वाल्मीकि कृत रामायण में राम के सत्रह गुण बताए गए हैं। आज हम यह कह सकते हैं कि यह सत्रह गुण किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारने और विकसित करने में सक्षम हैं। इसका अभिप्राय यह हुआ कि लोगों में नेतृत्व क्षमता बढ़ाने व किसी भी क्षेत्र में अगुवाई करने के लिए यह गुणसूत्र अहम भूमिका अदा करते हैं। वाल्मीकि जी ने नारद जी से प्रश्न किया – “सम्प्रति इस लोक में ऐसा कौन मनुष्य है जो गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवादी और दृढ़व्रत होने के साथ-साथ सदाचार से युक्त हो। जो सब प्राणियों का हितकारक हो, साथ ही विद्वान, समर्थ और प्रियदर्शन हो।” इस प्रश्न का उत्तर देते हुए नारद बोले – “इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न राम में यह सभी गुण हैं। राम के सोलह गुण, एक आदर्श पुरुष में होने चाहिए।” यथा – गुणवान्, वीर्यवान् (वीर), धर्मज्ञ (धर्म को जानने वाला), कृतज्ञ (दूसरों द्वारा किये हुए अच्छे कार्य को न भूलने वाला), सत्यवाक्य (सत्य बोलने वाला), दृढव्रत (दृढ व्रती), चरित्रवान्, सर्वभूतहितः (सभी प्राणियों के हित करने वाला), विद्वान्, समर्थ, सदैव प्रियदर्शन (सदा प्रियदर्शी), आत्मवान् (धैर्यवान), जितक्रोध (जिसने क्रोध को जीत लिया हो), द्युतिमान् (कान्तियुक्त), अनसूयक (ईर्ष्या को दूर रखने वाला) और बिभ्यति देवाश्च जातरोषस्य संयुगे ( जिसके रुष्ट होने पर युद्ध में देवता भी भयभीत हो जाते हैं)।
सदाचार से युक्त समस्त प्राणियों का हितसाधक, विद्वान्, सामर्थ्यशाली और एकमात्र प्रियदर्शन पुरुष कौन है? मन पर अधिकार रखने वाला , क्रोध को जीतने वाला, कान्तिमान् और किसी की भी निन्दा नहीं करने वाला कौन है? तथा संग्राम में कुपित होने पर किससे देवता भी डरते हैं? वाल्मीकि ने नारद से निवेदन किया – “महर्षे! मैं यह सुनना चाहता हूँ। इसके लिये मुझे बड़ी उत्सुकता है और आप ऐसे पुरुष को जानने में समर्थ हैं।”
महर्षि वाल्मीकि के इस वचन को सुनकर नारद ने उन्हें कहा – “अच्छा सुनिये।” फिर प्रसन्नतापूर्वक बोले – “आपने बहुत से दुर्लभ गुणों का वर्णन किया है। उनसे युक्त पुरुष को मैं विचार करके कहता हूँ, आप सुनें – इक्ष्वाकु के वंश में उत्पन्न हुए एक ऐसे पुरुष हैं। जो लोगों में राम नाम से विख्यात हैं। वे ही मन को वश में रखने वाले, महाबलवान्, कान्तिमान्, धैर्यवान् और जितेन्द्रिय हैं। वे बुद्धिमान्, नीतिज्ञ, वक्ता, शोभायमान तथा शत्रु संहारक हैं। उनके कंधे मोटे और भुजाएँ बड़ी-बड़ी हैं। ग्रीवा शंख के समान और ठोढ़ी मांसल है। उनकी छाती चौड़ी तथा धनुष बड़ा है। गले के नीचे की हड्डी (हँसली) मांससे छिपी हुई है। वह शत्रुओं का दमन करने वाले हैं। भुजाएँ घुटने तक लम्बी हैं, मस्तक सुन्दर है, ललाट भव्य और चाल मनोहर है। उनका शरीर मध्यम और सुडौल है। देह का रंग चिकना है। वह बड़े प्रतापी हैं। उनका वक्षःस्थल भरा हुआ है, आँखें बड़ी-बड़ी हैं। वे शोभायमान और शुभ लक्षणों से सम्पन्न हैं। धर्मके ज्ञाता,सत्यप्रतिज्ञ तथा प्रजाके हित साधनमें लगे रहने वाले हैं। वे यशस्वी, ज्ञानी, पवित्र, जितेन्द्रिय और मन को एकाग्र रखने वाले हैं। प्रजापति के समान पालक, श्रीसम्पन्न, वैरिविध्वंसक और जीवों तथा धर्म के रक्षक है।
स्वधर्म और स्वजनों के पालक, वेद-वेदांगो के तत्त्ववेत्ता तथा धनुर्वेद में प्रवीण हैं। वह अखिल शास्त्रों के तत्त्वज्ञ, स्मरण शक्ति से युक्त और प्रतिभा सम्पन्न हैं। अच्छे विचार और उदार हृदय वाले वे राम से बातचीत करने में चतुर तथा समस्त लोकों में प्रिय हैं। जैसे नदियाँ समुद्र में मिलती हैं, उसी प्रकार सदा रामसे वे आर्य एवं सबमें साधु पुरुष मिलते रहते हैं समान भाव रखने वाले हैं। उनका दर्शन सदा ही प्रिय मालूम होता है। सम्पूर्ण गुणों से युक्त वे राम अपनी माता कौसल्याके आनन्द बढ़ाने वाले हैं। गम्भीरता में समुद्र और धैर्यमें हिमालय के समान हैं। वे विष्णु भगवान् के समान बलवान् हैं। उनका दर्शन चन्द्रमा के समान मनोहर प्रतीत होता है। वे क्रोध में कालाग्नि के समान और क्षमा में पृथिवी के सदृश हैं, त्याग में कुबेर और सत्य में द्वितीय धर्मराज के समान हैं।”
महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में राम के स्वरूप और स्वभाव को इस तरह से वर्णित किया है। राम इतिहास पुरुष हैं। यह स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। अपने युग में राम ने मानव समुदाय के सुखद भविष्य हेतु अपना वर्तमान निछावर कर दिया। तत्कालीन समय में पृथ्वी पर एक ऐसा समूह था जो विज्ञान और वैज्ञानिकों के विरुद्ध कार्य कर रहा था। ऋषिगण मानव जीवन को वैज्ञानिक आधार देने के लिए प्रयासरत थे। एक ऐसी जीवनशैली देने के लिए तत्पर थे जो मानव को सुखानुभूति दे। इसके लिए तप और तपस्या शब्दों का प्रयोग किया गया था। तप अर्थात तत्परता। तत्परता से कार्य संपन्न करना। यह तत्परता तभी संभव थी जब तपस्या एक निश्चित परिपाटी के तहत होगी। तो तपस्या का साधारण अर्थ यह हुआ कि मनुष्य किसी भी विषय पर गंभीरता से चिंतन मनन करें। उसके गुण-दोष की परख कर मानव समुदाय को प्रदान करे। यह विधि-विधान अशिक्षित और वनों में रहने वाले संकुचित मानसिकता वाले मानवों को स्वीकार नहीं था। परिणामस्वरूप ऐसे वर्ग ने महर्षियों, ऋषियों और अनुसंधान कार्यों में संलग्न महान विभूतियों के कार्य में विध्न डालना शुरू किया।
राम ने मर्यादा में रहकर उनका समूल विनाश करने का संकल्प लिया। राम से पूर्व महामानव अतिविद्वान प्रकांड पंडित दशानन ने ब्रह्मा जी से आशीर्वाद और आज्ञा प्राप्त कर तत्कालीन सभी तथाकथित आतंकवादियों को अपने अधीन कर एक आदर्श वाक्य दिया था – वयं रक्षाम। अर्थात – मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा। दशानन ने उन सभी को सीमित कर दिया। इसके बदले में दशानन ने उन सभी से ‘कर’ लिया। दशानन ने ब्रह्मा जी के आदेश पर यह कार्य तो संपन्न कर दिया लेकिन उसे मोक्ष कैसे प्राप्त होगा? यह यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया। दशानन ने पृथ्वी पर उपस्थित समस्त आतंकवादियों को वश में करने और उनसे अवध्य होने का वरदान लिया था।
सनातन प्रजापते! मैं गरुड़, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस तथा देवताओं के लिये अवध्य हो जाऊँ। ब्रह्मा जी ने (वाल्मीकि कृत रामायण, उत्तर काण्ड, 10/22) ने दशानन को कहा – “तुम्हारा वचन सत्य होगा।” दशानन मानव जाति को शांतिप्रिय और तुच्छ समझता था। यह बात सभी देवता जानते थे। दो बड़े मानव जाति के साम्राज्य थे – अयोध्या में दशरथ और राजा जनक का साम्राज्य। दशानन ने ब्रह्मा जी को भ्रम में रखते हुए मानव जाति से अवध्य होने का वरदान नहीं मांगा। यह तथ्य बहुत कम लोग जानते हैं कि दशानन प्रकांड ज्योतिषाचार्य और आयुर्वेद आचार्य था। उसने अपनी मृत्यु तिथि स्वयं निर्धारित कर ऐसा राजनीतिक प्रपंच रचा की राम लंका की ओर अग्रसर हो गए। दशानन को मोक्ष देने के उपरांत ही मानव जाति के पुरुषों में सर्वोत्तम की उपाधि प्राप्त कर राम ‘पुरुषोत्तम’ कहलाए।
