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bhootnath by devkinandan khatri

रात आधी से ज्यादा बीत जाने पर भी कला, बिमला और इंदुमति की आँखों में नींद नहीं है। न मालूम किस गंभीर विषय पर ये तीनों विचार कर रही हैं! संभव है कि भूतनाथ के विषय ही में कुछ विचार कर रही हों, अस्तु जो कुछ हो इनकी बातचीत सुनने से मालूम हो जाएगा।

इंदुमति : (बिमला की तरफ देख कर) बहिन, जब इस बात का निश्चय हो गया कि तुम्हारे पति को गदाधरसिंह (भूतनाथ) ने मार डाला है तब उसके लिए बहुत बड़े जाल फैलाने और सोच-विचार करने की जरूरत ही क्या है? जब वह कमबख्त तुम्हारे कब्जे में आ गया तो उसे मार कर सहज ही में बखेड़ा तै करो!

बिमला : (ऊँची साँस लेकर) हाय बहिन, तुम क्या कहती हो? इस कमीने को यों-ही सहज में मार डालने से क्या मेरे दिल की आग बुझ जाएगी? क्या कहा जाएगा कि मैंने इसे मार कर अपना बदला ले लिया? किसी को मार डालना और बात है और बदला लेना और बात है। इसने मेरे दिल को जो कुछ सदमा पहुँचाया है उससे सौ गुना ज्यादा दुःख और इसे हो तब मैं समझूं कि मैंने कुछ बदला लिया।

इंदुमति : बहिन, तुम खुद कह चुकी हो कि यह बहुत बुरी बला है अस्तु यदि यह तुम्हारे कब्जे से निकल गया या तुम्हारे असल भेद की इसे खबर हो गई तो बहुत बुरा हो जाएगा।

बिमला : बल्कि अनर्थ हो जाएगा। तुम्हारा कहना बहुत कठिन है, मगर उसे हमारा भेद कुछ भी मालूम नहीं हो सकता और न यहाँ से निकल कर भाग ही जा सकता है।

इंदुमति : ईश्वर करे ऐसा ही हो मगर…

कला : कल इन्द्रदेव जी यहाँ आएंगे, उनसे राय करके कोई-न-कोई कार्रवाई बहुत जल्दी हो जाएगी।

बिमला : मैं सोच रही हूँ कि तब तक उसकी (पड़ोस वाली) घाटी पर कब्जा कर लिया जाय, उसका सदर दरवाजा जिधर से वे लोग आते-जाते हैं बंद कर दिया जाय, उसके आदमी सब मार डाले जायें और उसका माल-असबाब सब लूट लिया जाय और इन बातों की खबर भूतनाथ को भी दे दी जाएँ।

इंदुमति : बहुत अच्छी बात है।

बिमला : और इतना काम मैं सहज ही में कर सकूँगी।

इंदुमति : सो कैसे?

बिमला : तुम देखती रहो, सब काम तुम्हारे सामने ही तो होगा।

इंदुमति : हाँ, कल ही इस काम को करके छुट्टी पा लेना चाहिए जिससे इन्द्रदेव जी जाएँ तो उनके दिल को भी ढांढस पहुँचे।

बिमला : कल नहीं आज बल्कि इसी समय उस घाटी का रास्ता बंद कर दिया जाय जिसमें लोग भाग कर बाहर न चले जाएँ।

कला : ऐसा हो जाय तो बहुत अच्छी बात है, मगर दूसरे के घर में तुम इस तरह की कार्रवाई…

बिमला : (मुसकुराकर) नहीं बहिन, तुम व्यर्थ इतना सोच कर रही हो। बात यह है कि जिस तरह यह स्थान और घाटी जिसमें हम लोग रहती हैं इन्द्रदेव जी के अधिकार में है, उसी तरह वह घाटी भी जिसमें भूतनाथ रहता है इस घाटी का एक हिस्सा होने के कारण इन्द्रदेव जी के अधिकार में है। यह दोनों घाटी एक ही हैं, या यों कहो कि एक ही मान का यह जनाना हिस्सा और वह मर्दाना हिस्सा है और इसलिए इन दोनों जगहों का पूरा-पूरा भेद इन्द्रदेव जी को मालूम है और उन्होंने जो कुछ भी मुझे बताया है मैं जानती हूँ, इस बात की खबर भूतनाथ को कुछ भी नहीं है। यह घाटी जिसमें मैं रहती हूँ हमेशा बंद रहती थी मगर उस घाटी का दरवाजा बराबर न जाने क्यों खुला ही रहता था, शायद इसका सबब यह हो कि उस घाटी में कोई जोखिम की चीज नहीं है और न कोई अच्छी इमारत ही है, अस्तु भूतनाथ यह भी नहीं जानता कि उस घाटी का दरवाजा कहाँ है तथा क्यों कर खुलता और बंद होता है या इस स्थान का कोई मालिक भी है या नहीं। भूतनाथ को घूमते-फिरते इत्तिफाक से या और किसी वजह से वह घाटी मिल गई और उसने उसे अपना घर बना लिया और जब यह खबर इन्द्रदेव जी को और मुझको मालूम हुई तब उन्होंने मेरी इच्छानुसार यह स्थान मुझे देकर यहाँ के बहुत से भेद बता दिए। बस अब मैं समझती हूँ कि तुम्हें मेरी बातों का तत्त्व मालूम हो गया होगा।

इंदुमति : हाँ अब मैं समझ गई, ऐसी अवस्था में तम जो चाहो सो कर सकती हो।

बिमला : अच्छा तो मैं जाती हूँ और जो कुछ सोचा है उस काम को ठीक करती हूँ।

इतना कहकर बिमला उठ खड़ी हुई और इंदुमति तथा कला को उसी जगह बैठे रहने की ताकीद कर घर के बाहर निकलने लगी, मगर इंदु ने साथ जाने के लिए जिद्द की और बहुत कुछ समझाने पर भी न मानी, लाचार बिमला इंदु को साथ ले गई और कला को उसी जगह छोड़ गई।

भूतनाथ का साथ छोड़कर प्रभाकर सिंह के इस घटी आने का हाल हमारे पाठक भूले न होंगे। उन्हें याद होगा कि भूतनाथ की घाटी के अन्दर जाने वाली सुरंग के बीच में एक चौमुहानी थी जहाँ पहुँचकर प्रभाकर सिंह ने भूतनाथ और इंदुमति का साथ छोड़ा था और कला तथा बिमला के साथ दूसरी राह पर चल पड़े थे। आज इंदुमति को साथ लिए बिमला पुन: उसी जगह जाती है।

उस सुरंग के अन्दर वाली चौमुहानी से एक रास्ता तो भूतनाथ की घाटी के लिए था, दूसरा रास्ता सुरंग के बाहर निकल जाने के लिए था, और तीसरा तथा चौथा रास्ता (या सुरंग) कला और बिमला के घाटी में आने के लिए था। एक रास्ता तो ठीक उस घाटी में आता था जिधर से प्रभाकर सिंह आए थे और दूसरा रास्ता बिमला के महल में जाता था।

बिमला के घर आने वाले दोनों रास्ते एक रंग-ढंग के बने हुए थे और इनके अन्दर के तिलिस्मी दरवाजे भी एक ही तरह के साथ गिनती में एक बराबर थे, अस्तु एक सुरंग का हाल पढ़कर पाठक समझ जाएँगे कि दूसरी तरफ. वाली सुरंग की अवस्था भी वैसी ही है जो बिमला के घर को जाती है।

उस सुरंग की चौमुहानी पर पहुँचकर जब बिमला की घाटी से आने वाली सुरंग की तरफ बढ़िए तो कई कदम जाने के बाद एक (कम ऊँची) दहलीज मिलेगी जिसके अन्दर पैर रख कर ज्यों-ज्यों आगे बढ़िए त्यों-त्यों वह दहलीज ऊँची होती जाएगी, यहाँ तक कि बीस-पच्चीस कदम आगे जाते-जाते वह दहलीज ऊँची होकर सुरंग की छत के साथ मिल जाएगी और फिर पीछे को लौटने के लिए रास्ता न रहेगा। उसके पास ही दाहिनी तरफ दीवार के अन्दर एक पेंच है जिसे कायदे के साथ घूमाने पर वह दरवाजा खुल सकता है। अगर वह पेंच न घुमाया जाय और दहलीज के अन्दर कोई न हो, और जाने वाला आगे निकल गया हो, तो खुद-ब-खुद भी वह रास्ता बारह घंटे के बाद खुल जाएगा और वह दहलीज धीरे-धीरे नीची होकर करीब-करीब जमीन के बराबर अर्थात् ज्यों-की-त्यों हो जाएगी।

रास्ता कैसा पेचीदा और तंग है इसका हाल हम चौथे बयान में लिख जाए हैं पुन: लिखने की कोई आवश्यकता नहीं। लगभग तीन सौ कदम जाने के बाद एक और बंद दरवाजा मिलेगा जो किसी पेंच के सहारे पर खुलता और बंद होता है। पेंच घुमाकर खोल देने पर भी उसके दोनों पल्ले अलग नहीं होते, भिड़के रहते हैं। हाथ का धक्का दीजिए तो खुल जाएँगे और कुछ देर बाद आप-से-आप बंद भी हो जाएँगे मगर पुन: दूसरी बार केवल धक्का देने से वह दरवाजा न खुलेगा असल पेंच घुमाने की जरूरत पड़ेगी। दोनों दरवाजों के दोनों तरफ एक ही ढंग के तिलिस्मी पेंच दरवाजा खोलने और बंद करने के लिए बने हुए थे और इसका हाल भूतनाथ को कुछ भी मालूम न था। इसके अतिरिक्त उस सुरंग का सदर दरवाजा भी (जिसके अन्दर घुसने के बाद चौमुहानी मिलती थी) बंद हो सकता था और यह बात बिमला के अधीन थी। केवल इतना ही नहीं, उस चौमुहानी से भूतनाथ की घाटी की तरफ जाने वाली सुरंग में भी एक दरवाजा (इन दोनों सुरंगों की तरफ) था और उसका हाल भी यद्यपि भूतनाथ को तो मालूम न था मगर बिमला उसे भी बंद कर सकती थी।

इंदु को साथ लिए हुए बिमला उसी सुरंग में घुसी और उस सुरंग के भेद इंदु को समझाती तथा दरवाजा खोलती और बंद करती हुई उस चौमुहानी पर पहुँची जिसका हाल ऊपर कई दफे लिखा जा चुका है और जहाँ प्रभाकर सिंह ने इंदु का साथ छोड़ा था। वहाँ पहुँचकर कुछ देर के लिए बिमला अटकी और आहट लेने लगी कि भूतनाथ की घाटी में आने वाला कोई आदमी तो इस समय इस सुरंग में मौजूद नहीं है। जब सन्नाटा मालूम हुआ और किसी आदमी के वहाँ होने का गुमान न रहा तब वह भूतनाथ वाली घाटी की तरफ जो रास्ता गया था उस सुरंग में घुसी और दस-बारह कदम जाने के बाद दीवार के अन्दर बने हुए किसी कल-पुरजे को घुमाकर उस सुरंग का रास्ता उसने बंद कर दिया। लोहे का एक मोटा तख्ता दीवार के अन्दर से निकला और रास्ता बंद करता हुआ दूसरी दीवार के अन्दर कुछ घुस कर अटक गया।

इसके बाद बिमला सुरंग के सदर दरवाजे पर दरवाजे बंद करने के लिए पहुँची ही थी कि सुरंग के अन्दर घूमते हुए भूतनाथ के शागिर्द भोलासिंह पर निगाह पड़ी और उसने भी इन दोनों औरतों को देख लिया। वह इंदु को अच्छी तरह देख चुका था अस्तु निगाह पड़ते ही पहिचाना गया और आश्चर्य के साथ देखता हुआ बोला- “आह, मेरी रानी तुम यहाँ कहाँ? तुम्हारे लिए तो हमारे गुरुजी बहुत परेशान हैं!!”

इस जगह बखूबी उजाला था इसलिए इंदु ने भोलासिंह को और भोलासिंह ने इंदु को बखूबी पहिचान लिया। इंदु पर क्या-क्या मुसीबतें गुजरी और प्रभाकर सिंह कहाँ गए इन बातों की खबर भोलासिंह को कुछ भी न थी, इसलिए वह इस समय इंदु को देख कर खुश हुआ और ताज्जुब करने लगा। इंदु ने धीरे से बिमला को समझाया कि यह भूतनाथ का शागिर्द है।

इंदु उसे पहिचानती थी सही मगर नाम कदाचित् नहीं जानती थी। वह उसकी बात का जवाब दिया ही चाहती थी कि बिमला न उँगली दबाकर उसे चुप रहने का इशारा किया और कुछ आगे बढ़कर कहा, “तुम्हारे गुरुजी ने इन्हें मौत के पंजे से छुड़ाया और इनकी बदौलत उसी आफत से मेरी भी जान बची है!”

भोलासिंह : गुरुजी कहाँ हैं?

बिमला : हमारे साथ आओ और उनसे मुलाकात करके सुनो कि उन्होंने इस बीच में कैसे-कैसे अनूठे काम किए हैं।

भोलासिंह : चलो-चलो, मैं बहुत जल्द उनसे मिलना चाहता हूँ।

बिमला ने इंदु को अपने आगे किया और भोलासिंह को पीछे आने का इशारा करके अपनी घाटी की तरफ रवाना हुई।

बिमला इस सुरंग का सदर दरवाजा बंद न कर सकी, खैर इसकी उसकी ज्यादा परवाह भी न थी। चौमुहानी से जो भूतनाथ की घाटी की तरफ रास्ता बन गया था उसी को बंद कर उसने संतोष लाभ कर लिया। बिमला के पीछे-पीछे चल कर भोलासिंह उस चौमुहाने तक पहुँचा मगर जब बिमला अपनी घाटी की तरफ अर्थात् सामने वाली सुरंग में रवाना हुई तब भोलासिंह रुका और बोला, “इस तरफ तो हमारे गुरुजी कभी जाते न थे उन्होंने दूसरों को भी इधर जाने को मना कर दिया था। आज वे इधर कैसे गए!”

बिमला : हाँ पहिले उनका शायद ही खयाल था मगर आज तो इसी मकान में बैठे हुए है।

भोलासिंह : क्या इसके अन्दर कोई मकान है?

बिमला : हाँ, बहुत सुन्दर मकान है।

भोलासिंह : कितनी दूरी पर?

बिमला : बहुत थोड़ी दर पर, तम आओ तो सही।

“ये दोनों औरतें बेचारी भला मेरे साथ क्या दगा करेंगी!” यह सोच भोलासिंह आगे बढ़ा और इनके साथ सुरंग के अन्दर घुस गया।

जो हाल प्रभाकर सिंह का इस सुरंग में हुआ था वही हाल इस समय भोलासिंह का हुआ अर्थात् पीछे की तरफ लौटने का रास्ता बंद हो गया और बिमला तथा इंदु के आगे बढ़ जाने तथा चुप हो जाने के कारण वह जोर-जोर से पुकारने और टटोल-टटोल कर आगे की तरफ बढ़ने लगा।

प्रभाकर सिंह को इसके आगे का दरवाजा खुला हुआ मिला था मगर भोलासिंह को आगे का दरवाजा खुला हुआ न मिला। उसे दोनों दरवाजों के अन्दर बंद करके बिमला और इंदु अपने डेरे की तरफ निकल गईं।

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