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गृहलक्ष्मी कहानियां

गीली लकड़ी की सुलगती देह को थामे वह भिखारी लड़खड़ाता हुआ फिर वहीं ठिठक गया। एक फटा सा टाट पैरों से हिलाकर बस जम गया उस पांचवी सीढ़ी पर। उस सुप्रसिद्ध धर्मस्थल की वह पांचवी सीढ़ी पांच वर्षों से उसका धाम, काम, नाम उसका स्थायी पता… हां यही सीढ़ी हो गयी थी। देर रात वो करीब सौ कदम दूरी पर बनी एक झुग्गी में जा एक दरी पर सिमट कर लेटा रहता। नींद तो आती न थी, बस आंखों में रात काट देता। कैसी लम्बी कांटें भरी रात। ये रात उसके लिए पांच वर्षों से भी ज्यादा बड़ी थी। सोया ही कहां था वो, न सर्दी में, न गरमी में, न बारिश में।

उफ! अगर उस पांचवी सीढ़ी का सहारा न होता तो। अगर वो पांचवी सीढ़ी वाला साधु जल समाधि न ले लेता तो क्या करता। क्या होता? और भी जाने क्या क्या उसके दिमाग में चलता जा रहा था। बेखबर धन्न, धन्न गिरते सिक्कों की उस मनभावन आवाज से भी बेखबर उसका निगोड़ा मन कहां- कहां जाया करता है। इतना सुन्दर दृश्य है यहां क्यों नहीं रमता भला?

इस धर्मस्थल पर एक माह का विशाल मेला लगा है। कितने अपरिचित और पहचाने, हां बहुतों को तो पहचानने लगा था और कुछ उसको भी पहचानते थे पर आजकल तो रोज विदेशी, परदेसी, स्त्री पुरुष बच्चे हजारों ही आते-जाते रहते थे। मगर उस भिखारी का मन कहां उड़ा उड़ा रहता था। बाकी भिखारी बड़े खुश रहते थे ‘‘मुआ पगला” ऐसे धन्ना सेठ लोग पधारे हैं और यह हाथ पसारकर एक दुआ नहीं देता। बावला एक दुआ यानि रुपयों की बौछार, अब यही तो समय था जब खूब कमाई हो सकती थी। उसके बाद तो बस कुछ विशेष दिनों में ही मिल पाती थी अच्छी भीख।

पर, उस उड़े-उड़े से पंछी को कौन क्या कहता? उल्टा वो सब तो खुश थे उसके हिस्से की रेजगारी भी उन्हीं के कटोरों में जा गिरती थी। आजकल तो देने वाले भी मनुहार, आग्रह की आवाज सुने बिना प्रतिक्रिया करते भी कहां हैं?

एक परिवार हंसता गाता चढ़ा आ रहा था उस पवित्र स्थान की सीढ़ियों पर। न जाने क्यों उस धुन पर उस बूढ़े भिखारी के कान एकदम कंपकंपा गये। उसका मन पंछी फड़फड़ा उठा वो वापस वर्तमान में लौट आया। सजग होकर उसने अपने दाढ़ी से भरे चेहरे को दांये-बांये घुमाया। दो चार लोग वो जानी पहचानी धुन गुनगुना रहे थे। उसका मन न जाने क्यों धक्-धक् करने लगा। पैरों की धम-धम करती आवाज उसके पास बहुत पास आ गयी। वो आवाजें अब भी आ रहीं थी। ओह! क्या वो कहीं अर्न्तध्र्यान हो जाये या फिर छिपा ले स्वयं को, क्या करे। खैर एक काला कपड़ा उसने अपने सर पर ढक कर आंखें छिपा लीं। अब वो आवाज दूर से आ रही थी। गुनगुनाना बन्द हो गया था और वो लोग शायद ऊपर चढ़ चुके थे। आहा! चले गये। उसने चट से कपड़ा गिराया और खुद को सहज कर लिया।

करीब पन्द्रह मिनट बाद उसने अपने आपको उन्हीें कुछ आवाजों की टकराहट से फिर आहत महसूस किया और करीब करीब मर जाने वाली दशा में आ गया, क्योंकि उसी के चारों ओर खड़े वो लोग कुछ फोटो खींच रहे थे, उछल रहे थे हंस बोल रहे थे। 

ये कैसे धर्म संकट में ला पटका उसे समय ने उसकी ऐसी दुर्दशा पर तो शायद कीट पतंग भी हास-परिहास करते। उनको कम से कम कोई पहचान तो नहीं सकता था। काश! वो सीढ़ी पर बैठा कुत्ता होता या बिल्ली ही बन जाता। ओह! अब क्या करे अरे, ये अधेड़ तो करीब करीब उस पर आ ही गिरा था। उसने खुद को सिकोड़ा और दाढ़ी के भीतर अपना चेहरा छिपा लिया। अब एक ही चारा था उसके पास, वह जड़ हो गया। ऐसा जैसे वहां था ही नहीं और ऐसा ही किया था उसने। पर ये निर्लज्ज नयन, ऐसे बावले होकर घूरे जा रहे थे उस अधेड़ को। उफ! फिर से उसका मन पंछी फड़फड़ाता पच्चीस वर्ष पीछे लौटता चला गया।

‘‘बाबा, पापा ऐसा बोलने का प्रयास करता वो चार साल का उसका बेटा कैसा बार-बार उसके पाजामे को खींचकर कुछ जिद कर रहा था। उसे दो रुपये चाहिए थे कुल्फी खानी थी। और उसके पास इतना सब्र भी न था कि अपने बाबा या पापा को पैसे निकालने का भी समय दे। हंसकर उसने बेटे को गोदी में थाम लिया और हंसते गाते हुए कुल्फी खरीदकर दे दी। उसकी गोदी में ही कुल्फी चाटते चाटते उसके नन्हे- मुन्ने ने कैसे उसका कुर्ता बिल्कुल मीठा-गीला-गीला कर डाला था। फिर उसने प्यार से हैण्डपम्प पर जाकर उसके भी हाथ धुलवाये और अपना कुर्ता भी साफ किया।”

धन्न -धन्न दो रुपये का सिक्का किसी ने उसके कटोरे पर डाला और फिर वापस लौटा अपने वर्तमान पर। 

एक नन्हा सा करीब तीन या चार वर्ष का प्यारा सा बच्चा था। ओह! ये तो उसका…..उसकी नस-नस में सिरहन दौड़ गयी। वह और सिकुड़ गया। अपनी ऐसी बुरी दशा उसे तब भी महसूस नहीं हुई थी जब बहू के दुत्कारने पर वो हापुड़ का वो कस्बा छोड़कर यहां लखनऊ भाग आया था। कैसे मीठी सी प्रार्थना की थी उसने बहू से ‘‘जरा सा एक कप चाय दे दो। सारा दिन आॅटो चलाकर थक गया हूं, जरा जिगर तर हो जायेगा।” पर बहू को जाने क्या हुआ कि उसने नजरअन्दाज करके कहा, जरा घण्टा भर रुको तुम्हारा बेटा दुकान से आयेगा तो दोनों की साथ बना दूंगी।” बस, रूंआसा मन लेकर वह पचपन साल का चुस्त बूढ़ा आॅटोरिक्शा चालक एक ही पल में कमजोर सा हो गया। तन से भी मन से भी। उसी वक्त चला गया घर छोड़कर सब छोड़कर, बस अपनी मृत पत्नी का एक फोटो ले आया।

ओह! कैसा फूट-फूट कर रोया था वो सुलभ शौचालयों में। कैसा बैचेन रहा हफ्तों तक, कैसा दुःख कैसा पगला सा गया था वरना उसमें बहुत दमखम था वो दिहाड़ी का काम भी कर सकता था। फिर से आॅटो किराये पर चला सकता था। लेकिन हापुड़ में ही रह गयी उसकी मजबूती। अब तो बस वो थोड़े दिन काटने भर को वो जी लेना चाहता था। पत्नी का फोटो छाती पर रखे कैसा विलाप करता था कभी कभी।

उफ! पर तब भी तो उसने उस जल समाधि मग्न साधु की जगह ली ही थी। तब भी खुद को तो संभाला ही। पर आज? आज! ये सब देखकर ? ? ? वो कहीं तार-तार होकर बिखर न जाये। ऐसा लगता था उसे। एकाएक उस अधेड़ के हाथों का स्पर्श उसने अपनी हथेली पर महसूस किया। एक करारा नोट थमा दिया था उसने और प्रणाम करके वो नीचे उतारता चला गया था। उसने आंसुआें की बारिश में उस नोट को सहेजा। जैसे तैसे भारी हाथों से नोट ऊपर उठाकर उजाले में देखा। वो सब चेहरे उसे उस नोट में गुनगुनाते नजर आये। उसने नोट छाती पर लगाया कई बार होंठों पर रखा, पर ये बावरे नयन, आज बस अपने मन की करने पर उतारू हो चले थे। वो किसी तरह आंखें डबडबाता, कपड़े से आंखों की लाली छिपाता हुआ उठा और लड़खड़ाता हुआ हौले- हौले अपने डेरे पर पहुंच गया। दरी पर घुटने टिकाकर दहाड़ें मार मार कर जो रोया था वो, उफ! तस्वीर में से देखती उसकी मृत पत्नी भी सुबक पड़ी थी शायद। हिचकी लेता लेता वो हौले से फुसफुसाया था अपनी पत्नी के कान में ‘‘देख”! आज बेटे की कमाई मिली है।”

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