसूस किया और बोला‒“शायद अभी तक मेरी समझ से किसी गलतफहमी में पड़े हैं।”

“सच्चाई गलतफहमी नहीं होती नेताजी।”

“कैसी सच्चाई ?”

शेरवानी ने एक अखबार का मुड़ा हुआ कागज निकालकर खोला और उसे सीधा करके चौहान की तरफ रुख करके बोला‒“इसे पढ़िये…क्या लिखा है ?”

चौहान ने बुदबुदाने के अन्दाज में पढ़ा‒“मुझे नासिर के गुण्डों ने नेता चौहान के कहने पर मारा है।”

चौहान ने चौंककर कहा‒“इसका क्या मतलब हुआ ?”

“यह तहरीर मेरे भानजे और मुंहबोले बेटे ने मरते समय अपने खून से लिखी है।”

“क्या कह रहे हैं आप ?”

“नेताजी ! यह कागज मेरे बेटे की लाश की छाती पर रखा हुआ था। मेरी छाती में ज्वालामुखी खौल रहा था।

“मैंने नासिर को तो ठिकाने लगा दिया था। बस, आपसे बदला लेने की सोच रहा था, जो आप आपने खुद ही जुटा दिया।”

अचानक उसने रिवाल्वर निकाला और चौहान की तरफ तानकर गुर्राते हुए बोला‒“आपको ऊपर वाले ने इस वक्त एक तोहफा बनाकर भेजा है। आपके घर किसी को नहीं मालूम कि आप कहां गए हैं और आप ऐसी गाड़ी में आए हैं, जिसे कोई नहीं पहचानता। मेरा चौकीदार वफादार है और मेरा वफादार नौकर आपके लिए एक क्यारी में गड्ढा खोद रहा है।”

“शेरवानी…!”

“नेताजी ! आपकी लाश यहां इस तरह दफन कर दी जाएगी, जैसे नासिर की लाश। आज तक लोग नासिर को लापता समझते हैं। अब आपकी पार्टी, आपके रिश्तेदार और कानून के रक्षक सभी आपको फरार समझेंगे, क्योंकि आपके वारंट निकलने वाले हैं।”

चौहान ने खुद को शांत रखते हुए कहा‒“शेरवानी साहब ! आप जरूर किसी बड़ी गलतफहमी का शिकार हैं।”

“खूब ! क्या यह कागज और मेरे बेटे के खून से लिखी वह तहरीर भी गलत है।”

“जरा ठंडे दिमाग से विचार कीजिए। आपका भानजा कितने दिन लापता रहा ?”

“पूरे पांच दिन !”

“और उसके बाद उसकी कफन में लिपटी हुई लाश कोई आपके दरवाजे पर छोड़ गया ?”

“हां…!”

“और उस लाश की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि वह पांच दिन पहले मार दिया गया था। क्यों, ठीक है न ?”

“हां…!”

“आखिरी पांच दिन वह लाश कहां रही ? और पांच दिन बाद वह लाश किस उद्देश्य से आपके पास पहुंचाई गई ?”

शेरवानी कुछ न बोला।

नेता ने फिर से कहा‒“दूसरी बात, पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार शौकत कैसे मरा था ?”

“गला घोंटने से !”

“उसके शरीर पर कोई जख्म था ?”

“नहीं, लेकिन अन्दरूनी मार लगी हुई थी।”

चौहान मुस्कराया और बोला‒“और यह कागज जिस पर लाल तहरीर है। आपके कहने के अनुसार आपके भानजे ने खून से लिखी थी, जबकि खून निकला ही नहीं होगा।”

शेरवानी कुछ न बोला।

चौहान ने फिर से कहा‒“क्या आपने नासिर को मारकर उसका कफन सिलवाकर उसे गड्ढे में दबाया था ?”

“नहीं…!”

“आप इतने समझदार, बुद्धिमान आदमी, इतना बड़ा धोखा कैसे खा गए ? जिस किसी ने भी वह लाश आप तक पहुंचाई थी। उसी ने आखिर पुलिस को क्यों खबर नहीं कर दी ? लाश पुलिस तक क्यों नहीं पहुंची ? और फिर पांच दिन तक कहां रही ?”

“ओह…!”

“शेरवानी साहब ! यह जरूर किसी ऐसे आदमी की चाल है, जिसने एक अनजान आदमी ब्लैक टाइगर के नाम से खड़ा किया है, जो आपके और मेरे गुन्डों की मरम्मत कर रहा है।”

“जिसने आपके बेटे को भी खून किया और हम दोनों के बीच गलतफहमी की दीवार खड़ी करने के लिए लाश और कागज आप तक पहुंचानेे का नाटक रचा था।”

शेरवानी ने भर्राई हुई आवाज में कहा‒“शायद आप ठीक कह रहे हैं।”

चौहान ने कहा‒“अब जरा इस कागज को ध्यान से देखिए। इस पर क्या शौकत की ही तहरीर है ? आप तो उसकी तहरीर पहचानते होंगे।”

शेरवानी ने ध्यान से कागज देखा और बोला‒“ओहो ! यह लिखाई तो शौकत की नहीं है।”

“आपने पहले जुनून में विचार ही नहीं किया होगा।”

“यही हुआ है।”

अब यह भी विचार कीजिए कि खून का रंग सूखकर थोड़ा काला पड़ जाता है। लेकिन यह रंग लाल ही है। इसका मतलब है यह खून नहीं है।”

शेरवानी ने चौंककर कहा‒“ओहो…!”

चौहान ने ठंडी सांस ली और मुस्कराकर बोला‒“शेरवानी साहब ! मैं तो अपनी छाती पर इतना बड़ा दाग लिए बैठा हूं। फिर भी मैंने आपसे या सेठ साहब से कोई बदले की कार्रवाई नहीं की।”

“क्या मतलब ?”

“आपने और जगताप ने मिलकर प्रेमप्रताप को दीपा के सम्बन्ध में बहकाया। मेरे बेटे चेतन को नहर के किनारे ले जाकर गोली मारी। इन्स्पेक्टर दीक्षित आप लोगों के हुक्म पर वहां पहले पहुंच गया था जो प्रेमप्रताप हरिजन लड़की से होने बच जाती।”

शेरवानी का चेहरा सफेद पड़ गया।

चौहान ने कहा‒“लेकिन इन्स्पेक्टर दीक्षित को बेहोश करके किसी ने प्रेमप्रताप को बचाया। मैंने प्रेमप्रताप को मारने के लिए नासिर का गिरोह भेजा, उससे भी प्रेमप्रताप को बचा लिया गया। क्या इससे यह साबित नहीं होता कि सेठ जगताप ने लाला सुखीराम वाले केस के बाद अपने बेटे को आवागर्दी ने निकाल लिया। उसके दो एय्याश दोस्त चेतन और शौकत का खात्मा करा दिया।

“उन्होंने ही किसी को ब्लैक टाइगर बनाकर अपके गुन्डों का और मेरे गुन्डों का सफाया शुरू करा दिया है, ताकि आपके वोट बैंक का महत्त्व भी समाप्त हो जाए। और मैं भी सीट खो बैठूं।”

“उसके बाद जगताप साहब का अपना कोई आदमी सीट पर बैठे और वह आदमी शायद लखनलाल हो, हरिजन लखनलाल, जो उनका समधी भी हो जाएगा।”

शेरवानी की आंखें फैली हुई थीं।

उसने कहा‒“ये बातें तो मैंने सपने में भी नहीं सोची थीं।”

शेरवानी साहब ! अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है। हम दोनों का सामान्य शत्रु एक ही है। सेठ जगताप से अगर हम दोनों हाथ मिला लें तो उसे मैं रास्ते से हटा दूंगा।”

शेरवानी ने रिवाल्वर जेब में रखा। फिर चौहान की तरफ हाथ बढ़ा दिया। दोनों ने हाथ मिला लिया और चौहान ने मुस्कराकर कहा‒“अब हम एक और एक ग्यारह हैं। हमारी शक्ति का कमाल देखिए।”

उसने रिसीवर उठाया और डायल घुमाकर जगताप का फोन नम्बर मिलाने लगा।

अमर चुपचाप पिछले बरामदे से निकलकर कम्पाउंड में आया और कम्पाउंड की दीवार फलांगकर वह एक गली में एक जगह रखी हुई मोटरसाइकिल पर सवार होकर चल पड़ा। मोटरसाइकिल की गति काफी तेज थी और उसका रुख जगताप के बंगलेे की तरफ था।

जगताप के बंगले के फाटक पर मोटरसाइकिल रुकी तो चौकीदार ने उससे पूछा‒“क्या काम है ?”

अमर ने उसे करीब बुलाया और बोला‒“छोटे मालिक को बोलो, अमर बाबू मिलना चाहते हैं।”

“कौन अमर बाबू ?”

“तुम सिर्फ नाम लोगे तो वह समझ जाएंगे।”

“मैं यहीं से खबर करता हूं।”

चौकीदार ने एक्सटेंशन के फोन पर अन्दर से संपर्क बनाकर जब अमर के बारे में बताया तो दूसरी तरफ से जो भी जवाब मिला हो। बहरहाल, फाटक तुरन्त खुल गया।

अमर की मोटरसाइकिल बरामदे में रुकी ही थी कि प्रेमप्रताप निकल आया। उसने आगेे बढ़कर बेचैनी से उससे पूछा‒“क्या बात है अमर, इतनी रात में !”

“तुम्हारे डैडी क्या कर रहे हैं ?”

“किसी का इन्तजार कर रहे हैं। अभी फोन पर किसी ने जाने को कहा था। मैं अपने कमरे में था।”

“आने वाले कोई और नहीं, शेरवानी और चौहान हैं।

“ओहो…!”

“दीपा तो यहीं होगी ?”

“हां, मेरे बराबर का ही कमरा है।”

“और उसके सशस्त्र गार्ड ?”

“वे टैरेस पर रहते हैं। जरा से संदेह पर वह फायरिंग शुरू कर सकते हैं।”

“उन लोगों को दीपा के द्वारा खबर करा दो। इस समय तुम्हारी और सेठ साहब की जिन्दगी खतरे में है। वे लोग शेरवानी और चौहान के आते ही उन्हें निहत्था करके मेरे फोन या पुलिस का इन्तजार करें।”

“तुम कहीं बाहर जा रहे हो ?”

“हां, मेरे पास समय कम है।”

“ठीक है, अमर तुम्हारा शुक्रिया।”

अमर ने उसका हाथ थपथपाया और मोटरसाइकिल स्टार्ट करके वापस आया। फाटक से मोटरसाइकिल निकली तो वह काली कार भीतर प्रवेश कर रही थी, जिसमें शेरवानी और चौहान थे।

अमर मोटरसाइकिल निकालता ले गया। प्रेमप्रताप बड़ी तेजी से वापस मुड़ा और सीधा अपने कमरे की तरफ आया। दीपा उसे बाहर ही मिल गई। प्रेम ने उसे बताया कि अमर क्या कहकर गया है और दीपा बड़ी तेजी से टैरेस पर चली गई।

प्रेम नीचे आया तो चौहान और शेरवानी ड्राइंग रूम में पहुंच चुके थे। वे लोग जगताप से हाथ मिला रहे थे। प्रेम वहीं झाड़ में रुक गया।

अचानक चौहान ने रिवाल्वर निकालकर जगताप की तरफ तान लिया और मुस्कराकर बोला‒“सेठ साहब ! हमारी भेंट का उद्देश्य यह था।”

जगताप ने हैरत से कहा‒“इसका क्या मतलब हुआ ?”

“इसका मतलब हुआ, हमारी आपकी आखिरी मुलाकात। अच्छा होगा कि आप अपने बेटे प्रेमप्रताप को भी यहीं बुला लें, ताकि मैं उससे भी अपने बेटे चेतन का हिसाब बराबर कर लूं।”

“देखो, चौहान। बच्चों का हिसाब उन्हीं के साथ रहने दो। अपने बच्चों को हमने खुद बिगाड़ा था अपने स्वार्थ के लिए और हमें उसका बदला भी मिल गया।”

“बदला तुम्हें कहाँ मिला ? मुझे और शेरवानी साहब को मिला। हम दोनों के बेटे मारे गये। तुम्हारा बेटा तो फिर भी जिन्दा है।”

“और मैं उसे खोना नहीं चाहता। तुम्हें मारना हो तो मुझे ही मार दो। मैं अब इस गन्दे राजनीति के खेल से बहुत तंग आ चुका हूं। जिसमें दिन-रात की शांति बरबाद हो गई है। तुम जैसे दोस्त, दुश्मन बन गए हैं। तुम्हारी मिसालें भी मेरे सामने हैं कि तुम दोनों अपने-अपने बेटे खो चुके हो। अब मेरे लिए तो मेरा बेटा ही मेरी दौलत है। उसे मारने से तुम्हारे बेटे जिन्दा नहीं हो सकते। अब भी समय है कि संभल जाओ। अपने बेटे की मौत से शिक्षा लो।”

“खूब ! यह उपदेश तुम हमें इसलिए दे रहे हो कि तुम्हारा बेटा जिन्दा है। लेकिन हम उसे तुम्हारी आंखों के सामने मारेंगे।”

अचानक पीछे से उन दोनों की गर्दनों पर बन्दूकों की नालें आकर रख गईं। फिर लखनलाल की आवाज कानों में आई‒“मूर्खों ! सेठ साहब ने तुम्हें इतनी अच्छी सलाह दी है, तब भी तुम्हारी आंखें नहीं खुलीं। क्या तुम भूल गए थे कि अब प्रेम हमारा होने वाला जवांई है और सेठ साहब हमारे होने वाले सम्बन्धी ?”

उसने चौहान के हाथ से रिवाल्वर लिया और शेरवानी की जेब खाली कर ली।

“फिर वह शेरवानी से बोला‒“जाओ, शेरवानी साहब ! अगर इस बंगले में तुम्हारा खून हो गया तो बात दो सम्प्रदायों की बन जाएगी ! बेहतर हो कि तुम यहां से निकल जाओ।”

शेरवानी दांव-पेंच वाला आदमी था। मगर बहादुर नहीं था। उसने चुपचाप खिसक लेना ही उचित समझा। उसे दो बन्दूकधारी उसकी गाड़ी तक छोड़ आए। जैसे ही उसकी गाड़ी बाहर निकली, चन्द सेकेंड बाद ही पुलिस की गाड़ियां अन्दर आईं। दर्जनों अफसर और लगभग पचास पुलिस वाले थे।

एस॰ एस॰ पी॰ ने बन्दूकधारी से पूछा‒“यहां चौहान और शेरवानी साहब आए हैं ?”

“चौहान अन्दर हैं। शेरवानी साहब अभी वापस गए हैं।”

एस॰ एस॰ पी॰ ने एस॰ पी॰ सिटी ने कहा‒“आप शेरवानी साहब को देखिए।

एस॰ पी॰ सिटी कुछ गाड़ियां लेकर फौरन लौट पड़ा। बाकी अफसर अंदर आए और जब उन्होंने चौहान के हाथों में हथकड़ियाँ डलवाईं तो चौहान का चेहरा सफेद हो गया।

उसने कहा‒“यह सेठ जगताप भी तो हमारे अपराधों में बराबर के भागीदार हैं। इन्हें क्यों छोड़ा जा रहा है। उनका बेटा मेरे चेतन का खूनी भी है।”

एस॰ एस॰ पी॰ ने कहा‒“चौहान साहब ! अपने बेटे के बारे में आप खुद घोषणा कर चुके हैं कि उसने आत्महत्या की थी और आपका बयान टी॰ वी॰ पर भी आ चुका है। न ही उसका खून होने के नाते प्रेमप्रताप के विरुद्ध कोई सबूत है।”

“जहां तक जगताप की गिरफ्तारी का सवाल है। हमारे पास जब भी उनके खिलाफ गवाह या सुबूत मिल गए तो हम उन्हें नहीं छोड़ेंगे। अभी तो आप खुद गिरफ्तार हो जाइए।”

कुछ देर बाद जैसे ही एक खुली जीप में चौहान को बाहर लाया गया। अचानक सैकड़ों जन सामान्य की भीड़ ने जीप को घेरे में लेकर चौहान को बाहर खींच लिया।

जब तक पुलिस वाले उसे बचाने की कोशिश करते वह भीड़ के बिल्कुल बीच में पहुंच चुका था और पुलिस की हवाई फायरिंग और लाठीचार्ज से जब भीड़ छंटी तो चौहान की जगह हाड़-मांस का ढेर था। उसे इतनी बुरी तरह से मारा गया था कि सिर्फ हथकड़ियों से पहचाना जा सका, वरना कपड़ों के चीथड़ेे भी उसके बदन पर बाकी नहीं रहे थे।

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