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आचार्य महाप्रज्ञ के अवदान

योग की भाषा में मन की तीन अवस्थाएं हैं-अवधान, एकाग्रता, केन्द्रीकरण या धारणा और ध्यान। मनोविज्ञान भी इसी का संवादी विचार प्रस्तुत करता है। उसमें भी तीन अवस्थाएं मानी गई हैं- अटेन्शन, कान्सन्ट्रेशन और मेडिटेशन। मानसिक क्रियाएं इन तीन अवस्थाओं से गुजरती हैं।

अवधान- पहली अवस्था है- अवधान, अटेंशन। यह मन की वह क्रिया है, जहां हम मन को किसी वस्तु के प्रति व्याप्त करते हैं, लगाते हैं। जो मन घूमता रहता है, उसे सचेत करना, चैतन्यवान् बनाना-यह है अवधान की अवस्था। इसमें पदार्थ के साथ मन का सम्बन्ध जुड़ जाता है। हम कहते हैं सावधान हो जाओ। इसका मतलब है कि एक कार्य के प्रति दत्तचित्त हो जाओ। जो करना है, चित्त को उसमें लगा दो।

जब मौलिक स्वरूप के प्रति अवधान होता है, उस स्थिति में बाह्य के प्रति अवधान नहीं होता। मन का अवधान अपने प्रति हो जाता है। अपने प्रति मन का अवधान होना एक विशेष प्रकार की स्थिति है। इस स्थिति में ही प्रज्ञा का उदय होता है, आन्तरिक चेतना प्रकट होती है।

धारणा- मन की दूसरी अवस्था है- कान्सन्ट्रेशन। योग की भाषा में एकाग्रता या धारणा। यह अवधान से अगली अवस्था है। जिसमें हमने अवधान लगाया, मन का पदार्थ के साथ सम्बन्ध स्थापित किया, उसमें केन्द्रित हो जाना। जो मन चारों ओर भटक रहा था, अनेक वस्तुओं पर जा रहा था, उसे सब वस्तुओं से हटाकर उसी एक वस्तु में केन्द्रित कर देना कान्सन्ट्रेशन है, एकाग्रता या धारणा है। यह मन की धारणावस्था है।

ध्यान- मन की तीसरी अवस्था है- मेडिटेशन, ध्यान। अवधान के बाद धारणा और धारणा के बाद ध्यान। केन्द्रीकृत मन की जो सघन अवस्था है, जहां मन स्थिर हो जाता है, लम्बे समय तक मन जम जाता है, वह है मेडिटेशन, ध्यान। मन की वह स्थिति पैदा करनी होगी, जो अवधान कर सके। मन बहुत ही गतिशील तत्त्व है। मन का काम ही है गति को बनाए रखना। वास्तव में अवधान उसका स्वभाव नहीं है। हम बिल्कुल विपरीत दिशा में जा रहे हैं। स्रोत के साथ चलना बहुत स्वभाविक है। नौका भी चलती है तो स्रोत के साथ चलती है। स्रोत के प्रतिकूल चलना बहुत ही कठिन काम है। जो स्रोत के प्रतिकूल चल सके, वह साधक है, साधना है। इसका तात्पर्य है, जो मन का स्वभाव नहीं है, उस स्वभाव में मन को ले जाना और स्थापित कर देना।

मन इन्द्रिय और आत्म- चेतना का मध्यवर्ती है। इन्द्रियों का सम्पर्क बाहरी जगत् से है और चेतना का केन्द्र अन्तर्जगत् है। मन दोनों (इन्द्रिय और चेतना) के द्वारा प्राप्त तत्त्व का विश्लेषण करने वाला या भोग करने वाला है। हमारी प्रत्येक प्रवृत्ति, प्रत्येक कार्य में मन का योग रहता है। मन को जानना एक अर्थ में स्वयं को जानना है। हम अज्ञान के कारण मन को नहीं जान पाते हैं। यदि उससे परिचित हो जाएं तो मन की क्षमता, योग्यता और कार्य- संपादन की पद्धति में विकास किया जा सकता है।

कोई व्यक्ति ऐसा होता है, जो आठ-दस वर्ष की अवस्था में भी महान् कवि बन जाता है। कुछ कवि ऐसे होते हैं, जो अभ्यास के पथ पर चलते-चलते महान बनते हैं। प्रतिभा और अभ्यास निष्पन्नप्रत्येक क्षेत्र की यही स्थिति है। कृष्ण से पूछा गया-मन का निग्रह कैसे किया जाए? उत्तर मिला असंशयं महाबाहो, मन: दुनिग्रहं चलम्। अभ्यासेन च कौंतेय! वैराग्येण च गृह्यते॥ अभ्यास कृत होता है, अर्जित नहीं। वैराग्य स्वाभाविक होता है, कृत नहीं। महर्षि पतंजलि ने भी यही कहा है – ‘अभ्यास और वैराग्य से मन का निरोध होता है। अभ्यास करते-करते निरोध की अन्तिम सीढ़ी तक पहुंचा जा सकता है। अभ्यास से कुछ लब्ध नहीं होता तो पुरुषार्थ निष्फल हो जाता। अभ्यास से जो कल नहीं थे, आज बन सकते हैं।

मन बहुत ही गतिशील तत्त्व है। मन का काम ही है गति को बनाए रखना। वास्तव में अवधान उसका स्वभाव नहीं है। नौका भी चलती है तो स्रोत के साथ चलती है। स्रोत के प्रतिकूल चलना बहुत ही कठिन काम है। जो स्रोत के प्रतिकूल चल सके, वह साधक है, साधना है।

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