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गृहलक्ष्मी की कहानियां

गृहलक्ष्मी की कहानियां: मैं रविवार को सुबह एक पत्रिका के लिए विशेष लेख हेतु मूड बनाने के लिए मसाले वाली गरमा-गरम चाय पीकर अपने स्टडी रूम के गेट को बंद कर चिंतन करने लगा ही था कि तभी गेट पर खट-खट हुई। गेट खोला तो देखा पत्नी झाडू लिये खड़ी थी। समझ नहीं आ रहा था कि वह लक्ष्मी जैसा अवतार है या काली मां का या फिर केजरीवाल की पार्टी का प्रचार कर रही है! उसने अल्टीमेटम दे डाला। दो घंटे में स्टडी रूम से साहित्यिक किताबें व पत्र-पत्रिकाओं के हटाने का। घर की सफाई करनी है।
मेरे चिंतन से जुटाए विचार पल भर में आईने की तरह टूट कर बिखर गए। मैंने पत्नी का यह रूप देखा तो, दो पल के लिए सोचा क्या यह वही पचास वर्ष पहले वाली पत्नी है, जिसकी बातों में धीरज भरा सहजपन था। बोली में मिठास थी। अब आवाज इंजन की तरह कर्कश।
बहुत समय से सफाई करने का तकाजा चल रहा था। इसलिए सफाई तो होनी ही थी और पुराने अनुपयोगी अटाले को रद्दी के हवाले तो होना ही था। चूंकि साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का मामला था। मुझे वर्षों पुरानी सम्पदा से जूझना था। कमरा वर्षों पुरानी पत्र-पत्रिकाओं व किताबों से भरा हुआ था। हर बार इनके प्रति मोह ऐसा बना रहता है कि उन्हें बेचने का मन ही नहीं करता। क्या रखना क्या निकालने का निर्णय करना कोई छोटा काम नहीं था।
पूरा दिन लग जाता है, इन्हें झाड़ने-पोछने और जमाने में। दो घंटे में पूरी तरह सफाई का अल्टीमेटम देने वाली पत्नी भी यह बेहतर जानती है कि पूरे दिन से पहले यह काम पूरा नहीं हो सकता। थोड़ी ही देर हुई कि पत्नी फिर कमरे में आ धमकी। साहित्यिक रुचि-रुझान की दुश्मन बनी वह फिर अपना झाडू लिये आ धमकी। जल्दी करो। अलमारी की तीनों ताकें इस बार खाली रखना। यहां पोते-पोतियों की किताबें जमेगी। उन्हें भी सुविधा पूर्ण जगह चाहिये। इसका सीधा सा मतलब था कि मैं अपने अलमारी की पत्र-पत्रिकाएं यहां से हटा लूं।
काम जल्दी निपटाने की दृष्टि से पत्नी अलमारी के ऊपरी हिस्से में रखी साहित्यिक सामग्री धड़ाधड़ नीचे फर्श पर गिराती रही। लगा जैसे मेनका, ऋषि की साधना भंग करने आ गई हो।

मैंने कहा- इतनी जल्दबाजी मत करो। यह धीरज का काम है। पत्रिकाओं में से अधिक उपयोगिता पत्रिकाओं को छांटना है। समय तो लगेगा ही।
”ठीक है, बनाए रखो फैला पसारा। मैं तो चली। करते रहना इनसे मगज मारी। पर शाम तक कमरा बिल्कुल चकाचक हो जाना चाहिए।’’
मैं काम करने की योजना बना ही रहा था, तभी एक साहित्यिक मित्र श्रीजी का फोन आ गया। ‘आज शाम को चार बजे तक पहुंच ही जाना। कहानी विधा पर आपको मुख्य वक्ता के रूप में विचार प्रस्तुत करना है। ’’
मुझे आज लगा संकट कभी अकेला नहीं आता। यहां काम न करो तो पत्नी के गुस्से की रात-दिन की किच-किच सुनो और वहां न जाऊं तो प्रतिष्ठा की बात। इधर गिरो तो खाई उधर गिरो तो कुआं।’’ मैं धर्म संकट में फंस गया।
मैंने कमरे से बाहर निकलकर देखा, थकी हारी पत्नी खर्राटे भर रही थी। मैंने सोचा जो होगा सो देखा जायेगा और निकल पड़ा गोष्ठी में। वहां से दो घण्टे की कथा-कीर्तन के बाद घर लौटा। मुझे पता था कि कुछ न कुछ उल्टा-पुल्टा होने वाला है और जो सोचा वही हुआ।
बच्चों ने बताया कि दादी ने आपका सारा झमेला पीछे गैलरी में डाल दिया। कल रद्दी वाले को देने की कह रही थी।
मैंने देखा सारी पत्र-पत्रिकाएं एक पुरानी साड़ी में बांधकर राम भरोसे गैलेरी में पटक रखी थी। अलमारी की ताकों में बच्चों की कॉपी किताबें जम चुकी थी। पहले आओ पहले पाओ के सिद्धान्त के अनुसार अब उनका वहां स्थाई कब्जा हो गया था।
मैंने पोटली को देखा। कई पुरानी पत्रिकाएं अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिये मेरी ओर टुकुर-टुकुर देख रहीं थी और मैं उन्हें अंतिम बार देखकर सलाम कर रहा था।

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