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 Magical City Mandu: मांडू जीवन के आमोद-प्रमोद और पत्थरों में मुखरित प्रेम की अमरगाथा का जीवंत साक्ष्य हैं, जिसे कवि और राजकुमार बाजबहादुर ने अपनी प्रेयसी रानी रूपमति के प्रेम की निशानी के रूप में बसाया था और रसिकों को अभिभूत कर देते हैं। समुद्रतल से 2000 फुट की उंचाइयों पर विंध्य पर्वतमालाओं में बसा मांडू प्रकृति की विविध सुरभ्य रूपों को अपनी वादी में समेटे हुए है इसके शासकों ने जहाज महल, हिंडोला महल, सुंदर आकर्षक नहरें, स्नानघर और भव्य मंडप बनाया। मांडू का प्रत्येक स्थापत्य वास्तुकला की दृष्टि से एक रत्न है। इनमें विशाल जामी मस्जिद और होशगंशाह का मकबरा उल्लेखनीय है। जिनके निर्माण की भव्यता ने सदियों बाद ताजमहल जैसी इमारत के महान निर्माताओं को अनुप्रेरित किया था। मांडू की यही किर्तिगाथा अमर हो गई, जो राजप्रसादों और मस्जिदों में जनश्रुतियों और गीतों में बाद की पीढ़ियों को विराजत में मिली है।

उज्जैन- 

(इंदौर से 55 किमी. दूर): उज्जैन शिप्रा नदी के किनारे बसा हुआ है। उज्जैन जोकि ‘उज्जयिनी’ का आधुनिक नाम है, प्राचीन संस्कृति के साथ यह मंदिरों से परिपूर्ण हैं। वर्तमान में जो मंदिर की संरचना खड़ी है। वो अभी के समय में बनी हुई है, जो वर्षों में कई बार दोबारा बनाए गए हैं। हर बारह साल में एक बार होने वाले सिंहस्थ में धार्मिक स्नान करने के चमत्कारिक और अद्भूत परिणाम होते हैं जो कि चैत्र (अप्रैल) महीने में शुरू होता है और बैसाखी (मई) महीने तक जारी रहता है। यहां के मंदिर शहर के अभिन्न भाग हैं और उज्जैन की संस्कृति और महानता को बनाए रखते हैं । यहां का सबसे प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर है, जो कि शिव के 12 ज्योतिर्लिगों में से एक है।

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Magical City Mandu: जाने जादुई नगरी मांडू के बारे में 3

महेश्वर-

(इंदौर से 91 किमी. दूर): भारतीय सभ्यता के उषाकाल में महेश्वर एक उत्कृष्ट शहर थ। तब इसका नाम महिष्मती था जो कि राजा कार्त वीर्याजुन की राजधानी थी। रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों में नर्मदा के तट पर बसे इस मंदिरों के नगर का उल्लेख मिलता है। होलकर वंश की रानी अहिल्या बाई ने इस नगरी की पुरातन गरिमा को पुर्नप्रतिष्ठा प्रदान की। महेश्वर के मंदिर और विशाल दुर्ग परिसर का मौन सौंदर्य आज भी आपको अभिभूत करता है। 250 वर्ष पहले रानी अहिल्याबाई द्वारा प्रस्तावित महेश्वरी साड़ी अपनी अनोखी बनावटके लिए आज भी प्रसिद्ध है।

ओमकारेश्वर-

(इंदौर से 77 किमी. दूर) हिन्दू प्रतीकों मे प्रसिद्ध उॅं की आकृति जैसा यह स्थान एक द्वीप के समान है। अनेक पीढ़ियों से श्रद्धालुजन इस स्थान पर तीर्थ यात्रियों के रूप में आते हैं। यहां नर्मदा और कावेरी के संगम पर स्थित श्री ओंकार मांधाता के मंदिर में स्थापित ज्योर्तिलिंग (भारत के द्वादश ज्योर्तिलिंगों में से एक है) के सम्मुख प्रणाम निवेदित करते हुए भक्तजन अपना जीवन सार्थक करते हैं। मध्यप्रदेश के अन्य पवित्र स्थलों की भांति यहां भी प्रकृति ने अपनी शोभा से मानव कृतित्व में अनन्य योगदान दिया है।