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Ganga is synonymous with purity - Grehlakshmi

Ganga is synonymous with purity

गंगा नदी की महिमा सदियों पुरानी है। गंगा नदी को भारत की सबसे पवित्र नदी कहा जाता है। आखिर क्यों है गंगा नदी का इतना महत्त्व, क्यों है गंगा इतनी पवित्र? आइए जानते हैं इस लेख से।

गंगा हिंदू धर्म की ही नहीं, बल्कि भारत तथा समस्त संसार की पवित्र नदी है। गंगा का नाम ही इतना पवित्र है कि जिसे लेते ही तन-मन ही नहीं आत्मा भी पवित्र हो जाती है, इसी कारण इसे पतित पाविनी भी कहा गया है। अपने उद्गम से लेकर सागर में विघटित होने तक भारत के विशाल भू-भाग का संस्पर्श करती हुई यह नदी अपने आप में हमारी संस्कृति व सभ्यता के इतिहास की जीवित संवाहिका भी है। गंगा की महिमा

श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि नदियों में मैं गंगा हूं। इसलिए प्राचीन काल से गंगा को गंगा मैया के रूप में पूजा जाता रहा है। गमनार्थक ‘गम्’ धातु से उणादिक ‘गन्’ प्रत्यय जोड़ने पर गंगा शब्द की निष्पत्ति होती है। इसका अर्थ है निरंतर गतिशीलता, प्रवाह। ‘ग पृथ्वी गच्छति इति गंगा’ अर्थात् जो स्वर्ग से सीधे पृथ्वी पर आए, वह गंगा है। ‘ग अपव्ययं गम्यतीति गंगा’ अर्थात् जो स्वर्ग की ओर ले जाए, वह गंगा है।

इस प्रकार गंगा खुद ही सहज, निरोग और जीवन प्रवाह का अनुक्रम बन गई है। शब्द कल्पद्रुम में गंगा शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार की गई है- ‘गमयाति प्राणयति ज्ञापयति वा भव्यव्पदं या शक्ति: सा गंगा’ अर्थात् जो शक्ति भगवान के पादपदूमों तक पहुंचा देती है, परम तत्त्व का स्वरूप बोध कराती है, वह गंगा है। इस व्युत्पत्ति के आधार पर गंगा अपने अध्यात्म आदि दैविक और आदि भौतिक रूपों में उपस्थित होती है। मकरवाहिनी गंगा जग पालनहार श्री विष्णु के चरण कमलों से होकर ब्रह्मï जी के कमंडल से उद्धृत होकर परम योगी महादेव शंकर की जटाओं से झर-झर बहकर पृथ्वी लोक पर जन-जन के कल्याण हेतु प्रवाहित हुई है।

गंगा नदी का महात्म्य

मां गंगा की वजह से प्रयाग, हरिद्वार एवं काशी का स्थान भी महत्त्वपूर्ण माना जाता है। प्रयागराज में माघ के मास में जो व्यक्ति गंगा का दर्शन करता है, वह परमधाम का अधिकारी बन जाता है। ऐसी पुराणों की मान्यता है। व्रत, उपवास और गंगा स्नान करके स्वयं को धन्य मानते हैं। इसलिए पुराणों में प्रयाग को तीर्थों का राजा कहा गया है।

पद्म पुराण के अनुसार संगम तट पर जप-तप करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता। माघ के मास में गंगा किनारे संगम तट पर ब्रह्मï महादेव रूद्र, आदित्य, मरु त, गंधर्व, लोकपाल, यक्ष, लक्ष्मी, सती, शची, ब्रह्मïणी, पार्वती, नागकन्या, रम्भा, उर्वशी, मेनका तथा नागवती का वास होता है, पुराणों की ऐसी मान्यता है। जीवन के सोलह संस्कारों में मुंडन, नामकरण तथा अंतिम संस्कार का विशेष महत्त्व गंगा तट पर बताया गया है।

इतिहास के आइने में गंगा

गंगा के महत्त्व को पंडित जवाहर लाल नेहरु ने अपनी वसीयत में कुछ इस प्रकार लिखा था- ‘यही गंगा मेरे लिए निशानी है प्राचीनता की यादगार की, जो बहती आई है वर्तमान तक और बहती चली जा रही है भविष्य के स्वर्णिम महासागर की ओर। उसे मेरा शत-शत प्रणाम और अनेकानेक शुभकामनाएं। इतिहास गवाह है कि गंगा नदी के प्रति न केवल हिंदुओं की बल्कि गैर हिंदू लोगों की भी अपार आस्था रही है।

विश्व विख्यात पर्यटक इब्नबतूता ने लिखा है कि ‘सुल्तान मुहम्मद तुगलक के लिए गंगा जल दौलताबाद (पुरानी राजधानी) से बराबर लाया जाता था। उस समय गंगा जल को यहां पहुंचने में चालीस दिन का समय लगता था। अकबर का भी गंगा जल से बहुत अधिक जुड़ाव था। वह उसे अमृत मानते थे। वह घर या बाहर सभी स्थानों पर गंगा जल का प्रयोग करते थे।’

प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखक बर्नियर ने औरंगजेब के विषय में लिखा है- ‘वह खाने-पीने की सामग्री में हमेशा गंगा जल का प्रयोग करता था। यही नहीं, दरबार के अन्य लोग भी गंगा जल का पान करते थे। यात्रा के समय भी गंगा जल साथ रखा जाता था। मराठा पेशवा राजा व राजस्थान के राजपूत राजा भी हरिद्वार से गंगा जल मंगवाकर उसका उपयोग किया करते थे। उस समय एक कांवड़ का मूल्य बीस रुपए पड़ता था।

साहित्यिक रचनाओं में गंगा

गंगा की पवित्रता और आश्चर्यजनक आध्यात्मिक शक्ति को अन्य संप्रदायों ने भी स्वीकार किया। रहीम, रसखान, ताज और मीर की हृदय स्पर्शी रचनाएं इसकी गवाह हैं। महॢष वाल्मीकि, आदि शंकराचार्य, कालिदास, कात्यायन, पंतजलि, चाणक्य, सूरदास, तुलसीदास, भारतेन्दु हरिशचन्द्र, महाकवि पद्माकर, राजदूत मेगस्थनीज, चीनी पर्यटक ह्वेनसांग तथा ऐसे ही अनेकानेक महापुरुषों ने गंगाजी की स्तुति कर अपनी-अपनी उत्कृष्ट रचनाएं लिखकर अपनी वाणी पवित्र तथा लेखनी धन्य की। इन सबकी तेजस्विता का रहस्य गंगा जल था।

कई मायनों में लाभकारी है गंगा

गंगा कई कारणों से हमारे लिए लाभदायक है। प्रत्येक पदार्थ के तीन स्तर होते हैं- (1) स्थूल, (2) सूक्ष्म, (3) कारण। ब्रह्मï नजर से जो गुण या लाभ दिखाई पड़ते हैं, वे स्थूल हैं, जो वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा प्रमाणित होते हैं, वे सूक्ष्म हैं और जो तत्त्वदर्शी आत्मवेत्ता योगियों द्वारा योग की नजर से देखे जाते हैं, वे कारण गुण कहलाते हैं। गंगा जी के भी ये तीनों स्तर हैं।

स्थूल रूप से गंगा आर्िर्थक लाभ वाली नदी है। अपने उद्गम स्थल हिमालय से लेकर सागर में विघटित होने तक अनेक आर्थिक पहलुओं से गंगा ने मनुष्य को बांध रखा है, जिनमें वन-संपदा, जड़ी-बूटी तथा वनौषधियों का विशेष स्थान है। इसके अतिरिक्त गंगा कृषि, मत्स्य पालन व पर्यटन की दृष्टि से भी लाभदायक है। गंगा नदी पर निर्मित अनेक बांध भारतीय जनजीवन तथा अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग है। इन्हें उत्तर भारत का मेरुदंड भी कहा जाता है।

सूक्ष्म रूप से गंगा जी मनुष्य को शारीरिक व मानसिक आरोग्य प्रदान करने में सक्षम हैं। गंगा जल में प्राण वायु (ऑक्सीजन) की मात्रा को बनाए रखने की असाधारण क्षमता है। साथ ही कुष्ठ, अजीर्ण, पुराना ज्वर, तपेदिक, पेचिश, दमा, मस्तक शूल आदि बिमारियों में गंगा जल का प्रयोग अत्यंत लाभदायक है। सन् 1925 में दक्षिण भारत के राजा कृष्ण राव को असाध्य रोग हो गया था। दवाओं से भी लाभ न मिलने पर उन्होंने सभी दवाईयां छोड़कर गंगा जल लेना आरंभ कर दिया और वह उससे जल्द ही स्वस्थ हो गए।

संक्रामक बिमारियों का शमन करने में गंगा जल सर्वश्रेष्ठ है। गंगोदक में खून वृद्धि तथा कीटाणु समाप्त करने की अलौकिक सामर्थ्य है। गंगा में स्नान करने से मस्तक और त्वचा रोग ठीक हो जाते हैं।

शास्त्रानुसार महत्त्व

शास्त्रों का कथन है कि गंगा के स्मरण, दर्शन, आचमन, स्नान-पूजन से विशेष पुण्यों की प्राप्ति होती है। गंगा जी मुक्तिदात्री मानी गई हैं, इसलिए जीवन के अंतिम समय में व्यक्ति के मुंह में दो बूंद गंगा जल व तुलसी दल दिए जाने की प्रथा रही है। भगीरथ ने गंगा जल के स्पर्श मात्र से अपने पूर्वजों का उद्धार करा दिया था। यूं तो गंगा जल में हमेशा ही दिव्य चैतन्य प्रवाहित होता रहता है लेकिन मुख्य तिथियों जैसे कि कुंभ, ग्रहण, पूर्णिमा, अमावस्या, संक्रांति और एकादशी पर तो इसकी दिव्यता में और भी वृद्धि हो जाती है। इसलिए इन तिथियों में गंगा जी का सान्निध्य विशेष लाभकारी माना गया है।

संतों की नजर में गंगा

आदि महाकवि वाल्मीकि, तुलसीदास, कालिदास तथा वेदव्यास ने गंगा को परम पवित्र, सुखदायनी, पीड़ा शमन करने वाली एवं स्वर्ग दिलाने वाली माना है। वैदिक ऋषियों ने अपने कई शास्त्र गंगा के तट पर बैठकर लिखे हैं। इतना ही नहीं भगवान राम, वशिष्ठï, विश्वामित्र, राजा सगर, राजा हरिश्चन्द्र से लेकर हजारों ऋषि-महर्षियों को ज्ञान-ध्यान, योग तथा मुक्ति का पथ दिखाने वाली मां गंगा ही तो है।

गंगाजी को विदित है कि और लोग तो अपने पाप देने के लिए मेरे पास आते हैं, जबकि संत मुझे पावन करते हैं। कहते हैं जब प्रयाग में भारद्वाज मुनि स्नान करने आते थे, तब गंगा भी अति उत्साह तथा खुशी से पच्चीस सीढ़ियां ऊपर आ जाती थीं। महॢष वाल्मीकि की श्रद्धांजलि रही है- हे माता भगीरथी! तुम्हारे तट पर निवास करते, तुम्हारे जल का पान करते, तुम्हारी लहरों मे झूलते, तुम्हारा नाम लेते, तुम्हीं में दृष्टि लगाए हुए मेरा शरीरपात हो।

ब्रह्मï सत्य, जगत मिथ्या का उद्घोष करने वाले श्री आदि शंकराचार्य बेहद आश्चर्यचकित होकर प्रेरित हुए-हे गंगे! जो कलयुग के पाप यज्ञ, दान, तप तथा ज्ञान से समाप्त नहीं होते, वे तुम्हारे जल की धारा के दर्शन मात्र से खत्म हो जाते हैं। भगीरथ स्वच्छ तथा पतित पावनी है, ऋषि-मुनियों ने भौतिक रूप से भी गंगा को उतना ही पवित्र, निर्मल तथा स्वच्छ रखने का कर्त्तव्य-निर्देश दिया है।

गंगा की सात्विकता

युग-युगांतर से सनातन धर्मों हिंदुओं का आशंका रहित भरोसा रहा है कि गंगा जल सर्वदा पवित्र है। उसमें किसी भी मलिन वस्तु के संपर्क से मलिनता नहीं आती, अपितु जिस वस्तु से उसका स्पर्श हो जाता है वह निश्चित रूप से पवित्र और शुद्ध हो जाती है। भारत की पुरातन सभ्यता एवं संस्कृति ने जिस किसी भी विषय का धाॢमक गुणगान किया है, उसमें हर दम ही जन हित का रहस्य जरूर रहता है। विदेशी विशेषज्ञों के शोध-निर्णय पर उतना आश्चर्य है जितना आश्चर्य अपने महामनीषी महॢषयों की विलक्षण ज्ञानमयी दृष्टि पर होता है।

गंगा के जिस जल की धारा में मुर्दे, हड्डियां आदि दूषित वस्तुएं बह रही हैं, वहीं कुछ फीट नीचे का गंगा जल पूर्ण शुद्ध रहता है। गंगोत्री से समुद्र तक के पथ में कितने ही नदी नाले गंगा जी में प्रविष्ट होते हैं, लेकिन गंगा के जल का अद्भुत गुण गंगोत्री से गंगासागर तक अक्षुण्ण बना रहता है। गंगा जल साल तक रखे रहने पर भी दूषित नहीं होता। जबकि अन्य समस्त नदियों का जल कुछ ही वक्त में खराब एवं बदबू युक्त हो जाता है। गंगा जल को गर्म करना दोष माना गया है।

देवनदी मां गंगा

भारतीय संस्कृति में गंगा का सर्वोच्च ओह्दा है। गंगा के प्रति भारतीय ही नहीं विदेशी भी आस्था का भाव रखते हैं। आस्था का कारण भी है। दूसरी नदियों की भांति गंगा मात्र नदी नहीं, अपितु मनुष्यों के चारों पुरुषार्थों की वजह भी है। इसलिए इसे देवनदी भी कहते हैं। गंगा को मां गंगा, देवी गंगा या पतित पावनी गंगा उस समय से कहा जाता है जब यह ब्रह्मïा के कमण्डल से निकलकर आई। गार्गी संहिता के मुताबिक तुंबरु नामक देवर्षि ने अपनी महती नामक वीणा बजाई तो खुद ब्रह्मïा दयालु होकर जल की भांति बह निकले। गीता में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा है – ‘हे अर्जुन, मैं स्रोतों में खुद गंगा हूं।’

अमृत के समान है गंगाजल

गंगा के किनारे जो व्यक्ति कल्पवास करता है उसका यह जन्म ही नहीं, अगला जन्म भी सुधर जाता है। ऌपुराणों में तीर्थ दो प्रकार के माने गए हैं, एक वे जो हमारी कामनाएं पूर्ति करते हैं तथा दूसरे वे हैं जो मोक्ष देते हैं। मानव दोनों चाहता है।

प्रयाग में गंगा तट पर वे दोनों कामनाएं पूर्ण हो सकती है, ऐसी मान्यता पुराणों की है। भारतीय सनातन पौराणिक कर्मकांड़ों में गंगा जल को अमृत के समान माना गया है हजारों किलोमीटर में फैली मां गंगा करोड़ों के दु:ख सुख की प्रत्यक्ष गवाह है। भजन-कीर्तन व अनुष्ठïान से लेकर सिंचाई करने, प्यास बुझाने, काया साफ करने तथा मन साफ करने तक के कार्य मां गंगा अपने स्वभाव के अनुसार हजारों वर्षों से करती चली आ रही है।

यह खेद का विषय है कि गंगा जी के असीम महत्त्व व महात्म्य के बावजूद गंगा में लगातार प्रदूषण बढ़ रहा है और इसका जिम्मेदार कोई और नहीं अपितु स्वयं मनुष्य व उसकी स्वार्थी गतिविधियां ही हैं। ऐसे में यह हम सबका ही दायित्व है कि हम हमारी सभ्यता व संस्कृति की संवाहिका गंगा को प्रदूषण से मुक्त करने का प्रयास करें और इनके दर्शन, पूजन और स्नान से स्वयं को लाभांवित करें।

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