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तपती मिट्टी-21 श्रेष्ठ नारीमन की कहानियां पंजाब: Nariman ki Kahaniyan
Tapti Mitti

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Nariman ki Kahaniyan: सुबह उठते ही मेरा सिर भारी था। हवा अजीब-सी लग रही थी। होंठ सूख रहे थे। मन बेचैन था। इतने में फोन बज उठा। बेटी रणजोध का नाम देख, कुछ तसल्ली हुई। उसके मम्मी कहने और स्वर से मन को मिली थोड़ी-सी खुशी भी सरक गई। उसकी बात तीखे ब्लेड-सी चीरती गई। ‘तुम चिन्ता ना करो, मैं आ जाऊंगी।’ इतना कह तो दिया परन्तु उसकी ढेर सारी चिन्ताओं ने मुझे कुचल डाला। सोचा, किससे बात करूं? यह बैठा है उसका बाप। इसे देख कर घिन आती है। इस आदमी को कुछ भी बताने का मन नहीं करता। यह अब भी वही कुछ करेगा, जो यह करता आया है। खुद पर झेला है सब, यह किसी योग्य होता तो कैसी चिन्ता होती। चिन्ताओं के पहाड़ तले दबी जा रही हूं। कुछ सूझता नहीं, मन घबराने लगा। चक्कर आया और आंखों के सामने अंधेरा पसर गया। सामने वैसा ही सफेद पहाड़ दिखाई दे रहा है। तेज तूफान के पीछे भागा नहीं जा रहा। लगता है, यह सारा तूफान मुझ पर ही आ कर गिरेगा। पल-क्षण का ही फासला है, जिन्दगी खत्म समझो।

उस सफेद पहाड़ ने काला रंग ले लिया। इससे बचना और भी मुश्किल है। यह पूरी कायनात को तबाह करता आ रहा है। भागती हूं। यह गड़गड़ाहट तो पीछा नहीं छोड़ रही। कान बहरे और शरीर सुन्न हो गया। धड़ाम से नीचे जा गिरी। तेज आवाज से मन कांपने लगा। पिछले कमरे का दरवाजा धड़ाक-धड़ाक बज रहा है। दरवाजा पीटते जोरावर की कड़कती आवाज से जैसे होश आया।

“अरे कब से पानी मांग रहा ह कहां चली गई?”

सुनते ही खुद को संभाला। अपने सूखे होंठों को पानी से तर कर, उसे पानी का गिलास देती हैं।

“आर. ओ. का है?”

“पी लो, और क्या तुम्हें किसी छप्पड़ का दिया है। सभी आर. ओ का ही पानी पीते हैं।”

खीझ के कारण मैंने ऐसा जवाब दिया। इसके जहरीले स्वर ने मेरे भीतर और भी जहर घोल दिया। क्या करूं, अंदर ही अंदर सुलगने की आदत हो गई है। परन्तु कभी-कभी मन उकताने भी लगता है। सारी उम्र इसकी हरकतों ने परेशान किया है। ऑपरेशन के दिन मैंने कहा, रणजोध को बुला ले। मुझे डपटते हुए बोला, “वो क्या यहां आ कर पहरा देंगी।” मैं चुप हो गई। कभी सीधे मुंह बात नहीं करता। बहुत मुश्किल से जीवन काटा है। इसे लेकर अस्पताल पहुंची। जाते ही कई टैस्ट किए गए। डॉक्टर ने बताया, ‘दोनों आंखों में सफेद मोतिया है।’

“डॉक्टर साब, अभी इतनी उम्र तो नहीं इनकी।” स्वाभाविकतावश मेरे मुंह से निकला।

“इसका उम्र से कोई ताल्लुक नहीं। हमारे रहन-सहन पर निर्भर करता है। कई बार गुस्से या अधिक बी. पी. से यह और भी भयानकता से आंखों में उतरता है। ऑपरेशन करना पड़ेगा। आपस में मशविरा कर लें।”

इससे पूछा, “कहने लगा, दरवाजे पर खड़े होने पर भी गली के मोड़ से आते आदमी को पहचान नहीं पाता। अब सोचना क्या है, ऑपरेशन करवा कर, काम खत्म करते हैं।”

“सारी उम्र मोड़ से आने वालों को देखते हुए अभी तक चैन नहीं आया।” परमात्मा का शुक्र है! तब तो यह माई का लाल चुप रहा। डॉक्टर को ऑपरेशन के लिए हामी भर दी। फीस दी और ऑपरेशन करवा कर अगले दिन घर आ गए। दो दिन आंखों पर पट्टी बंधी रही। आज पट्टी उतार कर काला चश्मा लगा लिया। सिर पर सफेद दस्तार बांध कर खुद को बहुत भक्त दिखाना चाह रहा है। सफेद रुमाल अभी भी हाथ पर बांध रखा है। इस रुमाल से मुझे बहुत भय लगता है।

डर क्या, मेरे भीतर सहम ही इस रुमाल कारण बैठ गया, वरना कभी का किनारा कर लेती। रिटायरमैंट के बाद तो दाढ़ी कलर करना छोड़ दिया, अब सफेद कटी दाढी भी सफेद गमछे व रुमाल के साथ मिल गई। अब मझे और भी डर लगने लगा है। पता नहीं, कब ये तीनों मिल कर मेरे पीछे पड़ जाएँ।

रणजोध के विवाह के बाद और भी बिदकने लगा। कहने लगा, “देखा, कैसा खबीखान घर ढूंढा है बेटी के लिए। इकलौता लड़का, इंजीनियरिंग कॉलेज का प्रोफेसर, कोई छोटी बात नहीं। तुम देख सकती थी, ऐसा रिश्ता। यह तो मेरी जान-पहचान थी। लड़का देखो, ऊंचे पद पर होकर भी हमें कैसे विनम्रता से मिलता है।”

इस बात की याद आते ही, फोन पर रणजोध की बातें सुन कर मेरी सांस फिर से अटकने लगी। यह तो खोखली बातें करते थकता नहीं। मुझे मालूम है, खुद तो पानी पी कर मजे से पड़ा है। लेकिन मैं कैसे बैठ सकती हूं। अब मेरे अंदर की कैसेटस चलने लगी। इस कैसट में कितनी ही कहानियां भरी हुई हैं। इन्हें सुन कर मेरी देह मिट्टी हो जाती है। मैं बेसुध हो जाती हूं। इस आदमी को कोई होश नहीं। इसे तो शाम को बोतल खोलते ही बर्फ, चखना, दही-रायता सब तड़का लगा चाहिए। मैं सारी उम्र इसी प्रकार बेलन-सी घूमती रही हूं।

फिर भी कहता है, तू अभी तक सुधरी नहीं। हां, मैं नहीं सुधरी। उन्हीं दिनों को याद करके लगता है कि मैंने अपनी देह का बेलन अपने ही हाथों से खरीद लिया हो। अब वही बेलन, मेरी देह और सोच पर घूमता रहता है। मुझे अधमरा कर दिया। मैं ना अब जिन्दा में हूं, ना मृतक हूं। कितनी मुश्किल से दिन काटे हैं, आखिर यह जीना भी किस काम का। बिरादरी में से भी अब कोई साथ खड़ा नहीं होता।

सोचती हूं, भगवान तो देता है परन्तु हम उसके वरदान के साथ धोखा करते हैं। मैं बी.एड. कर रही थी। पंजाबी विषय प्रो. मान पढ़ाते थे। उनके पढ़ाने का अंदाज ऐसा था कि सिलेबस का पता ही नहीं चलता था। क्लास में लंबा-सा नौजवान, महरून रंग की पगड़ी, सफेद कमीज-काली पैंट में दायां हाथ डाले, शिवकुमार बटालवीं के गीत गाता। उसे सुन कर मन झूम उठता था। उसे दूर से आते देख ही मेरा दिल धड़कने लगता। उसकी जेब से नीले बार्डर वाले सफेद रुमाल का किनारा मुझे नजर आता। दिसंबर सैमस्टर में मेरे सबसे अधिक नंबर आए। उसके काव्यमय अंदाज में दी गई मुबारकबाद में क्लास तालियों की गड़गड़ाहट से भर गई। मैं उसकी ओर खिंचने लगी। प्रो. मान की तीखी नजर ने इस बात को ताड़ लिया। एक दिन लाइब्रेरी में मुझे अकेले बैठ देख, वह मेरे पास आ गए। मुस्कुराते हुए बोले, ‘पम्मी बेटी, संगीत के समुद्र में तैरने वाला, कभी किसी की जिन्दगी को नदी में नहीं डूबने देगा। ऐसा मेरा विश्वास है। बाकी जोरावर जैसा सुन्दर नौजवान कहीं मिल सकता है। अपने मन की बात मुझे बताओ। मैं नजरें झुकाए बैठी रही। मेरी मुस्कुराहट ने सहमति दे दी। उन्होंने दोनों के परिवारों तक बात पहुंचा दी। प्रो. मान की मध्यस्थता के कारण हमारे मन की मुराद पूरी हो गई।

सफेद रुमाल की बात जोरावर ने मुझसे कही। मैंने हंसते हुए कहा, “तुम्हारे सफेद रुमाल को चूम कर, धोकर-निखार कर रखूंगी।”

हम दोनों की नियुक्ति एक ही स्कूल में हो गई। मेरी मैथ्स में और इसकी एस. एस. में। मालूम नहीं था, इस बहुरूपिए के कितने रूप हैं। मुझे भरमा लिया इसने। अब ठोकरें खा रही हूं दर-ब-दर।

“आंखों में कसक हो रही है। दवा नहीं डाली।” मैं एकदम यादों के भंवर से बाहर निकली।

फ्रिज से शीशी निकाल, आंखों में दवा डालते हुए भी मैंने सफेद गमछे को छू लेने से परहेज किया। दवा की गिर गई बूंदें, हाथ पर लपेटे रुमाल से साफ करने लगा। आंखें बंद हैं परन्तु जुबान कैंची-सी चलती है।

“अपनी कसक पल भर सहन न होती, जो कसक मेरे अंदर हो रही है, उस ओर कभी ध्यान नहीं दिया इस आदमी ने।”

मैं शीशी बंद कर, परे हटने लगी तो बोला, “कहां रह गई। कितने दिन हो गए, रणजोध का फोन नहीं आया। ना हैप्पी ने कोई बात की है। उसे तो अपने कॉलेज से ही फुरसत नहीं मिलती। कभी किसी कॉलेज, कभी किसी यूनिवर्सिटी में सेमीनार के लिए जाना पड़ता है। फोन मिलाओ तो एक-एक घंटा बिजी आता है। नाप-तोल कर बात करता है। कभी कहता है, स्टूडेंस को लेकर टेक्नालॉजी का नया प्रोजैक्ट दिखाने जा रहा हूं। बस टाईम ही नहीं मिलता। अब यह नया काम और शुरू हो गया है, ऑन लाईन क्लासेज का। क्लासरूम में अपनी मर्जी चलती है। अब तो हर वक्त कंप्यूटर से ही चिपका बैठा रहता है। रणजोध से पूर्वी तो कहती है, पापा, उसकी वही जाने। उसके पास टाईम नहीं है।”

मैं जानती हूं, तुमने जैसे अपने बच्चों के दुःख-सुख सुने हैं। खाली बैठा, बस खोखली बातें करता रहता है। सारी उम्र ये धंधे मैं ही निपटाती रही हूं। अब भी मुझे मालूम है, रणजोध की चिन्ता है, इसलिए चुप बैठी हूं।

रणजोध को याद कर रहा है, जैसे बहुत शर्म थी बेटी की। आज भी वह बात याद कर, सारा शरीर पसीना-पसीना हो जाता है। एक दिन रात तक घर ना लौटा। हम मां-बेटी फिक्रमंद। मोटर साइकिल पर कब का निकला। फोन बंद आ रहा है। ट्रैफिक का बुरा हाल है, पता नहीं। आखिर में आधी रात को लौटा। मैं रोटी देने गई, मुझे एकदम से जकड़ लिया। मेरे हाथ से प्लेट छूट गई। खटाक सुन कर लड़की भाग कर आई। देख कर, एकदम पलट गई। इस कंजर से निपट कर गई, बेटी लिहाफ में मुंह छुपाए बैठी थी। अब उसे याद कर रहा है।

इसके कारनामों के कारण ही मैं अपनों से दूर एकदम अकेली रह गई ह। हरदम इसकी करततों पर पर्दा डालती रही।

हम मलकपुर स्कूल में थे दोनों। हिन्दी की नई आई, अरोड़ा मैडम तिरछी नजर से इसकी ओर देखा करे। एक दिन स्टाफ रूम में मुझसे कहने लगी, “मैडम, संधू सर, हर वक्त हाथ पैंट की जेब में डाल कर रखते हैं।”

“बस इनकी आदत है। हर किसी की कोई न कोई आदत या फितरत होती है।”

पहले भी कई लोग यह सवाल कर चुके थे। मैं अपनी बुद्धि अनुसार जवाब दे देती। परन्तु यह न सुधरा।

मैंने घर पर आकर इसे बताया तो कहने लगा, “तूने जरूर उससे कोई बात की होगी, तभी तो उसने ऐसा पूछा। तुम अपनी जबान को काबू में रखा करो।” सुन कर मैं हक्की -बक्की रह गई।

इतने में ट्यूशन पढ़ने वाले बच्चे आ गए। यह अंग्रेजी पढ़ाता था। उनके साथ बी.ए. फाइनल करने वाली लड़की भी आने लगी। उसकी मां का कहना था, बापविहीन लड़की है। थोड़ी मेहनत करवा दे, ताकि अपने पैरों पर खड़ी हो सके। मैंने हामी भर दी।

उनके जाने के बाद फिर उसी बात को कुरेदने लगा, बोला, “अब इन बच्चों के सामने अपना ज्ञान मत बघारने लगना।”

मैं हैरान रह गई। बात क्या थी, इसने क्या समझ लिया। उसके बाद यह मुझसे उल्टा ही बोलने लगा। आने-जाने का समय आगे-पीछे करने लगा। मैं चुप रही। घर का माहौल शांत रखना ठीक समझा। लेकिन इसका अंहकार कम ना हुआ।

आज सुबह से ही इसकी कई कहानियां याद आ रही हैं परन्तु सबसे ज्यादा फिक्र रणजोध की है। इसकी अकड़ मेरी जान का हौवा बन गई।

आज भी वह दिन नहीं भूलता। स्कूल में रिसैस टाईम में आकर कहने लगा, “आज मुझे मंडी जाना है। ट्यूशन पढ़ने वाले बच्चों को बता देना, मैं लेट आऊंगा।”

मुझे मालूम था, आज आधी रात तक नहीं आएगा। स्कूल के अध्यापक व्यंग्य से मुस्कुराते हैं, जब इसे दूसरे-चौथे दिन कहीं न कहीं पट्टी बांधे देखते हैं।

आखिरी पीरियड में एक विद्यार्थी भागते हुए आया, “मैडम, जल्दी घर चले, आपको बुलाया है।”

मेरी जान सूख गई। वही हुआ, जिसका डर था, सारी गली लोगों से भरी थी। इसकी पगड़ी खुल कर गले में पड़ी थी। केश बिखर गए थे। एक तमाशबीन उसका रुमाल वाला हाथ ऊपर करके कह रहा था. “ये देखो! हरदम जिसे जेब में छिपा कर रखता था। साले. इन टंडों की एक रग ज्यादा होती है।” मेरी टांगें कांपने लगी। लोगों की भीड़ में यह सिर झुकाए खड़ा था। ट्यूशन वाली लड़की को लोगों ने पहले ही घर भेज दिया था। इसकी करतूत ने मुझे जीते-जी जमीन में गाड़ दिया। पंचायत व गांव के प्रमुख लोगों के हाथ जोड़ने लगी। फैसला लड़की की मां की सहमति से हुआ कि हम इस गांव की सीमा में दिखाई न दें, सामान लेकर निकल जाए। गरीब की बेटी का विवाह मुश्किल हो जाएगा, अगर बात थाने-कचहरी तक पहुंच गई।

लोगों के आगे हाथ बांध कर, गांव से दूर तीसरे जिले में तबादला करवाया। कुदरत का शुक्र है कि यहां आते ही, हमें शुभकर्ण मिल गया। हमारा बी. एड. का क्लासमेट। उसने ही मकान किराए पर दिलवाया और मदद की। पहले वह स्कूल टीचर रहा, फिर मेहनत कर, कॉलेज का प्रोफेसर बन गया। हमारे दोनों बच्चों की पढ़ाई में बहुत मदद की। अभी तक उसका स्नेह बना हुआ है। उसकी बात करने पर कहता है, “जनाना आदमी है। औरतों में बैठ कर खुश होता है।”

इसे किसी की कद्र नहीं। आखिर उसने हमारे कई काम संवारे हैं। तुम्हारे मर्दानेपन की तो दूर तक धूम रही है।

स्कूल के साथ-साथ रणजोध को संभालती। एक बार इससे कहा, “रणजोध, बैंड पर खेल रही है, जरा ध्यान रखना।” सुनते ही इसने टी.वी. देखते हुए लड़की को पत्थर की तरह घुमा कर नीचे फेंक दिया। लड़की चीखने लगी। इसने दूसरा हाथ बाहर नहीं निकाला। बेटी है तुम्हारी। बस इसके हाथ और मेरी देह। मुझे मालूम है, मैंने कैसे बच्चों को पाला है। लड़का कभी खाना देने चला जाए तो कहेगा, वो कहां है? मम्मी को भेज?”

इसलिए लड़का इसके पास जाने से कतराता है। बी. टेक. करते ही वह कनाडा चला गया। रणजोध के विवाह के समय उसके आने पर मैंने पूछा, “कैसा लगा हैप्पी!”

बोला, “अच्छा है। अपनी रणजोध कौन-सी कम है। साइक्लॉजी की टीचर है। साइक्लॉजी वाले आदमी को अंदर तक पढ़ना जानते हैं। फिक्र ना कर।” उसकी बात सुन कर मैं हंस दी।

याद आया रणजोध के साइक्लॉजी विषय लेने पर इसने कितना शोर मचाया था कि वह कॉमर्स पढ़े परन्तु रणजोध ने फार्म जमा करवा कर कह दिया, “पढ़ना मुझे है पापा।”

आज तो रणजोध की बातों से मेरे सीने में सुई-सी चुभ गई है। इसीलिए पिछला सब याद आ रहा है। लड़की जब से ब्याह कर गई है, एक दिन भी खुश नहीं दिखी। दो महीने पहले मिलने आई, चुप बैठी रही। जब भी आती, कोई बात ना करती। बस साहिल बेटे में व्यस्त रहती है और यह बैठा दामाद का बखान करता रहता है।

कल शाम आए अपने दोस्त बिल्ले के आगे खूब हवाई किले बनाता रहा। हैप्पी तो बाहर विदेश भी हो आया है। आखिर मैंने टोका, “डॉक्टर ने दवा लेकर आराम करने को कहा है।” तब कहीं इसकी कागजी बातें बंद हईं।

दवा देने गई तो बिदकने लगा, “मेरे पास किसी को दो मिनट बैठे हुए नहीं देख सकती तू।”

मैंने कहा, “अपनी निगाह ठीक कर लो, खुद को संभाल लो। मैं पहले ही बहुत कुछ देख चुकी हूं।”

आंखों का इलाज तो हो गया परन्तु अंदर के जाल का क्या इलाज होगा।

फोन की घंटी बजी। रणजोध का फोन है। “मम्मी, आपने कहा था, शाम तक बात करूंगी। अब तो आठ बज गए हैं। इसीलिए अब फोन किया। ठीक तो हो?”

“तुम्हारे पापा की आंखों का ऑपरेशन हुआ है। उसमें ही उलझी हुई थी। कल सुबह तुम्हारे पास आ जाऊंगी। बस धीरज रखो। मेरी ओर देख, मैंने कैसे अपनी जिन्दगी काटी है, इस आदमी के साथ।” इतना कह कर मैंने फोन बंद कर दिया।

इस आदमी से क्या बात करूं? जिसने औरत को हमेशा भोग्या समझा। कभी जीवन-साथी नहीं माना। साथ तो क्या देता। अब इसे बताना ही होगा। फोन हाथ में लिए खड़ी थी।

“किसका फोन था?”

“रणजोध का।”

“क्या कह रही थी?”

“क्या कहेगी…क्लेश है।”

“कुछ तो बताया होगा?”

“हैप्पी से झगड़ा हो गया है।”

“तुम कल चली जाओ। लड़कियां आजकल जिद करने लगी हैं। ऐसा ना हो, उसके साथ हमारी इज्जत भी खराब हो।”

“हर कोई एक समान नहीं होता। तुम तो रणजोध को मेरे स्थान पर और हैप्पी को अपने स्थान पर खड़े करके देखते हो।”

“तुम इन बातों को छोड़ो। अगर मेरी आंखों की बात ना होती तो मैं खुद जाता।”

आंखें बंद किए, सोच में उलझी बैठी हूं। फोन यूं सीने पर रखा है, जैसे इससे तूफान को रोकने वाला कोई जिन्न निकल आएगा। उसी हालत में कहीं आंख लग गई।

सुबह उठ कर तैयार होने लगी। टैक्सी वाले को बुला लिया।

टैक्सी रिजनल सेंटर पहुंची। सामने पार्क में रणजोध खड़ी इंतजार कर रही थी। गले मिलते ही रोने लगी। मैंने पूछा, “क्या हो गया?”

“मम्मी, बहुत कुछ हो गया। तुम्हारे पास जाकर भरे मन से लौट आती थी। तुम्हें अपने जन्म से देखती आ रही हूं। अब मैं भी वही नर्क भोग रही हूं। कोई फर्क नहीं। मेरा मन बात करने से घबराता। सोचती, तड़पती मिट्टी को और क्या तड़पाऊं। लेकिन अब पानी सिर से ऊपर गुजर गया। कोई चारा ना देख कर, खुद से ही निपटने का फैसला किया।”

“इसे ऐसा क्या हो गया?”

“मम्मी, यह कमीना बाहर लोगों के सामने बहुत विनम्र और सोशल होने का ढोंग करता है परन्तु अंदर से पूरा जालिम पत्थर है। इस बहुरूपिए का कुरूप, मैं कब से बर्दाशत कर रही हूं। कॉलेज से आते ही मैं रसोई में चली जाती हूं और यह मेरा फोन चैक करने लगता है।”

“यह किसका नंबर है। किसने तुम्हें फोन किया।” ऐसी पूछताछ करने पर कितनी बार कहा, मैं भी तुम्हारे बराबर की हूं। मेरे भी कितने स्टूडेंट्स हैं। फोन कर, कुछ न कुछ पूछते रहते हैं। मैं अब सभी के नाम और नंबर याद नहीं रख सकती। मेरी इन बातों की ओर इसका कोई ध्यान नहीं। बस अपनी झाड़ता रहता है।

उस दिन तो हद ही कर दी। प्रो. बराड़ का नंबर देख कर पूछने लगा, “यह तुम्हें क्यों फोन कर रहा था।” खुद इसने हर एक लड़की का नंबर सेव कर रखा है। बात करते हुए हाथापाई तक पहुंच गया। यह तो क्राइम पेट्रोल को पार कर एयरटेल से मेरी कॉल डिटेल निकलवाने चला गया। वहां मेरा एक स्टूडेंट था। उसने फोन करके पूछा, “मैडम, क्या बात हो गई? सर, कॉल डिटेल लेकर गए हैं।” मैंने उसे टाल दिया लेकिन मेरे भीतर आग भभक उठी। मैंने सोचा, घर में एक-दूसरे पर विश्वास होना चाहिए। सुधर जाएगा, इसीलिए चुप रही।

“यही तो बात है। इसी चुप ने ही तो तेरी मां को मरवाया। सारी उम्र अपनी हड्डियां तुड़वाती रही।”

“मम्मी, तम्हारी बात ठीक है। बहत फंक-फंक कर कदम रखें मैंने. लेकिन यह अपनी हरकतों से बाज नहीं आया। मेरे पर्स की तलाशी लेने लगता है। ‘ये डार्क रैड लिस्टिक क्यों रखी है। ये गोलियों का पत्ता कौन-सा है।’ मैंने कहा, ‘जा, कैमिस्ट के पास ले जा, अनपढ़ों वाली बातें मन में आती हैं।’

“अब क्या कहता है?”

“सीधे मुंह कभी बात नहीं करता। मम्मी हर रोज सुबह होते ही एक नई मुसीबत खड़ी कर देता है। तैयार होते देख कहेगा, यह जीन्स क्यों पहन रही हो, तुम क्या सोलह साल की हो। टीचर को सोबर रहना चाहिए। आज तो तुम्हारे कॉलेज में यूथ फेस्टिवल है। दूसरे कॉलेजस से भी प्रोफेसर आएंगे।’ सुन कर शरीर गुस्से से कांपने लगा। दुखी होकर घर से निकल आई। बाल स्टाफ रूम में आकर सैट किए।”

रणजोध की बातें सुन कर सुन्न रह गई। एक यमदूत कम था, जो दूसरा भी आकर चिपट गया। वह घर पर बैठ कर इसकी प्रंशसा के पुल बांधता रहता है। कहता है, लड़कियां ख्वामख्वाह जिद करती है। उसे अपनी इज्जत की पड़ी है।

“ये सब छोड़ो मम्मी और सुनो, अब यह मेरी किताबों की तांक-झांक करता है। मैं अरुंधती राय का उपन्यास पढ़ रही थी। उसे उलट-पलट कर कहने लगा, अब छोड़ दे किताबों का पीछा। डी. सी. लगेगी क्या। बन गई, जो बनना था। मेरी पी.एच.डी. इसने अपनी इन्हीं करतूतों के कारण छुड़वा दी थी। मुश्किल से ही अब पूरी की है। बाहर से कहूंगी तो कोई सच नहीं मानेगा। सभी कहते हैं कि प्रो. चहल तो बहुत अच्छे व्यक्ति हैं। मुझे मालूम है, मेरी देह को कुत्ते समान नोंचता है। ऐसे सेंसेटिव पलों में ऐसे गंदे शब्द बोलता है कि रूह कांप जाती है। इस शैतान को लोग क्या समझ सकते हैं। मैं सब कुछ लुटा कर भी इससे कुछ हासिल नहीं कर पाई। ताने, व्यंग्य, शक से मेरा अंदर छलनी कर दिया है इसने।

बेटी की बातों से मेरे जख्म फिर से हरे हो गए। “बेटी, हौसला रख।”

“मम्मी, मैं बहुत हौसला कर चुकी। आज इसीलिए तुम्हें बुलाया है ताकि मेरा मन हल्का हो जाए और तुम्हें सब मालूम हो सके। मैं कॉलेज से बाइक पर निकली, थोड़ी दूर जाकर बाइक खराब हो गई। अचानक पीछे से प्रो. नंद की कार में दो और अध्यापिकाएं बैठी थीं। प्रो. नंद ने कहा, बाइक इधर जूस वाले के पास एक ओर लगा दें। मैकेनिक इसे ठीक करके आपके घर पहुंचा देगा। उन्होंने मैकेनिक को फोन कर दिया। हम तीनों उसकी कार में बैठ कर घर आ गई। पीछे से यह अपनी कार पर आ रहा था। घर पहंच कर, इसने जो बकवास की, वो बर्दाशत से बाहर की बात थी। प्रो. शारदा मेरी एग्जाम ड्यूटी का लैटर घर देने आ गया। उसके जाने के बाद फिर इसने वही बकवास शुरू कर दी।

पढ़े-लिखे की कोई बात नहीं इसमें। इतने गंदे शब्द मैंने पहली बार इसके मुंह से सुने।

“वही तेरे बाप जैसी बातें। रात कभी इसके चाचा का लड़का हौलदार आ जाता। रात को खाना खिलाती। उसके जाने के बाद मुझ पर लांछन लगाता, तू उसकी चारपाई पर बैठ कर क्या कर रही थी। इन कुलक्षणों से भगवान बचाए। मुझे लगता है, सारा दिन बोलता रहता है, इसे दवा वगैरह देकर देखो।”

“मां, तुम अभी भी किस भ्रम में हो। सारी उम्र बाप को दही में कैप्सूल घोल कर दिए, सुधरा वो…? मैंने साइक्लॉजी पढ़ी है मां, इन बातों का पढ़ाई से कोई लेना-देना नहीं। आदमी जिस माहौल में पलता, बड़ा होता है, उसमें यह पित्तृसत्तामक अंश वक्त के साथ बढ़ते जाते हैं। ये आदमी खुद को सुपर समझते हैं। मानसिक रोगी या सनकी नहीं होते। अपनी साईकी को सिद्ध करने के लिए कोई भी बड़ा कारनामा कर सकते हैं। इन बातों के कारण ही मैं परेशान रहती हूं।”

साहिल की इसे कोई खुशी नहीं। यह कहता है कि इसकी डेट ऑफ बर्थ के हिसाब से तो तुम उस समय ट्रेनिंग कोर्स पर थी।” यह बात सुन कर मेरे पैरों तले से जमीन निकल गई। इसे याद नहीं, वीक एंड पर यह कैसे मेरी देह नोंचता था। रोज के तानों से तंग आकर मैंने कह दिया, ‘जा, डी. एन .ए. टैस्ट करवा ले।” इसने अगले दिन उठते ही कह दिया, कॉलेज लीव भेज दे, आज चंडीगढ़ चेक करवा कर आएंगे। मैं इसके साथ चली तो गई परन्तु मन में ठान लिया, अब इस शैतान के साथ नहीं रहना। रिपोर्ट मिलने पर बेशर्म ने मुझे दिखाई नहीं। मम्मी, इसके साथ रहना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। यहां तबादला करवा लिया है। उससे कह दिया है, सीधे ढंग से मामला निपटा ले। अगर कोर्ट-कचहरी ही जाना है तो कोई बात नहीं, मैं भी सीधी टक्कर के लिए तैयार हूं। मैं और साहिल अब यहीं रहेंगे। मम्मी, चलो चल कर चाय पीते हैं।”

उठते हुए मन ही मन मैंने उसकी पीठ ठोंक, शाबाशी दी।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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