अहिंसा का सिद्घांत केवल धर्म का ही सिद्घांत नहीं है। वह अच्छा जीवन जीने का सिद्घांत है, स्वस्थ जीवन जीने का सिद्घांत है। हम बिमारियों के बारे में बहुत सोचते हैं। औषधियां बढ़ रही हैं और रोग भी बढ़ रहे हैं। अनुसंधान होना चाहिए, बिमारियां क्यों बढ़ रहीं है? बिमारियां केवल कीटाणुओं के कारण ही नहीं बढ़ रही हैं, वे हमारी मानसिक हिंसा के कारण भी बढ़ रही हैं।
आपको ज्ञात होना चाहिए कि सारी बिमारियांं शरीर की बिमारियां नहीं हैं, वे साइकोसो मेटिक-मनोकायिक बिमारियां हैं। मन से पैदा होने वाली, हिंसा पैदा होने वाली बिमारियां है। ध्यान के द्वारा यह हिंसा का मूल, हिंसा का दबाव कम होता है, प्रतिक्रिया-विरति होती है तब बेचारी बिमारियां टिकेंगी कैसे? उनके टिके रहने का आधार ही समाप्त हो जाता है। तर्कशास्त्र का एक नियम है, ‘कारणभावे कार्याभाव:’ -कारण का अभाव होता है तो कार्य का अभाव होता है। कारण के बिना कार्य कहां से रहेगा? इस कारण की खोज नहीं करते। आज की अनेक समस्याओं में हम बाहरी-बाहरी बातों में खोज करते हैं। मूल कारण की खोज नहीं करते। यदि इस सच्चाई को मानें कि मानसिक हिंसा के कारण बिमारियां बहुत बढ़ रही हैं, तो शायद दवाइयों के चक्कर में बहुत फंसने की जरूरत नहीं रहती और स्वास्थ्य के लिए बहुत चिंता करने की आवश्यकता भी नहीं रहती।
बीमारी मिटे कैसे? यह बीमारी कीटाणु की बीमारी नहीं। ये बहुत सारी बिमारियां हिंसा का भावना से उत्पन्न बिमारियां हैं। जब मन से हिंसा निकल जाती है, तत्काल ऐसा लगता है कि स्वस्थ हो गया हूं।
हमने देखा कि ध्यान करने से शुगर की बीमारी ठीक होती है। अल्सर की बीमारी, रक्तचाप की बीमारी ठीक होती है। प्रश्न होता हे? बीमारी क्यों मिट गई? दवा तो नहीं की। ध्यान किया और एक्जिमा ठीक हो गया। ऐसा क्यों हुआ? ये बहुत सारी बिमारियां मानसिक बिमारियां हैं। ये हिंसा से पैदा होने वाली बिमारियां है। हमने इस ओर कभी ध्यान नहीं दिया। हिंसा को बहुत स्थूल अर्थ में पकड़ा।
हम एक नए दृष्टिकोण का निर्माण करें। सिद्घांत की चिंता में बहुत न उलझें। बहुत गहरे में न जाएं। सिद्घांत की पुष्टि प्रयोग के द्वारा करें। प्रयोग का मूल्यांकन करें। यह सोंचे कि प्रयोग होगा तो जीवन में अहिंसा उतरेगी।
जब हम प्रतिक्रिया से मुक्त होते हैं, हमारे मन में प्रतिक्रिया नहीं होती, हमारे मन में हिंसा नहीं होती तो दूसरे व्यक्ति, सामने वाले व्यक्ति हिंसा में जा नहीं सकते, जाते-जाते रुक जाते हैं, जाना चाहते हैं तो भी उनके पैर ठिठुर जाते हैं।
मेरे मन में हिंसा है और सौ बार अहिंसा के सिद्घांत की चर्चा करूं, अहिंसा की बात समझाना चाहूं तो सारी बकवास होगी, सारा व्यर्थ का प्रलाप होगा, नतीजा कुछ भी नहीं होगा।
अहिंसा एक महान शक्ति है। अहिंसा एक महान ज्योति है। किन्तु उस शक्ति पर एक आवरण आ गया। ज्योति पर इनती गहरी राख आ गई कि वह तिरोहित हो गई। उसकी तेजस्विता कभी प्राप्त होती नहीं।
जो व्यक्ति अहिंसा का साक्षात्कार कर लेता है, उसमें असीम शक्ति जाग जाती है, मरने की शक्ति जाग जाती है। मरने की शक्ति दुनियां में सबसे बड़ी शक्ति होती है।
इससे बड़ी कोई शक्ति नहीं और जिस व्यक्ति में मरने की शक्ति आ गई वह सारी भौतिक शक्तियों से अपराजेय बन गया। कोई डरा नहीं सकता, कोई ध्वस्त नहीं कर सकता। कोई उसे संत्रस्त नहीं कर सकता। वह अपराजेय बन गया।
यह शक्ति का विकास अहिंसा के द्वारा ही प्राप्त हो सकता है।
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