मानव धर्म को धर्मशास्त्र में सदाचार कहा गया है। मानव में सर्वगुण संपन्नता सदाचार से ही आती है। स्कंदपुराण के अंतर्गत श्री काशीखंड के 35 से 38 वें अध्याय तक ‘सदाचार’ का वृहत वर्णन किया गया है। इसमें ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास-आश्रम का विशद वर्णन किया गया है। एक बार श्री शैल पर्वत पर कार्तिकेयजी से अगस्त्य ऋषि ने पूछा कि कलियुग में अन्य युगों की भांति तपस्या, योगाभ्यास, दान, व्रत, आदि करना दुर्लभ होगा तो उन्हें मोक्ष की प्राप्ति कैसे होगी? इसके उत्तर में श्री कार्तिकेयजी ने कहा- ‘बिना सदाचार के मनोरथ की प्राप्ति नहीं होती।
आचार ही परम धर्म, परम तपस्या की वृद्धि करने वाला है और आचार से ही समस्त पापों का नाश होता है।’ सदाचार से मनुष्य को आयु, लक्ष्मी और कीर्ति तो प्राप्त होती ही है, भगवान भी उसे प्राप्त होते हैं। सदाचार भागवत धर्म है और शिष्टाचार मानव धर्म सदाचार की श्रेष्ठता और फल- अकेला सदाचार बल संपूर्ण संसार पर प्रभुत्व पा सकता है। सदाचार ही सर्वाेत्तम शक्ति और संपत्ति है। सदाचार ही सर्वाेत्तम धर्म है। सदाचार ही सर्वाेत्तम मोक्ष-साधन है।
पवित्र विचार, पवित्र वाणी और पवित्र व्यवहार ही सदाचार है। सदाचारी कौन है? जो अपने सुख में प्रसन्न नहीं होता, दूसरे के दुःख के समय हर्ष नहीं मानता तथा दान देकर पश्चाताप नहीं करता, सदाचारी कहलाता है। सदाचारी व्यक्ति में निम्नलिखित गुणों का होना आवश्यक है-वाणी की शालीनता, सद्व्यवहार अपनाना, दोहरी जिंदगी न जीना, अहंकार का त्याग करना, सबको सम्मान देना_ चरित्र एवं व्यवहार में समन्वय रखना, पराई वस्तु की अपेक्षा न करना, आहार में पवित्रता रखना, स्वाध्याय एवं सत्संग करना, बुद्धि एवं विवेक से काम करना, सत्य भाषण करना तथा इंद्रियों पर नियंत्रण रखना।
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