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रिश्तों की गर्माहट—गृहलक्ष्मी की कहानियां
Rishto ki Garmahat

रिश्तों की गर्माहट: उन्होंने पूछा “ए , लड़की तू यहाँ अकेले क्यों बैठी है,क्या तुझे नहीं मालूम …इस वक्त यहाँ बैठना ठीक नहीं है।

जीऽऽऽऽ ” मैं रास्ता भटक गई हूं मेरे अपने मुझसे बिछड़ गए हैं”

     थोड़ी देर तक दोनों तरफ़ चुप्पी पसरी रही,,,मानों नन्हे शिशु को सुलाने के जतन में किसी माँ ने सख्त आदेश दे दिए हों,कि ज़रा सी भी आवाज़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

  अणिमा ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा”बुरा न मानें तो मैं पूछ सकती हूँ कि आप ???? “

    हूंऽऽऽऽ मेरा नाम रानी है,

” मैं अपना घर छोड़कर सुकून और एकांत की चाह में यहाँ तक आ गई हूँ ,,,,वो सामने वाला तंबू देख रही हो ना ,,,,हाँ.. हाँ,,वही, जहाँ मद्धम मद्धम दीप जल रहा है,मैं वहीं रहती हूँ।

“तुम्हें यहां बैठे देख कर आ गई”  चलो अच्छा है अब दोनों कुछ देर साथ बैठेंगे तब तक सवेरा भी हो जाएगा।

अगर तुम बताना चाहती हो तो अपना नाम मुझे बता सकती हो।
  “हूंऽऽऽऽ ,,,मैं अणिमा”

“अणिमा!!!कितना प्यारा नाम है तुम्हारा”

    कुछ भी हो उस औरत के पास बैठने से मेरे अंदर सकारात्मक उर्जा भर रही थी।
  अणिमा!!!!तुम मुझे अपनी सी लग रही हो इसलिए तुमसे बात करने का जी चाह  रहा है।

तुम जानना चाहोगी मैं कौन हूँ ???

हूँऽऽऽऽऽ,गर्दन स्वीकारोक्ति में हिलाते हुए

मैं एक बहुत अच्छे घर की बहू हूँ ,,,सब ठीक चल रहा था कि एक दिन अचानक मेरी सास का एक्सीडेंट हो गया दुर्भाग्य से उस दिन गाड़ी मैं चला रही थी ,,,,मुझे कुछ नहीं हुआ लेकिन मम्मी को बहुत चोट आई और वह कोमा में चली गईं। इसके लिए रोज मुझे ताने सुनने को मिलते थे और आए गए लोगों के सामने जलील किया जाता था।
खैर!!!मैं उन सबकी परेशानी समझती थी और समय के साथ मुझे भी ऐसी बातें सुनने की आदत हो गई थी। जबकि सब जानते थे कि हम दोनों सास -बहु में हमेशा सामंजस्य बना रहता था।

लेकिन जब मेरी सहने की क्षमता ने जवाब दे दिया तो मुझे वहाँ से हमेशा के लिए चले जाना ही सही लगा।
मुझे लग रहा था कि वह लोग मुझे ढूंढते हुए यहां तक जरूर आएंगे और मुझे ले जाएँगे,,,क्योंकि सबको पता है सागर और रेत मेरे मित्र हैं।
आए भी थे सभी परिवार के लोग ,लेकिन तब तक देर हो चुकी थी और मैंने अपना इरादा बदल दिया था।

अणिमा सोचने लगी”अरे यह तो बिल्कुल मेरी कहानी है”
कहीं इसे मेरे बारे में पता तो नहीं चल गया,लेकिन कौन बताएगा । अरे!!!”हां ,,एक जैसा दुख भी तो हो सकता है ,हम दोनों का ।
कहते हैं न “किसी भी स्त्री का दुख दो-चार घर छोड़कर अपनी रिश्तेदारी बनाती चलती है”
संकोच करते हुए अणिमा ने आखिर अपनी बात कहनी शुरू ही कर दी।
रानी, इस समय मेरा मन और मेरी पीड़ा तुम  में समायी सी लग रही है।तुमने अपने शब्दों के वाक्यूम क्लीनर से मेरे भीतर का बहुत सारा दर्द खींच लिया है।

    जानती हो तुम, जब  घर में मैं बहू बन कर आई थी तो सब मुझे कितना प्यार करते थे । सासू माँ तो मुझे बेटी बना कर रखती थी ,उनकी जान बसती थी मुझमें । पति भी बहुत लाड करते थे, हर वक्त अणिमा,अणिमा करते रहते थे। देवर और ननद की तो मैं चहेती भाभी थी मेरे बिना सलाह के उनका कोई काम ही नहीं होता था।

मैंने भी तो न्योछावर कर दिया था अपने आप को उन सब पर।इनकी खुशियों में ही मैं अपनी खुशी ढूंढती रही। कभी कोई शिकायत नहीं की मैंने किसी बात के लिए।अचानक 10 साल बाद क्या मैं इतनी बुरी हो गई कि मुझसे बोलना भी नहीं पसंद करते वह लोग।

“अणिमा के झरझर आँसू बहते जा रहे थे।”

“रानी ने पानी की बोतल पकड़ाते हुए कहा लो अणिमा ,पानी पी लो पहले”

अच्छा यानी कि अब तुम भी थक गई हो मेरी बात सुन कर ,ऊब होने लगी ,तुम्हें भी

  रानी ने जोर से डपट कर कहा”चल पगली मैं तो तुम्हारा रोना चुप कराने के लिए तुम्हें पानी पीने के लिए बोल पड़ी”

  चलो आगे बताओ फिर मुझे भी तो बतानी है, तुम्हें अपनी पूरी बात

   पिछले 2 साल से मैं बहुत मानसिक तनाव में जी रही हूं सबका मेरे प्रति व्यवहार मुझे जीने नहीं दे रहा है ।
घर में जब से मेरी देवरानी तनु ब्याह कर आई है सबने मुझे दूध में मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया और तो और अंकुश को भी मेरा नाम याद नहीं रहता।यह भी अपने हर काम के लिए मम्मी जी, तनु या अपने भाई-बहनों को बुलाते हैं। मेरे जरा सा भी बोलने पर कहते तुम आराम करो।

यहाँ तक कि अपने जिस बैग को अंकुश मेरे अलावा किसी को नहीं छूने देते थे,,अगर कोई हाथ भी लगा दे तो पूरा घर सिर पर उठा लेते थे,उसे भी अब तनु या कोई और लाकर देने लगा है।

यही कोई ढ़ाई साल पहले मैं बीमार हो गई थी,मुझे डॉक्टर ने आराम करने की सलाह दी थी लेकिन घर की जिम्मेदारियां इतनी थी कि आराम हो नहीं पाता।
इसी वजह से मैं कंसीव भी नहीं कर पाई। कंसीव ना कर पाने का दुख मुझे अंदर ही अंदर खाए जा  रहा था,,, मेरे अंदर जीने की इच्छा खत्म होने लगी थी।

 एक दिन मेरे दूर के रिश्ते के मामा जी अपनी बेटी तनु को मेरे घर लेकर आए।इस शहर में उनका कोई नहीं था और तनु का एग्जाम था।पापा से उनकी बातचीत हुई तो उन्होंने मुझसे पूछ कर उन्हें मेरे घर तनु को रहने की सलाह दी।

   तनु आई तो लगा ही नहीं कि उससे पहली बार मिल रही हूँ। उसके व्यवहार से मैं और घर के सभी लोग बहुत प्रभावित हुए।एक हफ्ते में ही तनु ने मेरा दिल जीत लिया।हर वक्त दीदी दीदी बोलते हुए आगे- पीछे डोलती रहती थी।

  देवर जी के लिए लड़की ढूंढी जा रही थी।अंकुश ने मुझे सलाह दिया कि तनु से अगर अजय की शादी कर दी जाए तो कैसा रहेगा। हमें एक साधारण परिवार की ही लड़की चाहिए जो आकर घर में घुल मिल जाए और ऊपर से वह तुम्हारी लाडली भी है।

  मुझे अंकुश की बात बहुत अच्छी लगी । हमने मम्मी जी और देवर जी से बात की तो उन्हें भी सुझाव अच्छा लगा।हमने खूब धूमधाम से शादी की।सभी मेहमानों और रिश्तेदारों ने खुश होकर घर से विदा लिया।

  तनु ने आते ही घर के कामों में मेरा हाथ बंटाना शुरू कर दिया। शारीरिक रूप से मुझे आराम मिलने लगा था लेकिन मानसिक रूप से मैं बिल्कुल भी ठीक नहीं महसूस करती थी।शायद कंसीव न कर पाने की वजह से मैं अवसाद में जा रही थी
डॉक्टर ने अंकुश को तभी बता दिया था कि मैं कभी कंसीव नहीं कर पाऊंगी ,जब मेरा तीसरा मिसकैरेज हुआ था, घरवालों ने मुझसे यह बात छुपा कर रखी थी । एक दिन मैं बिना किसी को बताए ही अपनी पहले वाली गाइनेकोलॉजिस्ट जो मेरी सहेली भी थी , के पास चली गई तब उसने मुझे बताया कि मैनें तो पहले ही अंकुश जी को बता दिया था लेकिन तब उन्होंने मुझे मना कर दिया था तुझे बताने के लिए।
घर आई तो अंकुश से लड़ाई भी हुई मेरी।उस समय अंकुश ने चुपचाप मुझे सुन लिया और सब ईश्वर की मर्जी बोलकर मुझे सांत्वना दिया ।
लेकिन मन का क्या करती,उसको कहाँ दिखावा पसंद है । शरीर बेशक इधर-उधर फिरती रहती परन्तु मन पर जंग जो लग चुकी थी वह बढ़ती ही जा रही थी।कितना भी रेगमार्क से घिस लो पुन:पुन: लग जाती। अब मन पूरी तरह अस्वस्थ था फिर उसने शरीर को भी अपने साथ मिला लिया । डॉक्टर को दिखाया गया तो उन्होंने जो दवाइयां दी थी उसकी  वजह से मैं हमेशा नींद में रहती थी।
 इधर तनु ने पूरे घर की जिम्मेदारियां ओढ़ ली थीं।हर वक्त सब तनु तनु करते रहते थे।मुझे तनु से कोई परेशानी नहीं थी लेकिन घरवालों का व्यवहार मुझे अंदर से तोड़ रहा था। अब तनु भी मुझसे कतराने लगी थी या फिर व्यस्तता के कारण मेरे पास नहीं आ पाती थी।

  लेकिन आज तो हद ही हो गई थी,तनु प्रेग्नेंट है जिसकी जानकारी मुझे नहीं थी। मैंने तनु को कुछ लाकर देने को कहा , उसने ना ही मना किया और ना ही ले आई जब मैं खुद लेने गई तब तनु ने मुझे पकड़ लिया।मैंने उसको अपने से दूर झटक दिया।वह गिरते-गिरते बची।
देवर ने कहा भाभी ,,,,इस हालत में तनु के साथ अपने ऐसा व्यवहार किया,आपके पास बच्चा नहीं है ना तो आपको कहाँ समझ आएगी यह बात ।
मम्मी जी भी मुझ पर गुस्सा करने लगी,अंकुश ने भी मारने के लिए हाथ उठा लिया,,,
उसके बाद मैं अपने कमरे में ऊपर चली गई।अंकुश कमरे में आएं तो मैंने बात को करने की कोशिश की। उन्होंने मुंह मोड़ लिया। मम्मी जी को आवाज लगाई ,उन्होंने अनसुना कर दिया,हालांकि तनु को जबरदस्ती अपने से चिपका कर मैंने उसका लाड किया । देवर ने मुझे तनु के पास देखा तो उसे कमरे में चलने का का इशारा किया।
यह सब मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ।जिन पर मैं अपना जान छिड़कती थी,उन्होंने मेरे साथ ऐसी बदसलूकी की। मैं बिना किसी से कुछ कहे उसी क्षण घर से निकल पड़ी और फिर दिन भर भटकती हुई अंतत: यहां आकर लहरों के पास बैठ गई ।
रानी ने कहा लड़की मैं भी ऊहापोह में घर छोड़कर आ गई थी,,,,बाद उसके मुझे हमेशा यही लगता रहा कि एक और मौका मुझे खुद के लिए देना चाहिए था।

   खैर!!!!तुम जो भी फैसला लेना अपने जीवन के बारे में, वह सोच समझ कर ही लेना।

    सूरज की लाली बादलों पर छन छन कर आने लगी थी।  चुपके से भोर दस्तक दे रहा था। मेरे पास से जाने कब वह मनमोहिनी चली गई। मैंने उसको बहुत ढ़ूंढ़ा लेकिन वह न मिली। उस तंबू की तरफ़ दौड़कर गई परन्तु वहाँ किसी तंबू का नामोनिशान भी न था।

    इतने में पीछे से फिर किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा ,,मैंने झटके से उसी औरत की आस में मुड़कर देखा तो इस बार अंकुश थे साथ में मम्मी जी देवर जी और तनु भी थी।

अंकुश ने झट से अपने सीने से मुझे चिपका लिया और लगातार रोते रहे। मम्मी जी ने भी मेरा माथा चूम लिया और गाल पर मीठी सी चपत लगाते हुए कहा…

  “ऐसे  बिना बताए कोई अपने घर से आता है क्या ??
हम सब कितने परेशान हो गए थें। तुम्हें कुछ हो जाता तो, सोचा है कभी ,,,क्या होता हम सबका,,,,अंकुश कैसे अपना जीवन बिताता”

  तुम्हें बुरा लगा ना कि हम सब ने तुम्हारे साथ कैसी बदसलूकी की।
  अनी,बेटा तुम दिन रात घुलती जा रही थी ,हमारी सहानुभूति तुम्हारे लिए और ज़हर का काम कर रही थी।हम जितनी सहानुभूति तुम्हें दिखाते तुम उतनी ही ज्यादा हीन भावना से ग्रसित होती जा रही थी । सामान्य जीवन जीना तो तुम भूल ही चुकी थी । तुम्हें किसी से कोई मतलब नहीं रह गया था । उस दिन तुमने बेहोशी की हालत में अंकुश को कहा कि बस अब तुम्हारी जीने की इच्छा पूरी हो चुकी है सब कुछ तो मिल गया है।अब मैं जी कर क्या करूँगी ,इससे हम सब डर गए।

   अंकुश डॉक्टर से मिला तो उन्होंने ही सलाह दी कि अब उसको छोटा मोटा अपना काम खुद करने दो, इसीलिए न ही हम सब तुम्हें मना करते थे और न ही तुम्हारा काम करते थे। इसका फायदा भी देखने को मिला कि तुम अब बिस्तर से उठकर रसोई तक भी आने-जाने लगी थी। अंकुश की तरफ़ भी पूरा ध्यान रहता था तुम्हारा।

   तनु से अपना बैग मँगवाने पर जब तुम नाराज़ हुई तब मैं और अंकुश एक-दूसरे को देखकर सिर्फ इसीलिए मुस्कुराए थें कि मेरी अनी अब वापस पहले जैसी हो रही है।

    उस दिन तनु को इस तरह गिरते हुए  देख कर हम सब घबरा गए गए और अनायास ही मुँह से ऊँची आवाज निकल गई । हाँ , अंकुश का तुम पर हाथ उठाना,अजय का इस तरह तुम्हें बोलना ,,, वाकई हमारी गलती थी। अगर उसी पल हम सब आपस में बात कर लेते तो नौबत यहाँ तक तो नहीं ही आती। तुमसे  अच्छा, भला और कौन सोचेगा तुम्हारे घर के लिए।

    तनु और अजय ने तो पहले ही तय कर लिया है कि इनके पहले बच्चे की माँ सिर्फ और सिर्फ तुम रहोगी भला तुम दोनों से अच्छे माता-पिता इस बच्चे को और कहां मिलेंगे। अणिमा ने रोते हुए झट से तनु को अपने छाती से चिपका लिया।

      मैं सबके साथ खुशी मन से घर की ओर चल पड़ी।रानी लहरों के बीचो बीच खड़ी हो मुझे देखकर मुस्कुरा रही थी।

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