mehnat ka phal meetha
mehnat ka phal meetha

एक बार एक अमीर व्यक्ति मंदिर से लौट रहा था। रास्ते में उसे एक भिखारी मिला, जो काफी युवा और हृष्टपुष्ट था। उसने अमीर से भीख माँगी। अमीर ने चुपचाप जेब से एक चांदी का सिक्का निकाला और उसे दूर झाड़ियों में फेंक दिया। भिखारी उस ओर लपका और थोड़ी देर की मेहनत के बाद सिक्का खोजने में कामयाब हो गया। अगले दिन फिर से अमीर जब पूजा करके लौट रहा था तो फिर उसने उससे भीख माँगी।

इस बार अमीर ने सिक्का निकाला और एक गड्ढे में फेंक दिया, जिसमें गंदा पानी भरा था। भिखारी गड्ढे में उतर गया और सिक्का खोजकर ही दम लिया। अगले दिन फिर यही हुआ, इस बार अमीर ने सिक्का वहीं पास बहते एक नाले में फेंका। भिखारी सिक्का खोज लाया आैर अमीर के पास आकर बोला कि यह आपकी दयालुता है कि आप मुझे रोज एक सिक्का दे रहे हैं।

लेकिन मैं यह नहीं समझ पाया कि आप मुझे सीधे हाथ में भीख देने की बजाए इधर-उधर क्यों फेंकते हैं? इस पर अमीर मुस्वफ़ुराकर बोला कि मैं तुम्हें यह समझाना चाहता हूँ कि जितनी मेहनत तुम इस एक सिक्के को खोजने में करते हो, उतनी अगर किसी काम में करो तो ऐसे कई सिक्के कमा सकते हो। सुनकर भिखारी की आंखें खुल गई और उसने अमीर से वादा किया कि आगे से वह सिर्फ अपनी मेहनत से ही कमाकर खाएगा। अमीर ने उसे अपने यहाँ काम पर रख लिया।

सारः स्वाभिमान से अर्जित आय अधिक सुखद होती है।

ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंIndradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)