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मन हैं अनेक – आचार्य महाप्रज्ञ

मन तो एक ही है। हमारे चित्त अनेक होते हैं। हमारे चित्त की वृत्तियां अनेक होती हैं। चित्त में नाना प्रकार की वृत्तियां जागती हैं, नाना प्रकार के चित्त जागते हैं और अनेक बन जाते हैं अनके चित्तों के कारण मन भी अनेक जैसा प्रतिभासित होने लग जाता है।

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सत्य को खोजना होगा – आचार्य महाप्रज्ञ

यह हमारा मोह है, भ्रम है कि केवल सिद्धांत और तत्त्व चर्चा के आधार पर हृदय बदलना चाहते हैं और हिंसा से अहिंसा की प्रतिष्ठापना करना चाहते हैं, किंतु अहिंसा की प्रतिष्ठा तब तक नहीं हो सकेगी जब तक चंचलता को कम करने का अभ्यास नहीं किया जायेगा।

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