googlenews
संस्कार—गृहलक्ष्मी की कहानियां
Sanskaar-Grehlakshmi ki Kahaniyan

ऑफिस में क्लर्क के पद पर काम करते हुए मुझे दस वर्ष हो गए थे , लेकिन ऑफिस के किसी कर्मचारी से मेरा बैर—भाव नहीं था। ऑफिस में बैठा सारा दिन फाइलों को निपटता रहता हूं और शाम को बॉस की सेवा में लग जाया करता हूं । इस ऑफिस का एक आदर्शवादी कर्मचारी होने के कारण बॉस की कृपा दृष्टि मेरे ऊपर बनी रहती है । इस ऑफिस में कई अफसर आए और गए , लेकिन किसी अफसर ने मुझ पर अंगुली नहीं उठाई और मैं सब का चहेता बना रहा । यही कारण था कि मैं धीरे – धीरे अपनी टूटी कुर्सी में धंसता चला गया। मैं इस ऑफिस में क्लर्क के पद पर नियुक्त हुआ था और क्लर्क से आगे नहीं बढ़ पाया। क्लर्क के पद से ही शायद रिटायर हो जाऊंगा , जबकि मेरे बाद आए, कई क्लर्क अफसर तक बन गए । इसी बात को लेकर मेरी पत्नी हमेशा ताने मारा करती है।
आज ऑफिस आते ही मैं एकदम से बैचेन और अस्थिर हो गया । आज मेरा मन काम करने का नहीं हो रहा था । मैं भीतर ही भीतर घुटन महसूस कर रहा था । इन परेशानियों का प्रमुख कारण था कि आज मेरे बचपन का मित्र विनीत इस ऑफिस में अफसर बनकर आ रहा था। न जाने क्यों उसके आने से मुझे खुशी कम और ईष्र्या जलन काफी अधिक हो रही थी । उसका इस ऑफिस में अफसर बनकर आना मुझे अधिक परेशान कर रहा था। मुझ उससे नफरत हो रही थी और मैं उसकी शक्ल भी देखना नहीं चाहता था,लेकिन ऑफिस का कर्मचारी होने के नाते मुझे उसका स्वागत करना ही पड़ेगा और न चाहते हुए भी मुझे उसका चेहरा प्रतिदिन देखना ही पड़ेगा फिर भी मैं अनमने ढंग से अपने मित्र के अफसर बनकर आने का धौंस अन्य कर्मचारियों पर जमाने लगा , लेकिन मेरी यह धौंस मात्र दिखावटीपन था। मैं भीतर ही भीतर विनीत के आने से जल रहा था। आज तक किसी अन्य अफसर के आने से इतनी जलन नहीं हुई थी , जितनी आज हो रही थी । मैं भी तो अफसर बन सकता था , लेकिन मेरी किस्मत और संस्कार ने मुझे अफसर बनने का मौका नहीं दिया । मुझमें भी अफसर बनने की सारी योग्यताएं रहने के बावजूद मुझे अयोग्य करार कर दिया जाता और मेरे स्थान पर किसी अन्य को अफसर बना दिया जाता । मैं चाहता था कि विनीत भी इस ऑफिस में क्लर्क बनकर ही आए और मेरी तरह ही क्लर्क बनकर रह जाए । पर ऐसा नहीं होने वाला था । वह उच्च संस्कार वाला और प्रतिभावान जो था । यही सब सोचकर मैं भीतर ही भीतर ही घुटन महसूस करने लगा । मुझे अपने आप पर खींझ होने लगी । मैं क्यों पैदा हुआ मध्यमवर्गीय परिवार में ? मुझमें भी क्यों नहीं आते बड़े लोगों से जैसे उच्च संस्कार ! लेकिन कमबख्त यह मध्यम वर्ग भी बड़ी अजीब वस्तु है । समाज की सारी कुंठाएं अपने कंधों पर ढोये फिरता है और करहाने में भी शरमाता है । निम्न वर्ग तो अपनी पीड़ाओं और अभावों की प्रदर्शनी लगा देता है । उच्च वर्ग अपनी खटमली प्रवृतियों के कारण अंधकार में अपना संसार उजागर करता है, तो मेरा वर्ग समाज के भय से मुंह छिपाकर रोता है और आलोचनाओं के भय से मुंह छिपाकर हंसता है । विनीत के आगमन पर मेरी हंसी कुछ ऐसी ही थी ।
विनीत आते ही अपने कर्मचारियों का चहेता बन गया था , लेकिन मेरे मन में उसके प्रति विद्रोह की चिंगारी उठ रही थी । मैं चाहकर भी अपना विद्रोह किसी के सामने प्रकट नहीं कर पा रहा था । विनीत मेरे बचपन का मित्र था । हम दोनों साथ मिलकर खेला – कूदा करते थे । यही नहीं हम दोनों एक ही विद्यालय से पढ़कर यहां तक पहुंचे थे। यही कारण था कि मैं उसके सारे गुण—दोषों से भली—भांति परिचित था। इस समय उसकी सारी कमजोरियों मेरी आंखों के आगे घूम रही थीं। वह था तो पढ़ने में साधारण। वह अक्सर विद्यालय की कक्षा से गायब ही रहता था। वह मोहल्ले की खूबसूरत युवतियों के पीछे मंडराया करता था। इसी कारण उसके मां – बाप को कई बार उलाहने भी सुनने पड़े थे । कॉलेज में भी उसकी यही आदत बन रही और कई बार युवतियों से छेड़छाड़ के आरोप में उसे क्लास से बाहर कर दिया जाता था । वह अपने साथियों के साथ नशीले पदार्थों का सेवन करने में पीछे नहीं रहता था । मैं भी उसकी टोली में रहता था और मेरी भी इच्छा होती थी कि मैं भी उसके इन गलत कार्याें में सहयोग दूं , पर मध्यमवर्गीय परिवार का होने के कारण मेरी हिम्मत नहीं होती थी । वह अमीर मां – बाप का इकलौता संतान था और वह पैसे वाला था। यही कारण था कि लड़कियां उसके इर्द – गिर्द मंडराया करती थी और वह जीवन का आनंद उठा रहा था ।
इसके विपरीत मेरे पिताजी क्लर्क की नौकरी करते थे । वे रोज रात को शराब पीकर घर आते थे और शराब की बदबू दूर करने के लिए हमेशा इलायची मुंह में डाले रहते थे । मैं मध्यमवर्गीय परिवार से था इसलिए मेरे मैट्रिक पास करते ही उन्होंने मुझे भी अपनी तरह एक ऑफिस में क्लर्क की नौकरी दिलवा दी , जबकि मेरी इच्छा अफसर बनने की थी , किंतु मैं अपने पिता के आदेशों की अवहेलना नहीं कर सकता था । मेरे घर की आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं थी । यही कारण था कि मैंने अपने अरमानों का गला घोंटकर क्लर्क की नौकरी कर ली। मैं अपने पिता की इच्छा के विरूद्ध नहीं जा सकता था ।
जबकि विनीत अपने पिता की इच्छा के विरूद्ध हो गया था । उसने अपने पिता के भवानाओं की कद्र न कर उनके प्रति विद्रोह कर दिया । उसके पिता उसे व्यवसायी बनाना चाहते थे , पर वह व्यवसाय नहीं करना चाहता था। वह अफसर बनना चाहता था। उसके पिता भी शहर के एक प्रसिद्ध और इज्जतदार व्यवसायी थे । इसलिए वह पिता से झगड़ा कर घर से भाग गया । विनीत के इस व्यवहार से सभी लोगों ने उसकी आलोचना की । उसकी आलोचना करने वालों में मैं भी था।
उसके दर—दर भटकने के समाचार मुझे निरंतर मिलते रहते थे , फिर यह समाचार मिला कि उसे किसी कार्यालय में एक अच्छे पद पर नौकरी मिल गई है , लेकिन बाद में पता चला कि वह निरंतर अपने बॉस से झगड़ता रहता था । इसी बीच समाचार मिला कि उसने किसी दूसरी जाति की लड़की से विवाह कर लिया है । इस प्रकार उसके अंतरजातीय विवाह करने के कारण उसके परिवार वाले और सारा समाज उसे घृणा की दृष्टि से देख रहा था । उसने तो अपने मां – बाप के अरमानों पर तुषारापात कर दिया था । उसके इस कार्य के कारण उसके पिता किसी को अपना मुंह दिखाने लायक नहीं रहे । वे अपना मुंह छिपाएं फिरते थे । लोग विनीत के बारे में तरह—तरह की चर्चाएं किया करते थे। मैं अपनी स्वजातीय पत्नी के साथ उसकी जमकर आलोचना किया करता था। मैं हमेशा लोगों के सामने यह कहता था कि उसे अपने मां-बाप की इच्छाओं का ख्याल रखना चाहिए था। मां—बाप की इच्छा के विरूद्ध विवाह कर लेने से उनके दिल पर कितना ठेस पहुंचा होगा । मां—बाप कितने अरमान से अपने बेटे को पालते हैं ,ताकि एक दिन वह उनके स्वप्नों को साकार करेगा । पर उसने तो उनके स्वप्नों को मिट्टी में मिला दिया । उसे अपनी जाति में लड़की नहीं मिली जो किसी दूसरी जाति की युवती से विवाह कर लिया । यह कितने शर्म की बात थी। मेरे और समाज के कहने के बावजूद वह अपनी पत्नी के साथ सुखी जीवन व्यतीत करता रहा ।
मुझे दु: ख तो इस बात का था कि आवारा किस्म का विनीत अफसर कैसे बन गया , लेकिन विनीत अफसर बनने के बाद काफी बदल गया था । अपने मिलनसार स्वभाव के कारण वह कर्मचारियों का चहेता अफसर बन गया था । मेरे प्रति भी उसका व्यवहार काफी सकारात्मक और आत्मीय था , लेकिन मुझे लगता था कि उसका यह व्यवहार मात्र दिखावटीपन है , लेकिन ऐसी बात नहीं थी । वह बचपन का दोस्त होने के नाते मेरा बहुत आदर – सम्मान करता था ।
एक दिन उसने मुझे अपने कक्ष में बुलाया और घर आने का निमंत्रण दिया । उसने मुझसे घर आने का आग्रह किया था और मैं ‘ न ’ कैसे कर सकता था । मैं अपनी पत्नी के साथ उसके आवास पर गया , तो दोनों पति —पत्नी ने हम लोगों का भरपूर आदर—सत्कार किया । विनीत हम लोगों के आगे—पीछे ही लगा रहा । विनीत के इस बदले व्यवहार को देखकर मुझे लगने लगा कि वह मेरा बॉस नहीं , बल्कि मेरे बचपन का वही दोस्त है , लेकिन अगले ही पल मेरे संस्कारों ने मुझे दबोच लिया । मुझे अपने आप से घृणा होने लगी कि मैं क्यों इसके घर आ गया ? विनीत तो अब अफसर बन गया है और मैं एक छोटा – सा क्लर्क हूं । मैं निम्न स्तरीय बातें सोचने लगा । तभी उसने मुझे झकझोर कर कहा – ” तुम किस सोच में डूबे हो । क्या स्वागत – सत्कार में कमी रही गई ? “
मैं बोला – ” नहीं ऐसी कोई बात नहीं है । तुम से क्या गिला – शिकवा हो सकता है ? आखिर तुम हमारे बचपन के मित्र हो । मुझे तो ऐसा लग ही नहीं रहा है कि तुम हमारे बॉस हो । तुम्हारे यहां आकर मुझे बहुत अच्छा लगा । बचपन की बातें याद आ गई थी । “
विनीत खुश होते हुए बोला – ” ठीक है अगले रविवार हम तुम्हारे घर आ रहे हैं । रात का खाना भी तुम्हारे यहां ही खाएंगे । कभी भाभी के हाथ का बना खाना नहीं खाया । इसी बहाने भाभी के हाथ का बना खाना खा लेंगे ।”
विनीत के घर से निकलते ही पत्नी का प्रवचन प्रारंभ हो गया – ” देखो , तो विनीत कितना बड़ा आदमी बन गया है । एक तुम हो जो आज तक क्लर्क के क्लर्क ही हो । अब तुम जीवन में कभी तरक्की नहीं कर सकते । हमारी जिंदगी यूं ही अभाव और कष्टों में गुजर जाएगी । विनीत के पास क्या नहीं है ? ऐशो – आराम की सारी सुविधाएं मौजूद हैं । उसे किसी चीज की कमी नहीं है । मैं अभागी थी जो तुम्हारे साथ घुंट – घुटकर जीवन जीने को मजबूर हूं । न जाने कब हम लोग भी विनीत की तरह बड़े आदमी बनेंगे । इन बातों को तुमने कभी सोचा भी है । कभी आगे बढ़ने का प्रयास किया है ? बस हाथ पर हाथ धरे एक पद पर जिंदगी बिताए जा रहे हो ? “
उसका एक – एक शब्द व्यंग्य , तिरस्कार और कुंठा से भरा था । वह विनीत को नीचा दिखाना चाह रही थी , पर यह कैसे संभव था ? आखिर वह मेरा बॉस था और उसके पास मां – बाप की पुश्तैनी संपत्ति भी थी । वह बचपन से ही तो अमीरी में अपनी जिंदगी व्यतीत करता आया है , तो अब वह कैसे गरीबी में अपना जीवन व्यतीत करेगा । इसके विपरीत मैंने गरीबी में ही अपना बचपन गुजारा और गरीबी में ही जीवन की अंतिम सांस लूंगा । मध्यम वर्ग की यही नियति है ।
घर में कदम रखते ही पत्नी उबलकर बोली – ” आने दो उसे रविवार को , मैं उसे ऐसा खाना खिलाऊंगी कि उसने आज तक खाया नहीं होगा , किंतु ठंडा पानी कहां से आएगा …..? “
वह काफी सोचने के बाद बोली – ” आप किसी भी कीमत पर शनिवार तक घर में फ्रिज ले आइए । “
यह सुनते ही मुझे दिन में तारे नजर आने लगे और बोला – ” फ्रिज खरीदने के लिए पैसा कहां से आएगा । हम मध्यम वर्गीय लोगों के पास फ्रिज की क्या आवश्यकता ? फिर इतने पैसे मैं कहां से लाऊं ? क्या फ्रिज के लिए अपने आप को बेच दूं । मेरी औकात नहीं कि मैं फ्रिज खरीद सकूं । “
यह सुनते ही वह तुनककर बोली – ” मैं तुम्हारी कोई दलील नहीं सुनना चाहती । शनिवार तक किसी भी कीमत पर घर में फ्रिज आ जानी चाहिए । वरना मुझसे …. ? “
पत्नी की धमकी सुनकर मैं बर्फ की तरह जम गया । मुझे उसके दबाव के आगे झुकना ही था , सो मैं झुक गया ।
काफी भाग – दौड़ के बाद मैं अपने एक परिचित के यहां से किश्त पर फ्रिज खरीद लाया । घर में फ्रिज आते ही पत्नी ने राहत की सांस ली । अब वह विनीत को नीचा दिखाने के लिए पूरी तरह से तैयार थी । पानी की बोतलें और सब्जियों से सारा फ्रिज भर गया । मेरी इतनी औकात कहां थी कि मैं फ्रिज को अंडे , फल और दूध से भरता ? रविवार शाम को ही विनीत अपनी पत्नी के साथ मेरे घर आ गया ।
काफी समय तक हम लोग बातों में मशगूल रहे। जब वह भोजन के लिए बैठा तो मेरी पत्नी द्वारा बनाए गए व्यंजन की भरपूर प्रशंसा की । वह बोले जा रहा था – ” वाह ! लजीज व्यंजन बनाना तो कोई भाभीजी से सीखे । लगता है आपके हाथों में जादू है । आपके हाथों के बने व्यंजन की जितनी भी प्रशंसा की जाए काफी कम ही होगी ? “ और उसने पानी का गिलास उठा लिया । पानी का एक घूंट पीते ही बोल पड़ा – ” यह क्या भाभी जी ? आपको भी फ्रिज की बीमारी लग गई है ? “
मेरी पत्नी शर्माने का बहाना बनाते हुए बोली – ” क्या करूं भाई साहब । घड़े का पानी पीते – पीते ऊब गई थी । घड़े का पानी तो एकदम स्वादहीन और तीखा लगता था , इसलिए फ्रिज खरीद लिया । “
यह सुनकर विनीत हंस पड़ा और बोला – ” भाभीजी , आप भी क्या बात करती हैं ? भला घड़े का पानी तीखा और स्वादहीन कैसे लगता है । घड़े का पानी तो एकदम शुद्ध और मीठा लगता है । फ्रिज का पानी हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। फ्रिज तो मेरे यहां भी हैं , किंतु मुझे फ्रिज से नफरत है । सच कहूं तो फ्रिज बहुत खराब चीज है । “
वह मेरी ओर मुखातिब होते हुए बोला – ” दोस्त , मैंने लाचारी में ‘ स्टेट्स ’ का ढोंग रचने के लिए फ्रिज खरीद लिया । घर में फ्रिज रखने से थोड़े ही कोई इंसान बड़ा या छोटा हो जाता है । इंसान अपने कर्म और विचार से ही बड़ा होता है । किसी के पास अथाह धन—दौलत होने से वह बड़ा आदमी नहीं कहलाता , बल्कि छोटे से छोटे व्यक्ति भी अपने विचार और संस्कार से काफी बड़ा आदमी बन सकता है । सच मान मेरे दोस्त , मैं जब भी फ्रिज को खोलता हूं , तो मुझे बहुत दु: ख होता है । हर चीज समय से पूर्व कटी और पिछड़ी महसूस होती है । “ विनीत कुछ क्षण रूककर मेरी पत्नी से बोला – ” भाभी जी ! बाहर की तपन से जिसे डर रहता है वह फ्रिज के अंदर सुरक्षित तो रह जाता है , पर बढ़ते समय का साथ नहीं दे पाता । हमारे दु: ख का मुख्य कारण यही दिखावटीपन है। आप जितना इससे दूर रहेगी , उतना ही सुखी रहेंगी । इस बाहरी दिखावटीपन से इंसान भीतर से एकदम खोखला हो जाता है। आप मेरा कहा मानिए और इस खोखले दिखावटीपन से दूर रहिए । अन्यथा आपका यह खोखला दिखावटीपन आपके सुख—चैन को छीन लेगा। आपको यह चैन से जीने नहीं देगा । “
और वह मेरी पत्नी की ओर मुस्कुराकर देखते हुए बोला – ” आप इस बात को अन्यथा न लेंगी और मेरे कहने का मतलब समझ गई होंगी । यदि न समझी हो तो मेरा दोस्त आपको समझा देगा । “
मेरी पत्नी विनीत के कहने का मतलब समझ गई थी और मैं भी । पत्नी ने शर्म से अपना सिर झुका लिया था । उसे अपनी गलती का अहसास हो गया था ।
विनीत कुर्सी पर से उठा और मेरे कंधे पर हाथ रखकर बाहर की ओर जाने लगा । मैं दरवाजे तक उसे छोड़ने गया और सोचने लगा – ” विनीत का कहना सही है कि फ्रिज रखने से कोई इंसान अमीर नहीं हो सकता । उसके सारे राज तो उसके संस्कार और विचार ही खोल देते हैं । सचमुच यही खोखला दिखावटीपन ही इंसान को चैन से जीने नहीं देता। उसके विचार और संस्कार ही उसे बड़ा या छोटा बनाते हैं। इंसान को बड़ा बनने के लिए अपने विचार और संस्कार को बदल देना चाहिए । मैं विनीत के बारे में क्या – क्या सोचा करता था ? मेरे विचार और उसके विचार में कितना अंतर है । मेरे विचार कितने निम्न स्तरीय थे , जबकि उसके विचार और संस्कार कितने उच्च हैं , तभी तो वह इतना बड़ा आदमी बन गया । मैं अपने निम्नस्तरीय विचार और संस्कारों के कारण क्लर्क का क्लर्क ही रह गया । “
मैं जाते हुए विनीत को एकटक निहारने लगा । वह मुझसे काफी दूर होता जा रहा था|

Leave a comment