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gunahon ka Saudagar by rahul | Hindi Novel | Grehlakshmi
gunahon ka Saudagar by rahul

अमरसिंह धनीराम की चिता जलाकर श्मशान से लौटा तो कमरे में उसकी बन रेवती सिसकियां भर-भरकर रो रही थी और लक्ष्मी मुर्दों सरीखा पीला चेहरा लिए हुए बैठी थी।

हाथ-मुंह धोकर अमरसिंह चुपचाप चारपाई के पायंती आकर बैठ गया तो लक्ष्मी ने कुछ देर चुप रहकर धीरे से पूछा‒“सुदर्शन को खबर कर दी थी ?”

अमरसिंह ने लम्बी सांस ली और धीरे से बोला‒“यह बात कोई छिपाने की थी ?”

“क्या कह रहा था…वह ?”

“रोने के सिवा और क्या कहता ? बाप की सेवा का सपना लेकर जवान हुआ था‒जब सेवा का समय आया तो बाप की अर्थी को कंधा और चिता को अग्नि दिखाने को भी मौका नहीं मिला।”

लक्ष्मी कुछ देर खामोश रही। फिर जैसे बहुत डरते-डरते बोली‒“रिश्ता तो…नहीं तोड़ने को कहा ?”

“मां ? क्या यह समय उससे ऐसी बात पूछने का था ?”

“मुझे तो लगता नहीं कि अब वह शादी करेगा।”

अमरसिंह कुछ न बोला।

उसका दिमाग दूसरी तरफ काम कर रहा था। फिर उसने धीरे से लक्ष्मी से कहा‒“मां ! अपना और रेवती का सामान बांध लो।”

लक्ष्मी ने चौंककर पूछा‒“क्यों ?”

“मैं तुम दोनों को आज ही रात में गाड़ी में सवार करा दूंगा।”

“कहां के लिए ?”

“तुम दोनों गांव चली जाओ मौसी के पास।”

“क्यों ?”

“इसलिए कि अब यहां तुम लोगों के लिए खतरा है।”

“लेकिन तू…?”

“मैं ? मुझे तो अभी यहीं रहना है। मैं यहां से चला गया तो मेरे वारंट निकल जाएंगे, क्योंकि मेरे खिलाफ इंक्वायरी चल रही है।”

“नहीं…नहीं…मैं तुझे छोड़कर नहीं जाऊंगी।”

“मां ! अक्ल से काम लो। मैं यहां अपना बचाव करूंगा या तुम दोनों को सम्भालूंगा ? जवान बहन का साथ है। कोई ऊंच-नीच हो गई तो हम सबको मर जाना पड़ेगा।”

“बेटी…!”

“दुश्मन जब दुश्मनी पर उतर आता है तो फिर कोई खाना नहीं छोड़ता। इसका सबूत तुम उस दिन देख चुकी हो, जब उन लोगों ने धोखे से दरवाजा खुलवाकर रेवती के साथ बदतमीजी की थी। बात सिर्फ बदतमीजी तक ही रहीं अगर भगवान न करे…”

लक्ष्मी ने दहलकर कहा‒“नहीं…नहीं…भगवान के लिए आगे कुछ मत कहो !”

“तो फिर एक ही रास्ता है। तुम और रेवती आज ही रात की गाड़ी से निकल जाओ।”

“जैसा तू कहेगा, मैं वैसा ही करूंगी।”

“बस, तो सामान बांधो।”

लक्ष्मी तुरन्त उठ गई।

अमर भी उठता हुआ बोला‒“मैं अभी आता हूं।”

फिर वह बाहर निकल आया।

गली के दूसरे किनारे के एक दरवाजे पर उसने धीरे-धीरे दस्तक दी तो अन्दर से आवाज आई‒“कौन है…?”

अमर से धीरे से कहा‒“शरीफ चाचा ! मैं हूं…और…”

कुछ ही पल बाद दरवाजा खुल गया। वह एक बूढ़ा सफेद दाढ़ी-मूंछों और लम्बे बालों वाला आदमी था, जिसने सलवार-कुर्ता पहन रखे थे‒आंखों पर ऐनक, सिर पर टोपी और चेहरे पर वात्सल्य व विनम्रता।

उसने पूछा‒“क्या बात है अमर बेटे ?”

“शरीफ चाचा ! इस गली में एक आप ऐसे हैं, जो खुदा के सिवा और किसी से नहीं डरते। यह मैंने अन्दाजा लगाया है।”

“बेटे ! तुम्हारा ख्याल ठीक है। जो खुदा से डरता है, फिर वह किसी से नहीं डरता और न ही उसका कोई भी कुछ बिगाड़ सकता है।”

“अगर आप मेरा एक काम और कर देंगे तो आपका उपकार कभी नहीं भूलूंगा।”

“बेटे ! तुम मेरे मरहूम बेटे की तरह हो। बाप कभी बेटे पर उपकार नहीं करता। बोलो, क्या करना है ? मैं आधी रात को भी तैयार हूं।”

“काम भी रात का ही है।”

“बेझिझक बोलो।”

“आपके घर में कपड़े सिलने आते हैं। उनमें बुर्के भी तो होते हैं।”

“बेश्क होते हैं‒“क्यों ?”

“इस वक्त दो बुर्के होंगे आपके घर में ?”

“कई हैं। किसके लिए चाहिए ?”

“चाचा ! आपको तो मेरे बारे में सबकुछ मालूम है।”

“मालूम है बेटे। खुदा अपने नेक बन्दों का ही इम्तिहान लेता है।”

“आपको यह भी मालूम है कि बदमाशों ने मेरी बहन के साथ बदतमीजी की थी।”

“मालूम हो गया है। उस रात मैं घर पर होता तो जरूर निकलता। इन सबने तो गैरत बेच खाई है। उस रात तुम्हारी बहन के साथ गुण्डों ने बदतमीजी की, कोई नहीं निकला। किसी दिन किसी और की बहन-बेटी के साथ भी यही हो सकता है।”

“आप सचमुच फरिश्ता हैं चाचा।”

“नहीं बेटा। आदमी, आदमी रहे तो उसका रुतबा फरिश्तों से भी ऊंचा है, खुदा ने इन्सान को ही अशरफुल मखलकात यानी सारे प्राणी वर्ग में सबसे श्रेष्ठ बनाया है। मगर आदमी खुद ही जानवर बन जाता है।”

“बहरहाल, मेरी मां और बहन की इज्जत और जिन्दगियां अब खतरे में हैं। इसलिए मैं उन्हें आज ही रात गाड़ी से बाहर भेजना चाहता हूं।”

“ओहो और तुम्हें उनके लिए दो बुर्के चाहिए।”

“हां, चाचा। खुली जाएंगी तो भी पहचान ली जाएंगी।”

“क्या अकेली जाएंगी ?”

“फिर कौन जाएगा ?”

“यह बूढ़ा किसलिए है ? बहनजी और बेटी को मैं खुद स्टेशन पहुंचा दूंगा। रेल में सवार कराके तब तक खड़ा रहूंगा, जब तक रेल चली न जाए।”

“शुक्रिया, चाचा। आप…।”

“बस…बस, आगे कुछ मत कहना। मैं अभी बुर्के लाता हूं। उन्हें तैयार कराओ।”

अमरसिंह कुछ देर बाद दो बुर्के लेकर वापस हुआ तो उसका माथा ठनका। उसने अंधेरे में एक छाया-सी देखी थी, जो शायद उन दोनों की बातें सुन रही थी और वह छाया अब खोखे के पीछे छुपी हुई थी।

अमरसिंह के होंठ सख्ती से भिंच गए। आंखों से शोले से निकलने लगे और नथुने फूल गए। लेकिन वह इत्मीनान से चलता रहा।

खोखे के पास से गुजरते हुए उसने उस छाया तो भी देख लिया। और वह आगे बढ़ता चला गया। इसका मतलब यह था कि पहले ही से उसकी निगरानी हो रही थी और अब यह बुर्केवाली खबर भी बदमाशों को मिल जानी थी।

गली के दूसरे मोड़ पर एक और लड़की को खोखा था। अमर ने वहीं रुककर आड़ में होकर दोनों बुर्के खोखेे की सलाखों पर लटका दिए।

कुछ पल बाद ही उसके कानों में दबे पैरों की पदचाप् और कपड़ों की सरसराहट सुनाई दी और वह बिल्कुल चौकन्ना हो गया।

फिर एक छाया खोखे के पास से दबेे पांवों गुजरने लगी, जिसने काली पतलून, स्पोर्ट्स शू और काली टी-शर्ट पहन रखे थे। वह नौजवान ही नजर आ रहा था।

जैसे ही वह अमर के करीब से गुजरने लगा, अचानक अमर ने अपने लोहे जैसे हाथ का घूंसा बनाकर पूरी शक्ति से उसकी कनपटी पर मारा। नौजवान आवाज निकाले बिना उसकी भुजाओं में झूल गया।

अमर ने उसे खींचकर खोखे के नीचे सरका दिया और आराम से बुर्के लेकर वह घर की तरफ चल पड़ा। जैसे कुछ हुआ ही न हो।

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