Hindi Kahani: ग़ालिब ने ठीक ही कहा था
हुई मुद्दत कि ग़ालिब मर गया
पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना
कि यू होता तो क्या होता !
गर उस दिन मैंने उसे रोक लिया होता तो…गर! आज वह दिन मुझे शिद्दत से याद आ रहा था।घण्टों हो गए थे
हमें एक-दूसरे के साथ बैठे हुए।ये दूसरी बार चाय आर्डर की थी।
“सर!कुछ और?”
“कुछ नहीं?”
वेटर ने हिम्मत नहीं हारी और चारु की तरफ़ रुख किया।
“मैडम आप!सैंडविच या मफिन्स?”
चारु चुपचाप बाहर देखने लगी।शायद वह हम दोनों के बीच किसी और को नहीं आने देना चाहती थी।वेटर ने
एक बार हमें और फिर अपनी कलाई में बंधी घड़ी पर नज़र डाली।उसके लिए समय का मतलब दो कप चाय और डेढ़ घंटे थे पर हम दोनों के लिए मानो समय रुक सा गया था।
चारु की यह जगह बहुत पसंद थी।इसकी साज-सजावट मिट्टी से जोड़ती थी।ज्यादा ताम-झाम नहीं सिर्फ़
सादगी की खुशबू…बांस की बनी बाउंड्री वाल और मिट्टी की दीवारें पर चूने और रामराज से बनी आड़ी-तिरछी
रेखाओं से बनी कलाकृतियाँ…मौसम भी हमारे साथ था।सफेद बादलों से गुथम-गुत्था करते स्लेटी बादल उन्हें
पीछे धकेल पूरे आसमान में बिखरे पड़े थे।हवाएं बेचैन थी हमारे मन की ही तरह…
“क्या कर रहे हो, सब देख रहे हैं हमारी तरफ…”
मैंने लापरवाही से कहा था
“सब!मैं दुनिया की परवाह नहीं करता।”
“पर मुझे तो है।”
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चारु ने हाथ छुड़ाते हुए कहा था।
“क्या मुझसे प्यार,दुनिया से पूछ कर किया था।”
वह तड़प उठी थी।
“मेरे लिए तुम क्या हो यह तुम अच्छी तरीके से जानते हो। क्या हाथ पकड़ भर लेने से प्रेम जाहिर हो जाता
है।यह दिखावा है।”
मेरी पकड़ ढीली हो गई थी पर विश्वास और भी पक्का वह सिर्फ मेरी है सिर्फ मेरी…
वेटर ने एक बार फिर बड़ी उम्मीद से देखा।
“ऋषभ!तुम कुछ लोगे?”
हवा से लहराते बाल एक जिद्दी बच्चे की तरह उसके चेहरे पर बार-बार आ रहे थे।उसने अपनी लम्बी-लम्बी
उंगलियों से अपने बालों को पकड़ कर कान के पीछे फंसा दिया और उस शरारती बच्चे की शरारत को शांत
कर दिया।मैं सोच रहा था,कैसा महसूस करते होंगे उस जमाने के प्रेमी जो अपना प्रेम उन गुलाबी पन्नों के
हवाले कर सुकून से जवाब आने का इंतज़ार करते होंगे पर आज के युग में प्रेम तो रहा पर प्रेम पत्र गुम हो
गए।वैसे भी हमारा प्रेम टीन ऐजर का प्रेम नहीं था।हमने एक-दूसरे को प्रेम पत्र तो नहीं लिखे थे पर स्याह
अंधेरे मे मोबाइल पर उसका नाम उभर कर आता, मेरा चेहरा खिल जाता।
हमने अपने प्रेम पत्र एक-दूसरे के सामने बैठकर कभी कुल्हड़ तो कभी कांच के गिलास तो कभी इस होटल
के सफेद कपों के साथ एक-दूसरे की आँखों में आँखें डालकर लिखे थे।सच कहूँ तो हमारी उम्र में प्रेम पत्र
जितने लिखे नहीं जाते, उन से कहीं अधिक वो घोल दिए जाते हैं चाय की छोटी-छोटी चुस्कियों में…हमारा प्रेम
भी कुछ ऐसा ही था।उसकी लम्बी-लम्बी पतली उंगलियों में फ़ँसा चम्मच आज बहुत देर तक चीनी को चाय में
घोलता रहा।अचानक उसकी उंगलियाँ रुकी और गोल-गोल घूमती चाय में बनता भँवर भी स्थिर होता चला
गया।होंठो से ज्यादा बोलने वाली उसकी आँखें अचानक से शांत हो चली थी।
“ऋषभ! ये हमारी आखिरी मुलाकात है।”
“क्यों?”
यह सवाल मेरे होठों ने नहीं मेरी आँखों ने पूछा था।मेरी आँखों में उग आए सवालों को नजर अंदाज कर उसने
आँखे फेर ली थीं।मेरे अंदर का प्रेमी कहीं कोने में दुबक गया था और पुरुष जाग चुका था।न जाने कितने
सवाल मन-मस्तिष्क पर दस्तक दे रहे थे पर मैंने कुछ भी नहीं पूछा और सवालों को डाँट कर शांत करा
दिया।वो जा रही थी मेरी ज़िंदगी से पर मैंने भी उसे कहाँ रोका था।मेरे ठंडे व्यवहार को देख वह चुपचाप अपनी
जगह से उठ गई और मुझे मेरे अकेलेपन के साथ छोड़कर चली गई।शायद उसे मेरी आँखों में प्रेमी कम पुरुष ज्यादा दिखाई दिया था।
वो जा चुकी थी उस होटल से ही नहीं मेरी जिन्दगी से भी…सामने रखे चाय के प्याले में अभी भी थोड़ी सी चाय पड़ी हुई थी।उसकी वाइन कलर की लिपस्टिक के निशान कुछ देर पहले उसके यहाँ होने के सबूत के तौर पर
अभी भी चाय के प्याले पर देखे जा सकते थे।रजनीगंधा के अतर की खुशबू अभी भी फिजाओं में
थी।निराशा से मेरा मन डूबता जा रहा था।मैं कोस रहा था खुद को…क्यों,क्यों नहीं पूछा मैंने उससे, दुबारा कभी भी न मिलने का कारण…मैं झटके से उठा और चारु के प्याले में बची चाय को एक घूंट में पी गया।जैसे खुद से
कहना चाह रहा हो।
“तुम कहीं भी रहो पर मेरे जीवन में,मुझ में, हमेशा रहोगी थोड़ा-थोड़ा…”
उसके जाने के बाद जीवन में कुछ खास नहीं बदला था बस निशा का मेरी जिंदगी में आने के अलावा
अलावा!निशा मेरी पत्नी थी।मेरे ठंडे स्वभाव से उसे समझते देर नहीं लगी थी।वह किसी और से जानती इससे
पहले मैंने ही अपना अतीत उसके सामने खोल कर रख दिया था।एक बार भी नहीं सोचा कि उसे कैसा
लगेगा वह छली गई थी दूसरों से नहीं मुझ से…मैं उसका गुरूर था पर एक पल में उसका वह गुरुर टूट चुका
था।उसे बता कर मैं हल्का हो चुका था।दिल का बोझ कहीं ना कहीं हल्का हो चुका था पर मैं यह समझ नहीं
पाया था मैंने अपना बोझ अब उसके सीने पर रख दिया था।
निशा को मेरे अतीत का पता चल चुका था।उसकी सिसकियों की आवाज मैंने कई दिनों तक महसूस की
थी।सूजी हुई पलके और आँखों में तैरते लाल डोरे बीती रात की चुगलियाँ कर ही देती थी।हम एक कमरे एक
बिस्तर को साझा करते थे पर तन और मन से आज भी जुड़ नहीं पाए थे।मेरी रातें बेचैनी में बदलती करवटों में
बीत रही थी।निशा बगल में चुपचाप पड़ी रहती थी।मैं गुनहगार था निशा का… उसका तो कोई कसूर भी नहीं
था।चारु मेरे जीवन से जा कर भी नहीं जा पाई थी।उसके लौटने की कोई संभावना नहीं थी।सुना था शहर के
किसी बड़े बिजनेसमैन से उसकी शादी हुई थी।अपने नए जीवन में वह काफी खुश थी। मैं उसकी खुशी में
खुश होना चाहता था पर खुशी न जाने क्यों उससे रूठ गई थी।मैं चाहता था कि पहले जैसा ही हो जाऊँ पर
सच कहूँ तो वक्त के थपेड़ों में मुझे याद ही नहीं कि मैं वास्तव में पहले कैसा था?
उस दिन न जाने क्यों मुझे बिल्कुल नींद नहीं आ रही थी।निशा भी शायद जाग रही थी।उसने धीरे से साइड
लैंप जलाया।
“अभी तक जाग रहे हैं!”
“नींद नहीं आ रही?”
मैंने ठंडा सा जवाब दिया।
“नींद नहीं आती या फिर सपने आपको सोने नहीं देते।”
मैंने चौक कर उसके चेहरे की ओर देखा।कितना आसानी से वह कह गई थी मेरे दिल की बात…मैं बहुत देर
तक उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश करता रहा।उसके चेहरे पर एक भी भाव नहीं था जिसे मैं पढ़
सकता।वह एक झटके से उठी और उसने अलमारी खोली।चारु का झुमका उसने मेरे हाथों पर रख दिया।उस
दिन मैं चारु को यही तो देने गया था।मैं सकपका गया शायद निशा से इस बात की उम्मीद नहीं थी।
“मेरी दादी कहती थी किसी आदमी की जुड़ी यादें सिरहाने पर रख कर सोइए,फिर उसके सपने नहीं सताते।”
कब तक उसके नाम के झूठे सपने देखकर मैं अपने मन को तसल्ली देता रहता।मैं भी तो उन सपनों से बाहर
आ जाना चाहता था।जीवन में बहुत कुछ बदल चुका था।निशा शांत थी बिल्कुल शांत एक झील की
तरह…उसने मेरे हाथों को अपने हाथों में लेकर कहा
“जो बदल गया उसे बदल जाने दो।उसका उम्र भर मातम क्या मनाना। सुख चाहे दुख में बदला हो आगे
बढ़कर उसे वैसे ही गले लगा लो जैसे सुख को लगाया था।”
मैं सोच रहा था,क्या पहला प्यार सिर्फ परियों की कहानियों में पूरा होता है? चारु भी तो मेरे लिए एक परी की
ही तरह थी और मैं उसका राजकुमार पर हमारी कहानी तो कभी पूरी नहीं हुई!मैं अंधेरे में एक ऐसी जुगनू की
तलाश कर रहा था जो किसी और के जीवन में उजाला कर रही थी पर मेरे जीवन में उजाला करने वाली तो
निशा थी। दुबली-पतली साधारण सी दिखने वाली निशा… अंदर से इतनी मजबूत होगी यह मैंने कभी सोचा
भी नहीं था।अपने पति के अतीत को जानकर भी वह इतनी सहज बनी रही?क्या हमें अपने जीवन में ऐसी
परियों का सम्मान नहीं करना चाहिए? हम क्यों उस जुगनू को पकड़ने की कोशिश करते हैं जो कभी हाथ नहीं
आता।
हम दोनों दुखी थे हमारे दुख के कारण अलग-अलग थे।कहते हैं दो लोगों को जोड़ने का काम प्रेम से कहीं
अधिक दुख ने किया है।मैं वर्षों से इस दुख को चुभला रहा था।न जाने कितने दिन और कितनी रातें इस दुख
को चुभलाते बीती थी पर मेरे जीवन में उस दिन की घटना के बाद धीरे-धीरे कुछ बेहतर बदलने लगा था।मैं
अब निशा के साथ सहज होने का प्रयास करने लगा था।आज बाॅस की मैरिज एनिवर्सरी थी। शहर के बड़े और
महंगे मैरिज लाॅन में एक ग्रैंड पार्टी का आयोजन था।ऑफिस के सभी लोगों को बुलाया गया था।
“निशा! शाम को तैयार रहना,पार्टी में चलना है।”
निशा मुझे आश्चर्य से देख रही थी।शादी के इतने दिनों बाद मैंने पहली बार उससे कहीं साथ चलने को कहा
था।शादी के बाद मैंने आना-जाना छोड़ ही दिया था।कहीं बहुत जरूरी होता तो अकेला ही जाता पर निशा को
साथ लेकर कभी गया ही नहीं, निशा ने कभी इस बात की कोई शिकायत भी नहीं की थी।शायद उसने अपनी
स्थितियों के साथ समझौता करना सीख लिया था।
थोड़ी ही देर बाद हम उसे नामी-गिरामी मैरिज लॉन के सामने खड़े थे।शहर का जाना-माना मैरिज लॉन बड़े-बड़े
लोगों की शादियाॅं और समारोह यहीं होते थे।निशा ने हल्के गुलाबी रंग की प्योर शिफॉन की साड़ी पहन रखी
थी। कितनी खूबसूरत लग रही थी वह, खूबसूरत तो वह पहले भी थी लोगों के मुॅंह से उसकी खूबसूरती और
सादगी के बारे में सुना था पर आज पहली बार मैंने उसे इतने ध्यान से देखा था।उसकी सादगी में भी एक
खूबसूरती थी।माथे पर छोटी सी बिंदी आसमान में भोर के तारे की तरह चमक रही थी।कानों में छोटे-छोटे
झुमके जब भी हिलते शरारत से उसके मुॅंह को चूम लेते।मैं बॉस को ढूंढता हुआ स्टेज तक पहुॅंच गया।बाॅस
और उनकी पत्नी की पीठ मेरी तरफ थी वह किसी से शुभकामनाएं लेने में व्यस्त थे। मैं हाथों में गुलाब का बुके
लिए अपनी बारी के आने का इंतजार कर रहा था।तभी…
“हेलो ऋषभ!हाऊ आर यू?मीट माई वाइफ चारु सिंघानिया…”
सामने चारु खड़ी थी।कितना बदल गई थी चारु…खादी साड़ी की जगह किसी मशहूर ब्रांड के गाउन ने ले ली
थी। कान में हीरे के बड़े-बड़े टॉप्स और बाएं हाथ की उंगली में प्लेटिनियम में जड़ा एक बड़ा से सोलिटीयर…
“हेलो सर,हेलो चाsss…मेम!”
जबान फिसलते-फिसलते बची।उसने अपनी जबान को दाँतों के बीच दबा लिया।एक हल्की सी मुस्कान के
साथ मिसेज सिंघानिया ने उसके अभिवादन का जवाब दिया।उसकी वो आँखें जो न कुछ बोलकर भी बहुत
कुछ बोल जाती थी बिल्कुल शांत पड़ी थी।मेकअप की मोटी परत से दमकते चेहरे के पीछे खुशियाँ नदारद
थी।चारु के ठंडे व्यवहार से मैं स्तब्ध था जैसे उसने मुझे पहचाना ही नहीं था।क्या वक्त के साथ मैं इतना बदल
गया था या शायद उसने पहचान कर भी नहीं पहचाना था।निशा की होंठो ने धीरे से बुदबुदाया…
“चारुsss!”
मेरा अतीत और वर्तमान एक साथ मेरे सामने खड़े थे। मैं अपने अतीत से रूबरू होना चाहता था पर मेरा
अतीत मुझे पहचानने से इनकार कर रहा था।तभी मेरे वर्तमान ने मेरे हाथों को मजबूती से पकड़ा।
“नमस्ते मैम! मैं निशा अग्रवाल ऋषभ की पत्नी…”
मैं आश्चर्य से निशा के चेहरे पर पसरे आत्मविश्वास को देख रहा था।यही विश्वास तो वर्षों पहले मैंने चारु के
चेहरे पर अपने लिए देखना चाहा था पर… मैंने निशा के हाथों को मजबूती से पकड़ लिया।निशा की आवाज
मेरे कानों में गूंज रही थी।
“जो बदल गया उसे बदल जाने दो।उसका उम्र भर मातम क्या मनाना।”
