अन्दर कमरे में से रेवती की सिसकियां सुनाई दे रही थीं। दालान में अमरसिंह और सुदर्शन बैठे थे। एक चारपाई पर चिंतित लक्ष्मी बैठी थी।
सुदर्शन कह रहा था‒“मुझे तो थोड़ी देर पहले पता चला था कि रात को यहां आकर गुंडों ने बदतमीजी की थी। मैं पहले थाने गया। पंडित नामक सिपाही ने बताया कि तुम लाला सुखीराम के यहां मिलोगे। तुम चौराहे के रेस्तरां में ही नजर आ गए।”
गुनाहों का सौदागर नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1
“तुम्हें किसने खबर दी ?”
“गली में तीसरा मकान मेरे एक पहचान वाले का है, उसने रात को हंगामा सुना था। सुबह-सुबह उसने मुझे बताया था, क्योंकि वह मुझे और बाबूजी को देख चुका था।”
“और वह बदमाश भी छूट गया, जिसे मैंने पकड़ा था।”
“ओहो…!”
“उसने मुझे धमकी भी दी है।”
“यह तो अच्छा नहीं हुआ ?”
“क्या अच्छा नहीं हुआ ?”
“अमर भैया ! आजकल के गुंडे पुलिस से नहीं डरते, वरना रात को इतनी निर्भीकता से यहां हंगामा न खड़ा करते।”
“मगर मैं हथियार डालने वाला नहीं हूं।”
“तुम अकेले क्या कर लोगे ?”
“जो कुछ भी बन पड़ेगा।”
“मेरे बाबूजी भी चिंतित हैं।”
“होना चाहिए। हमारे बड़े-बूढ़े और हमदर्द हैं।”
“वह कह रहे थे‒इसी सप्ताह रेवती को डोली में बिठा दो।”
“इतनी जल्दी…यह कैसे सम्भव है।”
“देखो, अमर। न तो हमसे तुम्हारे हालात छिपे हैं और न ही तुमसे हमारे हालात। मैं नहीं चाहता कि तुम अकारण का बोझ लादो। शादी का मतलब, सिर्फ शादी है और बस !”
“फिर भी मेरी अकेली बहन है।”
“बाद में अरमान निकालते रहना। जब फालतू ही तो जो चाहे देना, जितना चाहो करना। मैं इन्कार नहीं करूंगा, लेकिन तुम अभी अपनी बहन के साथ मां को भी खतरे में डाल रहे हो।
“पुलिस ड्यूटी का समय नियत नहीं होता। तुम यूं भी रात की गश्त पर रहते हो। मांजी और रेवती रात भर अकेली रहेंगी तो क्या होगा ?”
अमरसिंह कुछ न बोला।
सुदर्शन ने पुनः कहा‒“सोच-विचार से कुछ नहीं मिलेगा। बहन के हाथ पीले हो जाएं तो तुम्हारी जिम्मेदारी भी कम होगी। मां भी बूढ़ी हो चुकी हैं। पहले तो उन्हें यहां कोई परेशान नहीं करेगा। ऐसा कुछ हुआ तो मैं उन्हें भी बात थमने तक अपने यहां ले जाऊंगा।”
“मुझे कुछ सोचने तो दो।”
“सोचोगे भी तो वही फैसला करना पड़ेगा। जवान बहन की रक्षा कितनी नाजुक होती है‒इसका अन्दाजा तो तुम्हें हो हो गया होगा।”
लक्ष्मी ने कहा‒“अमर बेटे ! सुदर्शन बेटे ! सुदर्शन ठीक कह रहा है।”
अमरसिंह ने सिर हिलाकर कहा‒“ठीक है, जैसी तुम्हारी इच्छा।”
सुदर्शन ने उठते हुए कहा‒“ठीक है। मैं बाबूजी से कहता हूं।”
“अरे, तुम बैठो। चाय तो पीओ।”
“नहीं। औपचारिकता की जरूरत नहीं। अब मेरा घर है यह।”
सुदर्शन को अमरसिंह बाहर तक छोड़ने आया। उसने हाथ मिलाया और मोटरसाइकिल पर सवार होकर चला गया।
अमरसिंह कुछ देर वहीं खड़ा रहा। फिर ठंडी सांस लेकर मुड़ा और वापस घर में आकर लक्ष्मी से बोला‒“मां ! क्या यह ठीक रहेगा ?”
लक्ष्मी ने कहा‒“बेटे ! रेवती विदा हो जाएगी तो मैं चैन की नींद सोऊंगी और तू भी निश्चिंत होकर अपनी ड्यूटी दिया करेगा।”
“ठीक है, मां।”
अमरसिंह वापस जाने के लिए निकल पड़ा।
सुदर्शन के बाद अमरसिंह भी चला गया। तब गली के मोड़ से एक नौजवान लड़का अन्दर की तरफ आया और एक छोटी-सी चाय की दुकान पर रुककर दुकानदार से बोला‒“यह मोटरसाइकिल वाला अमरसिंह के यहां आया था ?”
“जी, हां।”
“क्या रिश्ता है उसका ?”
“रिश्ता होने वाला है।”
“क्या मतलब ?”
“अमरसिंह की बहन से ब्याह होने वाला है।”
“तुम कैसे जानते हो ?”
“मैं सुदर्शन बाबू की पहचान वाला हूं।”
“कौन सुदर्शन ?”
“वह जो मोटरसाइकिल पर गए हैं।”
“क्या करता है ?”
“नए-नए नौकर हुए हैं।”
“कहां पर ?”
“होशियारपुर पावर हाउस में।”
“कौन-सी पोस्ट पर ?”
“शायद जूनियर इंजीनियर हैं।”
“हूं ! बाप का नाम क्या है ?”
“धनीराम…!”
“उनका कारोबार ?”
“पहले आढ़तिये थे फल-सब्जी के। अब कुछ संपत्ति बना ली है। आढ़त का काम छोड़ दिया है, क्योंकि इसमें भाग-दौड़ और मेहनत ज्यादा है। धनी चाचा को सांस का रोग यानी दमा हो गया है। कुछ दूर चलकर ही हांफने लगते है।”
“हूं…!”
“सुदर्शन बाबू ने जबर्दस्ती कह-सुनकर उसकी नौकरी खत्म करा दी हैं, क्योंकि सुदर्शन बाबू धनी चाचा के इकलौते ही बेटे हैं।”
“अच्छा…!”
“लेकिन आप यह सब क्यों पूछ रहे हैं ?”
लड़के ने उसे घूरकर देखा और बोला‒“बताऊं, क्यों पूछ रहा हूं ?”
दुकानदार हैरत से बोला‒“मैं कुछ समझा नहीं; साहब।”
“अभी समझाए देता हूं।”
अचानक लड़के ने एक चौकी पर रखे शीशे के कप-प्लेट और गिलासों का भरा टोकरा उठाया और जमीन पर पटक दिया।
दुकानदार हड़बड़ाकर खड़ा होता हुआ बोला‒“हे…हे…साहब ! यह आपने क्या किया ?”
लड़के ने पानी की बाल्टी उठाकर भट्टी में उलट दी। बाल्टी नाली में फेंक दी। दुकानदार खड़ा हुआ थरथर कांप रहा था।
सिगरेटों के पैकिट, माचिसों के डिब्बों, बीड़ियों के बंडल, सभी नाली में पड़े नजर आए और फिर शोर सुनकर जो लोग उधर आकर्षित हुए थे, वह जल्दी-जल्दी अपने घरों को खिसक गए। औरतों ने घरों के दरवाजे बंद कर लिए।
सबकुछ करने के बाद नौजवान ने कमीज का कालर खड़ा किया और दुकानदार से पूछा‒“और बताऊं ?”
दुकानदार हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाया‒“नहीं…नहीं, साहब। अब तो यह लकड़ी का खोखा ही बच गया है। यह भी बर्बाद हो गया तो मैं अपने बच्चों का पेट कहां से पालूंगा !”
नौजवान ने नथुने फुलाकर कहा‒“तो फिर कुछ और बातें भी याद कर ले।”

“आज्ञा कीजिए, साहब।”
“मेरा नाम चौहान है…चौहान…!”
“जी, मालिक।”
“मैं यहां तुमसे क्या पूछने आया था ?”
“क…क…कुछ भी नहीं, मालिक।”
“बस; इस कुछ भी नहीं में ही तुम्हारा जीवन है।”
“मैं समझ गया, मालिक।”
“नहीं समझा होगा तो और समझा जाएंगे।”
“नहीं…नहीं, मालिक। मैं बिल्कुल समझ गया।”
चौहान ने कॉलर और ज्यादा खड़े किए और आराम से चलता हुआ गली से बाहर आ गया। एक तरफ से मोटरसाइकिल आई और चौहान के पास रुक गई। उसके ऊपर सवार लड़के ने चौहान को संबोधित करते हुए पूछा‒“क्या हुआ ?”
“काम हो गया।”
“चलो…बैठो…”
चौहान पीछे बैठ गया। मोटरसाइकिल सड़क पर दौड़ने लगी। वे दोनों वही लड़के थे, जो डाकेवाली रात को पप्पी के साथ थे।
अमरसिंह रात को गश्त के लिए तैयार ही हो रहा था कि पंडित अंदर से निकलकर आया और अमरसिंह को संबोधित करके बोला‒“अंदर जा। तुझे इंस्पेक्टर साहब बुला रहे हैं।”

“क्यों…?”
“अब मैं क्या इंस्पेक्टर साहब का पी॰ ए॰ हूं।”
अमरसिंह अंदर आया तो इंस्पेक्टर दीक्षित टेलीफोन पर किसी से कह रहा था‒“जी हां, सर‒अभी यहीं है।”
“…”
“जी, बस मैं अभी लेकर आता हूं।”
“जो आज्ञा सर।”
फिर उसने रिसीवर रखा तो अमरसिंह ने सैल्यूट मारकर कहा‒“आपने मुझे बुलाया, सर ?”
इंस्पेक्टर दीक्षित ने उठते हुए शुष्क स्वर में कहा‒“मेरे साथ चलो।”
“कहां, सर ?”
इंस्पेक्टर दीक्षित ने उसके सवाल का जवाब नहीं दिया। वह अपनी कैप सिर पर फिट करके डंडा उठाता हुआ बाहर आ गया।
अमरसिंह उसके साथ ही बाहर आया।
