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bhootnath by devkinandan khatri

दारोगा के चले जाने के बाद थोड़ी देर तक वहाँ सन्नाटा रहा, इसके बाद उन तीनों में इस तरह बातचीत होने लगी-

जमना : देखो बहिन, जमाने ने कैसा पलटा खाया है!

सरस्वती : बहिन, किस्मत ने तो बहुत दिनों से पलटा खाया हुआ है, यह कहो कि उतना दु:ख देकर भी विधाता को चैन न पड़ा और अब वह अपनी निर्दय आँखों के सामने एकदम से ही हम लोगों का निपटारा किया चाहता है। दुनिया में लोग किस तरह कहाकरते हैं कि धर्म की सदा जय रहता है?

भूतनाथ नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1

जमना : हाय, अब मैं क्या करूँ? मेरी समझ में कुछ भी नहीं आता। (इन्दुमति से) बहिन, तुम चुप क्यों हो? तुम ही कुछ बताओ कि अब क्या किया जाय? इस कैदखाने से छुटकारा मिलना तो बड़ा कठिन जान पड़ता है।

इन्दुमति : बहिन, मैं क्या कहूँ? मेरी किस्मत तो बिलकुल ही फूटी हुई है, मैं इस योग्य कहाँ हूँ कि कुछ राय दूँ!

जमना : नहीं बहिन, तुम्हारी किस्मत फूटी हुई नहीं थी बल्कि मेरे साथ आ रहने ही से तुम्हारे भी किस्मत फूट गई, बदकिस्मत के साथ रहने वाला भी कुछ दिन में बदकिस्मत हो जाता है, मेरी ही संगत में तुम्हें भी बर्बाद कर दिया। आह, हम दोनों बहिनें वास्तव में…

सरस्वती : अब इन बातों के सोचने-विचारने का यह समय नहीं है, इस समय अपना कर्तव्य सोचना और बहुत जल्द निश्चय करना चाहिए कि जब थोड़ी देर में दारोगा आवेगा तो उसे क्या जवाब दिया जाएगा, हाय, हम लोगों की नादनी और जल्दबाजी ही के सबब से यह बुरा दिन देखना नसीब हुआ, नहीं तो बड़े मजे में उस घाटी के अन्दर हम लोग पड़े हुए थे, अगर थोड़े दिन और प्रकट न होते तो अच्छा था, शीघ्रता से उछल पड़े, यही बुरा हुआ।

जमना : (ऊँची साँस लेकर) खैर जो हुआ सो हुआ।

सरस्वती : मेरी राय में तो अब दारोगा की बात मान ही लेनी चाहिए।

जमना : वह जरूर कहेगा कि तुम एक चिट्ठी लिख दो कि भूतनाथ बेकसूर है इत्यादि इत्यादि।

सरस्वती : बेशक ऐसा लिखने के लिये कहेगा, परन्तु यह बताओ कि इस कैद में पड़े सड़ने से ही लाभ क्या है? हाँ कुछ उम्मीद हो तो कहो।

जमना : उम्मीद तो कुछ भी नहीं है।

सरस्वती : बस फिर, जो कुछ दारोगा कहे सो लिख दो और भूतनाथ से सुलह करके बखेड़ा तै को, अपने साथ क्यों बेचारी इन्दुमति और प्रभाकर सिंह जी को जहन्नुम में मिला रही हो?

जमना : और अगर उसकी इच्छानुसार लिख देने पर भी वह बदल जाय अर्थात् अपना काम पूरा करके हम लोगों को मार डाले तब?

सरस्वती : तब क्या? जो होगा सो होगा, उसकी बात न मानने से तो निश्चय है कि वह हम लोगों को कभी जीता न छोड़ेगा, और लिख देने पर आशा होती है कि शायद वह अपने कौल का सच्चा निकले और हम लोगों पर रहम करे!

जमना : हाँ, सो हो सकता है (कुछ गहरी चिंता करके) अच्छा निश्चय हो गया कि ऐसा ही किया जाएगा अर्थात् जो कुछ दारोगा कहेगा उसे मंजूर कर लेंगे।

सरस्वती : (ऊपर की तरफ हाथ उठा कर) हे ईश्वर, क्या हम लोगों के पाप का प्रायश्चित्त नहीं है? क्या हम लोग इस योग्य नहीं हैं कि तू हम लोगों पर दया करे? तू तो बड़ा दयालु कहलाता है। क्या इस समय हमारे लिये यहाँ कोई मददगार नहीं भेज सकता!

कुछ देर तक जमना और सरस्वती में इसी तरह की और भी बातें होती रहीं, इसके बाद समय पूरा हो जाने पर कैदखाने का दरवाजा खुला और तिलिस्मी दारोगा किताब बंद करता हुआ आकर उन तीनों के सामने खड़ा हो गया।

दारोगा : कहो क्या निश्चय किया?

जमना : हम लोगों को क्या निश्चय करना है, जो कुछ कहोगे करने के लिये तैयार हैं।

दारोगा : शाबाश, यही बुद्धिमानी है, अच्छा तो तुम अपने हाथ से एक चिट्ठी भूतनाथ के नाम की लिख दो जिसमें यह मजमून होना चाहिए- “मेरे प्यारे गदाधरसिंह,

बड़े अफसोस की बात है कि तुम अभी तक हमारे पति के घातक का पता लगा कर वादा पूरा न कर सके। मुझे पता लग चुका है कि दलीपशाह मेरे पति का घातक है, इसके लिये मुझे कोई सबूत मिल चुके हैं, अब तुम शीघ्र मेरे पास आओ तो मैं वह सबूत तुम्हें दिखाऊँ। आशा है कि उसके सहारे तुम जल्द असली बात का पता लगा लोगे।”

बस इसी मजमून का पत्र लिख दो और तुम दोनों बहिन उस पर अपना हस्ताक्षर भी कर दो, कलम-दवात और कागज मैं अपने साथ लेता आया हूँ।

जमना : (कुछ बिगड़ कर) वाह वाह, क्या खूब! तुम तो ऐसी बात लिखाना चाहते हो जिससे कि मैं जीती रहकर भी किसके आगे मुँह न दिखा सकूँ। इससे तो साफ जाहिर होता है कि ये बातें लिखाने के बाद तुम हम लोगों को मार डालोगे। बेशक ऐसी ही बात है। दलीपशाह बेचारे ने मेरा क्या बिगाड़ा है जो मैं उसे इस तरह हलाल करूँ?

दारोगा : ऐसा लिखने में तुम्हारा कोई नुकसान नहीं है, और बिना इस तरह पर लिखे तुम्हें छुटकारा भी नहीं मिल सकता।

जमना : चाहे जो हो, मगर मैं दलीपशाह के बारे में कदापि ऐसा न लिखूँगी, वह बेचारा बिलकुल निर्दोष है।

दारोगा : देखो नादानी मत करो और मुफ्त में अपने साथ इन्दुमति और प्रभाकर सिंह की भी जान मत लो।

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जमना : अब जो किस्मत में लिखा है सो होगा मगर मैं ऐसा अँधेर नहीं कर सकती।

दारोगा : खैर जब तुम्हें यही धुन समाई हुई है तो देखो तुम्हारे साथ कैसा सलूक किया जाता है! अच्छा मैं जाता हूँ, थोड़ी देर में बंदोबस्त करके पुन: आऊँगा।

इतना कहकर दारोगा वहाँ से चला गया और आधे घंटे के बाद पुन: लौट आया, अबकी दफे और भी दो आदमी उसके साथ थे जिनके चेहरों पर स्याह नकाब और हाथ में नंगी तलवारें थीं।

दारोगा ने पुन: उसी सुरंग को दरवाजा खोला जिसमें जमना, सरस्वती और इन्दुमति को प्रभाकर सिंह के कैद की अवस्था दिखाने के लिए ले गया था, इसके बाद दोनों नकाबपोशों से कुछ कहा जिसके सुनते ही वे जमना, सरस्वती और इन्दुमति के पास चले गये और उन तीनों को खंभे से खोल उसी सुरंग में ले गये। वह खिड़की खोल दी गई थी जिसमें से पहिले दफे उन तीनों ने झाँक कर प्रभाकर सिंह को देखा था। दारोगा की आज्ञानुसार दोनों नकाबपोशों ने जमना, सरस्वती और इन्दुमति को उस खिड़की के पास खड़ा कर दिया और स्वयं नंगी तलवार लिए उनके पीछे खड़े हो गये। उस समय दारोगा ने पुन: उन तीनों से कहा, “एक दफे फिर नीचे की तरफ झाँक कर अपने प्रभाकर सिंह की दुर्दशा देखो। मैं उनके पास जाता हूँ और तुम्हारे देखते-ही-देखते उनका काम तमाम करता हूँ।”

इतना कह दारोगा वहाँ से चला गया और ये तीनों बड़ी ही बेचैनी के साथ नीचे की तरफ देखने और रक्षा के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने लगी।

हथकड़ी-बेड़ी से मजबूर और पेड़ के साथ बँधे हुए प्रभाकर सिंह सिर झुकाए जमीन की तरफ देख रहे थे जिस समय हाथ में नंगी तलवार लिए दारोगा उनके पास पहुँचा।

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