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मां का शॉल—गृहलक्ष्मी की लघु कहानी
Maa Ka Shawl

मां का शॉल-मां के गुजर जाने के 6 महीने बाद भाई की बेटी के जन्म पर पहली बार मायके जाना हुआ। सब कुछ ऐसा ही था लेकिन मां नहीं थी। सभी लोग ऐसा व्यवहार कर रहे थे कि कहीं मुझे मां की कमी महसूस ना हो।

बाबूजी बिना बात हँस देते थे,भाई बार-बार इधर-उधर की बातें करता जाता था और भाभी तो जैसे मेरी ही खातिर में लगी थी।

लेकिन मुझे बार-बार मां की आवाज सुनाई दे रही थी। बिट्टो ये खा ले,बिट्टो वो खाले, देख तेरे लिए ही मंगवाया है, तुझे बहुत पसंद है ना। (मां मुझे प्यार से बिट्टो ही बुलाती थी)

जब कभी हम सभी अपनी बातों में मशगूल होते तो पीछे से आकर अपना शाँल मुझे उड़ा देती और कहती, इसे ओढ़ ले नहीं तो सर्दी लग जाएगी।

 मैं इन ख्यालों में ही थी, कि इतने में भाभी आकर कहती है, दीदी ये साड़ी और यह सूट आपके लिए है, मेरी आंखें जो इतनी देर से अपने आंसुओं को अंदर ही अंदर पी रही थी कि कहीं खुशी के मौके पर आंसू न आ जाए, अपने को रोक ना सकी और आंखें नम हो गई।

 मैंने भाभी से कहा भाभी मुझे तो सिर्फ मां का वो शाँल ला दो। भाभी गई और वो शाँल लाकर मुझे ओढ़ा दिया और बेटी को मेरी गोद मे लाकर दे दिया, और बोली अब आपको ही इसे दादी और बुआ दोनों का प्यार देना है।

शाल में मां के स्नेह की गरमाई को महसूस करते हुए मुझे एहसास हुआ कि मां तो यही कही है मेरे पास….

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