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gunahon ka Saudagar by rahul | Hindi Novel | Grehlakshmi
gunahon ka Saudagar by rahul

कुछ देर बाद जीप में अगली सीट पर खुद इंस्पेक्टर दीक्षित ड्राइव कर रहा था और पिछली सीट पर अमरसिंह चुपचाप बैठा था। उसका अवचेतन उसे किसी खतरे का संकेत कर रहा था।

जीप लगभग पांच मिनट के सफर के बाद जब डी॰ एम॰ के बंगले के फाटक में घुसी तो अमरसिंह के कान खड़े हो गए। चौकीदार ने सैल्यूट भी किया था।

जीप रुकने के बाद अमरसिंह उतर आया। इंस्पेक्टर दीक्षित ने नीचे उतरकर अर्दली से पूछा‒“डी॰ एम॰ साहब कहां हैं ?”

अर्दली ने जवाब दिया‒“साहब ड्राइंग-रूम में हैं।”

“अकेले हैं ?”

“नहीं, साहब‒“कई लोग हैं।”

“अच्छा, यह पर्चा उनके सामने पहुंचा दो।”

इंस्पेक्टर दीक्षित ने एक पर्ची पर अपना नाम लिखकर दे दिया, जिसे अर्दली लेकर अन्दर चला गया। अमरसिंह चुपचाप खड़ा था।

तभी उसकी नजरें कम्पाउंड में खड़ी एक मारुति पर पड़ीं और उसका दिल सहसा बहुत जोर से धड़का, क्योंकि उस गाड़ी को अमरसिंह पिछले दिन ही थाने में देख चुका था।

वह समाज-सेवक शेरवानी की गाड़ी थी।

शेरवानी की गाड़ी से आगे एक मूल्यवान एअरकंडीशंड गाड़ी भी खड़ी गाड़ी भी खड़ी हुई थी, जिसके पीछे वाले शीशे पर स्टीकर लगा था। जिस पर छाया थाः

“ज्योति ऑयल मिल।”

अमरसिंह के कान अब बाकायदा खड़े हो चुके थे।

कुछ देर बाद अर्दली लौटकर आया और इंस्पेक्टर दीक्षित से बोला‒“आपको बुलाया है।”

इंस्पेक्टर दीक्षित ने अमरसिंह से कहा‒” तुम यहीं ठहरो‒जब तुम्हें बुलाया जाए, तब आना।”

“बहुत अच्छा, साहब।”

इंस्पेक्टर दीक्षित अन्दर चला गया।

अर्दली ने अमरसिंह को ऊपर नीचे तक देखा और बोला‒“तुम्हारी ही नाम अमरसिंह है…कांस्टेबल अमरसिंह ?”

अमरसिंह ने चौंककर पूछा‒“हां…क्यों…?”

“कुछ नहीं, यूं ही पूछ रहा था।”

अमरसिंह अब पूरी तरह चौकन्ना हो गया था। उसे विश्वास हो गया था कि कुछ-न-कुछ होने वाला जरूर है, जो उसे वहां लाया गया है।

कुछ देर बाद अर्दली फिर से बाहर आया और अमरसिंह से बोला‒“अन्दर चलो। बुलाया है तुम्हें।”

अमरसिंह अर्दली के साथ चुपचाप अन्दर आया। एक बड़े-से, स्वच्छ, सादगी से सुसज्जित ड्राइंग-रूम में, जिसमें एक तरफ महात्मा गांधी की तस्वीर लगी थी, एक तरफ जवाहर लाल नेहरू की। एक बड़े कीमती सोफे पर डी॰ एम॰ बैठा था। दाएं सोफे पर शेरवानी था, बाएं पर जगताप !

कल कालरदार स्टूल पर पप्पी बैठा हुआ था। वे सब लोग चाय पी रहे थे। इंस्पेक्टर दीक्षित एक तरफ दोनों हाथ बांधे किसी नौकर की तरफ सादर खड़ा था। उस समय उसके हाथ में डंडा भी नहीं था।

अमरसिंह भी चुपचाप खड़ा हो गया। उसकी तरफ किसी ने ध्यान भी नहीं दिया था।

डी॰ एम॰ पप्पी की तरफ इशारा करके जगपात से पूछ रहा था‒“क्या कर रहे हैं, चिरंजीव ?”

जगताप ने मुस्कराकर जवाब दिया‒“मैंने सोचा था, कारोबार सम्भाल लें, लेकिन चिरंजीव जरा आ£टस्टिक माइंडेड हैं और स्पोर्ट्समैन भी हैं।

“खूब !”

“वैसे अभी एक प्रोड्यूसर जिद कर रहा है कि मैं अपने साथ मुंबई लिए जा रहा हूं‒कोई बड़ी हीरोइन सामने डालकर हीरो बना दूंगा‒आजकल वैसे ही नए-नए चेहरे बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं‒लेकिन मैंने कह दिया कि ग्रेजुएशन तक मेरे हाथों में‒फिर यह अपना कैरियर खुद ही चुन लेंगे।

डी॰ एम॰ ने कहा‒“होनहार बिरवान के होत चीकने पात।”

शेरवानी ने चाय का खाली कप मेज पर रखते हुए कहा‒“जगताप साहब, कुछ कंजूसी से काम ले रहे हैं बच्चे के बारे में जबान खोलते हुए‒पप्पी बड़ा होनहार लड़का है‒अगर बाप कह दें कि रातभर खुले में टांग से खड़ा रह तो खड़ा रहेगा।”

“ओहो…।”

“एक बार चार गुण्डों ने एक शरीफ बुर्कापोश लड़की को घेर लिया था‒हमारे इलाके के लोग कुछ कम पढ़े-लिखे और उदासीन टाइप के हैं‒इत्तफाक से पप्पी उधर से गुजर रहा था।”

…“इसने मोटरसाइकिल रोककर एक दुकानदार का डंडा उखाड़ा और चारों को मार भगाया। आज तक वह बुर्कापोश लड़की हर रक्षाबंधन पर पप्पी को राखी बांधती है।”

“बहुत खूब !”

“यही नहीं। हमारे इलाके के एक बड़े कारखानेदार हैं‒करी मुल्ला साहब दिल्ली से पांच लाख का पेमेंट लेकर लौट रहे थे‒वह भी कैश। बदामाशों को भनक मिल गई। स्टेशन से निकलते ही कार में बैठने से पहले करीमुल्ला को घेर लिया। एक बदमाश ब्रीफकेस लेकर भागा।

“यह पप्पी उसी गाड़ी से किसी को सी-ऑफ करने गया था। इसने देखा तो मोटरसाइकिल से पन्द्रह किलोमीटर तक बदमाश का पीछा किया। उसने गोलियां भी चलाई। जब उसकी गोलियां खत्म हो गईं, तब पप्पी ने उसकी मोटरसाइकिल से पन्द्रह किलोमीटर तक बदमाश का पीछा किया। उसने गोलियां भी चलाईं। जब उसकी गोलियां खत्म हो गईं, तब पप्पी ने उसकी मोटरसाइकिल गिराई और उसकी अच्छी तरह ठुकाई करके ब्रीफकेस कब्जे में किया।

“रात को तीन बजे करीमुल्ला का ब्रीफकेस लेकर उनकी कोठी पहुंचा। जबकि वह रिपोर्ट भी लिखवा चुके थे। वह हक्का-बक्का रह गए।”

“भई वाह, पप्पी साहब ! आप को पर्दे के ही नहीं, असल जिंदगी के भी हीरो हैं।”

पप्पी ने बड़ी शालीनता और विनम्रता से थोड़ा-सा शरमाकर नजरें झुका लीं। अमरसिंह के होंठ कठोरता से भिंच गये थे।

अपनी प्याली रखकर डी॰ एम॰ ने इन्स्पेक्टर दीक्षित की तरफ देखा और बोला‒“हां भई, इन्स्पेक्टर दीक्षित ! कहां है वह कांस्टेबल ?”

दीक्षित ने सम्मानपूर्वक अमरसिंह की तरफ इशारा करके कहा‒“साहब ! यह मौजूद है।”

डी॰ एम॰ ने अमरसिंह की तरफ देखा और अमरसिंह ने तुरन्त अटेंशन होकर सैल्यूट मारा। बाकी लोग भी अमरसिंह की तरफ आकर्षित हो गये थे।

डी॰ एम॰ ने अमरसिंह से पूछा‒“तुम्हारा ही नाम अमरसिंह है ?”

अमरसिंह ने विनम्रता से जवाब दिया‒“यस, सर !”

डी॰ एम॰ ने पप्पी की तरफ रुख करके कहा‒“क्या आप कांस्टेबल को जानते हैं ?”

पप्पी ने सादर जवाब दिया‒“जी हां, अंकल। यही वह कांस्टेबल है।”

“आप अपनी जुबान से बताइए क्या हुआ था ?”

“अंकल ! उस दिन-रात को मैं अपने एक फ्रेंड को गोहाटी मेल से सी॰ आफ॰ करके वापस लौट रहा था। गाड़ी लेट आई थी। लगभग दस बजे होंगे।

“जब मेरी मोटरसाइकिल मौरिस रोड के चौराहे पर पहुंची तो वहां यह कांस्टेबल एक पनवाड़ी की दुकान के तख्ते पर टांगें लटकाये बैठा था।”

“अकेला था या और भी थे ?”

“उस वक्त तो वह अकेला ही था। मैंने उस वक्त इसके साथ किसी और को नहीं देखा था।”

“अच्छा, फिर क्या हुआ ?”

“इसके हाथ में लाठी थी। मोटरसाइकिल की रोशनी देखकर यह झटपट दुकान के तख्ते से उतरा और लाठी सड़क पर मारकर मुझे ललकारके रोका। अब अगर वैसे ही रोकता तो मैं रुक जाता। पुलिस से मुजरिम ही डरते हैं, मैं भला क्यों डरता ?”

शेरवानी ने कहा‒“कुदरती बात है।”

पप्पी ने फिर कहा‒“इसने मोटरसाइकिल का हैंडल पकड़ लिया। इसके मुंह से स्प्रिट जैसी ठर्रे की गंध आ रही थी। हमारे कारखाने का एक चौकी दार वैसा ही ठर्रा पीकर एक बार खून की उल्टी करके मर गया था। इसलिए मुझे उसकी गंध हमेशा याद रहेगी।”

शेरवानी ने फिर से कहा‒“पप्पी को तो सिगरेट तक का शौक नहीं। चाय भी दिन में एक या दो प्याली पीता है।”

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फिर पप्पी ने कहा‒“तो अंकल…मैंने पूछा, क्या बात है ? क्यों रोक रहे हो मुझे ?”

“कहने लगा, कहां से आ रहे हो ?”

“मैंने बताया, स्टेशन से।

“कहने लगा, झूठ बोलते हो। कागजात दिखाओ।”

“अब इत्तफाक था कि मेरी जेब में ड्राइविंग-लाइसेंस तो था, लेकिन कागजात नहीं थे।”

“हूं…!”

“मैंने उससे कहा कि आप मेरे साथ चलिये। मेरी कोठी ज्यादा दूर नहीं। मैं आपको कागजात दिखा दूंगा। तो अड़ गया कि नहीं…या तो थाने चलो या सौ रुपये दो।”

“खूब !”

शेरवानी ने फिर बीच में हस्तक्षेप किया‒“ऐसे ही लोग इतने जिम्मेदार विभाग को बदनाम करते हैं।”

पप्पी ने फिर से कहा‒“अंकल इत्तफाक था कि मेरी जेब में उस समय सौ रुपए नहीं थे, वरना देकर पीछा छुड़ा लेता। ठीक उसी समय शोर की आवाज सुनाई दी। मैंने झट मोटरसाइकिल खड़ी कर दी। उसी समय तीन मोटरसाइकिल सवार बाईं दिशा से आकर दाईं तरफ निकल गए।

“मैंने शोर सुना तो पता चला कि वे लोग कहीं लूटमार करके भाग हैं। मैं जल्दी-जल्दी अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट करने लगा। लेकिन इसी कांस्टेबल ने मेरी भुजा पकड़ ली। अगर यह उस समय मुझे न पकड़ता तो मैं जरूर उन तीनों को पकड़ लेता।”

“हूं…”

“उल्टे इसने मुझे दबोच लिया और जबर्दस्ती खींचता हुआ उस तरफ ले गया, जहां लाला सुखीराम चाचा की दुकान है। वहां चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगा कि मैं तीन लुटेरों में से एक को पकड़ लाया हूं। बस, उन लोगों ने मेरी पिटाई शुरू कर दी।”

अमरसिंह बड़ा शांत खड़ा था। लेकिन उसके भीतर जैसे पागलपन का दानव बिलबिला रहा था।

शेरवानी ने दीक्षित से कहा‒“आगे आप बताइए ?”

इंस्पेक्टर दीक्षित ने सम्मानजनक स्वर में कहा‒“रात को समय…लाला सुखीराम बौखलाए हुए। इत्तफाक से उस दिन प्रेमप्रताप साहब ने वैसा ही लिबास पहन रखा था, जैसा उनमें से एक लुटेरा पहने था। डी॰ एस॰ पी॰ भी आ गए थे। अकारण प्रेमप्रताप साहब को हवालात में कैद करना पड़ा, क्योंकि लालाजी एफ॰ आई॰ आर॰ दर्ज करा चुके थे।

“दूसरे दिन सुबह जब मैंने सावधानी के तौर पर लालाजी, प्रोफेसर साहब और हशमत साहब को बुलवाया तो लालाजी ने प्रेमप्रताप साहब को रोशनी में देखा तो चौंक पड़े।

“कहने लगे, ‘अरे, यह किस भोले-भाले लड़के को पकड़ लिया ? यह तो मेरे बेटे अमृत से भी छोटा है। जिसने मेरा गल्ला लूटा था, वह तो उम्र में उससे ज्यादा और खुर्राट था।”

“फिर मैंने लाला सुखीरामजी का लिखित में बयान लिया और प्रेमप्रताप को छोड़ दिया।

“दरअसल अमरसिंह भी नया खून है और नई-नई नौकरी मिली है, हुजूर। नई-नई पुलिस की वर्दी पहनकर लोग अपने आपको राजा समझने लगते हैं। अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल कर बैठते हैं, जिसके कारण शर्मिंदगी हमें उठानी पड़ती है और कभी-कभी तो हमारी नौकरी तक खतरे में पड़ जाती है इस चक्कर में।”

शेरवानी ने कहा‒“इंस्पेक्टर दीक्षित सही कह रहे हैं।”

फिर वह जगताप की तरफ देखकर बोला‒“सेठ साहब तो आपसे शिकायत करने को भी राजी नहीं थे। बड़े दयालु हैं। कह रहे थे‒“जैसे पप्पी बच्चा है, वैसे ही अमरसिंह भी अभी नादान है। समझते-समझते समझ जाएगा। अभी इसका कैरियर शुरू भी नहीं हुआ, खत्म क्यों करें ?”

“मैंने सेठ साहब को समझाया कि आदमी को पहले ही कदम पर ठोकर लग जाए तो जीवन का बाकी सफर संभलकर तय करता है। अगर अभी से अमरसिंह को लगाम न दी गई तो आगे जाकर तो यह पुलिस की वर्दी पर एक धब्बा बन जाएगा।

डी॰ एम॰ ने कहा‒“आप ठीक कहते हैं, शेरवानी साहब ! यह अच्छा हुआ कि आपने रिपोर्ट करा दी। अब मैं आप लोगों से पुलिस डिपार्टमेंट की तरफ से माफी मांगता हूं।”

जगताप ने कहा‒“क्यों लज्जित करते हैं, डी॰ एम॰ साहब। मुझे तो इस लड़के अमरसिंह पर भी तरस आ रहा है। अच्छा हो कि इसे सिर्फ वार्निंग देकर छोड़ दें।”

“सेठजी ! हमारे डिपार्टमेंट में सिर्फ वार्निंग से काम नहीं चलता।”

तभी शेरवानी ने प्रसंग बदलते हुए कहा‒“अरे हां, डी॰ एम॰ साहब। अगले महीने हो रही है न आपकी बहन की शादी ?”

“जी, हां। बस, आशीर्वाद दीजिएगा।”

“सेठ साहब तो पहले ही आशीर्वाद के साथ बच्ची को उपहार स्वरूप देने के लिए एक मारुति बुक करा चुके हैं।”

“अरे, इसकी क्या जरूरत है ?”

जगताप ने कहा‒“डी॰ एम॰ साहब ! इसमें तो आपके बोलने का सवाल ही नहीं। आपकी बहन पहले ही हमारी बहन हैं। यहां एक ही होटल अच्छा है।” फिर शेरवानी से पूछनेे लगा‒“क्यों शेरवानी साहब, बात कर ली ?”

“बहुत पहले। पूरी बारात रूबी होटल में ठहरेगी।”

डी॰ एम॰ ने मुस्कराकर कहा‒“मैं आप लोगों का आभारी हूं। आप ही लोगों के सहयोग से मेरी बहन की जिम्मेदारी का बोझ मेरे सिर से उतरेगा।”

“डी॰ एम॰ साहब ! वह आपकी नहीं, हमारी जिम्मेदारी है। आप तो इस शहर में ही हमारे मेहमान हैं और मेहमानों को हम कष्ट नहीं देते।”

“शुक्रिया…!”

फिर जगताप, प्रताप उर्फ पप्पी और शेरवानी उठ गए। डी॰ एम॰ उठने लगा तो शेरवानी झट से हाथ उठाकर उससे बोेला‒“शर्मिंदा मत कीजिए। डी॰ एम॰ जिले का बादशाह होता है। हम लोग हर हालत में प्यादे हैं।”

फिर उसने अमरसिंह की तरफ इशारा करके कहा‒“बस, जरा इन जाते-शरीफ का ख्याल रखें।”

“आप लोगों ने अच्छे नागरिकों की हैसियत से अपनी जिम्मेदारी पूरी की है। अब डी॰ एम॰ के रूप में अपना दायित्व पूरा करूंगा मैं।”

“शुक्रिया…!”

उन लोगों के जाने के बाद डी॰ एम॰ ने इंस्पेक्टर दीक्षित से कहा‒इंस्पेक्टर दीक्षित !”

“यस, सर !”

“कांस्टेबल अमरसिंह को इसी समय सस्पेंड किया जाता है।”

“यस, सर !”

“हम आर्डर भेज देंगे। इसके खिलाफ ए॰ डी॰ एम॰ सिटी की इन्क्वायरी चलेगी। अगर सारे आरोप सिद्ध हो गए तो इसे जेल भी हो सकती है।”

“यस, सर !”

“बस, अब आप इसे यहां से ले जाइए।”

“यस, सर !” फिर वह अमरसिंह से बोला‒“चलो !”

अमरसिंह चुपचाप उसके साथ बाहर आ गया। उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसका शरीर आत्मा से ही खाली हो गया हो।

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