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महानगर | Mahanagar novel S Balwant | best novel in hindi | Grehlakhami
Mahanagar

असलम दिल्ली वापिस आते वक्त काफी परेशान था।

ड्राइवर कार भगाए जा रहा था। उसे लगा वह बहुत तेज चला रहा है। जैसे-जैसे पेड़ पीछे छूटते जाते उसको लगता बहुत कुछ पीछे रह गया है।

असलम को गुरपाल की मौत की खबर मिलते ही उसकी तो जैसे जान निकल गई।… यह कैसे हुआ?… यह सब तो उसको बस कामिनी के घर जाकर ही पता चला।

वे दोनों बड़े अच्छे दोस्त थे। मुद्दत से एक दूसरे के करीब थे। अपनी हर बात आपस में साझी करते।

गुरपाल की मौत की खबर सारे शहर में यूं फैली जैसे हवा ही बताती जा रही हो। कुछ ही पलों में दुनिया इकट्ठी हो गई। हर कोई परेशान था। जवानी में ही चला गया। बहुत प्यारा इनसान था वह। बेचारा गरीब मारा गया। दोस्तों का दोस्त था वह। असलम जब पहुंचा तो अफसोस में डूबे दोस्त ऐसी बातें कर रहे थे।

गुरपाल की पत्नी कामिनी घुटनों में मुंह छिपाए एक तरफ बैठी रो रही थी।

कामिनी का पिता उसे हौंसला दे रहा था। कामिनी की मां गुरपाल व कामिनी की बेटी तानिया को बहला रही थी। तानिया खुद भी हैरान-सी हुई यह सब देख रही थी। उसकी अभी समझ ही नहीं थी कि मरना जीना किसको कहते हैं? वह तो अभी चार वर्ष की भी नहीं हुई थी।… कामिनी को सब से बड़ा धक्का लगा था। कई लोग गुरपाल के पिता के पास आकर शोक प्रकट करते।

वह रोये जा रहा था।

दूसरे दिन अंतिम संस्कार हुआ। लोग रोते पीटते हुए उसे विदाई दे रहे थे। अग्नि देवता उसकी देह को मिट्टी में मिलाने का अपना कर्त्तव्य निभा रहे थे।

सारी रस्मों के बाद जब वह घर पहुंचे तो कामिनी के पिता ने गुरपाल के पिता को पास बुलाकर कहा, “हमने तो बहुत समझाया इस लड़की को। मानी ही नहीं। हम तो पहले ही कहते थे कि यह शादी ठीक नहीं है।”

गुरपाल का पिता चुप बैठा सुनता रहा। कामिनी का पिता पहले तो इधर-उधर की बातें करता रहा और अन्त में उसने दिल की बात कह डाली। वह चाहता था गुरपाल का पिता अपनी वसीयत उसकी बेटी के नाम कर दे। “यह नन्ही सी जानें और वह भी लड़कियाँ?… दुनिया का कैसे मुकाबला करेंगी? अब तो आप ही इनकी सहायता करो।”

गुरपाल का पिता चाहे देहाती था पर शायद वह ऐसे हालात से परिचित था। उसकी और तो कोई औलाद नहीं थी। उसने अपनी वसीयत पहले से ही तानिया के नाम करवाई हुई थी। उसने कागज निकाल कर कामिनी के पिता को पकड़ाए तो कामिनी के पिता के चेहरे पर पहले तो मुसकान आई पर फिर गहरी खामोशी में बदल गई।

वह चाहता था कि जायदाद कामिनी के नाम हो। पर फिर भी वह खुश था।

चौथे को फूल चुगने थे। गुरपाल के पिता के साथ असलम भी चला गया। ठीक समय पर पहुंच कर सबने फूल चुने और वह उन्हें कीरतपुर में अंतिम प्रवाह करने के लिए चल पड़े।

चलते समय कामिनी के पिता ने कहा कि फूल हरिद्वार ले जाएं…पर शायद गुरपाल के पिता ने यह न सुना या सुनकर अनसुना कर दिया। और वह कीरतपुर की ओर चल पड़े।

जब वह कीरतपुर जा रहे थे तो असलम को गुरपाल और कामिनी के यूनिवर्सिटी के दिनों की यादें आ रही थीं। कैसे वे दोनों एक दूसरे की मुहब्बत में अंधे थे। सुबह हो या शाम वह हमेशा इकट्ठे दिखते थे।

वे जब भी लड़ते चाय वाले बाबा के पास शिकायत करते। वह बीच में पड़कर इनकी सुलह करवा देता। बाबा भी उन्हें बहुत प्यार करता। कभी कभी तो वह चाय के पैसे भी न लेता। अक्सर वे बाबा से पैसे भी उधार ले लेते थे।

कामिनी की भूरी आंखें, भूरे बाल। बस हिरनी लगती थी वह। गुरपाल भी बड़ा सुंदर और गबरु जवान था।

एक बार वे दोनों खूब लड़े। सुलह के लिए जब वह बाबा के पास पहुंचे तो कामिनी शिकायत कर रही थी “बाबा, गुरपाल को अक्ल नहीं है। अब तुम ही बताओ कि इसे मेरी बात माननी चाहिए कि नहीं?”

“यह कोई जरूरी है कि मैं तेरी हर बात मानूं?… रात को दिन कहूं और दिन को रात?”

बाबा ने उनको शांत करवाया। मुहब्बत की मिठास के बारे में अपने अनुभव बताये। वह धीरे-धीरे शांत हो गये। उनका टकराव हमेशा किसी न किसी विषय पर बहस करते हुए होता था।

एक दिन वह इस बात से झगड़े कि मुहब्बत फिजूल शब्द है। इस शब्द का वह मतलब नहीं जिसमें इसका प्रयोग किया जाता है।

कामिनी रो रही थी। वह कहती कि “गुरपाल बस उसे एक जरूरत की चीज समझता है। मुहब्बत नहीं करता।”

गुरपाल ने अपना पक्ष पेश करते हुए कहा “जैसे अब तू है! भावुक तौर पर मैं तुझे देखे बगैर, मिले बगैर नहीं रह सकता। पर जब हम संसार के बंधनों में बंध जब यह पता चलेगा कि हम एक दूसरे के हो गए हैं फिर मुहब्बत का रूप ऐसा नहीं होगा। इसकी अगली कड़ी होगी। तब मुहब्बत किसी और रूप में बदल जाएगी। इसीलिए मुहब्बत की फीलिंग स्थायी नहीं हो सकती। कामिनी मेरी प्रेरणा है। इसलिए मैं मुहब्बत शब्द कहकर इससे जल्दी पीछा छुड़वाना नहीं चाहता। बल्कि हमेशा के लिए साथ रहना चाहता हूं।”

इस तरह उनकी बहसें चलती रहतीं और वह यह सब कुछ असलम के साथ साझा करते।

एक दिन वे लाल किला देखने गये। दोनों सारी चीजें बड़े ध्यान से देखते रहे।… शाही दरबार कैसे लगता होगा।… कैसे संगीत व नाच चलते होंगे। वह सारा दिन घूमते-घूमते कभी वह कहीं बैठ जाते तो कभी कहीं।

शाम हुई तो वह लाइट एण्ड साउंड प्रोग्राम देखने बैठ गये। रोशनी व संगीत के द्वारा शाहजहां की दिल्ली के निर्माण से लेकर उसके उजड़ने तक की कहानी बताई गई।

बाद में आजादी का झंडा फहराने तक दिखाया गया।

उस समय की दिल्ली की चहल-पहल, मीना बाजार “चाँदनी चौक” और जामा मस्जिद। सबके बारे में तफसील से पीछे से आ रही आवाज़ बताती रही और रोशनी व संगीत वह माहौल बनाते जिसकी बात की जा रही थी।

गुरपाल बड़े ध्यान से यह प्रोग्राम देख रहा था और कामिनी उसके कंधे पर सिर रखकर शायद ताजमहल पहुंच गई थी।

वह सोचती थी शाहजहां एक बहुत ही खूबसूरत इनसान रहा होगा। उसने कितना कुछ बनवाया था। मुहब्बत की मिसाल थी वह। वह दिल्ली का निर्माण भी उसी ने करवाया। मुगलों के समय दिल्ली का नक्शा ही कुछ और होगा।

“शाहजहां रोमांटिक होते हुए भी एक कामयाब बादशाह निकला। रोमांटिक तो बहादुर शाह जफर भी था। पर वह शायर अधिक था। हुकूमत की पकड़ सदा मजबूत इरादों वाले हाथों में हो तो हुकूमत चलती है। शायरी से नहीं।

वह इन खयालों में ही डूबी हुई थी कि शो खत्म हो गया। गुरपाल ने उसको उठाया और वह होस्टल आ गये।

उनके इश्क का दोनों के माता-पिता को पता नहीं था।

जब पता चला तो तूफान खड़ा हो गया।

कामिनी का पिता जब यह खयाल करता कि, “उसकी बेटी की जब किसी पगड़ी और दाढ़ी वाले आदमी के संग ब्याह की खबर उसके सम्बन्धियों को पता लगेगी तो वे क्या सोचेंगे?… बहुत शर्म की बात है।”

गुरपाल का पिता तो अनपढ़ देहाती था ही। पर वह यह समझता कि उसका एक ही बेटा है। पढ़ लिख कर अफसर बनेगा।

वह स्वयं गुरुद्वारे का बड़ा भक्त था। वह हमेशा सुबह शाम गुरुद्वारे जाता। मन एकाग्रचित्त करके बैठा रहता।

जब उसको यह पता लगा कि उसका गुरपाल किसी हिन्दू लड़की के साथ घूमता फिरता है तो उसको अच्छा न लगा। पर उसको एक बात का धैर्य था कि “गुरपाल है बड़ा समझदार। उसने सोच समझ कर ही यह फैसला किया होगा?…

अभी यह विरोध चल ही रहा था कि गुरपाल और कामिनी गायब हो गये। उन्होंने चुपचाप शादी कर ली। पूरा साल वे किसी को दिखाई नहीं दिए। पर असलम को वे मिलते और सब कुछ बता देते।

साल बाद उनके घर एक बेटी ने जन्म लिया। कामिनी ने उसका नाम सरस्वती रखना चाहा। उसने शुरू से ही यह सपना देखा था और सोचा था अगर बेटी हुई तो सरस्वती ही नाम रखेगी पर गुरपाल ने उसका नाम तानिया रखा। चाहे कामिनी को अच्छा न लगा हो।

धीरे-धीरे जिन्दगी अपनी रफ्तार से दोबारा चलने लगी। दोनों घर वाले भी मान गए। अब क्या हो सकता था?

अब जब भी कामिनी के घर वाले आते हमेशा कामिनी के कमरे में घुस कर खुसर-फुसर करते रहते। गुरपाल को यह बात तो बुरी लगती। पर वह समझता कि यह कामिनी का मसला है।

गुरपाल के बुजुर्ग जब आते बस हालचाल पूछते। जो भी बहू खिलाती खा लेते। जहां सुलाती सो जाते। वह आते भी बहुत कम थे। गांव से शहर आना कौन सा आसान था।

पर गुरपाल और कामिनी खुश थे। जिन्दगी अपनी रवानगी के साथ चल रही थी। कामिनी कॉलेज में पढ़ाती थी और गुरपाल सचिवालय में काम करता था।

एक दिन आतंकवादियों ने उससे एक फाइल मांगी। उसके इनकार करने पर उन्होंने उसे उसी जगह ढेर कर दिया।

इन्हीं खयालों में कीरतपुर आ गया। उन्होंने वहां पहुंच कर फूल प्रवाह किए। गुरपाल के पिता ने असलम का कंधा पकड़ कर कहा, “काका जल्दी वापिस चलें। जाकर पाठ भी रखवाना है। वाहेगुरु का नाम लेंगे तभी गुरपाल की आत्मा को शांति मिलेगी।”

और वह असलम के कंधे पर सिर रख कर रो पड़ा। असलम उसे चुप करा रहा था तो गुरपाल के पिता को लगा जैसे उसे गुरपाल ही चुप करा रहा हो।

जब वह घर पहुंचे तो कामिनी के पिता ने क्रिया का सारा प्रबन्ध कर रखा था। कार्ड भी छप गये थे। पंडित भी बुक कर लिया था।

गुरपाल का पिता कुछ न बोल सका। बस हैरान होकर सब देखता और सोचता रहा कि “यह काम तो उसे करना था? गुरपाल का पिता तो वह है। पर यह सब क्या?” पर सब देखते और सोचता रहा कि वह अपने गांव जाकर पाठ जरूर रखवाएगा।

जैसे-जैसे पेड़ पीछे छूटते जा रहे थे, असलम को लगा बहुत कुछ पीछे रह गया है। उसको लगा जैसे वह इन पेड़ों से पूछ रहा हो कि “तानिया की शादी गुरुद्वारे में होगी या मन्दिर में?”

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