Bhagavad Gita
Attachment and Love Difference

Bhagwat Geeta Lesson: कई बार हम खुद को भीड़ में पाते हैं हंसी, बातचीत और जान-पहचान के बीच फिर भी दिल के किसी कोने में खालीपन महसूस होता है। हम सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं, दोस्तों से मिलते हैं, फिर भी भीतर एक अजीब सी उदासी बनी रहती है। आखिर ऐसा क्यों है कि हम शारीरिक रूप से अकेले न होने पर भी खुद को अकेला महसूस करते हैं? क्यों हमारे रिश्ते अक्सर खोखले लगते हैं? भगवद गीता इस सवाल का उत्तर सतही स्तर से परे जाकर देती है। सच्चा जुड़ाव निकटता में नहीं, बल्कि ‘अनुरूपता’  में है। यह इस बात में नहीं है कि हमारे आसपास कितने लोग हैं, बल्कि इस बात में है कि हम स्वयं से और दूसरों से कितनी गहराई से जुड़े हैं। अकेलापन लोगों की अनुपस्थिति से नहीं, बल्कि संबंधों में अर्थ की अनुपस्थिति से जन्म लेता है। भगवद गीता इस रहस्य को बड़े सुंदर तरीके से समझाती है।

Bhagwat Geeta Lesson
bhagwat geet

गीता बताती है कि सच्चा अकेलापन बाहरी दुनिया से नहीं, भीतर से शुरू होता है। जब हम स्वयं के सच्चे स्वरूप से कट जाते हैं, जब हम अपनी आत्मा की आवाज़ अनसुनी कर देते हैं, तभी भीतर खालीपन जन्म लेता है। दूसरों की स्वीकृति, प्रशंसा या साथ हमें क्षणिक सुख दे सकते हैं, लेकिन अगर स्वयं से जुड़ाव नहीं है तो अकेलापन बना रहता है।

भौतिक जुड़ाव, यानी केवल किसी के साथ शारीरिक रूप से उपस्थित होना, अकेलापन मिटा नहीं सकता। गीता के अनुसार, सच्चा संबंध आत्मा से आत्मा का होता है प्रेम, करुणा और निष्काम भाव से। जब हम बिना किसी अपेक्षा के दूसरों से प्रेम और सहानुभूति के साथ जुड़ते हैं, तब ही हमारे रिश्ते गहरे और सार्थक बनते हैं।

अक्सर हम खुद को दूसरों से अलग मानते हैं पर गीता याद दिलाती है कि हर जीवात्मा एक ही ब्रह्मांडीय चेतना का अंश है। जब हम इस दिव्य एकता को पहचानते हैं, तब अलगाव और अकेलापन का भाव स्वाभाविक रूप से कम होने लगता है। हम महसूस करते हैं कि हम कभी वास्तव में अलग नहीं थे बस हमें यह याद दिलाने की जरूरत थी।

Spritual
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गीता के अनुसार, आत्मा शाश्वत और अखंड है। यह संसार का मोह, माया और बदलती परिस्थितियाँ ही हैं जो हमें अस्थायी अकेलेपन का भ्रम देती हैं। जब हम अपने भीतर झांकते हैं और अपनी चिरस्थायी दिव्यता को पहचानते हैं, तब हम समझते हैं कि हम कभी अकेले नहीं थे, न कभी होंगे।

गीता हमें सिखाती है कि एकांत एक वरदान है आत्मचिंतन और विकास का अवसर। जब हम अकेले होने के क्षणों का स्वागत करते हैं और उन्हें अपने भीतर के साथ गहरे संबंध बनाने का माध्यम बनाते हैं, तो वही एकांत हमें शक्ति और शांति देता है।

अकेलापन तब होता है जब हम बाहर किसी सहारे की तलाश करते हैं, लेकिन एकांत वह अवस्था है जब हम भीतर ईश्वर का सहारा पाते हैं। अकेलापन कोई बाहरी समस्या नहीं, बल्कि आत्मा से दूरी का परिणाम है। जब हम भीतर से जुड़ते हैं अपने सच्चे स्वरूप और ईश्वर से तब भीड़ में भी शांति पाते हैं और एकांत में भी प्रेम महसूस करते हैं। भगवद गीता हमें याद दिलाती है कि हम सदा जुड़े हैं अपने आपसे, दूसरों से और समस्त ब्रह्मांड से।

राधिका शर्मा को प्रिंट मीडिया, प्रूफ रीडिंग और अनुवाद कार्यों में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है। हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा पर अच्छी पकड़ रखती हैं। लेखन और पेंटिंग में गहरी रुचि है। लाइफस्टाइल, हेल्थ, कुकिंग, धर्म और महिला विषयों पर काम...