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 शुभ मुहूर्त-गृहलक्ष्मी की कहानी: Shubh Muhurat Kahani
Shubh Muhurat

Shubh Muhurat Kahani: आज नीरज कुमार और उनकी पत्नी नीरा की खुशी देखते बन रही है । मेहंदी ,संगीत ,हल्दी की सारी रस्में पूरी करने के बाद आज उनकी बेटी मंजरी की बारात है।
बहुत देख सुनकर  मंजरी के पापा ने मयूर को चुना है । मंजरी आईटी इंजीनियर है तो मयूर भी आईटी कंपनी में सीनियर मैनेजर है। शादी तय करते समय ही मंजरी के पिता ने मयूर के पिता से कह दिया था कि वे शादी धूमधाम से करेंगे, अपनी हैसियत से सामान भी देंगे पर दहेज के नाम पर कुछ नहीं।

 मयूर के पिता को थोड़ी निराशा हुई क्योंकि बेटे की शादी पर वे अपनी कमाई खर्च नहीं करना चाहते थे। वे चाहते थे कि  मंजरी के पिता से वे डिमांड करें परंतु अपनी यह मंशा को प्रकट नहीं कर पाए । आखिर क्या करते, पढ़े-लिखे इतने बड़े अफसर को यह कहते शोभा नहीं देती, वे यह भी समझते हैं।

अब बारात लग गई है। शहर के एक अच्छे होटल से शादी हो रही है । किसी पुराने किले की शक्ल का यह होटल साज सज्जा से भव्य महल लग रहा है।  बाहर खुले में बहुत बड़े एरिया में खाने पीने की व्यवस्था है ,चाय- कॉफी से लेकर कई तरह के पेय पदार्थ, तरह-तरह के स्टार्टर, इंडियन, चाइनीज, इटालियन के लाइव काउंटर के साथ  मेन कोर्स में भी वेज,नान वेज की बहार। सजावट और स्वाद इतनी अच्छी कि बाराती- सराती सभी मेहमान घूम- घूमकर स्वाद का आनंद ले रहे हैं ।

 स्टेज पर जयमाला होने के बाद  दोनों परिवार के सगे- संबंधी मंडप के पास इकट्ठे हैं, शादी की रस्में शुरू हो गई हैं। मंडप में  मंजरी की बुआ ,मामी रस्म के अनुसार गीत गा रही हैं। वैसे तो आजकल पहले की तरह शादी ब्याह के गीत लोगों को आते कहां है?  परंतु कुछ लोगों के  
कारण पुरानी परंपरा घिसट घिसट कर बढ़ रही है। मंजरी की बुआ को शुरू से ही गाने बजाने का शौक रहा है और कहीं भी शादी ब्याह हो तो वे धूम मचा देती हैं ।
अभी तो मयूर की तरफ से मंडप पर गहने चढ़ाए जा रहे हैं तो वह गाली गा रही हैं, बाराती पक्ष भी खूब आनंद से सुन रहे हैं और फरमाइश भी कर रहे हैं। इस दौरान बीच-बीच में चाय कॉफी भी चल रहा है, जिससे लोगों को नींद न आए क्यों कि यहां तो रात भर शादी की रस्में चलती हैं।

 मयूरी जयमाल के समय तो लहंगा पहनी हुई थी,अभी मंडप में पीली साड़ी पहन कर बैठी है। इतनी सुंदर लग रही है मानो देव लोक की परी हो। मयूर भी सूट में खूब जंच रहा है परंतु कुछ लोगों के टोकने के कारण  उसके कंधे पर एक धोती डाल दी गई है। कन्यादान  और भाई के द्वारा लावा मिलाने का रस्म हो चुका है । पंडित जी सात वचन करवा रहे हैं, मंजरी, मयूर के साथ-साथ उसके दोस्त भी इसका आनंद ले रहे हैं। बस, अब सिंदूरदान होना है, उसकी तैयारी हो रही है।

तभी मयूर के पिता मंडप के पास आकर कहते हैं कि,दस मिनट रुक कर सिंदूरदान का मुहूर्त
 है । फिर मंजरी के पिता को किनारे ले जाकर कुछ कहते हैं। मंडप से मंजरी की नजर उस तरफ चली जाती है, वह देखती है कि उसके पिता हताश से कुर्सी पर बैठ गए हैं।  पिता को वैसे बैठे देखकर मंजरी अपने भाई को इशारे से बुलाती है और पूछती है ,बात क्या है ?
और पलक झपकते मंजरी का भाई बातें उस तक पहुंचा देता है। फिर तो अचानक  मंजरी खड़ी हो जाती है और कहने लगती है, नहीं मैं यह विवाह नहीं करूंगी । मंजरी के ऐसे कहने से पूरा वर- वधू पक्ष सकते  में आ जाता है। किसी को कुछ समझ नहीं आता कि अभी तक इतने उत्साह से सारी रस्म निभाने वाली मंजरी को यह अचानक क्या हो गया?
बगल में बैठा मयूर भी कुछ समझ नहीं पाया, उसने मंजरी को पकड़ कर बैठाया और पूछा “आखिर बात क्या है?”
 मंजरी ने धीरे से कहा ,”अपने पिता से पूछो।”
 अभी तक शादी समारोह में जो उल्लास- खुशी, हंसी- मजाक का माहौल था ,अचानक से मातम में बदल गया। एक अजीब सी मनहूसियत छा गई । मंजरी की मम्मी और बुआ मंडप में बैठी थीं, तो वे वहीं बैठी रह गईं। लग रहा था कि उनमें उठने की शक्ति नहीं बची है। उसके पापा जो कुर्सी पर बैठे तो उठे ही नहीं । उसके पापा के पास मामा ,चाचा बगल में खड़े कुछ मंत्रणा करने लगे।

हैरान मयूर उठकर अपने पिता के पास गया जो स्टेज के पास गंभीर मुद्रा में बैठे थे और उसकी मम्मी असहाय सी बगल में खड़ी कुछ कह रही थी। मयूर ने अपने पापा को इतना कहते सुना ,
“नहीं इन्हें एक फ्लैट लेकर पुणे में देना ही होगा तभी सिंदूरदान होगा और शादी होगी।”
 मयूर तो किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया, फिर भी हिम्मत से उसने कहा ,
“यह क्या कह रहे हैं पापा, मैंने तो पहले ही आपसे कहा था कि कुछ मांगना नहीं है ,दहेज नहीं लेना है।”
” हां गलती हो गई ,जो मैं तुम्हारी बातों में आ गया। तुम्हारे ऊपर इतना खर्च किया है मैंने  यहां इंजीनियरिंग कराने के बाद अमेरिका पढ़ाने को भेजा। अगर कुछ मांग ही लिया तो क्या हुआ?”
” नहीं पापा यह गलत है ,हम लोगों को कमी ही क्या है?मेरा और मंजूरी दोनों का पैकेज ऐसा है कि एक वर्ष के अंदर हम खुद फ्लैट ले लेंगे और आपको कुछ जरूरत हो तो वह भी पूरी कर देंगे ।”
“नहीं मैं तुम्हारी बात नहीं सुनूंगा।”
यह सुन तमतमाता हुआ मयूर वहां से मंडप की तरफ आया और मंजरी के पापा के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया, उसने कहा,
  “पापा की बातों से परेशान मत होइए और विवाह की रस्म पूरी कीजिए।”
उन्होंने कुछ जवाब नहीं दिया तो वह मंजरी के पास जहां उसकी मम्मी भी बैठी थी , वहां जाकर उसने इसी बात को दोहराया।
 उसकी मम्मी ने तो कुछ नहीं कहा, लेकिन मंजरी बोली,
“यह तो अच्छा हुआ, शादी पूरी होने के पहले ही तुम्हारे पिता की मंशा का पता चल गया। मैं नहीं करूंगी शादी। तुम भी तो उसी परिवार के बेटे हो, मुझे विवाह कर उसी परिवार में तो जाना है । कल को सब मिलकर मुझे यंत्रणा दें, जला दे, मार दे, उसका क्या भरोसा ?
नहीं नहीं मैं शादी नहीं करूंगी।”
 तभी मंजरी के मामा ने उससे कहा,” बेटी जब मयूर कह रहा है तो उसकी बातों पर विश्वास करो और सिंदूर दान की रस्म पूरी करो।”
” नहीं मामा पढ़े-लिखे  होने से क्या होता है, दहेज से संबंधित बहुओं को जलाने मारने की खबरें तो रोज हो रही हैं। यहां तक कि लोग प्रेम विवाह करते हैं और बाद में लड़के के मन में ही लालच आ जाती है और मांग पूरी न हो तो फिर जान भी ले लेते हैं । इस तरह से प्यार के अंकुर भी नहीं पनपते और एक प्रेम में पागल युवती इस तरह के चक्रव्यूह की शिकार हो जाती है।” मंजरी को लग रहा है कि खुद पर उसका नियंत्रण नहीं,वह बस बोले जा रही है।
 परंतु परिवार के लोग चिंतित हैं कि विवाह के मंडप से लड़की उठ जाए तो उसका क्या होगा? पिता तो बिल्कुल मूक हो गए हैं, पर उसके चाचा ने आगे बढ़कर कहा,
” मंजरी, तुम्हें मयूर से तो कोई शिकायत नहीं, उसकी बात पर तो गौर करो।”
 चाचा की इस बात से अचानक मंजरी को मयूर से पहली बार का मिलना याद आया, जब उसे  पहली नजर में ही लगा था कि यही उसके सपने का राजकुमार है। वह देखने में जितना स्मार्ट लगा, उसके विचार उतने ही परिपक्व। शादी तय होने के बाद भी वह तीन चार बार मिली है और हर बार उससे वह प्रभावित होती रही। उसे अपने पापा की पसंद पर गर्व हुआ। मंजरी ने अपनी मम्मी से भी मयूर की बहुत बड़ाई की थी। अब वह क्या करे, असमंजस में पड़ गई। उसने कहा,
” नहीं मुझे इनसे कोई शिकायत नहीं, परंतु कुछ ऐसा हो जिससे कि भविष्य में मैं कोई परेशानी में ना पड़ूं।”
 वहीं उपस्थित मंजरी के मामा जो मजिस्ट्रेट हैं और बहुत मजाकिया भी , उन्होंने कहा कि चलो तब एक बॉन्ड पेपर पर मयूर से साइन करवा लेते हैं कि भविष्य में उसका परिवार किसी तरह की फरमाइश नहीं रखेगा, वह अपनी बात पर अटल रहेगा।
 उनकी हां में हां मिलाते हुए मंजरी का छोटा भाई बोला, हां,मामा यह तो बहुत अच्छी बात है, और  एक सादे पेपर पर लिख कर उसने मयूर से साइन करवा लिया, वहां उपस्थित पांच लोगों से गवाह के तौर पर साइन करवा लिया, मानो यह कचहरी का स्टांप पेपर तैयार हो गया।

 उसके बाद मंडप में मयूर और मंजरी  को फिर उनके आसन पर बैठाया गया। पंडित जी ने भी अपना स्थान ग्रहण किया। पंडित जी के मंत्रोच्चार के साथ मयूर ने मंजरी को सिंदूर लगाया। फिर घर की औरतों ने उसके बाद की रस्में पूरी की। पंडित जी के आशीर्वचन से ओतप्रोत श्लोक के साथ उपस्थित लोगों ने युगल जोड़ी पर फूलों की वर्षा कर उन्हें आशीर्वाद दिया। बादल छंट गए और मंजरी का चेहरा दमकने लगा।

 अब तक मंजरी के चाचा मयूर के पिता को मंडप तक लाने में सफल हो पाए थे, जैसे ही उसके पिता बुझे चेहरे लिए मंडप पर पहुंचे, मंजरी की बुआ जो पहले शादी के गीतों से माहौल को गुलजार कर रही थी, व्यंग्य करते हुए मयूर के पिता से ऊंची आवाज़ में कहा,
 “बधाई हो समधी जी, सिंदूरदान ‘शुभ मुहूर्त’ में ही हुआ है।

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