Babul and Neem
Babul and Neem

Babul and Neem: कुछ लोग अज्ञान के कारण बुराइयों में जाते हैं, किंतु जब ज्ञान हो जाता है तो बुराई को छोड़ भी देते हैं। इसलिए बहुत जरूरी है कि हमारा ज्ञान बढ़े मूर्खता मिटे और हम प्रबुद्ध बनें।

लुकमान हकीम ने अपने शिष्य को भारत भेजा और कहा- ‘तुम यथासंभव जहां भी विश्राम करना,
बबूल के वृक्ष के नीचे करना। उस समय पैदल ही यात्राएं होती थीं। लोग दूसरे देश (विदेश) जाते तो पैदल ही जाते थे।
शिष्य अपने गुरु लुकमान के निर्देशानुसार अपनी यात्रा में बबूल वृक्ष के नीचे विश्राम करते हुए जब भारत पहुंचा तो उसकी शारीरिक स्थिति बहुत खराब हो चुकी थी।

उसका शरीर बीमारी से आक्रांत हो गया था। आयुर्वेद के एक योग्य गुरु के यहां उसने शरण ली। वैद्य ने उससे सारा हाल पूछा और आने का प्रयोजन पूछा। वैद्यजी समझ गए कि लुकमान ने यात्री को बबूल के नीचे विश्राम के लिए क्यों निर्देश दिया था।

वैद्यजी ने उस यात्री के हाथ लुकमान के लिए आयुवे र्द के कुछ सूत्र लिखकर दिए और कहा- ‘तु हारी बीमारी के लिए किसी दवा की जरूरत नहीं। पथ्य का ध्यान रखोगे तो बिना दवा के ही ठीक हो जाओगे। तुम अपने देश जाओ लेकिन एक बात का ध्यान रखना, जहां कहीं भी तुम विश्राम करो,
नीम के पेड़ के नीचे करो। नीम के पेड़ के अतिरिक्त तुम और किसी वृक्ष का आश्रय
मत लेना।

लुकमान के शिष्य ने वैद्यराज के निर्देश का पालन किया और जब लुकमान के पास सीरिया पहुँचा उसके गुरु लुकमान ने नीम और बबूल के पेड़ों का रहस्य बताते हुए कहा- ‘बबूल का पेड़ ऊर्जा को खीचता है और नीम का पेड़ ऊर्जा का संपे्रषण करता है। अगर सयक ज्ञान हो तो आदमी स्वस्थ रह
सकता है। आज का आदमी बीमार ज्यादा इसीलिए होता है कि स्वास्थ्य का उसे पूरा ज्ञान नहीं है। शरीर के लिए क्या उपयोगी है और क्या हानिकारक है, उसे ज्ञान नहीं है। शराब और दूसरे नशे स्वास्थ्य को पूरी तरह से नष्टï कर देते हैं, अगर यह ज्ञान हो जाए तो आदमी नशे कि गिर त में नहीं जाएगा।
कुछ लोग अज्ञान के कारण बुराइयों में जाते हैं, किंतु जब ज्ञान हो जाता है तो बुराई को छोड़ भी देते हैं। किंतु कुछ लोग बुराई में इतनी दूर चले जाते हैं कि जब तक ज्ञान होता है, बहुत देर हो चुकी होती है। इस तरह अपनी शक्ति को नष्टï कर देने का एक बड़ा हेतु है अज्ञान। इसलिए बहुत जरूरी है
कि हमारा ज्ञान बढ़े मूर्खता मिटे और हम प्रबुद्ध बनें। विद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने के लिए इसीलिए तो जाते हैं कि हमारा ज्ञान बढ़े।

मूर्खता से ही मिलता-जुलता एक शब्द है- मूढ़ता। प्राय: लोग मूर्खता और मूढ़ता को एकार्थक समझ लेते हैं। जबकि इनमें पर्याप्त अंतर है। पढ़ने-खिलने से मूर्खता तो मिटती है, किंतु जरूरी नहीं कि मूढ़ता भी मिट जाए। मूढ़ता का मतलब है- ‘मूर्च्छा’ मूर्च्छित चेतना में कोई भान नहीं रहता।
एक आदमी कोमा में चला गया तो फिर उसे पता नहीं चल पाता कि उसके साथ क्या हो रहा है? एनेस्थेसिया का इंजेक्शन देने के बाद आदमी का पेट फाड़ दो, हाथ पैर काट लो, उसे कुछ पता नहीं चलेगा। इस दृष्टिï से अज्ञानी को तो मूर्ख कहा जा सकता है, किंतु जो जानबूझकर गलती कर
रहा है, बुराई में जी रहा है, वह मूढ़ है। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय! पापं चरित् पुरुष:।

आदमी नहीं चाहता कि मैं पाप करूं, बुराई फिर भी कर लेता है? ऐसा क्यों? कृष्णा ने कहा
काम एष: क्रोध एष: रजोगुण समुद्भव:। काम और क्रोध- ये ऐसे दोष हैं जो न चाहते हुए भी आदमी को पापकर्म में प्रवृत कर देते हैं। ऐसा मूढ़ता या मूर्च्छा के कारण होता है। मूर्ख होना अच्छा नहीं, किंतु मूढ़ होना तो उससे भी बुरी बात है।