दूसरी तरफ जब मैदान साफ हो चुका था, तब लाला सुखीराम की दुकान के बिल्कुल सामने गर्ल्स कॉलेज के एक क्वार्टर में से एक अधेड़-उम्र नौकर ने झांककर पूछा‒“क्या हुआ, लाला ?”
ऊपर से औरतें भी चिल्लाने, रोने लगीं‒“कोई किसी के बुरे समय का साथी नहीं है।”
गुनाहों का सौदागर नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1
“सब यह समझते हैं, जैसे और किसी पर कभी कोई बुरा समय आयेगा ही नहीं।
“इतना हंगामा हुआ, इतनी चीख-पुकार मची ओर कोई बाहर निकलकर नहीं आया।”
इतने में बराबर के कम्पाउंड का फाटक खुला और प्रोफेसर और उसके दोनों लड़कों ने बाहर आकर इधर-उधर देखा। दूसरे कम्पाउंड और फाटकों से भी लोग निकल-निकलकर आ रहे थे।
प्रोफेसर लाला की दुकान पर पहुंच गए‒“अरे भई, यह क्या हुआ लाला ?”
“अरे, बाबूजी ! लुटेरे लूटकर भी ले गए और मारा-पीटा भी।”
ऊपर से रीता ने रोते हुये कहा‒“मैंने इतनी जोर-जोर से पुकारा, लेकिन आपने सुना ही नहीं।”
प्रोफेसर के लड़के ने कहा‒‘बहन ! हम लोग तो ड्राइंगरूम में बैठे टी॰ वी॰ देख रहे थे।”
दूसरा बोला‒“हम लोग खुद टी॰ वी॰ देख रहे थे।”
तीसरा बोला‒“हम लोगों के यहां तो नौ बजे से ही किवाड़ बन्द कर लेते हैं।”
लाला ने हांफते हुए कहा‒“ऐसा ही होगा। हर दिन किसी एक के यहां लुटेरे लूट मचाएंगे, बाकी सब टी॰ वी॰ देखते रहेंगे दरवाजे बन्द कर-करके।”
ऊपर से लालाइन ने कहा‒“अरे, पड़ोसी-पड़ोसी के काम नहीं आएंगे तो फिर कौन किसी के काम आएगा ?”
इतने में गर्ल्स कॉलेज का चौकीदार लाठी फटकारता हुआ आया‒“क्या हुआ, लाला ? यह कैसा धमाल है ?”
लाला ने कहा‒“अरे, भाई। दिनभर की आमदनी लूटकर ले गए और ऊपर से मारा-पीटा अलग।”
चौकीदार लाठी पटककर बोला‒“अरे, तुमने काहे को हमें नहीं बुलाया ?”
अमृत ने जलकर कहा‒“टेलीग्राम तो दिया था तुम्हें मिला नहीं होगा।”
इतने में मौरिस रोड के चौराहे की तरफ से चीखने-चिल्लाने की आवाजें सुनकर वे लोग फिर से चौंक पड़े और कुछ तो लपक-लपककर फाटक में घुस गये।
इतने में किसी ने जोर से कहा‒“अरे, यह तो पुलिस वाले हैं।”
दूसरा बोला‒“किसी को पकड़कर ला रहे हैं।”
अमृत कूदकर दुकान से उतर आया और चिल्लाकर बोला‒“यही है, हरामी‒इसी ने मुझे रिवाल्वर से मारा था।” फिर वह चिल्लाता हुआ झपटा और ऊपर से रीता चिल्लाई‒“अमृत…भैया…ठहर जाओ…।”
लालाइन चिल्लाई‒“अमृत…ठहर जा !”
लेकिन अमृत ने उन लोगों के करीब पहुंचते ही पप्पी का गिरेबान पकड़कर घूंसे मारने शुरू कर दिये। साथ ही चिल्लाता भी गया‒“हरामी…कुत्ते…कहां गये तेरे बाप…बुला उन दोनों को भी।”
फिर चारों तरफ से भीड़ ने पप्पी को घेर लिया‒“यह देखो साले को…चोर मालूम होता है…?”
“लगता है, किसी सेठ-साहूकार या ऑफिसर का बेटा है।”
“अरे, इन्हीं लोगों ने तो सारा वातावरण खराब कर रखा है।”
“मारो…साले को…।”
“मारो…हरामी को…।”
“यह समझता है कि हम लोग सोते रहते हैं।”
“अबे हम पूरे इलाके वाले एक हैं।”
“हरामियों ! तुम लोग फौज लेकर भी आओगे तो हम मिलकर मुकाबला करेंगे।”
फिर जिसका भी वश चल जाता, वही भीड़ में घुसकर दो-तीन घूंसे, लातें, ठोकरें मार लेता और पीछे हटकर इस प्रकार हाथ झाड़ने लगता, जैसे बहुत जरूरी फर्ज निभा दिया हो।
साथ ही कहता भी जाता था‒“नींदें हराम कर दी हैं, इन सफेदपोश लुटेरों ने !”
“अरे, शाम होते ही किसी राह चलते को रिवाल्वर दिखाया और लूट लिया।”
“इन लोगों के तो हाथ-पांव तोड़कर डाल देना चाहिए खड्डे में।”
“पता नहीं, कैसा एडमिनिस्ट्रेशन है ?”
“अन्धेरगर्दी है…अन्धेरगर्दी…।”
“ऐसा लगता है कि लॉ एंड ऑर्डर तो रहा ही नहीं।”
“जब वारदात हो जाती है, तब एक डेढ़ घण्टे बाद पुलिस आती है।”
“लेकिन आज तो कमाल ही हो गया, पुलिस वक्त पर पहुंच गई।”
“पन्द्रह दिन पहले राह चलते एक दूधिए को गोली मारकर लुटेरे आराम से उसका माल लेकर मोटरसाइकिल पर फरार हो गए।”
“सुना है, सुबह पांच बजे वारदात हुई और दोपहर को बारह बजे पुलिस पहुंची।”
दूसरी तरफ मार खाने वाला पप्पी हाथ जोड़कर चिल्ला रहा था‒“अरे, अंकल ! मुझे मत मारिए, मैं लुटेरा नहीं हूं। अरे, मुझे तो वे दोनों जबर्दस्ती पकड़कर साथ ले आए थे।”
प्रोफेसर ने उसके जबड़े पर घूंसा मारकर कहा‒“कौन थे वे दोनों तेरे…बाप ?”
अंकल, मेरे ही कॉलेज में पढ़ते हैं।”
“अच्छा, तू स्टूडेंड भी है ?”
“मैं तो गरीब आदमी हूं, अंकल ! उनकी बात न मानूं तो मारते हैं।”
इतने में पुलिस की वही जीप (जो लूटमार के समय शरदपुर की गली में से निकल गई थी) आकर रुकी और दरोगा ने ऊंची आवाज में पूछा‒“क्या हो रहा है ? कैसा मजमा है ?”
लाला, तुरन्त भीड़ से निकलकर बोला‒“अरे, मैं लुट गया, दरोगाजी !”
“क्या हो गया ?”
“अरे, यह हरामी ! दो और साथियों के साथ मोटरसाइकिल के साथ आया था। एक बाहर खड़ा रहा, दो अन्दर घुस गए।”
“ओहो…!”
“पांच हजार रुपए नकद लूटकर ले गए। मुझे और लड़के को मारा सो अलग।”
दरोगा नीचे उतरता हुआ बोला‒“बाकी दो कहां गए ?”
अमरसिंह के तीन साथियों में से एक जल्दी से बढ़कर बोला‒“साहब ! वे तो भाग खड़े हुए थे। उधर चौराहे से संयोगवश हमारा गश्त गुजर रहा था‒हम लोगों ने जान पर खेलकर उनका मुकाबला किया। दो भागने में सफल हो गए और एक यह बदमाश हमारे हाथ लग गया।”
ऊपर से रीता ने जोर से कहा‒“मैंने थाने फोन कर दिया था। वहां कोई कह रहा था कि हम कंट्रोल-रूम को खबर कर रहे हैं, कुछ देर में पहुंचेंगे।”
इतने में एक गाड़ी का सायरन गूंजा। साथ ही नीली लाइट भी स्पार्क करती हुई उसी तरफ आती नजर आई।
किसी ने कहा‒“वह आ गए।”
पुलिस की गाड़ी पहुंचते-पहुंचते लोग धीरे-धीरे इधर-उधर खिसकने लगे, विशेष रूप से जवान लड़के। प्रोफेसर के दोनों लड़के खड़े थे। उसने दोनों से कानाफूसी में कहा‒“अब जाओ, क्या तमाशा देख रहे हो ?”
सामने के क्वार्टर वाला अपने क्वार्टर में घुस गया। कम्पाउंड के कम्पाउंड में घुस गए। कुछ ही पल में वहां चंद आदमी रह गए। लाला, अमृत और बड़ा लड़का अलग था। गाड़ी में डी॰ एस॰ पी॰ आया था।
लाला उसे विस्तार से बताने लगा।
डी॰ एस॰ पी॰ उतरकर दुकान में आ गया। लाला और अमृत ने उसे पूरी घटना बयान की और टूटी-फूटी चीजें दिखाईं।

डी॰ एस॰ पी॰ ने पूछा‒“कितनी रकम गई है ?”
“पांच हजार रुपए।”
“और कुछ तो नहीं ?”
“जी नहीं, साहब !”
“वारदात की गवाहियां कौन-कौन सी हैं ?”
“साहब ! मैं और मेरा बेटा अमृत और मेरे परिवार वाले भी ऊपर ही थे।”
प्रोफेसर ने आगे आकर कहा‒“मैं सी॰ एस॰ कॉलेज का प्रोफेसर हूं।”
डी॰ एस॰ पी॰ ने उससे हाथ मिलाया।
प्रोफेसर ने कहा‒“हम लोगों की कोठी लाला के बिल्कुल पीछे है।”
“ओहो…!”
“लेकिन हम लोग ड्राइंग-रूम में टी॰ वी॰ देख रहे थे। आजकल सड़कों पर सन्नाटा शुरू रात से ही छा जाता है‒इसलिए दरवाजे बन्द कर लेते हैं। हमारे कानों में शोर की आवाज आई तो हम लोग समझे कि बराबर के कम्पाउंड में वी॰ सी॰ आर॰ चल रहा है।”
कम्पाउंड के बड़े-बूढ़े ने कहा‒“क्या बताऊं, डी॰ एस॰ पी॰ साहब ! अब बच्चों को कौन मना करे ? इतना तेज वाल्यूम खोल देते हैं कि आपस की आवाजें भी मुश्किल से सुनाई देती हैं।”
कम्पाउंड की एक महिला ने कहा‒“हम लोग इसलिए मनाही नहीं करते कि इस बहाने कम से कम जवान बच्चों को उलटी-सीधी बातें करना, अच्छी-बुरी जगह घूमना-फिरना तो बन्द हो गया है। डिनर लेते हैं और टी॰ वी॰ से चिपक जाते हैं।”
“हम लोगों ने भी बड़ी देर बाद शोर सुन, जब रीता की आवाज आई तो समझे कि कुछ हुआ है, वरना मैं तो यही समझी थी कि कोई वी॰ सी॰ आर॰ पर मार-धाड़ की फिल्म चला रहा है।”
डी॰ एस॰ पी॰ ने कहा‒“आप लोगों में से किसी ने इन लुटेरों को लूटमार करते देखा था ?”
“वह…तो…हम लोग तो जब आए है तो मौरिस रोड के चौराहे से ये सिपाही इस लड़के को मारते हुए ला रहे थे।”
डी॰ एस॰ पी॰ ने लाला से कहा‒“मौके का और कोई गवाह है ?”
लाला ने कहा‒“अब क्या बताऊं, साहब ! इतनी रात में कौन अपने घरों से निकलता है ? मैं तो इसलिए साढ़े नौ बजे तक दुकान खोले रहता हूं कि नाश्ते का सामान ले जाने वाले न लौट जाएं।”
ऊपर से लालाइन ने चिल्लाकर कहा‒“मैं गवाह हूं, मेरी बेटी गवाह है। मेरा बड़ा बेटा और बहू गवाह हैं। इस राक्षस को पकड़कर ले जाइए, वरना मैं अपने बच्चों के साथ डी॰ एस॰ की कोठी पर धरना दे दूंगी।”
लाला ने ऊपर देखते हुए चिल्लाकर कहा‒“तुम चुप रहो जी। तुमसे किसने कहा है मर्दों में बोलने को।”
“मैं मां हूं अमृत की, तुम्हारी पत्नी हूं। मुझसे पूछो मेरे मन पर क्या बीत रही थी, जब ये तीनों राक्षस तुम दोनों को मार-पीट रहे थे‒अरे, तुम में से किसी को कुछ हो जाता तो मैं किसे रोने जाती‒यहां कौन पराई आग में कूदता है‒जब खुद पर पड़ती है, तभी ऊपर वाला भी याद आता है और पड़ोसी भी याद आते हैं।”

ऊपर से रीता ने जोर से कहा‒“हमारी दुकान इन सबकी दुविधा के लिए इतनी रात तक खुली रहती है‒एक-एक के खाते में हजारों रुपयों का हिसाब है हमारा‒मगर हमने कभी किसी को दुखी नहीं किया।”
लाला चिल्लाकर बोला‒“अरी तू चुप रहती है या नहीं ?”
“नहीं चुप रहूंगी, बापू ! मैं ग्रेजुएशन कर रही हूं। अगर इस राक्षस को छोड़ दिया गया तो मैं अपने कॉलेज की यूनियन की अध्यक्ष से मिलकर थाने का घेराव कराऊंगी, डी॰ एम॰ की कोठी का घेराव कराऊंगी। जरूरत पड़ी तो सड़कों पर जुलूस निकालूंगी।”
प्रोफेसर ने हाथ उठाकर कहा‒“बेटी ! तुमने यह कैसे समझ लिया कि पड़ोसी तुम्हारे दुःख-दर्द के साथी नहीं ? हम सब एक-दूसरे के सुख के साथी हैं, दुःख के भी साथी हैं।”
फिर वह डी॰ एस॰ पी॰ से बोला‒“आप सबसे पहला गवाह मुझे बनाइए।”
डी॰ एस॰ पी॰ ने पूछा‒“और दूसरा गवाह ?”
प्रोफेसर ने कम्पाउंड के बड़े-बूढ़े की तरफ इशारा करके कहा‒“दूसरी गवाही हशमत देंगे। यह रिटायर्ड मेडिकल सुपरिन्टेन्डेंट हैं और हमारे इलाके के सबसे ज्यादा प्रतिष्ठित और आदरणीय व्यक्ति हैं।”
हशमत ने आगे आकर कहा‒“प्रोफेसर साहब ठीक कहते हैं। अगर पुलिस गवाह के बिना किसी मुजरिम को पकड़ भी नहीं सकती तो दूसरा गवाह मैं हूं।”
डी॰ एस॰ पी॰ ने लाला सुखीराम से कहा‒“ठीक है, आप एक एफ॰ आई॰ आर॰ लिखवाइए।”
