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gunahon ka Saudagar by rahul | Hindi Novel | Grehlakshmi
gunahon ka Saudagar by rahul

थाने पहुंचकर अमरसिंह का बेल्ट और बिल्ला उतार लिए गए। अमरसिंह कुछ न बोला।

वह बाहर निकलने लगा तो इंस्पेक्टर ने कठोर स्वर में कहा‒“ठहरो !”

अमरसिंह रुका तो इंस्पेक्टर ने कहा‒“जब तक इन्क्वायरी फाइनल न हो जाए तुम शहर छोड़कर भी नहीं जा सकते।”

अमरसिंह ने धीरे से कहा‒“मुझे मालूम है।”

“और सुनो, अगर तुमने पप्पी के खिलाफ कोई बदले की कार्रवाई की तो याद रखो फिर तुम्हें इस धरती पर कोई नहीं बचा सकेगा।”

“जी…!”

अचानक एक कांस्टेबल अन्दर आया और इंस्पेक्टर से बोला‒‘सर ! उस मोटरसाइकिल का पता चल गया।”

“कौन-सी मोटरसाइकिल ?”

“जिस पर वे तीन बदमाश भागे थे, जिन्होंने लाला की दुकान लूटी थी।”

“किससे पता चला ?”

गर्ल्स कॉलेज का चौकीदार बहुत डरपोक है। लेकिन मोटरसाइकिल के नम्बर देख चुका था, जिसके बारे में उसने पुलिस को नहीं बताया था।”

“ओहो, नम्बर क्या थे ?”

“यू॰ पी॰ 81, यू॰ एम॰ एस॰ 2923।”

“ओहो, मॉडल ?”

“टी॰ वी॰ एस॰ सुजूकी। कोई पुराना मॉडल था, जिसके नम्बर नए अलाट करा लिए थे।”

“हूं। मालूम करो। इन नम्बरों की मोटरसाइकिल का मालिक कौन है।”

“यस, सर ?”

जाने क्यों अमरसिंह का दिल बहुत जोर-जोर से धड़क रहा था। वह तेज-तेज चलता हुआ थाने से निकल आया।

अमरसिंह ने दरवाजे की घंटी बजाई। कुछ ही पल बाद दरवाजा खुल गया।

सुदर्शन उसे देखते ही चौंककर मुुस्कराया‒“अरे, अमर भैया…आप…?”

अमरसिंह ने कहा‒“तुमसे जरूरी काम था ? इसलिए रात में ही चला आया।”

“अरे, तो अंदर आइए न।”

अमरसिंह ने भीतर प्रवेश किया। सुदर्शन ने दरवाजा बन्द कर लिया।

अमरसिंह ने उससे सम्बोधित होकर पूछा‒“तुम्हारी मोटरसाइकिल कहां है ?”

सुदर्शन ने चौंककर पूछा‒“क्यों…?”

“जल्दी बताओ।”

“वह सामने खड़ी है।”

मोटरसाइकिल एक जगह आंगन में ही खड़ी थी। लेकिन आंगन में अंधेरा था।

अमरसिंह ने उससे कहा‒“जरा बत्ती जलाओ।”

सुदर्शन ने हैरत से पूछा‒आखिर बात क्या है ?”

“तुम बत्ती जलाओ।”

तभी अंदर से धनीराम की आवाज आई‒“सुदर्शन बेटा…कौन है…?”

इससे पहले की सुदर्शन कुछ बोलता, अमर ने तेज स्वर में कानाफूसी की‒“पिताजी को मत बताना, मैं हूं।”

“क्यों…?”

अंदर से फिर से धनीराम ने पुकारा तो सुदर्शन ने जोर से कहा‒“कोई नहीं, पिताजी। पड़ोस के राजू हैं। चाय की पत्ती मांगने आए हैं।”

“अच्छा…अच्छा पत्ती देकर दरवाजा ठीक से बन्द कर देना।”

“जो, पिताजी !” सुदर्शन ने अमर से कहा‒“बत्ती जलाने पर पिताजी को संदेह हो जाएगा।”

“अच्छा, तुम्हारी मोटरसाइकिल का नम्बर क्या है ?”

“यू॰ पी॰ 81, यू॰ एम॰ एस॰ 2923।”

अमरसिंह के दिल पर धक्का-सा लगा, उसने धीरे से कहा‒“मुझे पहले ही संदेह था‒यही होगा।”

“क्या मतलब ?” सुदर्शन हैरत से बोला।

“क्या ऐसा नहीं हो सकता कि तुम सुबह होने से पहले बाबूजी को लेकर यहां से कहीं और चले जाओ, सिर्फ थोड़े से दिनों के लिए !”

“क्यों…?”

“क्योंकि जिस लुटेरे को मैंने पकड़ा था, वह बड़े आदमी को बेटा था। छूट गया। उल्टा मैं सस्पैंड हो गया।”

“ओहो…”

“और अब मुझे परेशान करने के लिए तुम्हें फंसाने की कोशिश की जा रही है। लाला की दुकान के लुटेेरों के पास जो मोटरसाइकिल थी उसका नंबर अब तुम्हारी मोटरसाइकिल को नम्बर बताया जा रहा है।”

सुदर्शन को चेहरा सफेद हो गया।

उसने हैरत से कहा‒“यह आप क्या कह रहे हैं, भाई साहब ?”

“मैं सच कह रहा हूं, सुदर्शन। उन लोगों की जासूसी बहुत तेज है। इतनी जल्दी इन लोगों ने यह भी पता लगा लिया कि तुम्हारा रिश्ता हमारे घर में होने वाला है और तुम्हारे खिलाफ यह जाल इसीलिए बिछाया जा रहा है।”

“हे भगवान ! अब क्या होगा ?”

“इसके सिवा अब कोई दूसरा रास्ता नहीं कि तुम तुरन्त बाबूजी को लेकर यहां से चले जाओ।”

“लेकिन आज ही से मैंने अपनी नौकरी ज्वाइन की है।”

“सुदर्शन, अगर एक बार तुम्हारे माथे पर जेल का ठप्पा लग गया तो नौकरी को यूं ही चली जाएगी। नौकरी फिर भी मिल सकती है। लेकिन खोई हुई इज्जत वापस नहीं मिल सकती है।”

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ल…ल…लेकिन मैं पिताजी को क्या बताऊं ?”

“कुछ भी बताओ। अपने किसी रिश्तेदार की बीमारी को बहाना कर दो। लेकिन ज्यादा मत सोचो सुदर्शन। जितनी देर लगेगी, खतरा उतना ही करीब आएगा।”

इससे पहले कि सुदर्शन कोई जवाब देता, अचानक किसी ने जोर-जोर से दरवाजा पीटा और दोनों उछल पड़े। बाहर से तेज आवाज आई‒“दरवाजा खोलो…पुलिस…”

सुदर्शन ने हड़बड़ाकर कहा‒“अब क्या होगा भाई साहब ?”

अमरसिंह ने ठंडी सांस ली और बोला‒“अब हो ही क्या सकता है ? मैंने तो देर नहीं की। लेकिन शायद उन लोगों ने फुर्ती कर डाली। उन्हें जरूर आशंका होगी कि मैं तुम्हें भगा ने दूं।”

“मेरे बाबूजी…?”

“कुछ नहीं हो सकता सुदर्शन, बहुत देर हो गई।”

“म…म…मैं भाग जाऊं दीवार फलांगकर। आप बाबूजी को सम्भाल लीजिएगा।”

“जान खतरे में पड़ जाएगी। पुलिस मूर्ख नहीं होती। उन लोगों ने भागने के रास्तों पर निगरानी रखी होगी और बेहिचक गोली चला देंगे।”

अचानक बाहर से जोर से कहा गया‒

“दरवाजा खोला। चारों तरफ से घेरा डाल दिया गया है। फरार होने की कोशिश करोगे तो गोली मार दी जाएगी‒यह याद रखना।”

अमरसिंह ने कहा‒“देखो, मैंने क्या कहा था ?”

फिर आवाज आई‒“दरवाजा खोलो, वरना हम तोड़ रहे हैं।”

अमरसिंह ने दरवाजे की तरफ बढ़कर कहा‒“तोड़ने की जरूरत नहीं। मैं दरवाजा खोल रहा हूं।”

दरवाजा अमरसिंह ने खोला। सामने ही इन्स्पेक्टर दीक्षित कई सिपाहियों और दरोगा के साथ मौजूद था।

वह अमरसिंह को देखकर व्यंग्य से बोला‒“खूब ! तो तुम पहले ही से यहां मौजूद हो।”

अमरसिंह ने गम्भीरता से कहा‒“धनीरामजी की तबियत खराब थी। मैं उन्हें देखने आया था।”

“देखने आए थे या होने वाले जीजा को फरारी का रास्ता बताने ?”

फिर वे लोग अन्दर घुस पड़े। कई टार्चें रोशन हो गई थीं। सुदर्शन जहां खड़ा था, वहीं खड़ा रह गया। उसका रंग पीला पड़ गया था।

दीक्षित ने दरोगा से कहा‒“हथकड़ियां डालो।”

सुदर्शन ने थूक निगलकर कहा‒“म…म…मगर…मैं…निर्दोष हूं।”

“दोषी और निर्दोष का फैसला अदालत करती है, पुलिस नहीं।”

सुदर्शन के हाथों में हथकड़ियां डाल दी गईं।

अचानक आंगन की बत्तियां रोशन हो गईं और धनीराम नजर आया। उसने वह सब देखा तो हैरत से आगे आते हुए बोला‒“हें…यह सब क्या हो रहा है ?”

दरोगा ने कहा‒“तुम्हारे बेटे की गिरफ्तारी।”

“मेरे बेटे की गिरफ्तारी…किस जुर्म में ?”

“इसने दो लुटेरों के साथ मिलकर अपनी मोटरसाइकिल पर सवार होकर शास्त्री मार्ग के लाला सुखीराम की दुकान लूटी थी।”

धनीराम ने कलेजा पकड़कर हांफते हुए कहा‒“मेरे बेटे ने दुकान लूटी थी…नहीं…नहीं…इसने तो बचपन से आज तक…एक…चाकलेट तक नहीं चुराई।

“इसका मन तो हमेशा पढ़ाई की तरफ रहा दरोगाजी। आप लोगों को जरूर गलतफहमी हुई है। मेरा बेटा चोर नहीं हो सकता।”

इन्स्पेक्टर दीक्षित ने नथुने फुलाकर कहा‒“जिस मोटरसाइकिल पर सवार होकर इसने साथियों के साथ दुकान लूटी थी। वह मोटरसाइकिल यहीं मौजूद है।”

“नहीं, मेरा बेटा ऐसा नहीं कर सकता।”

“धनीराम ! तुम्हारे बेटे ने ऐसा ही किया था। इसे मालूम था कि उस इलाके के गश्ती दस्ते में उसका होने वाला साला भी शामिल है।”

उसने व्यंग्य से अमरसिंह की तरफ देखकर कहा‒“और साले ने भी साला होने को फर्ज खूब निभाया। होने वाले जीजा को बचाकर भगा दिया और एक निर्दोष, सम्मानित घराने के लड़के को उसकी जगह पकड़कर बन्द करा दिया।”

धनीराम ने कंपकंपाती आवाज में हांफते हुए कहा‒“नहीं…न तो मेरा लड़का…वैसा है…न ही अमरसिंह। मैं…मैं अमर के खानदान को भी अच्छी तरह जानता हूं।”

“तुम जो कुछ जानते हो अदालत में बताना।” फिर वह कांस्टेबलों से बोला‒“ले चलो इसे और एक आदमी मोटरसाइकिल उठाओ।”

दो कांस्टेबल बदहवास सुदर्शन को खींचते हुए बाहर ले गए। एक कांस्टेबल ने मोटरसाइकिल उठा ली और दूसरा उसे धकेलने लगा।

धनीराम ने हांफते हुए कहा‒“अरे छोड़ दो…छोड़ दो मेरे बेटे को।”

अमरसिंह ने उसकी भुजा पकड़कर कहा‒“आप अन्दर चलिए बाबूजी।”

“मेरा बेटा…मेरा लाल…”

“बाबूजी !”

“अरे, उसने तो कभी…किसी की पेंसिल तक…नहीं चुराई थी। भला इतना…बड़ा लुटेरा कैसे बन गया ?”

“बाबूजी ! उन लोगों ने सुदर्शन पर झूठा आरोप लगाया है।”

“बाबूजी ! इन लोगों ने मेरी दुश्मनी सुदर्शन से निकाली है।”

“क्या…क्या मतलब ?”

अमर ने बताया कि क्या हुआ था।

तब धनीराम ने हांफते हुए कहा‒“हे भगवान ! तो…तो मेरा यही अपराध है कि मैंने तुम्हारी बहन से…अपने बेटे का…रिश्ता तय किया…?”

“मुझे…मुझे क्या मालूम था कि मैं…ऐसे मनहूस घराने में…अपने बेटे का…भाग्य…फोड़ रहा हूं।”

“बाबूजी…!”

“अरे, अभी तो बात ही पक्की हुई थी कि हमारे ऊपर यह पहाड़ टूट पड़ा…मेरे बेटे का जीवन बर्बाद हो गया…उसकी नौकरी आज ही तो लगी थी…।”

“बाबूजी…!”

“मैंने…मैंने कितने अरमानों से…परवरिश किया था उसे…कितनी मेहनत से पढ़ा-लिखा था वह…जबर्दस्ती मुझे आराम करने बिठा दिया…और…और तुम…तुम…से संबंध जोड़कर…उसका भविष्य धूल में मिल गया…वह जेल चला गया…तो उसकी नौकरी भी चली जाएगी…और मेरी इज्जत भी…!”

“बाबूजी ! मैं पूरी कोशिश करूंगा।”

“नहीं, तुम्हारी छाया ही मनहूस है…मैं…मैं तुम्हें कभी क्षमा नहीं करूंगा…मैं तुम्हें कभी क्षमा नहीं करूंगा।”

फिर वह छाती पर हाथ रखकर चिल्लाया‒“बेटा…सुदर्शन…मैं आ रहा हूं…मैं…मैं…अपना सबकुछ बेच दूंगा…तुझे कुछ नहीं होने दूंगा…।”

अचानक धनीराम दरवाजे के पास औंधा गिर गया।

अमर उसकी तरफ झपटता हुआ चीखा‒“बाबूजी !”

उसने जल्दी से धनीराम को सीधा किया और उसके होंठों से कंपकंपाती आवाज बड़ी मुश्किल से निकली‒“बाबूजी !”

धनीराम की आंखें फटी रह गई थीं। सांस की डोरी टूट चुकी थी। अमर धनीराम को सम्भाले सन्नाटे में बैठा हुआ था। उसके कानों में धनीराम का एक-एक शब्द गूंज रहा था।

“बड़ा मनहूस था यह सम्बन्ध।

“मेरे बेटे का भविष्य बर्बाद हो गया।

“सिर्फ रिश्ता पक्का होने से मेरे बेटे का मुकद्दर फूट गया।”

धीरे-धीरे उसके होंठ मजबूती से भिंच गए। आंखें अंगारे उगलने लगीं। उसकी कल्पना में एक-एक चेहरा घूम रहा था।

पप्पी, जगताप, शेरवानी, दरोगा, इन्स्पेक्टर दीक्षित ! एक-एक चेहरा बार-बार उभरता। उसके जबड़े और ज्यादा कसते चले जाते।

दरवाजे के बाहर पड़ोसियों की भीड़ जमा हो गई थी।

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