सुदामा के चावल-गृहलक्ष्मी की कहानियां: Moral Story
Sudama ke Chawal

Moral Story: तारा का विवाह एक संपन्न परिवार में हुआ था। वो जल्द ही मां बनने वाली थी, लेकिन पूरे समय उसे बेड रेस्ट पर रखा गया। पूरे सात महीने की परेशानी उठाने के बाद तारा को प्रसव पीड़ा होने लगी।
डॉक्टर के हिसाब से प्रसव समय में अभी कुछ समय था,समय से पहले होने वाले दर्दों ने तारा के पति हरीश को कुछ नर्वस सा कर दिया , क्योंकि अभी समय काफी था तो डिलीवरी के समय मदद के लिए आने वाली उसकी बहन भी अभी तक नहीं आ पाई थी।
हरीश ने तुरंत ही ड्राइवर को गाड़ी निकालने के लिए बोला और तारा की डॉक्टर निधि को जाने से पहले ही फोन पर यह सब समाचार दे दिया था।हरीश तारा को लेकर अस्पताल पहुंच गये। हरीश तारा को लेकर काफी घबराए हुए थे, ईश्वर से बार-बार होने वाले बच्चे और तारा के अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना कर रहे थे।

अस्पताल पहुंचते ही तारा को डॉक्टर निधि ने एडमिट कर लिया, प्रीमैच्योर डिलीवरी के कारण काफी रिस्क भी था, पूरे चार घंटे बाद डॉक्टर ने बताया कि आपके घर एक नन्ही सी परी आई है ,लेकिन आपकी पत्नी को होश आने में अभी आठ दस घंटे लग सकते हैं। डॉ निधि ने बताया कि मैं अभी एक नर्स बच्ची की देखभाल के लिए आपके पास भेजती हूं।
तब हरीश ने कहा डॉक्टर प्लीज़ नर्स ऐसी भेजना जो मेरी बच्ची को संभाल सके, क्योंकि मै बच्चों के मामले में बिल्कुल ही अनभिज्ञ हूं और मेरे साथ इस समय परिवार की कोई अन्य महिला भी नहीं है।
डॉ निधि ने हरीश को तसल्ली देते हुए कहा आप घबराइए नहीं जो नर्स मैं आपकी बच्ची की देखभाल के लिए भेज रही हूं वो हमारे स्टाफ की सबसे काबिल नर्स है। उसने ही आपकी पत्नी की डिलीवरी के समय मुझे काफी मदद भी की है। वो एक होशियार और सभ्य नर्स है।आप इत्मीनान रखिए सब कुछ ठीक है और आगे भी सब ठीक होगा।
थोड़ी देर बाद जो नर्स आई वो एकदम सादगी और दया की मूर्ति थी, उसके चेहरे से ही पता चलता था कि किसी अच्छे घर की महिला है और अपना काम बखूबी करती होगी। नर्स ने हरीश को आश्वासन दिया कि आप बिल्कुल बेफिक्र रहिए, मैं बच्ची का बिल्कुल अपनी संतान के जैसा ही ध्यान रखूंगी।
अगली सुबह जब तारा को होश आया तो नर्स को देखती ही तारा की आंखें खुशी से छलक आई, दोनों बचपन की पक्की सहेलियां थी। दोनों ही एक दूसरे से मिलकर भावविभोर हो गई। तब हरीश से तारा ने रुक्मणी का परिचय कराया, बताया कि यही उसकी वो बचपन की सहेली है जिसकी वह अक्सर बातें करती है,बचपन से ही वो कितनी होशियार थी, डॉक्टर बनना चाहती थी, लेकिन परिवार की स्थिति ऐसी नही थी। लेकिन स्वाभिमानी इतनी रहीं कि कभी किसी से कोई मदद नहीं ली,साइड में ट्यूशन पढ़ाकर अपना पढ़ाई का खर्च निकालती रही और देखो आज भी रुकमणी के चेहरे पर स्वाभिमान का तेज है। तारा ने उसे बहुत-बहुत धन्यवाद दिया और जल्द ही घर आने का न्यौता दिया। तारा ने कहा कि अपने बेटे और पति के साथ जरूर आना।
बच्ची के सकुशल पैदा होने की खुशी में हरीश ने नामकरण संस्कार की एक शानदार पार्टी का आयोजन किया। सुबह हवन में तो रुकमणी अस्पताल की ड्यूटी के कारण नहीं जा पाई।
शाम को जब पार्टी में पहुंचती है तो देखती है कि पार्टी की रौनक अलग ही थी। सभी मेहमान लगभग आ चुके थे। पर तारा की आंखों को अभी तक अपनी मित्र रुक्मणि और उसके पति का ही इंतजार था। रुकमणी के आते ही तारा और हरीश ने प्रेम से गले मिलकर उसका और उसके पति का अभिवादन किया।
रुकमणी पार्टी की रौनक देखकर सोचने लगी कि वो बेकार ही पार्टी में आ गई, फिर कभी आकर भी तो बच्ची से मिल सकती थी। सभी लोग एक से एक बढ़कर बच्ची के लिए उपहार लाए थे।
रुकमणी अपने हाथ का उपहार छिपाने की कोशिश करने लगी। तब तारा ने रुक्मणी से कहा, रुकमणी तुम मेरी बेटी को कुछ उपहार नहीं दोगी। रुक्मणी ने कहा ,कहांँ तुम महलों की रहने वाली और कहांँ मैं गरीब सुदामा , दुआ और आशीर्वाद के सिवा क्या ही दे सकती हूं, कहकर रुक्मणी ने अपना उपहार तारा को थमा दिया।
तारा ने रुक्मणी का उपहार खोला तो उसमें रुकमणी के हाथ से बना ऊन का छोटा गुलाबी रंग का स्वेटर, छोटे-छोटे मौजे व टोपी थी। तारा वो सब देखकर निहाल हो गई। तारा ने रुक्मणी को गले लगा लिया और कहा प्यारी दोस्त

दोस्ती से बड़ा कोई रिश्ता नहीं होता,
दोस्ती में कोई छोटा या बड़ा नही होता,
काश कि ……
श्रीराम और निषाद की मित्रता जैसी हो हममें समरसता,
कच्चे धागे से बंधा है,पर बड़ा ठोस है, ये हमारा दोस्ती का रिश्ता।
रुकमणी मेरी बच्ची का नामकरण भी तुम्हें ही करना होगा, तुम्हारे प्यार भरे उपहार के आगे सब कुछ तुच्छ है। रुकमणी की आंखों में आंसू आ गए। दोनों सहेलियां गले मिलकर एकबार फिर बचपन में जैसे खो ही गई,वो सावन के झूले,वो गुड्डे गुडिया का ब्याह रचाना,एक सहेली गुड्डे की मां बनती एक गुड़िया की, फिर दोनों सहेलियां खेल खेल में ही बड़े बड़े रिश्ते निभा जाती।
रुक्मणी ने बच्ची का नाम अवंतिका बताया, जिसे सुनकर सभी बहुत खुश हुए। सभी ने तालियां बजाकर उनका स्वागत किया

तारा ने रुक्मणी का हाथ पकड़ कर कहा इससे अच्छा नाम और उपहार तो मेरी बच्ची के लिए हो ही नहीं सकता। क्योंकि कृष्ण जी भी सुदामा के चावल के बिना अधूरे थे।
फिर इस मित्रता के चलते दोनों परिवार आगे भी ऐसे ही मिलते रहे, उधर रुक्मणी का बेटा उमंग आज शहर का बड़ा सर्जन बन चुका था ।उसने अपनी मां की मेहनत की लाज रखी और अपनी मां के डांक्टर बनने के सपने को खुद में पूरा किया।
उधर तारा की बेटी निष्ठा भी अपनी मां की ही तरह मिलनसार , सहृदय और अच्छे संस्कार वाली आज एक काबिल वकील बन चुकी थी। दोनों बच्चे आपस में एक दूसरे को पसंद करने लगे।
आज फिर इतने बरसों बाद तारा और रुक्मणी वास्तव में मित्रता के रिश्ते में एक और रिश्ता जोड़कर समधन के नये रिश्ते में बंध गईं थी,वो बचपन वाला खेल आज नियति ने हकीकत में बदल दिया,दोनों सहेलियों ने एक दूसरे को खुशी से गले लगा लिया।