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bhootnath by devkinandan khatri

जब इंदु होश में आई और उसने आँखें खोलीं तो अपने को एक सुन्दर मसहरी पर पड़े पाया और मय सामान कई लौडियों की खिदमत के लिए हाजिर देखकर ताज्जुब करने लगी।

आँख खुलने पर इंदु ने एक ऐसी औरत को भी अपने सामने इज्जत के साथ बैठे देखा जिसे अब हकीमिन जी के नाम से संबोधन करती थी और जिसके विषय में जाना गया कि वह इंदुमति का इलाज कर रही है।

निःसन्देह इंदुमति को गहरी चोट लगी थी और उसे करवट बदलना भी बहुत कठिन हो रहा था। उसे इस बात का बड़ा ही दुःख था कि वह जीती बच गई और दुश्मनों के हाथ में फँस गई, परन्तु उस समय जितनी औरतें वहाँ मौजूद थीं, सभी खूबसूरत, कमसिन, खुशदिल, हँसमुख और हमदर्द मालूम होती थीं। सभी को इस बात की फिक्र थी कि इंदुमति शीघ्र अच्छी हो जाय और उसे किसी तरह की तकलीफ न रहे। सभी प्यार के साथ उसकी खिदमत करती थीं, दिल बहलाने की बातें करती थीं, और कई उसके पास बैठी सर पर हाथ फेरती हुई प्रेम से पूछतीं कि ‘कहो बहन, मिज़ाज कैसा है? अब तुम किसी बात की चिंता न करो, यह घर तुम्हारे दुश्मनों का नहीं है बल्कि दोस्तों का है जो कि बहुत जल्द तुम्हें मालूम हो जाएगा कि दुश्मनों के हाथों से तुम किस तरह छुड़ा ली गई। जरा तुम्हारी तबीयत अच्छी हो जाय तो मैं सब राम कहानी कह सुनाऊँगी, तुम किसी तरह की चिंता न करो’! इत्यादि!

इन बातों से मालूम होता था कि ये सब-की-सब लौंडी ही न थी बल्कि अच्छे खानदान की लड़कियाँ थीं और दो-एक तो ऐसी थीं जो बराबरी का (बल्कि उससे भी बढ़कर होने का) दावा रखती थीं।

यह सब कुछ था परन्तु इंदुमति को इस बात ठीक पता नहीं लगता था कि वह वास्तव में दुश्मनों की मेहमान है या दोस्तों की। यद्यपि उसकी हर तरह से खिदमत होती थीं, उसकी खातिरदारी की जाती थी, उसे भरोसा दिलाया जाता था और जिससे वह खुश हो, वह करने के लिए सब तैयार रहती थीं, यह सब कुछ था मगर फिर भी उसके दिल को भरोसा नहीं होता था।

इसी तरह समय बीतता गया और इंदु की तबीयत सम्हलती गई। उसे होश में आये आज तीसरा दिन है, दर्द में भी बहुत कमी है और वह दस-बीस कदम टहल भी सकती है। आज ही उसने कुछ थोड़ा-बहुत भोजन भी लिया है और इस फिक्र में तकिए का सहारा लगाए बैठी है कि आज किसी-न-किसी तरह इस बात का निश्चय जरूर करूँगी कि वास्तव में मैं किसके कब्जे में हूँ।

उसकी खातिर करने वालियों में दो औरतें ऐसी थीं जिन पर इंदु का भरोसा हो गया था और जिन्हें इंदु सबसे बढ़कर उच्च कुल की नेक और होनहार समझती थी। एक का नाम कला और दूसरी का नाम बिमला था। सबसे ज्यादा ये ही दोनों इंदु के साथ रहा करती थीं।

रात पहर भर से कुछ ज्यादा जा चुकी थी। चिंता निमग्न इंदु अपनी चारपाई पर लेटी हई तरह-तरह की बातें सोच रही थीं। उसी के पास दो चारपाइयाँ और बिछी हई थीं जो कला और बिमला के सोने के लिए थीं। कला अपनी चारपाई पर नहीं बल्कि इंदु के पास उसकी चारपाई का ढासना लगाये बैठी हुई थी मगर बिमला अभी तक यहाँ आई न थी। कई सायत तक सन्नाटा रहने के बाद इंदु ने बातचीत शुरू की।

इंदुमति : कला, कुछ समझ नहीं आता कि तू मुझसे यहाँ का भेद क्यों छिपाती है और साफ-साफ क्यों नहीं कहती कि यह किसका मकान है?

कला : बहिन, मैं जो तुमसे कह चुकी कि यह तुम्हारे दुश्मन का मकान नहीं है बल्कि तुम्हारे दोस्त का है तो फिर क्यों तरद्दुद करती हो?

इंदुमति : तो क्या मैं अपने दोस्त का नाम नहीं सुन सकती? आखिर नाम छिपाने का सबब ही क्या है?

कला : छिपाने का सबब केवल इतना ही है कि यहाँ का हाल सुनकर जितना तुम्हें आनन्द होगा उतना ही बल्कि उससे ज्यादा दुःख होगा और हकीमिन जी का हुक्म है कि अभी तुम्हें कोई ऐसी बात न कही जाय जिससे रंज हो।

इंदुमति : यह कोई बात नहीं है, अगर है तो हकीमिनजी का केवल नखरा है और तुम लोगों का बहाना।

कला : अगर तुम ऐसा ही समझती हो तो लो आज मैं वह सब हाल कह दूँगी, मगर शर्त यह है कि सिवाय बिमला के और किसी को भी मालूम न हो कि मैंने तुमसे कुछ कहा था।

इंदुमति : नहीं-नहीं, मैं कसम खाकर कहती हूँ कि अपनी जुबान से किसी से भी कुछ न कहूँगी।

कला : अच्छा तो कुछ रात बीत जाने दो और बिमला को भी आ जाने दो।

इतने ही में बिमला ने भी चौखट के अन्दर पैर रखा!

इंदुमति : लो बिमला भी आ गई।

कला : अच्छा हुआ मगर जरा सन्नाटा हो जाने दो!

बिमला : (कला के पास बैठ कर) क्या बात है?

कला : (धीरे से) ये यहाँ का हाल जानने के लिए बेताब हो रही हैं।

बिमला : इनका बेताब होना उचित ही है मगर (इंदु की तरफ देख के) आप तंदुरुस्त हो जाती तब इसे पूछतीं तो अच्छा था नहीं तो…

इंदुमति : यही हठ तो और भी उत्कंठित करती है।

बिमला : सुनने से आपको जितनी खुशी होगी उससे ज्यादा रंज होगा।

इंदमति : बला से, जो होगा देखा जाएगा! मगर (उदासी से) तुमसे तो मुझे ऐसी आशा नहीं थी कि…

बिमला : (इंदु का हाथ प्रेम से दबाकर) बहिन, मैं तुमसे कोई बात नहीं छिपाऊँगी, कहूँगी और जरूर कहूँगी।

इंदुमति : तो फिर कहो।

बिमला : अच्छा सुनो मगर किसी के सामने इस बात को कभी दोहराना मत।

इंदुमति : कदापि नहीं।

बिमला : अच्छा खैर…यह बताओ कि तुम्हें अपना मायका (बाप का घर) छोड़े कितने दिन हुए?

इंदुमति : (कुछ सोच के) लगभग एक वर्ष और सात महीने के हुए होंगे, शादी भई और मायका छूटा। तब से आज तक दुःख-ही-दुःख उठाती रही। मैं अपनी माँ और मौसेरी बहिनों को फूट-फूट कर रोती हुई छोड़ कर पति के साथ रवाना हुई थी, वह दिन कभी भूलने वाला नहीं।

इतना सुनते ही कला और बिमला की आँखों में आँसू आ गये।

बिमला : (आँसू पोंछ कर) मुझे भी वह दिन नहीं भूलने का!

इंदुमति : (आश्चर्य से) बहिन, तुम्हें वह दिन कैसे याद है, तुम वहाँ कहाँ थीं?

बिमला : मैं थी और जरूर थी, बल्कि हम दोनों बहनें (कला की तरफ इशारा करके) वहाँ थीं।

इंदुमति : सो कैसे, कुछ कहो भी तो।

बिमला : बस इतना ही तो असल भेद है, सब बातें इसी से संबंध रखती हैं। (धीरे से) तुम्हारी वे दोनों मौसेरी बहिनें हम दोनों कला और बिमला के नाम से आज साल-भर से यहाँ निवास करती हैं। यद्यपि देखने में हर तरह से सुख भोग रही हैं मगर वास्तव में हमारे दुःख का कोई पारावार नहीं!

इंदुमति : (बड़े ही आश्चर्य से) यह तो तुम ऐसी बात कहती हो कि जिसका स्वप्न में भी गुमान नहीं हो सकता! यद्यपि तुम दोनों की उम्र वही होगी, चाल-ढाल, बातचीत सब उसी ढंग की है, मगर सूरत-शक्ल में जमीन-आसमान का फर्क है, ओह! नहीं, यह कैसे हो सकता है। मुझे कैसे विश्वास हो सकता है?

बिमला : (मुसकराकर) हम दोनों की सूरत-शक्ल में भी किसी तरह का फर्क नहीं पड़ा। मैं सहज ही में विश्वास दिला दूंगी कि जो कुछ कहती हूँ वह बाल-बाल सच है। अच्छा ठहरो, मैं तुम्हें अभी बता देती हूँ।

इतना कहकर बिमला उठी और उसने इस कमरे के कुल दरवाजे बंद कर दिए।

इंदु जबसे यहाँ आई है तब से इसी कमरे में है, उसे इसके बाहर का हाल कुछ भी मालूम नहीं है, वह नहीं जानती कि इस कमरे के बाहर कोठरी है या दालान, बारहदरी है या सायबान, पहाड़ है या बियाबान। होश में आने के बाद उसमें अभी बाहर निकलने की ताकत ही नहीं आई। हाँ, इसके भीतर की तरफ दो कोठरी, एक पायखाना और एक नहाने का घर है, इन्हें इंदु जरूर जानती है क्योंकि इन कोठरियों से उसे वास्ता पड़ चुका है।

बिमला इंदु के पास से उठकर दरवाजा बंद करने के बाद उसी नहाने वाली कोठरी में चली गई और थोड़ी ही देर में लौटकर मुसकराती हुई इंदु के पास आई और बोली, “अब तुम मुझे गौर से देखो और पहचानो कि मैं कौन हूँ!”

यद्यपि इंदु बीमार, कमजोर और हतोत्साह थी तथापि बिमला की नवीन सूरत देखते ही चौकी और उठकर गले से लिपट गई।

बिमला : बस समझ लो कि इसी तरह कला भी सूरत बदले हुए हैं। हम दोनों बहनें एक साथ एक ही अनुष्ठान साधन के लिए सूरत बदल कर ग्रहदशा के दिन काट रही हैं। जब तक कमबख्त भूतनाथ से बदला न ले लेंगी तब तक…

इंदुमति : (बिमला को छोड़ कर) अहा! मुझे कब आशा थी कि इस तरह अपनी बहिन जमना, सरस्वती को देगी, मगर भूतनाथ…

कला : (बिमला से) बस बहिन, अब बातें पीछे करना पहिले अपनी सूरत बदलो और उस झिल्ली को चढ़ाकर बिमला बन जाओ, दरवाजे खोल दो और आराम से बातें करो।

बिमला उठी और पुन: उसी कमरे में जाकर अपनी सूरत पहिले जैसी बनाकर लौट आई। काम केवल इतना ही था कि एक अद्भुत झिल्ली जो अपने चेहरे से उतारी थी फिर चढ़ाकर जैसी-की-तैसी बन बैठी। कला ने कमरे के दरवाजे खोल दिए और आराम के साथ बैठकर फिर तीनों बातचीत करने लगीं।

इंदुमति : बहिन, तुमसे मिलकर मैं बहुत प्रसन्न हुई, अब तुम अपना हाल कह जाओ और यह बताओ कि यह मकान किसका है, मेरी मौसी का या मेरी माँ का!

बिमला : दोनों में किसी का भी नहीं।

इंदुमति : (ताज्जुब से) तो क्या तुम दोनों लावारिस हो गईं? कोई तुम्हारा मालिक नहीं रहा?

बिमला : रहा और नहीं भी रहा!

इंदुमति : सो कैसी बात? यह मैं जानती हूँ कि दयारामजी के मरने से तुम दोनों विधवा हो गईं क्योंकि भाग्यवश दोनों बहिनें एक ही साथ ब्याही गई थीं फिर भी हम लोगों के माँ-बाप ऐसे गए-गुजरे नहीं कि हम लोग लावारिस समझी जायें।

बिमला : (अपनी आँखों से आँसू पोंछ कर) नहीं लावारिस तो नहीं हैं मगर अभागी और दैव की सताई हुई जरूर हैं। हम दोनों बहिनों को मालूम हो गया कि हमारे निर्दोष पति को गदाधरसिंह ने मारा है और बस यही जान लेना हमारी इस ग्रहदशा का कारण है।

इंदुमति : (चौंककर) हैं! कौन गदाधरसिंह?

बिमला : वही जो हमारे ससुर का ऐयार और हमारे पति का दिलीदोस्त कहलाता है।

इंदुमति : (बड़े ही आश्चर्य से) यह बात तबीयत में नहीं जमती। ऐयारी के फन से यह बिलकुल ही विरुद्ध है। ऐयार चाहे कैसा ही बेईमान क्यों न हो मगर मालिक के साथ ऐसा फरेब कभी नहीं करेगा और गदाधरसिंह तो एक नेक ऐयार गिना जाता है, एक दफे मैंने भी उसकी सूरत देखी है।

बिमला : बहिन, बेशक् ऐसा ही है। यद्यपि अभी किसी को इस बात की खबर नहीं है, यहाँ तक कि मेरे माँ-बाप और ससुर को भी इस बात का विश्वास नहीं हो सकता मगर मुझे तो जो कुछ पता लगा है वह यही है और बहुत ठीक भी है।

कला : और इतना भी मैं कहूँगी कि मेरे ससुर को भी इस बात का शक जरूर हो गया, खास करके तब से जबसे गदाधरसिंह ने अपना काम या हमारे यहाँ का रहना एक प्रकार से छोड़ दिया है, यद्यपि हमारे ससुर इस विचार को प्रकट नहीं करते।

बिमला : इस समय वही गदाधरसिंह तुम्हारा रक्षक बना है और भूतनाथ के नाम से तुम्हारे साथ दोस्ती दिखलाता है, मगर हम दोनों कब उस पर विश्वास करने लगीं!

इंदुमति : (चौंक कर) हैं!! क्या वही गदाधरसिंह भूतनाथ बना है?

बिमला : हाँ वही भूतनाथ है जिसके फंदे से बचाकर मैं तुमको यहाँ ले आई।

कला : बहिन, हम दोनों वे बातें जानती हैं जो अभी दुनिया में किसी को मालूम नहीं हैं या अगर मालूम हैं भी तो केवल दो ही चार आदमियों को।

बिमला : मैं भी भूतनाथ को वह मजा चखाऊँगी कि उसे नानी याद आ जाएगी और वह समझ जाएगा कि दुनिया में औरतें कहाँ तक कर सकती हैं।

इंदुमति : तुम्हारी बातों ने तो मुझे पागल बना दिया! मैं वे बातें सुन रही हूँ जिसके सुनने की आशा न थी। तो तुम यह भी कहोगी कि गुलाबसिंह ने भी हम लोगों के साथ दगा की और जान-बूझकर हम दोनों को भूतनाथ के हवाले कर दिया?

बिमला : कौन गुलाबसिंह?

इंदुमति : वही गुलाबसिंह, भानुमति वाला।

बिमला : (कुछ सोचकर) इस विषय में मैं कुछ नहीं कह सकती, क्योंकि अभी तक मैंने तुम्हारी जुबानी तुम्हारा हाल कुछ भी नहीं सुना। मैं नहीं जानती कि तुम क्यों कर घर से निकलीं, तुम पर क्या आफतें आईं, और गुलाबसिंह ने तुम्हारे साथ क्या सलूक किया। तथापि गुलाबसिंह पर शक करने की इच्छा नहीं होती क्योंकि वह बड़ा नेक और ईमानदार आदमी है तथा हमारे घर के कई एहसान भी उसके ऊपर हैं यदि वह मानें। यों तो आदमी का ईमान बिगड़ते कुछ देर नहीं लगती क्योंकि आदमी का शैतान हरदम आदमी के साथ रहता है।

इंदुमति : ठीक है, अच्छा मैं भी अपना हाल कह सुनाऊँगी मगर पहिले यह सुन लूँ कि क्यों कर यहाँ आई हो क्यों कर तुमने मुझे दुश्मनों के हाथ से बचाया है।

बिमला : हाँ-हाँ, मैं कहती हूँ सुनो। अच्छा यह बताओ कि तुम उन दुश्मनों को जानती हो जिनके हाथ में फंसी थीं?

इंदुमति : नहीं, बिलकुल नहीं।

बिमला : वे महाराज शिवदत्त के आदमी थे!

इंदुमति : ओफ ओह, जिसके खौफ से हम लोग भागे हुए थे! मगर अभी तुम कह चुकी हो कि मैंने तुम्हें भूतनाथ के हाथ से बचाया है।

बिमला : हाँ, बेशक् वैसा भी कह सकते हैं क्योंकि भूतनाथ तो हम लोगों का सबसे बड़ा दुश्मन ठहरा, मगर इधर तुम शिवदत्त ही के आदमियों के हाथ में फंसी थीं। इत्तिफाक से हम लोग भी उसी समय वहाँ जा पहुँचे और लड़-भिड़ कर उन लोगों के हाथ से तुम्हें छुड़ा लाए। बस यही तो मुख्तसर हाल है।

इंदुमति : (आश्चर्य से) तुममें इतनी ताकत कहाँ से आ गई कि उन लोगों से लड़ कर मुझे छुड़ा लाई?

बिमला : (मुसकुराती हुई) हाँ इस समय मुझमें इतनी ताकत है। मेरे पास दो ऐयार हैं तथा बीस-पच्चीस सिपाही भी रखती हूँ।

इंदुमति : तो ये सब तुम्हारे बाप या ससुर के नौकर होंगे? जरूरत पड़ने पर तुम्हें उनसे इजाजत लेनी पड़ती होगी?

बिमला : (एक लंबी साँस लेकर) नहीं बहिन, ऐसा नहीं है। हम दोनों अपने घर और ससुराल से मंजिलों दूर पड़े हुए हैं। हम लोगों की किसी को कुछ खबर ही नहीं बल्कि यों कहना कुछ अनुचित न होगा कि अपने नातेदारों के खयाल से हम दोनों बहिनें मर चुकी हैं और किसी को खोजने या पता लगाने की भी जरूरत नहीं।

इंदुमति : (आश्चर्य से) तुम्हारी बातें तो बड़ी ही विचित्र हो रही हैं। अच्छा तो तुम यहाँ किसके भरोसे पर बैठी हो और तुम्हारा मददगार कौन है?

बिमला : यह बहुत ही गुप्त बात है, तुम भी किसी से इसका जिक्र न करना। मैं यहाँ इन्द्रदेव के भरोसे पर हूँ। वही मेरे मददगार हैं और यह उन्हीं का स्थान है। वही मेरे बाप हैं, वही मेरे ससुर हैं, और इस समय वहीं मेरे पूज्य इष्टदेव हैं!

इंदुमति : कौन इन्द्रदेव?

बिमला : वही तिलिस्मी इन्द्रदेव! मेरे ससुर के सच्चे मित्र!!

इंदुमति : (सिर हिला कर) आश्चर्य! आश्चर्य!! और तुम्हारे ससुर को इस बात की खबर नहीं है।

बिमला : हाँ बिलकुल नहीं है।

इंदुमति : यह कैसी बात है?

बिमला : ऐसी ही बात है। मैं जो कह चुकी कि उन लोगों के खयाल से हम दोनों इस दुनिया में नहीं है।

इंदमति : आखिर उन्हें इस बात का विश्वास कैसे हुआ कि जमना और सरस्वती मर गईं?

बिमला : सो मैं नहीं जानती क्योंकि यह कार्रवाई इन्द्रदेव जी की है, मैं सूर्यमासी (इन्द्रदेव की स्त्री) के यहाँ न्यौते में आई थी, उसी जगह उन्होंने (इन्द्रदेव ने) मुझे गुप्त भाव से बताया कि भूतनाथ ने मेरे पति के साथ कैसा सलूक किया। मालूम होते ही मेरे तन-बदन में आग-सी लग गई और मैंने उसी समय उनके सामने प्रतिज्ञा की कि ‘भूतनाथ से इसका बदला जरूर लूंगी।’ (एक लंबी साँस लेकर) गुस्से से प्रतिज्ञा तो कर गई मगर अब विचारा तो कहाँ मैं और कहाँ भूतनाथ। पहाड़ और राई का मुकाबला कैसा? ऐसा खयाल आते ही मैं इन्द्रदेव के पैरों पर गिर पड़ी और बोली कि ‘मेरी इस प्रतिज्ञा की लाज आपकी है, बिना आपकी मदद के मेरी प्रतिज्ञा पूरी नहीं हो सकती और वैसी अवस्था में मुझे आपके सामने ही प्राण दे देना पड़ेगा’ इत्यादि।

इन्द्रदेव को भी इस अनुचित घटना का बड़ा दुःख था परन्तु मेरी उस अवस्था ने उन्हें और दुःखित कर दिया तथा मेरी प्रार्थना पर उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया बल्कि मेरी प्रतिज्ञा पूरी करना उन्होंने आवश्यक और धर्म समझ लिया। बस फिर क्या था, मेरे मन की भई! जैसा कि मैं चाहती थी उससे बढ़कर उन्होंने मुझे मदद दी और सच तो यह है कि उनसे बढ़कर इस दुनिया में मुझे कोई मदद दे ही नहीं सकता। खैर मैं खुलासा हाल फिर कभी सुनाऊँगी, मुख्तसर यह है कि उन्होंने हर प्रकार की मदद करने का बंदोबस्त करके हम दोनों को समझाया कि अब किसी तरह की जिंदगी हम दोनों को अख्तियार करनी चाहिए।

सबसे पहिले इन्द्रदेव जी ने यही बताया कि ‘प्रकट में तुम दोनों बहिनों को इस दुनिया से उठ जाना चाहिए अर्थात् तुम्हारे रिश्तेदारों के साथ-ही-साथ और सभी को यह मालूम हो जाना चाहिए कि जमना और सरस्वती मर गईं। यह बात मुझे पसन्द आई। आखिर इन्द्रदेव ने हम दोनों की सूरत बदलकर रहने और अपना काम करने का बंदोबस्त करके न मालूम हमारे रिश्तेदारों को कैसे क्या समझा दिया और क्यों कर विश्वास दिला दिया कि सब कोई हमारी तरफ से निश्चिन्त हो गए। उनकी इच्छानुसार बहुत ही गुप्त भाव से हम दोनों यहाँ कला और बिमला के नाम से रहती हैं। जो लोग हमारे साथ हैं वे सब इन्द्रदेव जी के आदमी हैं मगर उनको भी यह नहीं मालूम है कि हम दोनों वास्तव में जमना और सरस्वती हैं!

इंदुमति : (आश्चर्य से) क्या तुम्हारे घर में जितने आदमी हैं उनमें से किसी को भी तुम्हारा सच्चा हाल मालूम नहीं है?

बिमला : किसी को भी नहीं।

इंदुमति : तो फिर मेरे बारे में तुमने लोगों को क्या समझाया है?

बिमला : मैंने यही किसी को भी नहीं कहा कि तुम मेरी रिश्तेदार हो, केवल यही कहा कि तुम्हें भूतनाथ तथा शिवदत्त के हाथ से बचाना हमारा धर्म है। अस्तु अब उचित यही है कि हमारी तरह तुम भी अपनी सूरत बदल कर यहाँ रहो और अपने दुश्मनों से बदला लो, हम लोगों का बाकी हालचाल तुम्हें आप ही धीरे-धीरे मालूम हो जाएगा।

इंदुमति : ठीक है, और जैसा तुम कहती हो मैं वैसा ही करूँगी, मगर (सिर झुका कर) मेरे पति का मुझसे…

बिमला : (बात काट कर) नहीं-नहीं, उनके बारे में तुम कुछ भी चिंता मत करो, आज मैं उनको तुम्हें जरूर दिखा दूंगी और फिर ऐसा बंदोबस्त करूँगी कि तुम दोनों एक साथ…

इंदुमति : (प्रसन्न होकर) इससे बढ़ कर मेरे लिए और कोई दूसरी बात नहीं हो सकती, मगर यह तो बताओ कि इस समय वे कहाँ हैं?

बिमला : (मुसकुराती हुई) इस समय वे मेरे ही घर में हैं और मेरे कब्जे में हैं।

इंदुमति : (घबराकर) यह कैसी बात? अगर यहीं हैं तो मुझे दिखाओ।

बिमला : मैं दिखाऊँगी, मगर जरा रुकावट के साथ।

इंदुमति : सो क्यों?

बिमला : (कुछ सोच कर) अच्छा चलो पहिले मैं तुम्हें उनके दर्शन करा , फिर सलाह-विचार करके जैसा होगा देखा जाएगा। मगर इस सूरत में मैं तुम्हें उनके सामने न ले जाऊँगी।

इंदुमति : सो क्यों?

बिमला : तुम अपनी सूरत बदलो और इस बात का वादा करो कि जब मैं उनके सामने तुम्हें ले जाऊँ तो चुपचाप देख लेने के सिवाय उनके सामने एक शब्द भी मुँह से निकालोगी।

इंदुमति : आखिर इसका सबब क्या है?

बिमला : सबब पीछे बताऊँगी।

इंदुमति : अच्छा तो फिर जो कुछ तुम कहती हो मुझे मंजूर है।

“अच्छा लो मैं बंदोबस्त करती हूँ।” यह कहकर बिमला उठी और कुछ देर के लिए कमरे के बारह चली गई। जब लौटी तो उसके हाथ में एक छोटी-सी संदूकड़ी थी। उसी में से सामान निकालकर उसने इंदुमति की सूरत बदली और वैसी ही एक झिल्ली उसके चेहरे पर भी चढ़ाई जैसी आप पहिरे हुए थी। जब हर तरह से सूरत दुरुस्त हो गई तब हाथ का सहारा देकर उसने इंदु को उठाया और कमरे के बाहर ले गई।

कमरे के बाहर एक दालान था जिसके एक बगल में तो ऊपर की मंजिल में चढ़ जाने के लिए सीढ़ियाँ थीं तथा उसी के बगल में नीचे उतर जाने की रास्ता था और दालान के दूसरी तरफ बगल में सुरंग का मुहाना था मगर उसमें मजबूत दरवाजा लगा हुआ था। इंदु को उसी सुरंग में बिमला के साथ जाना पड़ा।

सुरंग बहुत छोटी थी, तीस-पैंतीस कदम जाने के बाद उसका दूसरा मुहाना मिल गया जहाँ से सुबह की सफेदी निकल आने के कारण मैदान की सूरत दिखाई दे रही थी। जब इंदुमति वहाँ हद पर पहुंची तब उसकी आँखों के सामने वही सुन्दर घाटी या मैदान तथा बंगला था जिसका हाल हम इस भाग के चौथे बयान में लिख आए हैं या यों कहिए कि जहाँ पर एक पेड़ के साथ लटकते हुए हिंडोले पर प्रभाकर सिंह ने तारा को बैठा देखा था।

वही त्रिकोण घाटी और वही सुन्दर बंगला जिसके चारों कोनों पर मौलसिरी (मालश्री) के पेड़ थे इंदुमति की आँखों के सामने था जिन्हें वह बड़े गौर से देख रही थी बल्कि यों कहना चाहिए कि वहाँ की सुंदरता और कुदरती गुलबूटों ने इंदु की निगाह पड़ने के साथ ही लुभा लिया और इसके साथ ही प्रभाकर सिंह की याद ने आँसू बनकर निगाह के आगे पर्दा डाल दिया।

आँखें साफ करके वह हर एक चीज को गौर से देखने लगी। इसी बीच एक चट्टान पर बैठे हुए प्रभाकर सिंह पर उसकी निगाह पड़ी जिनके चारों तरफ कुदरती सुन्दर पौधे और खुशरंग फूलों के पेड़ बहुतायत से थे जो उदास आदमी के दिल को भी अपनी तरफ खींच लेते थे और जिन पर सूर्य भगवान की ताजी-ताजी किरणें पड़ रही थीं।

आह, प्रभाकर सिंह को देखकर इंदुमति की कैसी अवस्था हो गई यह लिखना हमारी सामर्थ्य के बाहर है। वह कुछ देर तक एकटक उनकी तरफ देखती रही। न तो वहाँ से नीचे की तरफ उतरने का कोई रास्ता था और न वह यही जानती थी कि वहाँ तक क्यों कर पहुँच सकेगी, अस्तु वह बेचैन होकर घूमी और यही कहती हुई बिमला के गले से लिपट गई कि ‘बहिन, तुम बेशक् तिलस्म की रानी हो गई हो’!

बिमला : बहिन, घबड़ाओ मत, जरा गौर से देखो तो…

इंदुमति : (बिमला को छोड़ कर) तो क्या जो कुछ मैं देख रही हूँ केवल भ्रम है?

बिमला : नहीं, ऐसा नहीं है।

इंदुमति : तो फिर यह स्थान किसका है?

बिमला : इस समय तो मेरा ही है।

इंदुमति : तो क्या ये भी तुम्हारे ही मेहमान हैं?

बिमला : बेशक्।

इंदुमति : कब से?

बिमला : कई दिनों से, या यों कहो कि जबसे तुम आई हो उससे भी पहिले…

इंदुमति : (आश्चर्य, दुःख और क्लेश से) तब तुमने इनसे मुझे मिलाया क्यों नहीं बल्कि हाल तक नहीं कहा, ऐसा क्यों?

बिमला : इसके कहने का मौका ही कब मिला! आज ही तो इस योग्य हुई हो कि कुछ बातें कर सकूँ, इसके अतिरिक्त तुम्हारी मुलाकात के बाधक वे स्वयं भी हो रहे हैं। जिस तरह तुम मेरा साथ दिया चाहती हो उस तरह वे मेरा साथ नहीं दिया चाहते, जिस तरह तुमसे मुझे उम्मीद है उस तरह उनसे नहीं, जिस तरह तुम मेरा पक्ष कर सकती हो और करोगी उस तरह वे नहीं करते बल्कि आश्चर्य यह है कि वे भूतनाथ के पक्षपाती हैं और इसी बात का उन्हें हठ है, फिर तुम ही सोचो कि मैं क्यों कर…

इंदुमति : (जोर देकर) नहीं बहिन! ऐसी भला क्या बात है, उन्हें सच्चे मामले की खबर न होगी!

बिमला : सब कुछ खबर है, इसी वास्ते मैं उन्हें यहाँ लाई थी और भूतनाथ के कब्जे से पहिले ही दिन, जब तुम लोग सुरंग में घुसे थे छुड़ाने का उद्योग किया था परन्तु खेद यह है कि वे (प्रभाकर सिंह) तो मेरे कब्जे में आ गए और तुम आगे निकल गईं जिससे तुम्हें इतना कष्ट भी भोगना पड़ा।

इंदुमति : (आश्चर्य से) सो कैसी बात? तुम्हीं ने उन्हें मुझसे जुदा किया था?

बिमला : हाँ ऐसा ही है। (हाथ का इशारा करके) बस इसी घाटी के बगल ही में उस तरफ भूतनाथ का स्थान है, रास्ता भी करीब-करीब मिलता-जुलता है। भूतनाथ की घाटी में जाने के लिए जो रास्ता या सुरंग है उसी में से एक रास्ता हमारे यहाँ भी जाने के लिए है। इसके अतिरिक्त यहाँ आने के लिए एक रास्ता और भी है जिससे प्राय: हम लोग आया-जाया करते हैं। जिस समय तुम लोग भूतनाथ के साथ सुरंग में घुसे थे उस समय मैं देख रही थी।

इंदुमति : फिर तुमने कैसे उन्हें बुला लिया?

इसके जवाब में बिमला ने खुलासा हाल जिस तरह प्रभाकर सिंह को सुरंग के अन्दर धोखा देकर अपने कब्जे में ले आई थी बयान किया जो कि हम चौथे बयान में लिख चुके हैं।

अब हमारे पाठक समझ गए होंगे कि भूतनाथ के पीछे-पीछे सुरंग के अन्दर चलने वाले प्रभाकर सिंह को जिन्होंने धोखा देकर गायब किया वे बिमला और कला यही दोनों बहिनें थीं और यह काम उन्होंने नेकनीयती के साथ किया था ऐसा ही इंदुमति का विश्वास है।

खुलासा हाल सुनकर इंदुमति कुछ देर तक चुप रही फिर बोली-

इंदुमति : अच्छा यह बताओ कि मेरे आने की उन्हें खबर भी है या नहीं?

बिमला : कुछ-कुछ खबर है! तुम्हारे लिए वे बहुत ही बेचैन हैं, कलपते हैं, रोते हैं, मगर फिर भी भूतनाथ का पक्ष नहीं छोड़ते।

इंदुमति : तुमने अपने को उन पर प्रकट कर दिया?

बिमला : हाँ, भेद छिपा रखने की कसम खिलाकर मैंने उन्हें बतला दिया कि हम दोनों बहिनें जमना और सरस्वती हैं जिसे जान कर वे बहुत ही प्रसन्न हुए मगर इस बात पर उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि भूतनाथ मेरे पति के घातक हैं, गुलाबसिंह भूतनाथ का दोस्त है और गुलाबसिंह पर उन्हें पूरा विश्वास है।

इंदुमति : अच्छा तुम मुझे उनके सामने ले चलो, देखें वे क्यों कर राजी नहीं होते और कैसे तुम्हारा साथ नहीं देते।

बिमला : मुझे इसमें कोई उज्र नहीं है मगर तुम हरएक बात को अच्छी तरह सोच-विचार लो।

इंदुमति : (जोर देकर) कोई परवाह नहीं, तुम वहाँ चलो, (कुछ सोचकर) मगर मैं अपनी असली सूरत में उनके सामने जाऊँगी!

बिमला : जैसी तुम्हारी मर्जी, चलो पीछे की तरफ लौटी, एक सुरंग के रास्ते पहिले (उँगली का इशारा करके) उस बीच वाले बंगले में पहुँचना होगा तब उनके पास जा सकोगी।

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