श्री गुरुदेव की कृपा के बिना कुछ भी संभव नहीं। अध्यात्म में तो गुरु की कृपा चाहिए ही, पर सत्य तो यह है कि साधारण जीवन में भी विकास और उन्नति उन्हीं की होती है, जिनकी झोली में गुरुकृपा होती है। गुरु वह तत्त्व है, जो तुम्हें देह से ऊंचा उठा देता है और देह के ममत्व से ऊपर उठते ही तुम तुम्हारे स्वरूप में स्थित हो जाते हो और जो भवबंधन तुमसे छूटे नहीं छूटता था, जो ममता की फांसी तुम्हारे गले से निकाले नहीं निकलती थी, वह सहजता से ही निकल जाती है। जैसे, वृक्ष की जड़ को जब तक न काटा जाए तब तक वृक्ष के सिर्फ पत्ते, टहनियां और शाखाएं निकाल देने से वृक्ष का अन्त नहीं होता। इसी तरह जब तक मनुष्य अपने स्वरूप के मूल तक नहीं पहुंचता,

‘मैं कौन हूं इसका ज्ञान जब तक प्राप्त नहीं करता, तब तक मात्र मंत्र जप करने से, मात्र तीर्थयात्रा करने से, मात्र सेवा- कार्य, निष्काम कर्म, यज्ञ आदि करने से ना तो ममता की फांसी टूटेगी, ना अज्ञान दूर होगा और ना ही परमात्मा की प्राप्ति होगी। जिस तत्त्वज्ञान की चर्चा हम कर रहे हैं, उस तत्त्वज्ञान का इन कर्मों से कोई सम्बंध नहीं है। उससे तो बस अन्त : करण की शुद्धि होती है, और चूंकि अन्त:करण के शुद्ध होने पर ही ज्ञान को सुनने का मनुष्य अधिकारी हो सकता है, इसलिए इन बातों की जरूरत भी है।

मैं आप से पूछना चाहती हूं कि तो क्या आप ईमानदारी से यह कह सकते हैं कि आपका मन शुद्ध है? ईमानदारी से जवाब दीजिए! क्या आपकी इन्द्रियां विषयों को देख कर चलायमान नहीं होती? ज्ञान के अधिकारी वही हैं, जिनके चित्त में वैराग्य है। क्या आपके चित्त में वैराग्य है? तुम्हारे चित्त में तो दुनिया भर की ममता भरी पड़ी है। मां-पिता, पति, भाई-बहन धन -सम्पत्ति किसकी ममता नहीं है आपको! किसका आकर्षण तुमको नहीं है? एक तरफ तो दुनिया भर के तमाशे में संलग्न रहते हो और दूसरी तरफ सत्संग सुनने का तमाशा भी तुम्हारा चलता रहता है। तत्त्वज्ञान का अधिकारी कौन? जिसके चित्त में समता हो।

तुम्हारे चित्त में है? चाहे सुख आए, चाहे दुख, तुम्हारे अंदर कोई विकार की लहर न उठे, इसे कहते हैं चित्त की समता। ऋषियों ने कहा है कि जिसके चित्त में समता नहीं, जिसकी इन्द्रियां प्रतिपल चलायमान रहती हैं या जिसके मन में ममत्व है, जिसके चित्त में वैराग्य नहीं, वह ज्ञान का अधिकारी नहीं हो सकता। इसीलिए तो फिर ज्यादा करके गुरुओं ने, ज्ञानिओं ने, ऋषियों ने भक्तिमार्ग पर जोर दिया, सेवा पर भी जोर दिया। क्योंकि उससे चित्त की शुद्धि होने पर। वह व्यक्ति ज्ञान ग्रहण करने का अधिकारी हो जाएगा।

यह भी पढ़ें –आप ही से हैं जहां की खुशिया