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घड़ी-21 श्रेष्ठ युवामन की कहानियां पंजाब: Time Story
Ghadi

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Time Story: अरे सवा दस बज गए, कभी-कभी साढ़े दस बज भी हो जाते हैं। सारा दिन की भागदौड़ के बाद इस समय ही कहीं मुझे फुरसत मिलती है। दो सांस ले पाती हूं। मन को एकाग्र करने के लिए पांच-सात मिनट के लिए अलोम-विलोम करती हूं। इससे अधिक का समय मेरे पास नहीं होता।

बाबा रामदेव को टी.वी. में देख-देख कर मुझे भी गहरी सांस लेने की आदत हो गई है। इतने से ही मैं रिलैक्स हो जाती हूं। उसके बाद अखबार पढूं तो कई बार दादी शोर मचाने लगती है, “बत्ती बंद कर दे। बल्ब मेरे माथे में बजता है। सो नहीं पाती। अब तू भी सो जा..।”

मुझे खीझ होने लगती है। मैं कहती, दादी, तुम्हारी चारपाई मैं बाहर बरामदे में बिछा दूंगी। मम्मी से कह दूंगी, मुझे तुम्हारे साथ नहीं सोना। तुम मुझे कुछ करने नहीं देती।”

दादी का रोज का यही काम है। वह बहुत शोर मचाती है। कुछ सोचने, अखबार पढ़ने या खुद से बातें करने का मेरे पास यही वक्त होता है। जब तक मैं खुद से बातें न करूं, मुझे नींद नहीं आती। दादी को मेरी चिन्ता रहती है। वह कहती है, “भूरी, सुबह से लगी रहती है। जल्दी सो जाया कर। नहीं तो बीमार हो जाएगी।”

कभी-कभी दादी की बात ठीक लगती। किसी-किसी दिन मेरी आंखें बहुत भारी होने लगतीं। सिर भी दुखता रहता। तब मुझे कोई न कोई दवा लेनी पड़ती। मुझे दवा खाते देख कर दादी फिर बोलने लगती, “थोड़ा-सा दूध पिया कर। समय पर रोटी-पानी लिया कर। सिर में तेल लगाया कर। खश्की होने से भी सिर दखने लगता है। अभी से तम्हारा यह हाल है. आगे क्या करेगी।”

“दादी, आगे की आगे देखी जाएगी। तुम ऐसे ही चिन्ता मत किया करो।” मम्मी से अधिक हमारी चिन्ता दादी करती है। अब वो कोई काम तो नहीं कर पाती। बस बैठी रह कर सभी को आवाजें लगाती रहती है, “अरे तू सो जा। तू खाना खा ले। जा जाकर नहा ले।”

मैं कभी-कभी गौर से दादी के चेहरे की ओर देखती हूं। झुर्रियों भरा चेहरा। कमजोर-सा। सोचती, बूढा हो कर आदमी कैसा हो जाता है? ढीले हाथ-पैर, छोटे बच्चे समान। उसके घर में बैठे रहने का बहुत आसरा है। दादी को जीवन का बहुत तजुरबा है। एक दिन मैं दादी के सिर में तेल लगाने लगी। वह मुझे समझाने लगी, “ये बाल मैंने धूप में सफेद नहीं किए। तुम्हारी उम्र में बहुत मेहनत की है। अच्छा-बुरा वक्त खुद पर भोगा है। घर में दूसरे वक्त के खाने का कोई अता-पता नहीं होता था। अब तो सुख से घर में किसी चीज की कमी नहीं। भगवान का दिया सब कुछ है। अब तुम लोगों के पास रोटी खाने का वक्त नहीं होता…भई जैसी तुम्हारी मर्जी….।”

मैंने कहा, “दादी, अब हमारी मर्जी नहीं रही। हम सब घड़ी की सूईयों से बंधे हुए हैं। हमें सारे काम वक्त के अनुसार करने पड़ते हैं। अब पहले जैसी बात नहीं रही।”

मैंने अपनी दिनचर्या पर निगाह मारी। सुबह का खाना भागते-भागते होता। दोपहर का कोई अता-पता नहीं। कुछ कॉलेज में कुछ घर आ कर खा लेती हूं। एक रात को ही आराम से बैठ कर खाना खाने को मिलता है। कई बार तब भी बिजी होती हूं। कभी हिसाब-किताब करने लगती हूं, खाना खाते समय। क्या करू, वक्त ही नहीं मिलता…।

मेरा शैड्यूल ही ऐसा है। मैं चाह कर भी वक्त से खा-पी और सो नहीं सकती। भागदौड़ के बावजूद बेवक्त हो ही जाता है। सुबह पांच बजे का अलार्म लगाती हूं परन्तु सवा पांच बजे उठती हूं। अपना काम खत्म कर, नहा-धो कर ही चाय पीती हूं। फिर पाठ करती हूं। पाठ मैं अवश्य करती हूं। इतने में सवा छः बज जाते हैं। पन्द्रह मिनट में मैं तैयार हो जाती हूं। साथ ले जाने वाली हर चीज अपने पर्स के पास रख लेती हूं। साढ़े छः बजे ट्यूशन पढ़ने वाले आ जाते। दो ग्रुपों को पढ़ा कर मैं साढ़े आठ बजे घर से चल देती। कॉलेज से पौने तीन बजे घर पहुंचती। साढ़े तीन से साढ़े पांच तक फिर स्कूल के छोटे बच्चों को पढ़ाती हूं। फिर आधा घंटा रैस्ट। चाय-पानी पीती ह। छ: से आठ बजे तक नौवीं-दसवीं के दो ग्रपों के बच्चे पढ़ने आते हैं। बाद में रात का खाना बनाने की ड्यूटी मेरी होती। बस इसी तरह रात के दस बज जाते। कई बार मैं बहुत अधिक थक जाती हूं। इतवार या छुट्टी के दिन थोड़ा सा रैस्ट हो पाता है। हां सच! मेरे पास प्लस टू के तीन स्टूडेंट और भी पढ़ने आते हैं। वह मम्मी-डैडी के मुंह मुलाहजे के कारण आते हैं। मेरे डैडी कहते हैं, ‘बेटा, जब भी कोई कुछ पूछने के लिए आए, उसे मना नहीं करना चाहिए। आखिर विद्या दान सब से बड़ा दान होता है।”

पास में बैठी दादी कहती है, “भूरी, हाथ से कुछ दान-पुण्य भी किया करो। ताकि तुम्हारा ‘योग’ जल्दी खुल जाए।”

विवाह का योग खुलवाने के लिए दादी ने एक बार मुझसे चौराहे पर झाडू फिकवाया। झाडू खुल जाएगा और तुम्हारा योग खुल जाएगा। कितने ही महीने बीत गए। योग न खुला। फिर एक दिन दादी ने मेरे हाथ में ताला थमा दिया, कहा, इसे बंद कर चौराहे पर रख देना। कुंजी साथ में ही लगे रहने देना। नया ताला देख कर कोई भी उसे उठा ले जाएगा। जैसे ही वह ताला खोलेगा, तुम्हारा योग खुल जाएगा।

मेरे इंकार करने के बावजूद दादी ने मुझसे ऐसा ही करवाया। ताला रखे भी एक साल बीत गया। पता नहीं, योग कब खुलेगा। मैंने दादी से कह दिया, आगे से मैं ऐसे कोई भी काम नहीं करूंगी।

दादी फिर भी कोई न कोई उपाय करती रहती है। कभी मेरा हाथ लगवा कर कुछ करेगी। कभी सोए हुए मुझ पर फूंक मारेगी। ट्यूब को भी लाटू कहेगी। मैं कहती, दादी, तुम दीवार की ओर मुंह करके सो जाओ। रोशनी नहीं पड़ेगी। तब कहती, दीवार से सीलन की बदबू आती है।

हमारा घर बहुत पुराना है। प्लस्तर तक उतरने लगा है। मगर डैडी कहते हैं, दो-चार सालों में रंग-रोगन करवाएंगे। जरा हाथ खुला हो जाए।”

मेरा छोटा भाई सऊदी अरब जाने वाला है। उस पर भी खर्च होगा। वह बहुत खुश है। मगर मां को लगता है, पापी पेट की खातिर लोगों को देस से परदेस जाना पड़ता है। सारी उम्र यह छोटा-सा पेट नहीं भरता। वह भाई को समझाने लगती, “वहां हिम्मत से रहना। अपनी सेहत का ध्यान रखना।

भाई कहता, जब मैं वहां से पैसे भेजूंगा, तब सब से पहले घर में रंग-रोगन करवाना।

हमारे डैडी को अपने इस पुश्तैनी घर से बहुत प्यार है। वह अक्सर अपने बचपन की बातें करते। अपने लंगेटिया यार की मृत्यु पर वह बेहाल हो गए। दादी ने उनकी बहुत सेवा की। दादी बहुत हिम्मत वाली है। संयम वाली। मगर कई बार रात को बहुत शोर मचाने लगती है।

अखबार में कश्मीर में भूचाल की खबर पढ़ने और उसी समय दादी द्वारा लाईट बुझा देने के शोर के कारण मैं कांपने लगी। मुझे एक बरस पहले आए भूचाल की याद आ गई। जब कई घर ढह गए थे। हमारे पुराने घर की दीवार दरक गई थी लेकिन शुक्र है कि कोई नुकसान नहीं हुआ था।

मुझे ऐसे ही कुछ पुरानी बातें याद आती रहती हैं। एक हफ्ता पहले… कुछ छोटे बच्चे हमारे घर के सामने गेंद से खेल रहे थे। गेंद पड़ोसियों के घर चली गई। एक लड़का जब गेंद ले कर वापस आने लगा, तब पड़ोसी घर के लड़के ने उसकी कमर में जोर से लात लगाई। वह लड़का दर्द से बिलबिला उठा। पड़ोसियों को अपने पैसे का बहुत घमंड है। उन्हें चाहिए, वह अपने बच्चों को तमीज दे। बस ऐसी बहुत सारी बातें मेरे मन में कहीं न कहीं अटकी रह जाती है।

परसों हमारी बुआ वापस गई। इस बार वह पूरी फैमिली के साथ हमारे यहां आई थी। वैसे भी बुआ का बहुत रौब है। उसके आगे घर का कोई सदस्य बोल नहीं पाता। मगर मम्मी को बुरा लगा, कहने लगी, “ऐसे रौब का क्या करना है। जुबान की पक्की नहीं। हम से वायदा करके मुकर गई। लड़कों की कोई कमी है क्या। मेरी बेटी क्या अंधी-कानी है?”

बुआ की वायदा खिलाफी का हम सभी को बहुत बुरा लगा। पिछली बार उसने विलायत में रिश्ता करवाने की बात कही थी। इस बार चार दिनों में उसने एक बार भी यह बात न छेड़ी। बात छेड़ने पर कहने लगी, वहां के लड़के यहां की लड़कियों साथ ब्याह नहीं करवाते। यहां-वहां के लाईफ स्टाइल में बहुत अंतर है। ज्यादातर लोगों की आपसी सैटिंग नहीं बैठती। जल्दी डाइवोर्स हो जाते हैं। तुम लोग कहते हो तो मैं जा कर ट्राई कर लूंगी। वैसे है तो डिफीकल्ट।”

हमारी बिट्टी दसवीं तक पढ़ी है। बुआ के कहने पर हमने उसे सिलाई-कढ़ाई और पार्लर का कोर्स करवा दिया। तब बुआ ने कह दिया, उनकी डिमांड बहुत है। पहली बार बुआ ने ऐसा किया। शायद बुआ की भी कोई मजबूरी रही होगी।

मेरा और बिट्टी का चार महीने का ही अंतर है। उसने जल्दी ही पढ़ाई छोड़ दी। मैं पढ़ती रही। मैं सभी भाई-बहनों में बड़ी हूं। उन्होंने मुझे लड़कों की तरह पाला। वह हमेशा कहते, मेरे शेर पुत्तर क्या कर रहे हो? डैडी ने मुझे जापान की ‘सिटीजन’ घड़ी गिफ्ट की थी। मैं भी लड़कों की तरह बोलने लगी थी।

बी.एड. करने के बाद मझे कॉलेज में जॉब मिल गई। स्कल से बढिया है। अभी अस्थाई है। अब गौरमिंट की वैकेंसी निकली है। मेरे सेवटी-सेवन प्रतिशत नंबर है। एम.ए. के अलग। उम्मीद है, रिजर्व कैटगरी में से मेरा नंबर लग जाएगा।

कॉलेज के सड़ियल राधे-श्याम ने मेरा दिल तोड़ कर रख दिया, “मैडम, आप का नंबर लगना नाममकिन है। मैरिट काफी ऊंची जाती है।”

जल-भुन कर घर पहुंची। किसी बात पर मां से ऊंची आवाज में बोल उठी। तब बुआ कहने लगी, “भूरी, अपनी मां से कैसे बात कर रही है? यह तुम्हारा कालेज नहीं, घर है। मां, यह किस पर गई है?”

मैंने बुआ के गले में बांहें डाल कर कहा, “बुआ, मैं भतीजी आप की ही हूं।” मैंने बुआ से सॉरी कहा और बिना खाना खाए ही अंदर जा कर लेट गई।

थोड़ी ही देर बाद मम्मी ने आ कर समझाया, “किसी की बात को दिल से नहीं लगाना चाहिए। जो करेगा भगवान करेगा।”

सच में, मुझे कई बार बहुत गुस्सा आ जाता है। मेरे कॉलेज की कुलीग जगदीप मैडम ने मुझे एक बार समझाया, “भरपूर मैडम, सोचने से पहले ठंडे दिमाग से सोचा करो। गुस्से से आदमी की अक्ल मारी जाती है। पहले तोलो फिर बोलो।”

उनकी बात मेरे मन में बैठ गई।

एक बार कॉलेज में टी-पार्टी चल रही थी। मेरे धीरे-धीरे खाने पर प्रिंसीपल सर ने मुझे कई बार छेड़ा। घर आकर मैं सोचती रही, उन्होंने केवल मुझे ही यह सब क्यों कहा।

अगले दिन मैंने यह बात जगदीप मैडम से कही। उन्होंने कहा, यह सिर्फ मजाक की बात थी। सभी हंस रहे थे। लेकिन मुझे मजाक पसंद नहीं। मैडम ने कहा, “कभी-कभी मजाक कर लेना चाहिए। दिमाग पर अधिक बोझ नहीं डालना चाहिए। वैसे क्या तुम भूल गई कि गुस्सा नहीं करना। दिमाग को किसी सकारात्मक काम में लगाए रखो।”

मैं थोड़ी रिलैक्स हुई। उन्होंने फिर कहा, “अपने वीक स्टूडेंटस की एक्सट्रा क्लास ले लिया करो। लाइब्रेरी जा कर किताबें पढ़ा करो।” और भी बहुत कुछ समझाया उन्होंने।

कई दिनों बाद प्रिंसीपल सर आफिस के सामने मिल गए। पूछने लगे, “भरपूर मैडम, नाराज हो क्या?”

मैंने कहा, “नहीं सर, आपसे क्या नाराज होना। आप मेरे फादर समान हैं।”

फिर जाकर मेरे मन को शांति मिली।

बुआ के साथ हुई बात के समय भी दादी ने मेरा साथ दिया। मेरे हर दम काम में लगे रहने की तारीफ की।

दादी हम सभी से बहत प्यार करती है। बिट्री उनसे शरारतें करती। उसके दिमाग में लंदन बैठ गया। बुआ की वायदा खिलाफी के कारण छोटी मम्मी उससे चिढ़ने लगी। मेरी मम्मी ने समझाया, “ऐसे मन छोटा मत करो। वो दस दिन की मेहमान है। फिर चली जाएगी। पता नहीं अगली बार कब आए।”

मां की बात सुन कर मैं सोचने लगी, हम भी बुआ की तरह कभी-कभी यहां आया करेंगी। अपने ही घर में मेहमान बन जाएगी। हमारी भाभियां भी हमारे बारे में इसी प्रकार सोचा करेगी। मैंने कभी किसी से कोई बड़ा वायदा नहीं किया। मैं अपनी जुबान की पक्की रहती हूं।

इस बार बुआ के सारे परिवार के कारण हम सभी बहुत थक गए थे।

एक दिन दादी ने बुआ की बड़ी बहू को बातों में लगा कर, उससे काफी सारी बातें उगलवा ली। उसने बताया, बुआ, उसे पति के साथ नहीं सोने देती। हमारी इस बुआ की किस्मत अच्छी है। इसके पास बहुत पैसा है। फूफा जी वहां एंबैसी में काम करते हैं। उनका यहां आना-जाना एकदम फ्री है। एयरपोर्ट पर रहने के लिए कमरा मिल जाता है। इसलिए उन्होंने बारी-बारी से दोनों बहुओं को विजिटर वीजा पर इंग्लैंड घूमने के लिए बुला लिया था।

बुआ की बड़ी बहु बहुत संयम वाली थी। बुआ हर समय उसे कोसती कि वह सुन्दर नहीं। इस बारे में पूछने पर उसने बताया, तुम्हारे भाई बहुत अच्छे हैं। उनके कारण ही वह सास की बात का बुरा नहीं मानती। मम्मी को मैं सुन्दर नहीं लगती हूंगी, तभी तो कहते होंगे। यह उनका नजरिया है। वैसे तो मुझ में कोई कमी नहीं। एक दिन खुद यह कहना बंद कर देंगे।

बुआ की छोटी बहू का स्वभाव थोड़ा अलग है। वह गांव में नहीं रहना चाहती। वह अपने मायके में रहती है। हमारा भाई फ्रांस में रहता है। बुआ की दोनों बहुएं मैडिकल में पढ़ रही हैं, दोनों एक-दूसरे की कजिन हैं परन्तु दोनों के स्वभाव में जमीन-आसमान का अंतर है।

सोचते हुए लगता, बुआ अच्छा नहीं करती, अपने बेटे-बहु को आपस में मिलने नहीं देती। दोनों एक-दूसरे के बगैर तड़पते हैं। बुआ ने यहां आने के कारण अपनी दोनों बहुओं को यहां मिलने के लिए बुला लिया था। बुआ के इंग्लैंड जाने पर दोनों बहुएं वापस अपने मायके चली जाएंगी।

एक दिन बुआ बाजार जाने के लिए स्टोर में कपड़े बदलने के लिए गई। बुआ के लड़के मीऊ ने आकर एकदम अपनी बीवी सुच्ची की बांह पकड़ी और उसे कमरे में खींच लिया। जोर से बांह पकड़ने पर सुच्ची की चीख निकल गई। बुआ ने उसकी चीख सुन ली। स्टोर से निकल बुआ सुच्ची सुच्ची कह पुकारने लगी। उसने चारों ओर कमरों की ओर नजर घुमाते हुए कनिका से पूछा, “सुच्ची कहां है?”

“बुआ जी, वह टॉयलेट में है। उसके पेट में मरोड़ उठ रहा था।”

“अच्छा, मैं भाभी के साथ बाजार से होकर अभी आई। उसे कह देना, अपना सामान इकट्ठा करे। मैं आकर पैक करूंगी।” बुआ ने पर्स उठाते हुए कहा।

उसके जाने के बाद हम खूब हंसे। रात को भाभी ने मम्मी से बात की, मम्मी ने बुआ से। इस प्रकार सुच्ची को मीऊ के पास जाने की इजाजत मिली। बुआ ने साथ ही ताड़ना की, “सुच्ची प्रीकोशन जरूर लेना।”

हमारी दादी मुंह पर दुपट्टा करके हंसती रही। सुबह सात बजे खिले चेहरे से मीऊ छत से नीचे आया। आधे घंटे बाद शर्माती सुच्ची नीचे आई। बुआ ने एकदम उसे अपने पास बिठा लिया, “हम आज चले जाएंगे। ध्यान रखना, अगर दिन ऊपर हो गए तो…हमें अभी बेबी नहीं चाहिए। तुम्हें मालूम है न छोटी जल्दी फंस गई थी। पेपर बनवाने में मुश्किल हो जाएगी। पहले अपनी पढ़ाई पूरी कर लो। बाकी सब उधर आने पर…। समझ रही है न मेरी बात!”

“जी मम्मी जी! सुच्ची नजरें झुकाए बैठी रही। ‘जी मम्मी जी,’ से आगे बुआ का कोई बच्चा नहीं बोलता। अच्छा लगता है। सभी बुआ का कहना मानते हैं।

इस बार बुआ कुछ बदली-बदली सी लगी। पहले वह सभी के लिए कुछ न कुछ ले कर आती। आते ही सभी में सामान बांट देती। इस बार वह चुप ही रही। चलने से पहले उसने डैडी को जैकेट दी। चाचा जी को जर्सी। दोनों भतीजों को बाजार से ट्रैक सूट ला कर दिया। कहने लगी, “मुझे इनके माप का पता नहीं था।”

जिस दिन बुआ आई। उनके पास ढेर सारा सामान था। दस-बारह बड़े बड़े अटैचीकेस। हमने सोचा, इस बार बुआ बहुत माल लेकर आई होगी। बुआ ने आते ही अपने ढेर सारे मैले कपड़े दोनों भाभियों को धोने के लिए दे दिए। एक दिन धीरे से मम्मी से कहने लगी, “अब भूरी के लिए लड़का तलाश करो। इस के फेस पर ‘ग्लो’ नहीं रहा। ऐज बढ़ने से ग्लो और भी कम हो जाएगा। पिछली बार जब मैं आई थी, इसके चेहरे पर ग्लो था। मगर अब देखो कैसा ड्राई सा लग रहा है।”

मुझसे कहने लगी, “भूरी, चेहरे पर चमक वाला फेस पैक लगाया करो। तेजी, हर्बल वाला यूज करती और मैं पॉडज का।”

रात को खाने से पहले मां-बेटी चेहरे पर फेस पैक लगा कर बैठ गई। दादी के बलाने पर बआ और उसकी बेटी तेजिंदर ने कोई जवाब नहीं दिया। मगर दादी लगातार बोलती रही। चेहरा धोने के बाद तेजिंदर बोली. “हमने सुन्दर लगने के लिए चेहरे पर फेस पैक लगाया था।” दादी कहने लगी, “फिट्टे मुंह! तुम तो भगवान की ओर से ही गोरी-चिट्टी हो।”

तेजिंदर दादी की बातों पर हंसते-हंसते दोहरी होने लगी। हम अपनी दादी को ‘भाबी’ कहते हैं। रात को खाने के बाद सभी एक साथ बैठे। बुआ कहने लगी, “मैं इस साल तेजी की शादी कर दूंगी। मैं अपनी लड़की को तीस किलो गोल्ड दूंगी। ऐसी मैरिज करूंगी, लोग देखते रह जाएंगे।”

मम्मी कहने लगी, “जिसके पास जितना होता है, उतना हर कोई देता है। अपनी बेटी को कोई भी घर से खाली हाथ नहीं भेजता। बाकी ऊपर वाले की मर्जी। तुम्हें तो इस घर का पता ही है। यहां हमने रुखी-मिस्सी खा कर भी गुजारा किया है। अब तो फिर भी सुख से घी से ‘चुपड़ी रोटी खाते हैं।’

मम्मी की बात सुन कर बुआ एकदम चुप हो गई।

मम्मी बताया करती थी कि हमारे डैडी अकेले कमाने वाले थे। वह कुवैत गए। पहली बार वह सात सालों के बाद घर आए। उसके बाद तो फिर भी दो सालों के बाद दो महीने की छुट्टी में आते रहे। बवासीर हो जाने के कारण उन्हें वहां से वापस आना पड़ा। वह काफी कमजोर हो गए थे। हमारे चाचा भी बहुत अच्छे हैं। दोनों भाईयों में आपसी प्रेम है। मकान सारा मेरे डैडी ने बनवा कर दिया। अभी भी हमारा काम-काज इकट्ठा है। मेरी छोटी मम्मी भाव चाची भी मेरे मम्मी-डैडी का बहुत सम्मान करती हैं।

मेरी बड़ी बहन-जीजा का भी यही हाल है। हमारे जीजा ने दो बराबर के मकान बनाए। एक अपना, एक अपने भाई के लिए। मेरे जीजा जी दुबई में रहते हैं। उन्होंने बाद में अपने भाई को भी वहां बुला लिया। कुछ समय पहले ही उसका विवाह किया। दोनों भाइयों के घर में एक-एक लड़की है। दोनों देवरानी-जेठानी बड़े-बड़े घरों में अकेली रहती हैं। खाना इकट्टा बनता है।

एक बार मैं दीदी के घर रहने गई। इतने बड़े खाली घर में मुझे डर लगने लगा। मैंने बहन से कहा, ‘तुम कैसे अकेली रह लेती हो। तुम्हें डर नहीं लगता। जीजा जी से कहो, वापस यहीं आ जाएं।’ वह कहने लगी, ‘पापी पेट का सवाल है। “कमाने के लिए गए हैं। यहां कोई कमाई नहीं है। मुश्किल से रोटी चलती। हमें इन कोठियों में डर नहीं लगता। हमें तो यहीं रहना है। तुझे डर लगता है तो तू जा।”

मैं वहां एक रात रह कर वापस आ गई। मेरे घर में हरदम रौनक लगी रहती है। मेरा बड़ा भाई कितना ऊधम मचाता था। विवाह के बाद एकदम से बदल गया। अब चुप रहने लगा। उसका काम बढ़िया है। इसलिए हमारी भाभी अकड में रहती है। इस तरह दिखाती है जैसे उसके पति की कमाई से ही यह घर चलता हो। उसे यह मालम नहीं. भाई को यहां तक पहुंचाने वाला कौन है। मम्मी कहती है, ‘इन्सान को अपना पहला वक्त कभी नहीं भूलना चाहिए।’

हमारी मम्मी का बहुत बड़ा जिगरा है। वह सब कुछ देखती है मगर चुप रहती है। हमें समझाते हुए कहती है, “औरत को धरती समान सहनशील होना चाहिए। वक्त सब कुछ सिखा देता है। ….तुम्हारी भाभी भी खुद ही समझ जाएगी।”

मैं मम्मी जैसी नहीं बन सकती। वो पता नहीं किस मिट्टी की बनी है। बहुत ही हिम्मत वाली। मम्मी डैडी से पन्द्रह बरस छोटी है। इस बारे में वो कहती है, ‘बेटा, रिश्ते निभाने से बनते हैं। रिश्तों में काफी कुछ सहन करना पड़ता है।’

जिद करके मैंने एक दिन उनसे पूछा, “मम्मी, आप को यहां आ कर कैसा लगा?” पहले वह कुछ न बोली। फिर मुश्किल से उन्होंने बताया, “पहले-पहल मेरा दिल यहां नहीं लगता था। तुम्हारे डैडी से मुझे डर लगता था। तुम्हारी दादी बहुत लाड़-चाव करती थी। छोटी उम्र में विवाह हो गया। पुत्तर, जो नसीब में लिखा होगा, वहीं मिलता है। माथे का नसीब कोई बदल नहीं सकता।”

एक दिन कॉलेज में जगदीप मैडम कहने लगी, “किसी से नफरत नहीं करनी चाहिए। अच्छे-बुरे, अपने-पराए के साथ हमें इस समाज में ही रहना होता है। हमें प्यार से बुरे लोगों को अच्छे रास्ते पर लाना चाहिए। प्यार में बहुत ताकत होती है।”

मैंने कहा, “प्यार में ताकत! इस बारे में मैंने किताबों में ही पढ़ा है। वैसे मुझे अभी तक ऐसा कोई गहरा एहसास नहीं हुआ मैडम।”

जगदीप मैडम कहने लगी, “तुम्हारी बात गलत नहीं। जब तुम्हें प्यार हुआ, एहसास हुआ, उस समय हमें जरूर बताना।”

मैंने कहा, “मुझे अपने मां-बाप, भाई-बहनों, सारे परिवार से ही बहुत प्रेम है। खुद से भी बहुत प्यार है।” जब मैं अपने बारे में सोचती हूं, मुझे बहुत अच्छा लगता है। मैं अपने मां-बाप की आज्ञाकारी बेटी हूं। बेटी होने के कारण मुझे खुद पर गर्व होने लगता। जबकि पहले-पहल मैं खुद को लड़का ही समझती रही।

लड़की होने का एक किस्सा मुझे याद आ गया। एक दिन बस कंडक्टर ने मुझसे बदतमीजी की। बस में भीड़ थी। मेरे हाथ पर हाथ रख कर, हंसते हुए बोला, ‘यार, तुम बहुत चुप रहती हो। हमारे साथ कोई गल-बात नहीं करती।’

कितनी ही सवारियां वहां खड़ी थी। उसने मेरे पैर पर पैर रखते हुए कहा, “टिकट ले लो जी।”

मैंने मुश्किल से पर्स से पांच का नोट निकाला। टिकट छः रुपए का था। कंडक्टर हमेशा मुझसे पांच रुपए से अधिक लेता परन्तु टिकट न देता। पांच रुपए अपने थैले में डाल लेता। एक दिन मैंने उससे टिकट की मांग की। लेकिन उसने टिकट न दिया। मुझे गुस्सा बहुत आया। मुझे मम्मी की बात याद आई, ‘अपनी इज्जत अपने हाथ में होती है। तुम चुपचाप घर आया करो।’

बाद में मुझे पता लगा, रोज आने-जाने वाली सवारियों को कंडक्टर टिकट देता ही नहीं था। एक-दो रुपए कम लेकर बाकी पैसे अपनी जेब में डाल लेता था।

दूसरी बार मुझे लड़की होने का गहरा एहसास हुआ। सुबह से ही मेरा मूड खराब था। सुबह के समय गांव में और कोई बस नहीं आती थी। वापस में आने वाली बस का कंडक्टर अच्छा आदमी था।

तब मैंने पक्का मन बना लिया, अब मुझे कराटे सीखना है। लड़कियों को बोल्ड होना चाहिए। ऐसी बातों से मुझे बहुत डर लगता है। हाय! लड़कियों को क्या कुछ सहन करना पड़ता है। मुझे अमन का ध्यान आ गया।

अमन के साथ कितना बुरा हुआ था। बहुत ही बुरा! उसने बहुत सहन किया। वह मुझसे मिलने कॉलेज आई। चुप-चुप रही। ज्यादा खुल कर बात नहीं की। हालांकि उसे देख मुझे कॉलेज के बीते पांच वर्ष याद आ गए। कई बार अमन खुश हो कर बताती, आज मैं क्लास में अकेली थी। सर ने मुझे गीत सुनाया। वह कभी क्लास मिस नहीं करती थी। वह कहती, मैं हंडरेड परसेंट लैक्चर पूरे कर, एनयुल फंक्शन में ‘पंक्चूअल गर्ल’ का प्राईज लूंगी।’

एक बार क्लास के सभी चौदह विद्यार्थियों ने क्लास मिस की। मैं और सरोज दरवाजे के बाहर खड़े हो गए। अमन अकेली ही क्लास में थी। सर ने गाना गाया, ‘होंठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो…।’

अगले दिन हमने बहुत बार सर से गीत सुनाने को कहा, मगर उन्होंने गीत ना सुनाया बल्कि कहने लगे, ‘जो स्टूडेंट अनुशासन में नहीं रहते. मैं उन्हें गीत नहीं सुनाता।”

उस दिन कॉलेज में मैंने और अमन ने बहुत-सी यादें ताजा की। वह बुझी-बुझी सी रही। मैंने कहा, “अमन, तुम तो यू. के. में रह कर भी कितनी कमजोर हो गई हो।”

कहने लगी, “थैक्स कर मैं जीवित हूं। वहां मर नहीं गई।’

बेचारी रोने लगी। रोते हुए बताने लगी, “वहां सब अच्छा नहीं है। मेरे हस्बैंड को मुझ में कोई इंटरेस्ट ही नहीं। उसका वहां किसी और से चक्कर है। एक के साथ नहीं कइयों के साथ। वह कहता है, तुम ऐसे रह सकती हो तो रहो। इंजुआए करो। विवाह के एक साल बाद ही वह लडके-लडकियों को घर लाने लगा। मझे उनके लिए फड तैयार करने, उनके पास बैठने को कहने लगा।” अमन ने बताया, उसके लिए यह सब सहन करना मुश्किल था। वो सब बहत शोर मचाते। डिक करते…और भी बहुत कुछ था। वह अपने मम्मी-डैडी से अलग रहता था…।”

उसने रोते हुए बताया, “अब उसका डाइवोर्स हो चुका है। तीन साल पहले मैरिज बेस पर वह यू.के. गई थी। अब उसे वापस नहीं जाना।” मैंने कहा, “शुक्र है, तेरा कोई ईशू नहीं हुआ।” कहने लगी, “हम में ऐसा कुछ था ही नहीं।”

कुछ क्षण हम खामोश बैठी रही। थोड़ी देर बाद अक्षय सर स्टाफ-रूम में आए। मैंने उन्हें अमन के आने के बारे में बताया। उन्होंने अमन को देखा। उसने सर को नमस्ते की। अमन के कहने पर सर ने वही पुराना गीत सुनाया। मैंने पहली बार उनका गीत सुना था। उनकी आवाज सच में बहुत बढ़िया थी। अब तक अमन मायूस थी परन्तु गीत सुनने के बाद उसका मूड ठीक हो गया।

मैं उसके बाद इसलिए खुश हो गई क्योंकि मेरे सिर पर लटकती रिश्ते की तलवार उतर चुकी थी। दो दिन मैं बहुत टैंशन में रही। लड़का मालूम नहीं कैसा होगा। मैं मां से पूछताछ करती रहती। मम्मी कहती, “पूरी पड़ताल करके ही रिश्ता करेंगे।”

बाद में मालूम हुआ कि लड़का बहुत शराब पीता था। वैसे वह इंजीनियर था। डैडी ने इंकार कर दिया। अच्छा हुआ। वरना सारी उम्र रोना पड़ता। मुझे वैसे भी नशे-पत्ती से नफरत है।

मम्मी को हरदम मेरे विवाह की चिन्ता लगी रहती। अमन के बारे में सुन कर तो और भी डर लगने लगा था। अमन जाते समय मेरी घड़ी की ओर कहने लगी, ‘तुम्हारी वाँच नाईस है।’ मैंने कहा, ‘डैडी ने गिफ्ट की है।’

कहने लगी, ‘मेरे डैडी भी मुझे बहुत प्यार करते हैं। डैडी अच्छे होते हैं। अपने डैडी के कारण ही मैं आज यहां हूं। मेरे डैडी खुद मुझे इंग्लैंड से वापस ले कर आए। आई लव मॉय डैड सो मच।”

अमन डेढ़ घंटा हमारे पास रही। जाते समय कहने लगी, “मेरी जिन्दगी में तो काला धब्बा लग गया।”

मैंने कहा, “छोड़ो ऐसी बातें। बुरा सपना समझ कर भूल जाओ।” हालांकि मैं अभी तक इसी बारे में सोच रही हूं।

सच में अमन के साथ बहुत ही बुरा हुआ। मैंने घर जा कर मम्मी को अमन के बारे में बताया। सारी बात सन कर मम्मी का मन भी मायस हो गया, “लड़कियों की किस्मत से डर लगता है। अच्छे आदमी मिल जाए तो जान सुखी रहती है वरना…।” मम्मी कहानियां ले कर बैठ गई।

उस दिन मैंने अमन और सरोज को बहुत याद किया। कॉलेज में मैं और सरोज बहुत शरारती थीं। जो टीचर हमें पसंद न आता, हम उसकी क्लास न लेते। अक्षय सर की क्लास भी हमने बहुत कम ली थी।

नए आए राजेश सर बहुत अकड़ दिखाते। छोटी-छोटी बात पर डांटने लगते। कभी पांच मिनट लेट हो जाने पर, या टेस्ट तैयार ना होने पर, राजेश सर एकदम क्लास से बाहर निकाल देते। हमने उनके लेक्चर में जाना ही छोड़ दिया। जैसा वह पढ़ाते थे, हम खुद ही पढ़ लेते थे। मेहनत की और अच्छे नंबर लिए।

एक बार सरोज की बात करते हुए मैंने कहा, ‘सरोज अच्छी लड़की थी।’

राजेश सर तुनक कर बोले, “पंगे लेने में तुम और सरोज हमेशा आगे रहती थी। जिस सरोज को तुम अच्छा कह रही हो। मालूम वह मुझसे क्या कहती थी।”

मैंने उनकी ओर हैरानी से देखा, “क्या कहती थी सर?”

तब सर ने एक नया भेद मेरे सामने खोला। उन्होंने कहा, “वह कहती थी, सर, मैं जब आप को देखती हूं, मुझे कुछ होने लगता है। अगले साल या आप कॉलेज छोड़ दे या मुझे छोड़ना पड़ेगा।”

“हूं…। सर, वह ऐसी लड़की नहीं थी।” मेरी आंखें फटी रह गईं। सर का मुंह चमकने लगा।

“मैं कब कहता हूं, वह ऐसी थी। वह अच्छी थी। जिसने अपनी बात कहने की हिम्मत की। मैंने उसे तभी कह दिया, “सुनो, मेरी नौकरी का सवाल है। तुम्हारे लिए और भी कॉलेज हैं।”

“अच्छा सर, यकीन नहीं होता। वह हर बात मुझ से शेयर करती थी। वह मेरी पक्की सहेली थी।” मेरे हाथ में पकड़ा पेन स्वयं ही मेरे दांतों में आ गया।”

“तुम्हारी पक्की सहेली जरूर थी। मगर जरूरी नहीं, वह अपने दिल का प्रत्येक भेद तुम्हें बताती। कई बातें ऐसी होती है लड़की, जिसे इन्सान किसी से भी शेयर नहीं करता। मेरी एक बात और ध्यान से सुनो। पल्ले बांध लो। किसी पर भी हद से अधिक यकीन नहीं करना चाहिए। चाहे वह कोई भी हो…।”

कह कर राजेश सर ने गर्व से अक्षय सर की ओर देखा। वह कुछ न बोले। पास बैठे वरुण सर ने कहा, “यकीन तो सर, आदमी खुद पर भी नहीं कर सकता।”

दोनों एक-दूसरे के हाथ पर हाथ रख कर भेद भरे अंदाज में हंस दिए। हम सभी हैरान। राजेश सर ने वरूण से कहा, “लेक्चर फ्री है, चलो बाहर एक चक्कर लगा आते हैं।”

मुझसे चुप न रहा गया। मैंने कहा दिया, “सर, आप बाहर के चक्कर बहुत लगाते हैं।”

यह वही राजेश सर हैं, जिनकी क्लास हम मिस किया करते थे। जहां मैं पढ़ती रही थी, मुझे उसी कॉलेज में जॉब मिल गई थी। अक्षय सर भी हमें पढ़ाते रहे थे। वरुण सर, हमारे सीनियर थे। तभी मैं सभी के साथ गप्पें लगाया करती थी।

मुझे चक्कर में डाल कर, दोनों सर खुद चक्कर लगाने चल दिए। मुझे ऐसी बातें समझ में नहीं आती थी। …क्या सच में सरोज ने …सर से ऐसा कहा होगा। लेकिन सर झूठ क्यों बोलेंगे? सर ठीक ही कहते हैं, हमें किसी के दिल का क्या पता। मैं रात तक इस बात में अपना दिमाग खपाती रही। मुझे सरोज में ऐसी कोई बात नहीं दिखाई दी।

उस रात मेरा मन सरोज को फोन करने को हुआ। कलाई में पड़ी घड़ी में नजर डाली, ‘अंधेरा बहुत हो गया था।” मैंने खुद से कहा, “छोडो, भरपूर कौर! तेरा दिमाग तो खराब हुआ, उसका क्यों करना।”

ऐसी कई बातें मेरे दिमाग में पिसती रहती। उनसे छुटकारा पाने के लिए मैं अखबार पढ़ने लगी या कोई किताब।

बुआ के आने के कारण मैं कई दिनों तक अखबार पढ़ नहीं पाई थी। मैंने हफ्ते भर की अखबारें इकट्ठी कर के रखी थी। दादी खुर्राटे मार रही थी। मैंने सोचा, ठीक है, मैं आराम से अखबार पढ़ लेती हूँ।

मैंने अखबार उठा लिया। सबसे पहले ‘औरत दिवस विशेष अंक’ पर नजर गई। एक सुर्थी पर निगाह टिक गई, “औरत को एक दिन पूर्ण आजादी से मनाना चाहिए।’ बाकी सारा साल औरत भले गुलामी की जंजीरों में जकड़ी रहें। मेरे मुंह से खुद-ब-खुद निकला।

दूसरा पन्ना देखा। दूसरी खबर और भी बुरी, ‘नवजन्मी बच्ची कूड़े के ढेर से मिली। चिड़ियों-कौओं ने उसकी आंखें नोंच डाली थी। वहां निकट सिरंज, ग्लूकोस की बोतल, लहु से लिबड़े कपड़े और डॉक्टरी दास्ताने मिले।’

मेरा दिल खराब हो गया। मैंने सरसरी नजर दौड़ा कर, दूसरी अखबार की तीसरी खबर पढ़ीः ‘नव-ब्याहता दहेज की बलि चढ़ी।’ चौथी खबर थी: ‘चार वर्षीय बच्ची से दुष्कर्म।’

पांचवी खबर भी वैसी ही थी, ‘चलती रेलगाड़ी में लड़की से सामूहिक दुष्कर्म।”

हाय राम! सारी बुरी खबरें ही नजर आईं। मैं दुखी हो गई। हे राम! हमारे देश में बस यही कुछ बाकी रह गया। औरतों-बच्चियों पर होते अत्याचार कब बंद होंगे। जन्म से लेकर मौत तक औरत कहीं भी सेफ नहीं। अब तो जन्म लेने से पहले भी नहीं। मैंने सारी अखबार इकट्ठी करके एक ओर रख दी। मेरी आंखें भर आई,

मेरा भारत देश महान!

जहां पल-पल होता औरत जाति का अपमान।

मैंने कराटे सीखने का पक्का मन बना लिया। मेरी नींद उड़ गई। वक्त देखने के लिए मैंने मेज से घड़ी उठानी चाही। तभी दादी ऊंची आवाज में बोल उठी, “भूरी बेटा। इस बत्ती को आग लगा। लाटू बुझा दे।”

मैं अपने ही ध्यान में थी। डर कर चौंक गई। मेरा हाथ लग कर मेरी घड़ी नीचे गिर गई। मैंने कहा, “लो, टूट गई।” मेरी सांस रुक गई!

“सो जा…सो जा…।” दादी बोली।

मैंने तुरन्त घड़ी नीचे से उठाई। बार-बार देखी, ‘बच गई!’ मेरी जान में जान आई। मुझे इस घड़ी से बहुत प्यार है। उस समय मुझे मोह-प्यार का गहरा एहसास हुआ। रात के बारह बजे का समय था। बार-बार मैं घड़ी के शीशे पर पोर फिराते हुए कहने लगी, ‘अच्छा हुआ, बच गई। नहीं तो मेरी जान निकल जाती।’

मेरी नजर तेज चलती सूईयों पर जा टिकी। एक सूई तेज और दो धीमे चलती हुई। मेरे भीतर से आवाज उठी, “जिन्दगी की रफ्तार भी ऐसे ही है। कभी तेज कभी धीमी। समय ठहरता नहीं कभी, बस अपनी चाल चलता रहता है।”

मैंने पांच बजे का अलार्म लगा कर रात को बारह पांच पर घड़ी को अपनी कलाई पर सजा लिया। अब नहीं गिरेगी। दादी फिर से चीख उठी, “लड़की, मैं तेरी जान ले लूंगी।”

“नहीं दादी।” और मेरी अंगुली तुरन्त स्विच पर जा टिकी।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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