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महानगर | Mahanagar novel S Balwant | best novel in hindi | Grehlakhami
Mahanagar

शताब्दी एक्सप्रेस पूरी रफ्तार से भागी जा रही थी। यह गाड़ी बस से आधे समय में पहुंचा देती थी।

इकबाल सिंह दलेर सिंह के भोग पर चंडीगढ़ गया हुआ था। वहीं पर उसको जिन्दर और भगवान भी मिल गए। वह सारे इकट्ठे पढ़ा करते थे। कॉलेज के दिनों में वे कामरेड हुआ करते थे। पार्टी के झंडे लेकर इकबाल और दलेर सबसे आगे होते थे। जिन्दर और भगवान उनके पीछे-पीछे।

कॉलेज के बाद सारे इधर-उधर बिखर गए। दलेर को चंडीगढ़ के एक कॉलेज में नौकरी मिल गई। वह वहीं पढ़ाने लगा और इकबाल दिल्ली के किसी कॉलेज में टीचर लग गया। जिन्दर और भगवान दोनों दिल्ली के सचिवालय में काम करने लग गये।

आज वह तीनों इसी गाड़ी से दिल्ली वापस लौट रहे थे।

चलते वक्त उनके कॉलेज के दिनों के दोस्त रामकुमार ने चंडीगढ़ में ही जोर डाला और कहा कि जाने वाला तो चला गया। …धीरज करो।… घूंट-घूंट पी लो।” और वह उनको अपने घर ले गया। रामकुमार ने अमरीका से लाई जिन की एक बड़ी बोतल उनको और पकड़ा दी। बोला रास्ते में काम आयेगी।

रामकुमार ही उनको शताब्दी में चढ़ा गया था।

चलती गाड़ी में इकबाल ने वेटर को कह कर पानी और गिलासों का प्रबन्ध कर लिया। वे तीनों बाहर कॉरिडोर में खड़े होकर पीने लग गए।

वहीं पर एक तरफ एक आदमी कम्बल में अपने आपको पूरी तरह लपेटे बैठा था। साथ ही में उसने पन्द्रह सोलह साल के लड़के को अपने पास बिठाया हुआ था। वह आदमी बीड़ी पी रहा था और लड़का हैरान उनकी ओर देख रहा था।

वह पीते हुए बातें कर रहे थे। वह लड़का उनकी बातें ध्यान से सुन रहा था।

उन दिनों पूरा पंजाब लहूलुहान था।

कोई भी बात होती, पंजाब के बारे चर्चा छिड़ जाती। 1984 के दंगों के बाद दिल्ली के सिख बहुत डरे हुए थे। कोई भी बात होती तो वे सहम जाते।

इसके उलट जो लोग सिख नहीं थे वे सिखों की बहादुरी की बातें करते। कहते केवल यही एक कौम है जो इतनी लहूलुहान होने के बावजूद मारने को तैयार नहीं। वे यह भी बातें करते कि जो लोग दिल्ली के दंगों में लूटे गये थे वे पहले से अधिक खुशहाल नजर आते हैं।

वह जब दिल्ली के दंगों व लूटमार की बात करते तो अपनी आवाज को जरा धीमी कर लेते।

बातें चलती रहीं। वह एक दूसरे के संग अपनी बातें साझी करते रहे।… वे दिन उन्होंने कैसे गुजारे।… कैसे एक-एक पल उन दिनों वे मर-मर के जिए थे।…

दिल्ली के दंगों में भगवान के घर के सभी सदस्य मारे गए थे। इकतीस अक्टूबर से चार नवम्बर तक तो वे सारे महाजन के घर में छिपे रहे। पर बाद में उसने सोचा कर्फ्यू हट गया।

भगवान ने जिद की कि अब घर चलते हैं। वह घर के सभी सदस्यों को वापिस घर भेजकर खुद महाजन से बातें करने लग पड़ा। बस रास्ते में ही कुछ लोग आये और उसके घरवालों को कहने लगे कि “तुम्हें मिलिट्री लेने आई है। गाड़ी में बैठो कैम्प छोड़ आते हैं।”

बातों-बातों में उन सब पर मिट्टी का तेल डाल कर उन्हें जीते ही आग लगा दी।। जब भगवान वहां पहुंचा तो बहुत देर हो चुकी थी। परिवार के सारे लोग राख हो चुके थे।

भगवान टूट सा गया था। बाद में कितनी मुश्किल से महाजन ने उसे सम्भला था।

इसी तरह की मिसालें जिन्दर ने भी दी और इकबाल ने भी। पर डर जैसे उनकी रूह में समा चुका था। पल में चुप कर जाते और कोई और बात छेड़ने को कहते। पर घूम फिर कर वही पहुंच जाते।

शुरू से ही इकबाल की दलेर के साथ ज्यादा बनती थी।

उसने बात बदलने के लिए दलेर की बात छेड़ ली। दोस्तों का दोस्त था वह।… एक बार ऐसी संगत में कोई आ जाता तो फिर वापिस लौटना मुश्किल हो जाता। हमेशा के लिए दोस्त बन जाता उसका।

वैसे वह बुद्धिमान भी बहुत था और पढ़ा लिखा तो वह था ही। वह सीधा और साफ इनसान था। कोई दिखावा या शोशापन नहीं था उसमें। बस अपनी जिंदगी अपने ही ढंग से जीता था वह। चाहे फाइव स्टार होटल हो चाहे गांव के स्कूल का फंक्शन। वह अपनी पसंद के कपड़े पहनता। एक जैसा सादा खाना खाता और हर जगह अपना वजूद बना लेता।

अपनी अक्ल और सूझ-बूझ के कारण वह ऐसे मुकाम पर पहुंच गया था कि लोग उसकी बहुत इज्जत करते थे।

दलेर बड़े गर्व के साथ बताया करता था कि उसके दो शौक रहे हैं। वह दो चीजें चोरी किए बगैर नहीं रह सकता था। एक साइकिल की घंटी और दूसरा पैन।

वह बचपन में साइकिल की घंटी उतार लिया करता था। अपनी साइकिल न ले पाने की वजह से शायद बस घंटियां चोरी करने का शौक पड़ गया और पैन मारने की आदत तब पड़ी जब वह कॉलेज गया। दलेर बताया करता था कि बचपन में वह स्कूल में फट्टी लेकर जाया करता था, तो मास्टर कहा करते थे कि सरकंडे की कलम बनाकर सुन्दर लिखने की कोशिश किया करो। दलेर कोशिश भी करता पर उससे स्याही ही न बनती। जब उसको पढ़ने की आदत पड़ी तो पता चला कि पढ़ना तो बहुत जरूरी है। पर लिखने के लिए एक पैन की जरूरत होती है और शायद इसीलिए उसे पैन चोरी करने की आदत पड़ गई और आज वह इसी पैन के कारण ही वह मारा गया। एक लेख लिखा था उसने अखबार में। उसको लेकर हंगामा हो गया और बस “खबर” आ गई। गोलियों का निशाना बन गया था।…

भोग पर बहुत सारे लोग इकट्ठे हुए थे और भी बहुत सारे मित्र आए हुए थे। एक-एक करके सब मिले और बिछुड़ गए। “बहुत अच्छा इनसान था दलेर।” इस पर इकबाल भावुक हो गया। उनको लगा कि दलेर के व्यक्तित्व का कद इतना ऊंचा था कि वो अपने आपको उसके सामने बौना महसूस कर रहे थे।

उन्होंने और भी बहुत सी बातें कीं। जिंदर दिल्ली व सचिवालय की बातें सुनाता रहा। भगवान आपबीती बताता रहा। पर घूमफिर कर बात पंजाब या दिल्ली के दंगों पर ही आ रुकती।

गाड़ी अपनी पूरी रफ्तार से भाग रही थी।

अचानक कंबल वाला व्यक्ति उठा और टॉयलेट में घुस गया उसके जाते ही उसके साथ बैठा लड़का उठा और उनकी ओर हाथ जोड़कर कहने लगा “मुझे इस आदमी से बचाओ। मैं आपके पांव पड़ता हूं।… यह आदमी मुझे धमकी देता है।… रोज मेरे ऊपर आ चढ़ता है।… कहता है अगर किसी को बताया तो आतंकवादी बनाकर बंद कर दूंगा।… मेरे घरवालों को भी खबर नहीं कि मैं कहां हूं। वह भी मुझे खोज-खोजकर परेशान हो रहे होंगे।” वह सारी बातें एक ही सांस में कह गया।

इससे पहले कि वह कुछ कहते वह कंबल वाला आदमी टॉयलेट से बाहर आ गया और वह लड़का और भी सहम गया।

कंबल वाले आदमी ने अपने बदन से कंबल यूं उतारा जैसे फिल्मों में डाकू उतारते हैं। उसने पुलिस की वर्दी पहनी हुई थी। जब वह बोला तो पता चला कि उसने खूब पी रखी थी।

“मैं पुलिसवाला हूं।… देखते हो ये फीते?… वह अपने कंधे पर लगे फीते खींच उन्हें दिखाने लगा। “बताता हूं तुम्हें। …आने दो अगला स्टेशन।… तुम सब को उतरवाऊंगा।… कानून तोड़ते हो?… गाड़ी में शराब पीते हो?… बताता हूं तुम्हें।” वह अपनी बिखरी हुई मूंछे इकट्टी कर उनको संवारता हुआ उनकी तरफ घूरने लगा।

इतनी देर में कुछ लोग वहां इकट्ठे हो गये। इकबाल ने अवसर पाकर जिन वाली बोतल और गिलास गाड़ी से बाहर फैंक दिये।

पुलिस वाला यह सहन न कर सका “सबूत मिटाते हो?… हमारे पास और भी बहुत हथियार हैं।… देखना तुम अगले स्टेशन पर कि क्या होता है?”

वह उनको धमकी दे रहा था कि अचानक शोर मच गया कि किसी ने चलती गाड़ी में से छलांग लगा दी है। उन्होंने देखा कि वह लड़का वहां नहीं था। वे कांप गये। वह पुलिस वाला भी थोड़ा घबराया। उसको लगा कि लड़के की बात को लेकर कोई मुसीबत न खड़ी हो जाये। वह उनसे आंख बचाकर अपने को सम्हालने की कोशिश कर रहा था कि इधर इकबाल और उसके साथी खिसक कर अपनी-अपनी सीट पर जा बैठे।

गाड़ी पूरी रफ्तार से भाग रही थी पर किसी ने गाड़ी रोक कर उस लड़के को तलाशने की कोशिश न की।

इकबाल अपनी जगह डरा हुआ बैठा था। उसके कॉलेज में सुबह से पीरियड थे। आंखें बंद किए वह सोच रहा था कि अगर कोई मुसीबत खड़ी हो गई तो वह कॉलेज कैसे पहुंचेगा। जिन्दर और भगवान वैसे डर रहे थे कि अगर कोई उल्टा काम सिर पड़ गया तो सरकारी नौकरी से हाथ धो बैठेंगे।

वे तीनों भयभीत बैठे रहे।

वह पुलिस वाला बांहें उछालता हुआ दूसरे डिब्बे में चला गया।

अगला स्टेशन भी निकल गया और बाकी स्टेशन भी। वह पुलिस वाला नज़र नहीं आया और न ही उनको किसी ने कुछ कहा।

जैसे-जैसे दिल्ली करीब आ रही थी उनको वह घटना चुभने लगी। उस लड़के की मिन्नतें आंखों के सामने किसी फिल्म की भांति चलने लगीं। अब उनको पछतावा होने लगा। “कोई तो हिम्मत कर लेता उस लड़के जान तो बच जाती।” पर अब तो देर हो चुकी थी।

दिल्ली आई। वे उतर कर अपने-अपने घर तो पहुंच गए और फिर अपने-अपने कामों में भी जुट गये पर यह घटना अतीत की परछाई की भांति उनके पीछे-पीछे थी और वह बौनों की तरह महसूस कर रहे थे।

वैसे तो वे पहले भी आपस में कम ही मिलते थे पर अब जब भी मिलते आपस में आंख मिलाने की बजाय एक दूसरे से आंख चुराने लगते।

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