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"दो जून की रोटी" —गृहलक्ष्मी की लघुकथा: Roti Story
Do June ki Roti

Roti Story: अम्माँ सुनो! आज खाने में कुछ भी नहीं है ऐसे कब तक चलेगा अम्माँ! बेटी व्याकुलता भरी आवाज में अम्माँ से कहती है।
अम्माँ बेबसी भरी नजरों से अपनी बेटी को देखती हैं और कहती है – “लाडो आज तबियत ठीक नहीं है तू चली जा आज काम पर कुछ पैसे मिलेंगे तो घर में अनाज आएगा तब कुछ भोजन का इंतजाम हो पाएगा”।
बेटी अम्माँ से कहती हैं – “माँ मैं नहीं जाऊँगी बहुत काम रहता है घर का और वो जमींदार कम पैसे देता है तुम जाओगी तो ठीक रहेगा पिछले दिनों का भी हिसाब पूरा नहीं दिया तुम्हारी तबियत की वजह से तुम काम पर गई नहीं “!
अम्माँ भरे कदमों से उठी लड़खड़ाते हुए चलने की कोशिश में थी सिर पर कपड़ों से बंधा एक गोल कपड़ा बाँध कर वो काम पर निकल गई।
पहुँचते ही ज़मींदार कड़क आवाज में -” क्यूँ अम्माँ अब क्यूँ आई हो काम पर! तुम्हारी उम्र हो चुकी है बेटी हैं घर में उसको भेज देती “!
अम्माँ कांपते स्वर में -“रहने दो बेटा! काम मैं कर लूँगी इस बार पगार थोड़ा सा ज्यादा दे देना भले ही अगले महीने काट लेना घर में राशन नहीं हैं बेटा पिछले साल खत्म हो गया उसके बाद से मैं खुद बोझिल हो गई। अब बेटी की शादी भी करनी है कैसे करूँ घर में खाने की समस्या ऐसे ही घेरी रहती है”!
ज़मींदार चुप हो गया अम्माँ की आँखों से बहते आँसू देख उसका मन द्रवित हो गया वो बोला-” ठीक है अम्माँ! तुम से जितना कार्य हो सके कर लो अगर नहीं कर पाओ तो अभी बैठ कर आराम कर लो फिर काम देख लेना”!
अम्माँ उठी बिना बोले वो ईंटों का बोझ अपने सिर पर रख कर अपने काम में लग गई।
सबेरे से शाम बीत गई जब काम से लौटने के लिए अम्माँ बाहर आई तो बेहाल होकर गिर गई।
अम्माँ अम्माँ! क्या हुआ? फिर ज़मींदार बदहवास दौड़कर पानी लाया अम्माँ बेहोश थी पानी के छीटें मारते ही थोड़ी होश में आई और ज़मींदार से बोली-“बेटा एक काम करना आज की पगार जो बनतीं है वो मेरी बेटी तक पहुँचा देना मेरा सफर अब खत्म हो रहा है इसलिए अब तुम जाकर ये मजदूरी के पैसे बेटी को दे आना और बेटी से कहना कि दहेज के लिए पेटी मे कुछ गहने सम्भाल कर रखी हूँ उसे निकाल ले और शादी करके अपना घर बसा लेगी और ये मेरी शादी के गहने थे जो संजोकर उसके दहेज के लिए रखी थी और आज जो मजदूरी मिली है उसके पैसे दे देना उसे ताकि आज का राशन आ सके और “दो जून की रोटी” का इंतजाम हो सके।”
इतना कह कर अम्माँ अनंत यात्रा पर निकल गई पर जाते जाते”दो जून की रोटी” का इंतजाम कर गई।

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